An open letter to shahabuddin.... मोहम्मद शहाबुद्दीन, माफ़ कीजियेगा आदरणीय के लायक आप हैं नहीं, और आपको सर, साहब और जी कहने का अधिकार तो सिर्फ आपके चमचों, आपके गुर्गे के लोग और आपसे वोट बैंक की उम्मीद रखने वालों के पास है. शहाबुद्दीन, सबसे पहले आपको बधाई कि 11 साल के कारावास के बाद अंततः आप बाहर आए.  अन्य लोगों की भाँती मुझे आपके रिहा होने पर आश्चर्य बिलकुल भी नहीं हुआ. क्योंकि सलमान खान को भी बरी होते हुए देखा है.
मैंने सुना कि रिहा होने के बाद आप १३०० गाड़ियों, मंत्रियों, विधायकों और भारी जन समर्थन के साथ अपने आवास पहुंचे. मुझे यह भी उम्मीद है कि आपके काफिले में शामिल मंत्री, विधायक और भीड़ में ऐसे लोग भी होंगे जो चन्दा बाबू, पत्रकार राजदेव रंजन, के प्रति सहानुभूति रखते होंगे. या फिर कभी न कभी आंसू बहाए होंगे. और भविष्य में भी ऐसे नृशंस अपराध के बाद घंटो अपने-अपने गाँव, मोहल्ले आदि की चौक पर बैठ कर घंटो चर्चा करेंगे और निंदा भी. खैर छोड़िये उस बात से हमें क्या लेना देना. हम अपने काम की बात करते हैं. आपके पास भी समय कम होगा. वर्षो बाद जेल से बाहर आए हैं. लोग भी मिलने को आतुर होंगे.

शहाबुद्दीन, बचपन से मैं आपके किस्से सुनते आ रहा हूँ. लेकिन आपको सुनने और पढ़ने का मौक़ा इस बार मिल पाया. क्योंकि जब मैं सुनने और समझने के लायक हो रहा था तब आप जेल में थे. इसलिए मन किया कि क्यों न आपकी बात को सुनकर आपसे ही कुछ बात कर लूं. नहीं तो ये भी एक किस्सा बनकर ही रह जाएगा.  जेल से निकालने के बाद आपने सबसे पहले बिहार के मुख्यमंत्री को ‘परिस्थितयों का नेता’ कहा. लोग हैरान है कि नितीश कुमार ने जवाब क्यों नहीं दिया? लेकिन मेरे लिए हैरानी का विषय यह भी नही था. सत्ता पाने के बाद नेता कितनी आसानी से आंदोलन(जिसने उन्हें सत्ता तक पहुँचाया) और उससे जुड़ी भावनाओं का दमन करते हैं इसका प्रत्यक्ष उदाहरण मैंने दिल्ली में देखा है. फिर नितीश कुमार भी तो नेता है उनको सत्ता प्यारी क्यों न हो? मुझे हैरान करने वाली बात जो आपकी लगी कि ‘’आप अपनी छवि नहीं बदलना चाहते. आप स्वर्गीय  राजदेव रंजन के परिवार से मिलने जायेंगे. साथ ही आप अपने लिए जेल से महान क्रान्तिकारियों की कुछ किताबें लाए हैं.’’

शुरू आपके दूसरी बात से करते हैं. मैं बहुत उत्सुक हूँ आपसे जानने के लिए कि जब आप स्वर्गीय राजदेव रंजन के परिवार से मिलने जाएंगे तो आप उनकी पत्नी और उनके बेटे से नजर मिलाएँगे क्या? जिनके आँखों में आँसू और भय के साथ-साथ ‘’हमारा क्या कसूर था?’’ सवाल भी तैर रहा होगा? आप जाए उस बच्चे की तस्वीर जरुर देखिएगा जिसमें वो अपने पिता को मुखाग्नि दे रहा था. फिर दाद दीजिएग अपने हिम्मत की कि आप उस परिवार के साथ खड़े है जिनकी खुशियाँ छीन लेने वाला आरोपी आप की रिहाई के जश्न में शामिल था. आपसे एक अनुरोध और है कि आप चन्दा बाबू से भी मिलने ज़रूर जाइएगा. और कोशिश कीजियेगा कि आप उनके बेबस आँखों के सामने कुछ पल ठहरने की. चन्दा बाबू की लकवाग्रस्त पत्नी की आँखों में अपनी छवि देखिएगा हो सकता है आपको अपने छवि का यथार्थ स्वरूप दिखे. और उसको बदलने की जरुरत समझ आने लगे.

आपने कहा कि आप सच्चे मन से गांधी और अन्य महान क्रान्तिकारियों की किताबेँ पढ़ना चाहते हैं. मुझे उम्मीद है कि जब आप महात्मा गांधी को पढ़ रहे होंगे तो आप एक जगह जरुर रुकेंगे. जहाँ लिखा होगा ‘’अपने विरोधी विचारों की ह्त्या या दमन करने वाला इंसान वास्तव में अन्दर से बहुत कायर होता है, क्योंकि वह जीवित रहते उसका सामना नहीं कर सकता.’’ इस वाक्य को अंडर लाइन कीजिएगा. फिर आप आस-पास शीशा हो तो उसमें देखिएगा, अगर शीशा नहीं मिले तो तकनीक का ज़माना है सेल्फी लीजिएगा. शायद आपको अपनी छवि और हिम्मत की वास्तविकता का अहसास होगा. और आपको उसे बदलने की जरुरत महसूस होगी.

इतना सबके बावजूद अगर आपको अपनी यही छवि प्यारी लगे और इसको बनाए रखने की जरुरत लगे तो फिर भोजपुरी में एक कहावत है याद कीजिएगा. ‘’लूर लुफूत बाई, तीनों मुअले पर जाई.’’ आखिर आप सिवान से और मैं बक्सर से तो एक लाइन भोजपुरी यद् करना तो बनता है. बहुत-बहुत धन्यवाद कि आपने अपने समर्थकों की कतार के बीच कुछ समय दिया. बस इन्हीं बातों के साथ...
आपका शुभचिंतक

बिपिन बिहारी दुबे
Bipin Dubey

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