ज़माना तेज़ गति से बदल रहा है.. ज़ाहिर है इससे कोई बच नहीं सका है.. बात करें जेंटलमेन गेम क्रिकेट की तो सबसे लोकप्रिय खेल माना जाने वाला क्रिकेट भी अब कई तरह के बदलावों से गुजरने के बाद अब जेंटलमेन गेम कहलाने लायक नहीं रह गया है.. जी हाँ.. एक ज़माना था जब क्रिकेट सभ्य यानी जेंटलमेनों का खेल कहा जाता था.. लेकिन आज बीते ज़माने के क्रिकेट और ताजातरीन क्रिकेट में तुलना करें तो शायद ये बात साफ़ हो जाती है कि इस खेल में काफी कुछ बदल गया है.. टेस्ट मैच से वन डे, और वन डे से ट्वेंटी-ट्वेंटी..  और अब टेन-टेन से गली क्रिकेट के इस सफ़र में कहीं न कहीं क्रिकेट से जेंटलमेन का तमगा हटता नज़र आ रहा है.. क्रिकेट के शुरुआती दौर में सफ़ेद कपड़ों में क्रिकेट खेलना सभ्य लोगों के खेल की निशानी माना जाता था.. दौर बदला, कांसेप्‍ट बदला और कपड़ों का रंग भी बदला.. लेकिन साथ ही बदला सभ्य माने जाने वाले क्रिकेटरों का स्वभाव, उनका बॉडी लैंगवेज और उनका एटीट्यूड.

"स्लेजिंग" नाम के कांसेप्‍ट ने तो इस सभ्य क्रिकेट का नक्‍शा ही बदल कर रख दिया.. आज के युवा और जोशीले गेंदबाज़ अक्सर बल्लेबाज़ को ऐसे घूरता है मानो अगर वो क्रीज़ छोड़कर नहीं गया तो वो उसका खून ही पी जाएगा.. वहीं बल्लेबाज़ भी कुछ कम नहीं... वो भी रन बनाकर बल्ले को ऐसे घूमाता है, जिसे देखकर लगता है कि अगर गेंदबाज़ या कोई फील्डर उससे दूर न खड़ा हो तो उसका सर ही फट जाए..  मैदान में कई बार तो बल्लेबाज़ और गेंदबाज़ में ऐसी तनातनी हो जाती है कि इस गरमाए माहौल पर नियंत्रण करने के लिए मैदान के दो अम्पायरों को तो क्या मैदान के बाहर तीसरे और चौथे अम्पायर्स तक को हस्तक्षेप करना पड़ जाता है.. इन दिनों कोई ऐसे इक्का-दुक्के मामले हो तो बताएं.. लगभग हर मैच में कुछ ऐसा ही देखने को मिल ही जाता है.

पाकिस्तान और भारत के बीच हुए मैचों में किरण मोरे- जावेद मियांदाद और वेंकटेश प्रसाद-आमिर सोहेल के बीच मैदान में हुए हॉट टाक्स को भला कौन भूल सकता है.. और भारत के युवा तेज़ गेंदबाज़ श्रीसंत का गेंदबाजी से कहीं ज्यादा अपने सामने के बेट्समैन को गुस्से से देखने का नज़ारा तो क्रिकेटप्रेमियों के ज़हन में ताज़ा ही होंगे.. ये सिर्फ और सिर्फ भारत और पाकिस्तान के खिलाड़ियों की ही बात नहीं है.. विदेशी खिलाड़ी तो इनसे भी आगे हैं.. खिलाड़ी करें भी तो क्या..  उन्हें शुरू से प्रशिक्षण भी इसी बात का दिया जाता है..  बीते ज़माने के जेंटलमेन गेम के ही तो क्रिकेटर्स हैं जो तमाम देशों के कोच बन बैठे हैं.. ये इन कोचेज़ की ही सीख का परिणाम है कि आज मैदान में उतरते ही क्रिकेटर्स के दिलो-दिमाग में प्रतिद्वंदी टीम के प्रति गुस्से और द्वेष की भावना रहती है.. अपने विरोधियों को हराना है तो उनपर प्रेशर डालना ज़रूरी है, लिहाज़ा प्रेशर डालने के लिए क्रिकेटर्स को विरोधी खेमे के खिलाड़ियों पर आक्रोश और बदले की भावना से ही मैदान में उतरने की सीख दी जा रही है..  ऐसे में क्रिकेट इतिहास में तब से लेकर अब तक एक जेंटलमेन क्रिकेटर से जेंटल की संज्ञा कहीं खोती सी जा रही है.

यही नहीं पहले तो मैच फिक्सिंग और अब ताजातरीन स्पॉट फिक्सिंग ने भी इस जेंटलमेन गेम की सत्यता पर ही प्रश्न चिन्ह लगा डाला है.. शायद ही कोई देश ऐसा बच रहा हो, जिसका किसी खिलाड़ी पर मैच का परिणाम उसके खेले जाने से पहले ही तय करने के आरोप न लगे हो.. क्रिकेट खेल में भ्रष्टाचार तो एक अलग ही लम्बे-चौड़े बहस का विषय है.. आज का "जेंटलमेन" क्रिकेटर बाज़ार भाव में बिक भी रहा है, जिसकी शायद किसी ने कल्पना भी नहीं की होगी.. धोनी, गंभीर, सहवाग और यहाँ तक की क्रिकेट के भगवान सचिन की भी कीमत लग रही है और उन्हें खरीदने की जैसे होड़ मच जाती है.. यही नहीं जो क्रिकेटर किसी साल करोड़ों में बिकता है, उसी क्रिकेटर को दूसरे साल कोई खरीददार तक नहीं मिल पाता.. बहरहाल, क्रिकेट के खेल में हो रहा ये बदलाव भले ही क्रिकेट को और पॉपुलर बनाने में सफल हो रहा हो या इसे बदनाम करने का काम कर रहा हो.. लेकिन एक बात तो तय है कि कभी जेंटलमेन गेम कहलाने वाले इस खेल में कुछ ज्यादा ही नकारात्मक शैली हावी होती जा रही है.. अब आप ही बताएं क्या क्रिकेट में कहीं जेंटलमेन जैसी कोई बात रह गयी है?

लेखक नकुल देवर्षि जयपुर के रहने वाले हैं.