इस वक्त पूरे देश में जहां भ्रष्टाचार पर बहस छिड़ी हुई  है तथा एक मजबूत एवं सशक्त लोकपाल कानून बनाये जाने की कवायद चल रही है वहीं एक और कानून जिसने भ्रष्टाचार पर नकेल डालने में कामयाबी हासिल की है, अपने छह वर्ष पूरे कर लिए हैं। संयुक्त प्रगतिशील सरकार ने अपने पिछले कार्यकाल में जानने के अधिकार को लागू किया। भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश है तथा यहां अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सहित अन्य अधिकार आम आदमी को संविधानतः प्राप्त हैं। इसी कड़ी में सूचना का अधिकार लागू किया गया। अक्टूबर 2005 को ही राज्यों ने इसे अपने यहां लागू किया। इस लिहाज से यह कानून अपना छह वर्ष का सफर पूरा कर चुका है।

इन छह वर्षों की प्रगति का विश्लेषण करें तो कहीं इस कानून के जरिए आम आदमी को राहत मिली है वहीं दूसरी और सूचना मांगने वालों पर हमले जैसी घटनाएं भी प्रकाश में आई हैं। आरटीआई के पीछे मकसद यही था कि आम आदमी को जानने का अधिकार मिले। राशन कार्ड में देरी, पासपोर्ट की प्रक्रिया, सरकारी महकमों में भ्रष्टाचार सहित तमाम जानकारियां आवेदकों ने प्राप्त की, यही वजह रही कि राष्‍ट्रीय स्तर तक कई ऐसे मामले प्रकाश में आए जिन्होंने सूचना के अधिकार के मजबूती से बढ़ने का संकेत दिया। इसी कड़ी में 09 अगस्त 2011 को सुप्रीम कोर्ट का एक फैसला अति महत्वपूर्ण रहा। क्‍या सूचनाधिकार के तहत विद्यार्थी अपनी उत्तर पुस्तिकाएं देख सकते हैं संबंधी सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जांची गई उत्तर पुस्तिकाएं आरटीआई कानून में दी गयी सूचना की परिभाषा में आती हैं। इस फैसले के बाद सभी तरह की परीक्षाओं में शामिल विद्यार्थियों को आरटीआई के तहत अपनी जांची जा चुकी उत्तर पुस्तिकाएं देखने का अधिकार होगा।

वहीं एक अन्य दिलचस्प फैसले में राष्टीय उपभोक्ता फोरम ने सूचना मांगने वाले को उपभोक्ता मानकर वाद की सुनवाई कर एक नई इबारत लिखी। हुआ यूं कि मैसूर सिटी के डॉक्टर एस.पी. तिरूमला ने नगर निगम से दो आरटीआई लगाकर यह जानकारी मांगी थी कि निगम ने फोन लाइन बिछाने के लिए उनके क्लीनिक के आगे खुदाई की, परन्तु इसकी ठीक से मरम्मत क्‍यों नहीं की। डॉ. तिरूमला को निगम द्वारा जानकारी नहीं मिली तो उन्होने उपभोक्ता फोरम का दरवाजा खटखटाया, जिस पर सूचना हेतु सूचना शुल्क जमा कराने के कारण डॉक्टर तिरूमला को जिला उपभोक्ता फोरम ने उपभोक्ता माना तथा निगम पर 500 रुपये जुर्माना हुआ। निगम ने राज्य तथा केन्द्रीय उपभोक्ता फोरम में अपील की जहां से उसे राहत नहीं मिल सकी। बहरहाल यह तो बानगी भर है। राष्‍ट्रीय स्तर पर कई ऐसे मामले चाहे वह राष्‍ट्रमंडल खेलों में घोटाला हो या काले धन संबंधी तथ्य, आरटीआई के जरिए बेपर्दा हुए।

मई 2011 को आया केन्द्रीय सूचना आयोग का फैसला भी कम महत्वूपर्ण नहीं जिसमें यह कहा गया कि सुप्रीम कोर्ट को भी इस कानून के तहत सूचना देनी होगी, वहीं राज्य के संदर्भ में राज्यपाल द्वारा गृह मंत्रालय को भेजी रिपोर्ट भी सूचना के तहत मुहैया करानी होगी। कुल मिलाकर आरटीआई ने छह वर्षों के अपने सफर में उल्लेखनीय प्रगति की है।

वैश्विक परिदृश्य में आरटीआई : 10 दिसम्बर 1948 को संयुक्त राष्‍ट्र महासभा द्वारा स्वीकृत मानवाधिकारों में आरटीआई को मान्यता दी गयी। अब तक 85 देशों में कानूनी तौर पर यह कानून लागू है। इनमें 1766 में लागू हुआ स्वीडन का फ्रीडम ऑफ प्रेस एक्ट सबसे पुराना कानून है। इसे लागू करने वाले कुछ देश निम्न हैं।

