भारत देश अपनी आजादी का 70वां जश्न (स्वतंत्रता दिवस) मनाने जा रहा है। इस जश्न को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ‘70 साल आजादी, याद करो कुर्बानी’ के नारे के साथ मना रहे हैं। लेकिन क्या वास्तव में अंग्रेजों की गुलामी के बाद देश के आम आदमी को आजादी से जीने का अधिकार हासिल हो सका है? क्या देश को अंग्रेजों द्वारा बनाये कानूनों से मुक्ति मिल सकी? क्या देश को अंग्रेजियत की गुलामी से मुक्ति हासिल हो सकी? क्या सुभाष चन्द बोस, चन्द्रशेखर आजाद, भगत सिंह, राजगुरू आदि शहीदों का आजादी का सपना साकार हो सका? ऐसे तमाम सवाल हैं जिनका उत्तर देश का आम नागरिक तलाश कर रहा है। आजादी के बाद महात्मा गांधी ने कहा था कि ‘‘संसद में जो भी अंगे्रजी बोलेगा उसे मैं गिरफ्तार करवा दूंगा।’’ लेकिन बापू अपने जीते जी अंग्रेजी बोलने वाले किसी सांसद को जेल भिजवाना तो दूर वह किसी कांग्रेसी सांसद को पार्टी से बाहर का रास्ता तक नहीं दिखा पाये। बल्कि संसद में हिन्दी भाषा बोलने वाले नेताओं की हेय दृष्टि से देखने की परम्परा हो गई। जिसके चलते देश के नेताओं ने अपने बच्चों को या तो विदेशों में पढ़ाना शुरू कर दिया या फिर देश के हाई-फाई अंग्रेजी स्कूलों में बच्चों का दाखिला कराया। जिसे देखकर आम आदमी ने भी अपने बच्चों को इंग्लिश मीडियम स्कूलों में शिक्षा दिलाना शुरू कर दिया। जिसके कारण महानगरों से लेकर ग्रामीण अंचल के गली-मोहल्लों में भी अंग्रेजी स्कूलों की बाढ़ आ गई है।

जिस अंग्रेजी शिक्षा प्रणाली को आरएसएस द्वारा मैकाले की शिक्षा पद्धति बताकर विरोध किया गया था उसने भी अपने विद्यालयों में अंग्रेजी शिक्षा को अनिवार्य घोषित कर दिया। यही ही नही देश के सर्वोच्च न्यायालय से लेकर निचली अदालतों तक को अंग्रेजी ने जकड़ लिया। हालत यह हो गई कि जो भाजपा चुनावी एजेण्डे में ‘‘हिन्दु-हिन्दु-हिन्दुस्तान’’ का नारा देती है वह चुनाव जीतने एवं केन्द्र में सरकार बनने पर शाईनिंग इण्डिया, मेक इन इण्डिया, डिजिटल इण्डिया, स्टार्ट अप इण्डिया जैसे नारों के साथ देश के विकास का दावा करती है।

गुलामी की बेड़ियों को तहस-नहस करने के लिये राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के बाद राम मनोहर लोहिया ने किया। लेकिन गांधी और लेाहिया का ढ़ोल पीटने वाले कांग्रेस और समाजवादियों ने उनके आदर्शों पर कभी अमल करने का प्रयास नहीं किया। आजाद भारत की न्याय पालिका में जज और वकील के मध्य अंगे्रजी में क्या बहस हो रही है आज तक मुवक्किल नहीं समझ पा रहा है। इसी तरह आजादी के दिवस पर देश के राष्ट्रपति क्या संदेश दे रहे हैं यह देश का आम नागरिक आजादी के 70 साल बाद भी नहीं समझ पा रहा है। पूरे देश में एक बार फिर आजादी के जश्न की गूंज सुनाई दे रही है तो वहीं दूसरी तरफ महिलाओं, मासूम बालिकाओं, जेलों में बन्द निर्दोष लोगों की चीखें सुनाई दे रही हैं। वहीं न्यायपालिका में तारीख पर तारीख का सिलसिला लगातार बढ़ता जा रहा है।

