दक्षिण पंथी राजनैतिक पार्टियां सिर्फ़ और सिर्फ़ भावनाओं की राजनीति करती हैं . ये पार्टियां जनता की भावनाओं का राजनीतिकरण करती हैं . इनका हथियार हैं भावनाओं का दोहन . ये जन आस्था , धर्म ,राष्ट्रीयता , संस्कृति , संस्कार , सांस्कृतिक विरासत बचाने का दावा करती हैं , दम्भ भरती हैं और इन मुद्दों पर इनको जन समर्थन भी मिलता है पर दरअसल ये पार्टियां इन भावनात्मक मुद्दों का उपयोग अपने शुद्ध राजनैतिक फायदे के लिए करती हैं या यूँ कहें की इनके यही असली राजनैतिक मुद्दे हैं . ये मुद्दे ऐसे हैं जो जनता के करीब होते हैं या सामन्य भाषा में कहें की हर नागरिक के लिए एक तरह से गर्व के , सम्मान के प्रतीक होते हैं  और सामान्य नागरिक इसके बारे में ज्यादा सोचता नहीं हैं .

दक्षिण पंथी राजनैतिक पार्टियां आस्था , धर्म ,राष्ट्रीयता , संस्कृति , संस्कार , सांस्कृतिक विरासत के मुद्दों का अति सरलीकरण करके जनता के सामने रखती है जैसे एक देश एक भाषा .वो जनता से पूछती है की अपना देश एक है तो भाषा एक होनी चाहिए की नहीं और जनता सरल और सीधा जवाब देती है हाँ एक देश है तो एक भाषा हो ..सवाल भी सरल और जवाब भी सरल ...वाह कितना आसान और सरल तरीका है देश में एक भाषा के फार्मूले का ये अति सरलीकरण ही इनका असली भावनात्मक खेल है ..आइये देखें इसे अपने भारत के व्यवहारिक आईने में ... भारत में हर चार कोस पर पानी और वाणी बदलती है तो क्या ऐसे में सब भाषाओँ का गला घोट दिया जाए ? अलग अलग भाषाओँ के बोलने वालों को डंडे के जोर पर एक ही भाषा बोलने के लिए मजबूर किया जाए ? और उनको डंडे के ज़ोर पर मजबूर किया गया तो देश का क्या होगा? ये ऐसे सवाल हैं जो मस्तिष्क में कौन्धतें हैं .. और हमारे सामने एक नया सवाल खड़ा करतें  हैं की क्या एक भाषा के लिए हम एक देश को तोड़ने का खतरा मोल ले सकते हैं? तो जवाब है भाषा से पहले देश और एक देश ...

अब आइये इन भावनाओं का व्यापार कर अपनी राजनीति चमकाने वालों के राष्ट्रवाद की प्रेरणा कहाँ से आती है . शुद्ध देसी , स्वदेशी , और राष्ट्रवादियों की प्रेरणा विदेशी है .. यूरोप के देशों की नकल है . यूरोप के देश विविधता और बहुलता को पचा नहीं पाये और उन्होंने इंसानियत का क़त्ल कर डंडे के जोर पर  ऐसे राष्ट्रों  का निर्माण किया . उन्हीं यूरोपीय देशों की नकल ये  दक्षिण पंथी राजनैतिक पार्टियां  कर रही हैं . अब सवाल ये है भारतीय परिवेश में ये विचार अमल में लाया जा सकता है ? आइये विचार करें .एक तो भारत मुट्ठी भर लोगों का देश नहीं हैं, १२५ करोड़ लोगों का देश है . भारत दुनिया का एक ऐसा देश है जो जैविक , भौगोलिक विविधताओं का विधाता है . कितने मौसम , ऋतुएं , रंग , भेष , बोली, भाषा हैं की ये जिस राष्ट्रवाद की कल्पना ये  दक्षिण पंथी राजनैतिक पार्टियां भारत में लाने और थोपने की बात कर रही हैं वो नामुमकिन और असम्भव है इसलिए हमारे राष्ट्र की नीव विविधता और बहुलता है !

दक्षिण पंथी कट्टरवादियों ने दरअसल युवाओं को बरगलाने का कामयाब षड्यंत्र रचा है . युवाओं के दिल को मैला किया है .. उनकी भावनाओं को भड़का कर उनके तर्क , विचार करने की बौद्धिक क्षमता का ह्रास किया है , कुंद किया है और इस हद्द तक जहर घोला है की भारतीय संविधान के पवित्र सिद्धांतों के लगभग विरोध में युवाओं के दिल में जहर भरा है इसके उदहारण देखिये हाल ही में भारतीय विषमताओं में सामजिक न्याय और समता के लिए अनिवार्य एक पहल “आरक्षण” पर बवाल इस बात का प्रमाण है की सवर्ण जाति के युवा अपनी प्रगति में “आरक्षण’” को एक बाधा मानते हैं ... “आरक्षण” का उद्देश्य , उसके लाभार्थी , उसके सभी आयामों का शुद्ध तथ्यों के आधार पर विश्लेष्ण करने के बाद भी समझने को तैयार नहीं हैं ..इस हद्द तक मेरे देश के युवाओं के दिलों को मैला किया है की वो अपने तर्क और विवेक बुद्धि का उपयोग करने को तैयार नहीं हैं .

