राजनीति कितनी घिनोनी, दिखावटी, बेशर्म, क्रूर और दिलचस्प होती है इसका नजारा उत्तर प्रदेश में दिख रहा है । दयाशंकर-बसपा के संस्कारयुक्त बयानों से एक दूसरे को नीचा दिखाने की होड़ में शर्मनाक और निंदनीय गाली-गलोज की गंदी राजनीति परवान चढ़ती दिख रही है। सवाल ये है कि क्या वास्तव में एैसे शर्मनाक अपशब्द हमारे नेताओं के मुँह पर अचानक आ जाते हैं । क्या अपने विरोधी का विरोध करने के लिये नेताओं की सभ्यता, विचार, आचरण इतना नीचे अचानक से गिर जाते हैं कि उन्हें ‘वैष्या’ जैसे शब्दों का प्रयोग करना पड़ता है । और क्या मति इतनी मारी जाती है कि इसकी प्रतिक्रिया में विरोधी गड्डा खोदकर उससे भी नीचे गिरकर ‘बहन-बेटी’ पेष करो जैसे असभ्य नारे लगाने को ही वाजिब जवाब समझते हैं । यकीनन नहीं।

ये पहली बार नहीं है कि बसपा सुप्रिमों पर चुनावों में टिकिट को लेकर लेन-देन का आरोप लगा है । एैसा भी नहीं कि केवल बसपा ने ही इस सम्मान को प्राप्त किया है । आरोप लगाने वाले दयाषंकर की पार्टी भाजपा में भी पूर्व में पार्टी के ही नेता टिकिट वितरण में लिये गये नोटों की गिनती बता चुके हैं ।  पिछले बरस ही बिहार में भाजपा सांसद आर.के. सिंह ने पार्टी पर पैसा लेकर आपराधिक छवि वाले व्यक्तियों को टिकिट बेचने का आरोप लगाया था । वैसे राजनीति में जरा सी भी पहुॅंच और जगह रखने वाले लोग जानते हैं कि सभी पार्टियों में पार्टी फंड और अन्य चंदे के नाम पर आर्थिक मदद ली जाती है । कहीं ज्यादा और कहीं कम । लेकिन जिला स्तर पद से लेकर पार्टी टिकिट तक के आवेदकों को कुछ ना कुछ खर्च करना पड़ता है । तो फिर क्या हुआ कि दयाषंकर का बसपा सुप्रिमों पर यह आरोप लगाना इतना तूल पकड़ गया कि इस समय उत्तर प्रदेष में कोई दूसरा मुद्दा ही नहीं दिख रहा है।

रही बात अपषब्दों की तो यह चलन भी नया नहीं है । इस देष में नेताओ कि जुबान फिसलना परम्परा बन गयी है । नेता कब क्या बोल जाये उसको खुद भी पता नहीं रहता । और अगर मीडिया के दो चार ढंग के माईक सामने मिल जायें, फिर तो भगवान ही मालिक है । पिछले दिनों वायरल हुये एक वीडियों में सपा के षिवपाल जी तो आतंकियो को अपना साथी तक बताते नजर आये थे। बसपा के नेता भी इससे पहले ब्राह्मण समाज और हिंदु देवी देवताओं के बारे में विवादित बयान देते दिखाई दे चुके हैं । भाजपा में तो विवादित बयानों के लिये लम्बी फौज खड़ी नजर आती है, जब चाहो तब बुलवा लो । तो फिर बात केवल एक बयान या टिप्पणी की भी नहीं रह गयी।

उ.प्र. में विधानसभा चुनाव नजदीक हैं । पार्टियों के प्रवक्ता, फायरब्रांड, मुँहफट, और तेजस्वी नेताओं की जिम्मेदारी बनती है कि विरोधी पार्टी पर ढूंढ-ढूंढकर आरोप लगायें, और जोरदारी से लगायें । प्रैस कांफ्रैस हुई थी। मायावती पर आरोप लगाना था कि वे टिकिट बेचती हैं । सामान्य सा बयान है, सब बोलते हैं, बहुत से तो अच्छे से जानते भी हैं । इस पर कोई बाईट वायरल नहीं हो सकती । न्यूज भी खास नहीं बनती । लेकिन इस छोटी सी बात को कहने में भाजपा के दयाषंकर जी ने जिस शब्दावली का प्रयोग किया, वो पूरी स्त्री जाति पर कमेंट था, यह सार्वजनिक भी हो गया और व्यक्तिगत भी। धमाकेदार निगेटिव खबर तैयार थी । भाजपा प्रवक्ता ने अपनी बात का वजन बढ़ाने के चक्कर में अनजाने ही बसपा को एक एैसा डमरू पकड़ दिया जिसे बजा-बजाकर पार्टी भाजपा के विरोध में अपने वोटबैंक को एकजुट करने के साथ-साथ जनसहानुभुति बटोर सकती थी । बसपा ने ये किया भी । शोषल मीडिया ने भी इस पर अच्छा रियेक्षन दिया । भाजपा तक ने दयाषंकर की भाषा पर विरोध जताते हुये उन्हें छः साल के लिये पार्टी से निष्कासित कर दिया । नतीजन नारी सम्मान के नाम पर बसपा पूरी ताकत से सड़क पर उतर गयी और अविभूत मायावती जी ने खुद को देवी घोषित कर दिया । पार्टी ने इस विरोध की चिंगारी सेे उ.प्र. चुनाव में भाजपा की तैयारियों को राख करने की रणनीति भी बना ली । दयाषंकर पर मुकदमा दायर हो गया।