भारत देश में आजादी के नाम पर ताकतवर एवं सम्पन्न लोगों द्वारा तेज रफ्तार वाहन चलाकर आम आदमी, गरीब, मजदूरों को मौत के घाट उतारा जा रहा है वहीं महिला उत्पीड़न के सख्त कानूनों के बावजूद भी सड़क से लेकर आलीशान कोठियों, होटलों, वाहनों में अपराधी, नेता, अफसर, पुलिस आदि ताकतवर लोगों द्वारा आये दिन महिला एवं मासूम बच्चियों से रेप की घटनाओं को अंजाम दिया जा रहा है। जिसकी रिपोर्ट लिखना भी पुलिस की मर्जी पर निर्भर है। बल्कि न्याय की लड़ाई लड़ते-लड़ते पीड़िता भी टूटने पर मजबूर है।

एक तरफ आजाद भारत में जजों की तैनाती के अभाव में करोड़ों लोग न्याय की आस में अदालतों के चक्कर लगा रहे हैं वहीं दूसरी तरफ देश के सांसद अधिकारों की आजादी के नाम पर अपने लिये मनचाहे वेतन, भत्ते, सुख-सुविधाएं हासिल कर रहे हैं। जबकि देश की 80 करोड़ की जनता मात्र 30 रूपये दैनिक खर्चे पर जीवन यापन करने पर मजबूर है। देश में तमाम नियम-कानूनों के साथ ताकतवर, माफिया, अफसरों, मिलावट खोरों, पुलिस, नेता, मीडिया को बलात्कार की आजादी मिली हुई है। जिससे मिलावट, घटतौली, सड़क पर धर्मस्थल, दहेज एक्ट, बलात्कार, गौ रक्षा, शिक्षा के नाम पर लूट-खसूट की आजादी प्राप्त है। वहीं आम आदमी के लिये आवश्यक कहे जाने वाले जल-जंगल-जमीन पर माफियाओं, राजनेताओं ने कब्जा कर आम आदमी को उसके हकों से वंचित कर दिया है।

देश को 70 साल में आजादी के नाम पर घोटाले, भुखमरी, भ्रष्टाचार, संगीन अपराध, बदतर कानून व्यवस्था, धर्म, जाति के नाम पर नफरत, बदतर न्याय व्यवस्था, नेता-अफसरों की मनमानी, आरक्षण के नाम पर जातीय नफरत, धर्म के नाम पर भड़कती हिंसा, आतंकवादी हिंसा, सड़कों पर कब्जा, सरकारी मशीनरी में व्याप्त भ्रष्टाचार, राजनीति में जाति-परिवारवाद, नौकरी के नाम पर बेरोजगारों से ठगी, शिक्षा के नाम पर लूट, धर्म के नाम पर पाखण्ड, साम्प्रदायिक दंगे जैसी विकराल समस्याओं का सामना आजाद भारत के आम नागरिक को करना पड़ रहा है।

आजादी के बाद से गरीबी, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, शिक्षा, विकास आदि के नाम पर देश तथा राज्यों में चुनती आ रही सरकारों-नेताओं ने देश तथा जनता का जितना विकास किया वह सबके सामने है लेकिन इस विकास एवं योजनाओं के माध्यम से उन्होंने कितना कालाधन अर्जित किया वह आजाद भारत की जनता के सामने कभी नहीं आ सका। देश आजादी की 70वीं सालगिरह धूम-धाम से मनाने जा रहा है जिसमें न्यायपालिका, कार्यपालिका, विधायिका और प्रेस (मीडिया) भी शहीदों के बलिदान की जमकर जय-जयकार करेंगे। लेकिन क्या देश की सवा सौ करोड़ की जनता को इस आजादी का लाभ मिल पायेगा। इसकी उम्मीद उसे अभी दूर-दूर तक कहीं भी नजर नहीं आ रही है।

लेखक मफतलाल अग्रवाल ‘विषबाण’ मीडिया ग्रुप के संपादक एवं स्वतंत्र पत्रकार तथा सामाजिक कार्यकर्ता हैं.