वो जन्म के संयोग से ऊपर उठकर विचार करने की हालत में नहीं है की भारत जैसे देश में जहाँ जन्म के संयोग से बच्चों का भविष्य तय होता हो वहां “आरक्षण” एक न्याय संगत संवैधानिक प्रावधान है . ये  दक्षिण पंथी राजनैतिक पार्टियां नव आर्थिक उदारवाद के दौर में नए रोजगार के अवसर कैसे बढे , युवाओं को रोजगार कैसे उपलब्ध हों , सरकार नए रोजगार कैसे उपलब्ध कराये इस पर चर्चा नहीं करती क्योंकि उनको युवाओं के रोजगार में दिलचस्पी कम और जाति का सहारा लेकर विभिन्न जातियों को आपस में लड़ाने में ज्यादा रूचि  है जिससे ये अपने हिन्दुत्ववादी  एजेंडा लागू कर सकें  . अभी हाल ही में हरियाणा में हुई  हिंसा इसका प्रमाण है .गौर से देखिये इस किसान विरोधी सरकार को असल में किसानों की हालत बेहतर करने का काम करना था पर वो काम नहीं करके ..जो खेती पर आधारित हैं उन्हें आरक्षण  की होली में झोंक दिया . प्रश्न आरक्षण का नहीं है , असल प्रश्न यह है कि किसानों को ‘आरक्षण’ मांगने की ज़रूरत क्यों पड़ी ? खेती की ऐसी हालत क्यों हुई की किसान आत्म हत्या कर रहा है , युवाओं का कृषि को एक रोजगार एक रूप में अपनाने का रुझान कम है , क्यों एक ग्रामीण व्यवस्था वाले कृषि प्रधान देश में किसानों की ये हालत है ? अपने आप को छाती ठोक कर , आत्म घोषित राष्ट्र वादी पार्टी और उनकी सरकार अमेरिका के दवाब में डब्ल्यू टी ओ में किसान विरोधी करार पर साइन करती है और उसकी मंत्री संसद में बयान देती है ..” मज़बूरी थी जी करना पड़ा “ यही इन राष्ट्रवादी सरकार का असली चेहरा .. कथनी और करनी में कोई मेल नहीं ...यही नहीं ये देश की सम्प्रभुता के साथ खिलवाड़ करने का प्रमाण भी है .

दरअसल हमारे युवा तकनीक के फीड का शिकार है , उसको जो फीड कर दिया जाए वही उसके लिए अंतिम सत्य है ..वो देश की नीतियों को  बस अपने निजी सुविधा के हित में देखता , सोचता और परखता है , उसके लिए देश का मतलब है बस उसका भला ... क्योंकि ये स म स SMS  जनरेशन नव उदार आर्थिक युग के दौर की पैदाइश हैं जहाँ विश्वविधालयों में विचार मंथन का दौर लगभग बंद  हो  गया है , सोशल मीडिया बस उपभोगता वाद का मात्र लाइक- डीस लाइक मंच है ऐसे में भारतीय युवाओं को अपने वैचारिक आधार को व्यापक बनाने के लिए अपने लिए नए संवाद मंच बनाने होंगें . जहाँ वो आस्था , धर्म ,राष्ट्रीयता , संस्कृति , संस्कार , सांस्कृतिक विरासत, सेकुलरवाद , लिंग समानता और सामाजिक , आर्थिक , सांस्कृतिक समता  के मुद्दों के  अति सरलीकरण के खेल को समझ सके . इन मुद्दों पर अपने विचार को स्पष्ट कर सके . दक्षिण पंथी कट्टरवादियों के झांसे  में ना आये और शुद्ध भावनाओं से देश के रचनात्मक निर्माण में अपना योगदान दे !

लेखक मंजुल भारद्वाज “थिएटर ऑफ रेलेवेंस” नाट्य सिद्धांत के सर्जक व प्रयोगकर्त्ता हैं. एक अभिनेता के रूप में उन्होंने 16000 से ज्यादा बार मंच से पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है। लेखक-निर्देशक के तौर पर 28 से अधिक नाटकों का लेखन और निर्देशन किया है। फेसिलिटेटर के तौर पर इन्होंने राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर थियेटर ऑफ रेलेवेंस सिद्धांत के तहत 1000 से अधिक नाट्य कार्यशालाओं का संचालन किया है। वे रंगकर्म को जीवन की चुनौतियों के खिलाफ लड़ने वाला हथियार मानते हैं। मंजुल मुंबई में रहते हैं। उन्हें 09820391859 पर संपर्क किया जा सकता है। संपर्क - फोन : 9820391859