देश तथा इसे  लागू करने का वर्ष

अमेरिका       1964
आस्टेलिया    1982
यूके             2000
जापान          2001
पाकिस्तान     2002
जर्मनी          2005
चीन            2008
बांग्लादेश      2009

आवेदकों के लिए मुश्किलें कम नहीं : इस अधिकार का प्रचार-प्रसार तेजी से हो रहा है इसमें कोई संशय नहीं परन्तु आरटीआई आवेदकों पर हमले जैसी घटनाओं ने मुश्किलें बढ़ा दी हैं। अन्ना हजारे के अनशन के दिन भोपाल में 16 अगस्त को सक्रिय आरटीआई कार्यकर्ता 39 वर्षीय शहला मसूद की उनके आवास के बाहर गोली मारकर हत्या कर दी गयी। यह कोई अकेली वारदात नहीं इससे पूर्व में लगभग एक दर्जन ऐसी बड़ी वारदातें हुईं, जिन्हों ने पूरे देश को स्तब्ध कर दिया। आरटीआई कार्यकर्ताओं पर हमले की घटनाओं में गुजरात व महाराष्ट्र अग्रणी रहे। इस संदर्भ में राष्‍ट्रीय आरटीआई फोरम के अमिताभ ठाकुर का कहना है कि कानून में ही कमी है, जिसकी वजह से आरटीआई कार्यकर्ताओं की जान जोखिम में पड़ रही है। सूचना चाहने वाले आदमी को खुद सामने आना पड़ता है, जिसकी वजह से वह टार्गेट बन जाता है। कुल मिलाकर आरटीआई आवेदकों पर हमले चिंताजनक तो हैं परन्तु ऐसा बिल्कुल नहीं कि इस कारण सूचना मांगने वालों की रफ्तार कम पड़ी हो।

उत्तराखण्ड में ऐसा रहा सफर : यूं तो उत्तराखण्ड राज्य 13 जनपदों के समूह का छोटा सा राज्य है परन्तु इस राज्य में आरटीआई के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति हुई है। कानून लागू होने से 06 सितम्बर 2011 तक कुल 5516 अपीलें आयोग को मिली जिनमें से 5036 लगभग 92 फीसदी का निस्तारण हो चुका है। वहीं खास बात यह रही कि आयोग ने सूचना देने में कोताही बरतने वालों को फटकार लगाई तथा जुर्माना भी किया। गौर करें तो वर्ष 2006-07 में 60 हजार रुपये विभिन्न अधिकारियों से दण्डस्वरूप वसूला गया तथा अब यह वर्ष 2010-11 के आंकड़ों के अनुसार बढ़कर 4 लाख 86 हजार 500 तक पहुंच गया।

जहां आयोग ने कई महत्वपूर्ण फैसले लिए वहीं एक फैसला ऐसा रहा जिसमें बार-बार निर्देशों की अवहेलना करने पर संबंधित अधिकारी को गिरफ्तारी हेतु सम्मन जारी करने तक की चेतावनी दे दी गयी। प्रकरण के अनुसार श्रीनगर उत्तराखण्ड निवासी प्रदीप बहुगुणा की अपील पर सुनवाई करते हुए आयोग ने परियोजना समन्वयक को कई बार सूचना उपलब्ध कराने को कहा परन्तु तय तारीख तक उन्होंने ऐसा नहीं किया, जिस पर आयोग ने उन्हें अगली तारीख पर उपस्थित न होने की दशा में गिरफ्तारी सम्मन जारी करने की चेतावनी दी। आयोग ने यह कदम आरटीआई की धारा 18.3 में प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग करते हुए उठाया। यही नहीं कानून के व्यापक प्रचार-प्रसार के लिए आयोग ने इसे स्कूल, कॉलेजों, ग्राम पंचायत स्तर तक पहुंचाने का बीड़ा उठाया है। इस बाबत उत्तराखण्ड के सूचना आयुक्त श्री विनोद नौटियाल कहते हैं कि ग्रामीण क्षेत्रों में इस कानून के प्रति जागरूकता का अभाव है इस कारण आयोग जनता के द्वार पर पहुंचेगा तथा उक्त सभी जगहों पर प्रचार की तैयारी है। सूचना आयुक्तों को जनपद आबंटित कर दिये गये हैं तथा मौके पर शिकायतें भी ली जाएंगी। इस लिहाज से यह एक बेहतर प्रयास ही कहा जाएगा।

लेखक शिवा अग्रवाल गुरुकुल कांगड़ी विश्‍वविद्यालय में सूचना के अधिकार विषय के शोधार्थी हैं.