छिलके के नीचे प्याज.... हमारे देश में खाद्य पदार्थों के अलावा एक और चीज का बहुतायत में भक्षण किया जाता है। वह चीज है सौगन्ध यानी कसम। मेरे गोरखपुर जिले में इन शब्दों के लिए ''किरिया'' का इस्तेमाल भी किया जाता है। मगर ये शब्द पेट भरने के लिए नहीं अपितु झूठ बोलने के लिए खाये या खिलवाये जाते हैं। हमारे वहॉं बात-बात में लोग किरिया खाते रहते हैं। अदालतें अभियुक्तों और गवाहों को गीता पर हाथ रखवा कर सौगन्ध खिलवाती हैं। मानो गीता की सौगन्ध्‍ा ऐसी अचूक जड़-बूटी हो जिसे खिला देने के बाद बयान देने वाला सच ही सच बोलेगा, सच के सिवा कुछ नहीं बोलेगा। जड़ी-बूटी का असर उल्टा होता है।

बयान देने वाले के पेट में गैस बनने लगती है और एसिडिटी हो जाती है, जिसका परिणाम यह होता है कि कठघरे में खड़ा व्यक्ति अदालत की गरिमा बढ़ाते हुए झूठ की उल्टी पर उल्टी करने लगता है। अदालत में मौजूद लोग मान लेते हैं कि सच ही बोला गया होगा, हालांकि सब को पता होता है कि कितना सच बोला गया है और कितना झूठ। मेरे एक मित्र गीता पर हाथ रखकर कसम खिलवाने की अदालती रस्म में हल्का सा परिवर्तन का सुझाव देते हैं। वह कहते हैं-- गीता पर हाथ रखकर सौगन्ध खिलवाने के बजाय बयान देने वाले को सीधे गीता ही खिलवा देना चाहिए। यह कोई मुश्किल काम नहीं है।

गीता प्रेस इस काम को आसान करने के लिए बहुत पहले से गीता गुटका की छपाई करता आ रहा है, जिसका वजन बीस ग्राम से कम ही होगा। यह गुटका आराम से खाया और तुरन्त पचाया जा सकता है। गीता पर हाथ रखवा कर कसम खिलवाते कई सदी बीत गयी। नतीजा हमारे-आपके सामने है। एक बार सीधे गीता गुटका खिला देने का प्रयोग आजमाने में क्या हर्ज है ! वैसे, हमारी हिन्दू बिरादरी के पास सौगन्ध के रूप में खाने के लिए अन्य बहुत सारी चीजें हैं। मैंने बचपन में अपने गॉंव में ब्राह्मण कुल के लोगों को यज्ञोपवीत यानी जनेऊ हाथ में लेकर सौगन्ध खाते देखा है। कुछ लोग चुल्लू में पानी लेकर जल की सौगन्ध खाते हैं। मॉं, गंगा मॉं, गऊ मॉं आदि की सौगन्ध खाने का भी अच्छा चलन है। तेरी कसम या अपनी कसम खाने का भी रिवाज है। आरएसएस वालों को हिन्दुत्व की सौगन्ध खाते देखा है। इन विधियों को  भी आजमाया जा सकता है।

Vinay Shrikar
This email address is being protected from spambots. You need JavaScript enabled to view it.