डा. नूतन ठाकुरहम लोग जब भी किसी अंतर्राष्ट्रीय भाषा की बात करते हैं हमारे जेहन में मात्र एक भाषा आती है अंग्रेजी. इंटरनेशनल यानी इंग्लिश. और हिंदी? वह तो एकदम से देहाती भाषा है. मात्र हिंदी गो-पट्टी की भाषा, जिसे अब तक पूरे भारत देश के लोगों ने भी ना तो समुचित मान्यता दी है और ना ही हृदय से स्वीकार किया है. जब तक मैं भारत से बाहर नहीं गयी थी,  तब मैं भी ऐसा ही मानती थी. पर अब जब अमेरिका से घूम आई हूँ तो मुझे यही एहसास हो रहा है कि हम लोग वास्तव में हिंदी के साथ बहुत बड़ा अन्याय कर रहे हैं.

मैं जिस ग्रुप के साथ अमेरिका भ्रमण पर गयी थी उसमे कुल दस लोग थे- तीन भारत से, तीन ही पाकिस्तान से, एक अफगानिस्तान, एक श्रीलंका, एक भूटान और एक कजाकिस्तान से. इन में से कजाकिस्तान की गुल्मिरा रैजिकोवा को तो हिंदी बिलकुल ही नहीं आती थी, दूर-दूर तक नहीं. पर शेष सभी लोगों से मेरी बातचीत का एक बड़ा हिस्सा हिंदी में ही होता था. जी हाँ, हिंदी में. बल्कि उससे भी घोर आश्चर्य यह कि इन सब लोगों में सबसे अधिक अंग्रेजी हमारे भारत के ही दो प्रतिनिधि प्रयोग करते थे.

भूटान के एक सांसद थे चोयडा जैमसो, वे हिंदी ना सिर्फ आराम से समझ लेते थे बल्कि थोड़ी-बहुत बोल भी लेते थे. श्रीलंका के पत्रकार थे जो सिंहली भाषी अखबार में काम करते हैं, वे भी हिंदी बोल लेते थे और जो नहीं बोल पाते उसे अपने इशारों और हाथों के जरिये समझा लेते थे. इस तरह जैमसो साहब से तो हिंदी में खास बात नहीं हो पाती थी पर श्रीलंकाई पत्रकार मनोज अबयधीरा ना सिर्फ हिंदी में बात करना पसंद करते थे, बल्कि उन्हें हिंदी फिल्मों और हिंदी गानों का भी भारी शौक था. पता नहीं कब-कब की फिल्मों के गानों के बारे में पूछते रहते और उन फिल्मों के बारे में भी. दीपिका पादुकोने उनकी पसंदीदा हीरोइन हैं,  जिसके बारे में कुछ भी बुरा नहीं सुन सकते थे. अंग्रेजी के प्रति उनके मन में अच्छी भावना नहीं थी और वे इसे गुलामी का प्रतीक मानते थे.

अफगानिस्तान के मोहम्मद अनीस भी हिंदी बहुत तो नहीं जानते थे, पर हिंदी में बात करना उन्हें अच्छा लगता था और काफी प्रयत्न कर के वे हिंदी बोलते दिख जाया करते. पाकिस्तान के तीनों प्रतिनिधि सिविल सर्वेंट थे पर फैसल अहमद, लाल जान जफ़र तथा आरिफ रहीम से बात करते वक्त लगता नहीं था कि वे हमारे देश के नहीं हैं. सब के सब हिंदी (या शायद उर्दू) में पारंगत थे और बड़े मजे से उन लोगों से अपनी ही जुबान में बातें होती थीं. हिन्दुस्तानी प्रदीप कुमार और अनुभा रस्तोगी की अंग्रेजी काफी अच्छी थी और वे बहुधा अंग्रेजी का प्रयोग करते दिख जाया करती थीं.

ये बातें यह साफ़ साबित कर देती हैं कि एक भाषा के रूप में हिंदी ना सिर्फ बहुत समृद्ध है बल्कि इसकी हमारे देश के बाहर भी पकड़ और फैलाव है. यह भी साफ़ हो जाता है कि भले ही हम इस देश में हिंदी को राष्ट्रभाषा में स्वीकार करने में हिचक रहे हों, पर बाकी एशियाई देशों में इस बात पर लगभग सहमति सी है कि हिंदी हमारे देश की अधिकृत भाषा है और यह भाषाई स्तर पर भारत वर्ष का प्रतिनिधित्व भी करती है. तभी तो लगभग नहीं के बराबर हिंदी जानने वाले भूटान के जैमसो भी यह मानते हैं कि यदि वे किसी भारतीय से बात कर रहे हैं तो इसके लिए हिंदी भाषा उपयुक्त रहेगी और श्रीलंका के मनोज हिंदी में अपने आप को संप्रेषित करते हुए गौरवान्वित महसूस करते हैं.

इसके विपरीत हम लोगों को देखिये जो यदि अंग्रेजी नहीं जानते हैं तो कहीं ना कहीं अपने-आप को कुछ कमजोर और वंचित सा मानते हैं,  जैसे कि हमारा समुचित विकास हुआ ही नहीं हो. यही नीति हमारी सरकारों की भी रहती है. ज्यादातर शासकीय स्थानों पर अंग्रेजी भाषा का ही प्रयोग होता है और हिंदी की घोर अवहेलना होती है. आईआईएम के लिए होने वाले कैट परीक्षा के लिए तो हिंदी भाषा में परीक्षा तक नहीं होती क्योंकि इन लोगों का यह मानना है कि भारत में अच्छा मैनेजर मात्र अंग्रेजी भाषा-भाषी ही हो सकता है.

यह है इस देश में हिंदी की स्थिति. और इसी के साथ जुड़ा हुआ है एक छोटा सा वाकया. मैं जब न्यूयार्क अंतर्राष्ट्रीय हवाईअड्डे से वापस भारत आ रही थी तो हवाई जहाज़ के बारे में अनाउंसमेंट करते समय अंग्रेजी के अलावा हिंदी भाषा का भी प्रयोग किया गया था. मुझे यह सुन कर वास्तव में खुशी मिली थी और इस बात का भी एहसास हुआ था कि हिंदी भाषा की मान्यता अमेरिका तक में दी जा रही है. पर अफ़सोस इस बात का कि अमेरिका जाते समय हमारे अपने देश के इंदिरा गाँधी अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे पर मैंने देखा था कि एनाउंसमेंट केवल अंग्रेजी भाषा में ही हो रहा था, मेरी याददाश्त के मुताबिक वहाँ एक बार भी हिंदी भाषा का प्रयोग नहीं किया गया था. तो इसका क्या मतलब हुआ, जिस हिंदी तो अमेरिका महत्व दे रहा है उसे हमारा भारत घास के तीन पात समझ रहा है.

डॉ. नूतन ठाकुर

संपादक

पीपल'स फोरम, लखनऊ