लखनऊ में बसपा का विरोध प्रदर्षन हुआ, पार्टी नेता नसीमुद्दीन सिंदद्की के साथ जिलों से कार्यकर्ता, पदाधिकारी और घोषित प्रत्याषी तक ‘बहनजी’ के अपमान पर आक्रोषित होने पहुँचे । लेकिन अतिउत्साह में बसपा नेताओं ने दयाषंकर को जवाब भी उन्हीं की भाषा में दिया । तख्तियों पर उन्हें जानवर बताकर अपषब्द लिखे गये । यहाँ तक गनीमत रही लेकिन मैडम की तरफदारी में आगे दिखने की ललक में बसपा नेताओं ने दयाषंकर से एक कदम आगे जाकर बेज्जती के लिये उनकी माँ, बहन और बेटी को पेष करने की मांग कर डाली । पार्टी नेता कहना चाहते थे कि क्या दयाषंकर अपनी मॉँ, बहन और बेटी के बारे में एैसे शब्द बोल सकते हैं जैसा उन्होनें ‘बहनजी’ के बारे में बोला । लेकिन मूल भावना से इतर बयान को उत्तेजक बनाने की जैसी मंषा भाजपा नेता की रही उससे भी ज्यादा उत्तेजक नारेबाजी बसपा के नेताओं ने कर दी । यहीं से पाषा पलट गया । जिस एक प्रकरण को लेकर बसपा ने पूरे प्रदेष में सहानुभूति का माहोल बनाना शुरू किया था उसमें वह खुद फंस गयी और बुरी तरह फंस गयी । दयाषंकर की पत्नी स्वाति सिंह का अवतरण हुआ । बेटी को लेकर बसपा नेताओं के शर्मनाक बयान पर उन्होनें एक माँ के गुस्से का इजहार किया तो बसपा सुप्रिमों और उनके नेताओं की सारी रणनीति बिखरती चली गयी । हर और बसपा के इन नारों पर जमकर थू-थू हुई और जनता स्वाति सिंह के साथ खड़ी नजर आयी । स्वाति सिंह के साथ दयाषंकर की माँ ने बसपा नेताओं पर एफआईआर दर्ज करा दी । बसपा पूरी तरह बैकफुट पर आ गयी । हालांकि बाद में बसपा के पक्ष में एक वीडियो प्रसारित हुआ जिसमें नसीमुद्दीन सिद्की का पूरा भाषण दिखाया गया। उसमें वे बता रहे हैं कि बहन-बेटी को पेष क्यूँ किया जाये लेकिन तब तक रायता फैल चुका था।

इससे पहले भाजपा दयाषंकर को पार्टी से निष्कासित कर डेमेज कन्ट्रोल करने में ही जुटी थी लेकिन स्वाति सिंह को मिल रहे पब्लिक रेस्पांष को देखकर पार्टी ने इसे हाईजैक कर एक माँ के गुस्से का राजनीतिकरण कर दिया । तुरत-फुरत में ‘बेटी के सम्मान में भाजपा मैदान में’ स्लोगन को लेकर पार्टी ने पूरे उत्तर प्रदेष में धरना प्रदर्षन शुरू कर दिया । यह भावनात्मक मुद्दा था इसलिये इसका भरपूर फायदा लेने की रणीनीति पर कार्य शुरू हुआ ।  शोषल मीडिया के धुरन्दरों ने इसे जातिवाद से जोड़ते हुये मोर्चा ले लिया । फैसबुक पर मायावती के पुराने विवादित नारों से लेकर बसपा नेताओं के देवी-देवताओं को लेकर दिये बयानों को याद किया जा रहा है । लोगों को जोड़ने और तोड़ने का काम जोरों पर चल रहा है । नसिमुद्दीन सिद्की के सर पर 51 लाख का ईनाम रखा गया है तो कई नवोदित राणा मायावती को फूलन देवी के परिणाम याद दिला रहे हैं । विपरीत माहोल को देखते हुये बसपा को पूरे प्रदेष में किये जाने धरना प्रदर्षन की योजना को स्थगित करना पड़ा । फिलहाल मायावती बजाय पार्टी नेताओं के बयानों पर खेद जताने के, इस मामले पर आगे मोर्चा लेने की रणनीति बना रहीं हैं । जानकार बताते हैं कि इससे बसपा को फायदा कम, नुकसान ज्यादा उठाना पड़ सकता है ।

