भास्‍कर: देसी पद्धति सर्वपिष्‍टी से इलाज करने का दावा : चिकित्सा विज्ञान जटिलतम बीमारियों के गूढ़ रहस्यों का पता लगाने के लिए निरन्तर जूझ रहा है। ऐसी अनेक बीमारियां जो मानव जीवन के लिए काल बनी हुई थी, उन्हें पछाड़ कर चिकित्सा विज्ञान ने अपनी उपयोगिता साबित कर दिया है। लेकिन काल से होड़ है की तर्ज पर आज भी चिकित्सा विज्ञान की जंग कैंसर जैसी प्राणघातक बीमारी के साथ जारी है। गौर करने की बात है कि हर साल दुनिया में कैन्सर 80 लाख मानव जिदंगियों को निगल जा रहा है। इंसानी जिदंगी की खुराक पर जिंदा रहने वाले इस रोग पर अगर काबू न पाया गया तो 2020 तक पौने दो करोड़ जिंदगियां हर साल इस की जद में होंगी।

कैंसर जिसका नाम सुनते ही जीवन की आस खत्म होने लगती है और मृत्यु का बोध कही गहरे तक होने लगता है। एक ऐसी बीमारी जिसका होना सिर्फ होने वाले के अस्तित्‍व को ही खत्म नहीं करती बल्कि उसके परिवार को मानसिक और आर्थिक तौर पर दिवालिया बना कर छोड़ती है। कारण है इस बीमारी के इलाज के लिए होने वाला खर्च। गरीब देश में इस बीमारी का इलाज सबके लिए आसान नहीं है। क्यों कि इसके इलाज के कैंसरलिए लाखों-लाख रूपयों की जरूरत होती है। जैसे मुनाफा कमाने वाले तंत्र के गिरफ्त में मानव जीवन के जरूरतों से जुड़े बाकी क्षेत्र आ चुके हैं,  उसी तरह चिकित्सा विज्ञान का क्षेत्र भी अछूता नहीं रह गया है।

गंभीर बीमारियां से तो इस देश में लोग मरते ही हैं,  लेकिन उससे कहीं ज्यादा मर जाते हैं उन रोगो के उचित चिकित्सा न होने से। कारण की मुनाफाखोर चिकित्सा तंत्र की कीमत चुकाने की हिम्मत सबकी नहीं होती। अमूनन कैंसर के इलाज का खर्चा लाखों में होता है,  सो कागज के नोटों के अभाव में मानव जिदंगी की सांस उखड़ जाती है। और वो औंधे मुंह गिरकर दम तोड़ देती है। ऐसे में अगर कोई सस्ती चिकित्सा के जरिए इस रोग को जड़ से खत्म करने के साथ ही कैंसर के मरीजों को पूर्णत स्वस्‍थ करने की बात कहता है तो क्या चिकित्सा विज्ञान को उसकी बातों को गौर से सुनना नहीं चाहिए? या फिर उस चिकित्सा पद्वति का सूक्ष्मता से निरीक्षण कर दावा करने वाले को मौका नहीं देना चाहिए,  ताकि वो अपने दावों को जायज ठहरा सके,  लेकिन शायद मुनाफाखोरों के कब्जे में चल रहे चिकित्सा क्षेत्र को इस बात का खतरा है कि अगर इस किस्म की कोई चिकित्सा ने अपनी जगह बना ली तो उनके उन दुकानों का क्या होगा जो मानव जीवन की कीमत पर अकूत धन कमा रही है।

सर्वपिष्टी एक ऐसी ही विधि है कैंसर के इलाज की। जिसके प्रयोग से कैंसर के रोगी फिर एक जिदंगी की राह पर चल पड़ते है। एक दो साल नहीं तकरबीन 45 साल से इस पर शोध कर रहे डा. उमाशंकर तिवारी और प्रो. शिवाशंकर त्रिवेदी ने कैंसर को पछाड़ कर जिदंगी को आगे ले जाने का रास्ता खोजा है। पोषक उर्जा यानी सर्वपिष्टी के माध्यम से इस बीमारी का इलाज संभव है। वाराणसी में रविन्द्रपुरी स्थित डीएस रिर्सच सेन्टर इस काम को अंजाम दे रहा है। रिर्सच सेन्टर ने कैन्सर के सैकड़ों मरीजों पर इस विधि का प्रयोग कर उन्हें पुन: जिंदगी की और लौटाया है। ये सारे ऐसे रोगी थे जो तमाम चिकित्साविधियों को अपनाने के बाद अपने मौत के इन्तजार में थे,  आज ये सारे लोग जिंदगी के गले में बाहें डालकर चल रहे है।

डा. शिवाशंकर त्रिवेदी का कहना है कि सचेतन मेटाबोलिज्म का आत्यान्तिक विचलन ही कैन्सर है। इस विचलन को पोषक उर्जा द्वारा समाप्त किया जा सकता है। प्राकृतिक मानवीय भोज्य पदार्थों से प्राप्त पोषक उर्जा से ही हमने सर्वपिष्टी औषधि का विकास किया है। इस सन्दर्भ में उन्होंने विश्व स्वास्थ्य संगठन को अपने लिखे गए पत्र में कैन्सर को जड़ से उखाड़ फेंकने के लिए इस विधि को अपने हाथ में लेने की गुजारिश की है। ये अलग बात है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन की ओर से कोई जवाब नहीं आया। तमाम तरह के आलोचनाओं के बावजूद अपने मिशन में लगे डा. शिवाशंकर त्रिवेदी को पूर्ण विश्वास है कि एक दिन उनकी सुनी जाएगी। दुनिया में कैन्सर का इलाज नहीं दुनिया कैन्सर मुक्त होगी। कहा भी गया है-

इक न इक शमां अंधेरे में जलाए रखिए
सुबह होने को है माहौल बनाए रखिए।

लेखक भास्‍कर गुहा नियोगी वाराणसी के निवासी हैं तथा हिन्‍दी दैनिक युनाइटेड भारत से जुड़े हुए हैं.