कुछ महीनों पहले उ.प्र. के टीवी सर्वेक्षणों में मायावती के मुख्यमंत्री बनने के नतीजो से सपा परेषान थी लेकिन इस नये लफड़े ने बसपा सुप्रीमों को इस कदर फंदे में लिया है कि ताजा सर्वेक्षण भी हो लिये हैं । अबके नतीजों में मायालहर में कमी के संकेत आये हैं । सपा के लिये ये राहत की खबर है  । भाजपा से निपटने के लिये सपा साम्प्रदायिक्ता फैलाने के आरोप का इस्तेमाल करती है अबकी बार तहजीब का मसला भी हाथ आ गया है । सपा के दो दुष्मन खुद-ब-खुद लड़कर कमजोर हो रहे हैं । बसपा-भाजपा के इस ‘दंगल’ से सुकून पाये अखिलेष यादव चुटकी लेते दिखते हैं । उनका कहना है कि भाजपा ‘बुआ’ से राखी बंधवा ले सब मामला शांत हो जायेगा। सपा के फायरब्राण्ड आजम खाँ ने इसे ‘दो बदतमीजों की लड़ाई’ बताकर रस्म अदायगी की है । हालांकि सूत्र बताते हैं कि सपा रणनीतिक रूप से इस प्रकरण पर आगे बढ़ रही है । इसकी बानगी पुलिसिया कार्यवाही की इस तत्परता से समझी जा सकती है कि फरार चल रहे दयाषंकर के खिलाफ लखनऊ पुलिस ने गैर जमानती वारंट जारी कर दिये और कुर्की की तैयारी है। अभी स्वाति सिंह की शिकायत पर खास कार्यवाही नहीं हुई है।

राजनैतिक पंडित बताते हैं कि गाली-गलौज और शर्मनाक बयानों की इस ताजा श्रंखला में भाजपा को बढ़त मिली है ।  स्वाति सिंह की आक्रामक शैली और योग्यता से प्रभावित भाजपा को एक तेजतर्रार नेत्री मिल गयी है । बसपा तेजी से पीछे गयी है वहीं कांग्रेस अभी इस युद्धक्षेत्र में घुसने की योग्यता तैयार करने में जुटी है । इस बदजुबानी जंग से बड़ा फायदा सपा को हुआ है । पिछले दिनों जवाहरबाग, कैराना जैसे मामलों से प्रदेष में कानून व्यवस्था और अराजकता जैसे मुद्दों को लेकर सपा पर हो रहे लगातार हमलों से राहत मिली है । विषेषज्ञ बताते हैं कि चुनावी साल में आरोप-प्रत्यारोप, मान-सम्मान और फायदे-नुकसान की और भी लड़ाईया देखने को मिलेगीं । 

कुल मिलाकर जिन शर्मनाक बयानों पर जनता की भावनाओं को अपने पक्ष में करने की होड़ मची है उनका राजनीतिक लाभ उठाने पर कार्य चल रहा है । एैसी असभ्य भाषा से व्यक्तिगत भावनाओं को ठेस पहुंचने की बात पीछे रह जाती है जब इन पर राजनीति की चालें चलना शुरू हो जायें । आम जनता अपने नेता और जाति के प्रति अपमान समझकर आक्रोषित होती है लेकिन उसे पता भी नहीं चलता कि वो कब इन राजनैतिक धुरंधरों के हाथ की कठपुतली बन गयी । सम्मान की इस लड़ाई में हाषिये पर पड़ी जनता इस बात को लेकर दुखी है कि राजनीति अब असल मुद्दों से दूर हो रही है । सत्ता की चाह में राजनेता भाषा और मर्यादा तक की योग्यता खो रहे हैं । एैसे में इनसे कौन सी नैतिकता की उम्मीद की जाये ये समझ से बाहर है । प्रदेष में अव्यवस्थायें और समस्यायें मुँह फैलायें खड़ी हैं लेकिन विपक्षी पार्टियों को जनता से जुड़ा कोई मुद्दा ढूंढे नहीं मिल रहा है । राजनेताओं की अभ्रद भाषा भले ही इनके लिये राजनीति चमकाने में प्रयोग हो रही हो लेकिन आम जनता को सिवाय शर्म के कुछ नहीं मिला ।

जगदीश वर्मा ‘समन्दर’
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