आज के गांधी के रूप में विख्यात अन्ना हजारे महाराष्ट्र के अपने गांव रालेगांवसिद्धि, जो उनकी कर्मभूमि भी है, पहुंच चुके हैं। बीबीसी हिन्दी वेबसाइट में प्रकाशित आलेख 'अन्ना का आदर्श गांव' बताता है कि कैसे अन्ना ने पांच साल के अथक प्रयासों के बाद गांव के लोगों को शराब पीने से रोका। जिस गांव में शराब की भट्टियां हुआ करती थी वहां कैसे पान-बीड़ी सिगरेट, तम्बाकू की दुकान तक नहीं है। अब वहां बैंक हैं, साफ सुथरी सड़कें हैं और बाहर से आने वालों के लिये जगह है, इंटरनेट और लाइब्रेरी की सुविधा है। सुबह पांच बजे उठकर योग प्राणायाम से अपनी दिनचर्या शुरू करने वाले अन्ना अब भी गांव के उसी लकड़ी के मंदिर में रहते हैं, जहां से 1975 में उन्होंने फौज की ड्राइवर की नौकरी छोड़ने के बाद से समाज सेवा शुरू की थी।

सुबह भजन ध्यान के बाद लोगों से मिलना जुलना, स्कूलों और दफ्तर का काम निपटाना और एक समय का भोजन और जमीन पर सोना यह सब अन्ना की सामान्य दिनचर्या है। ये वही अन्ना हैं जो जन्तर मन्तर पर जन लोकपाल बिल को लागू करने और इसका मसौदा तैयार करने की समीक्षा समिति में आम जनता की सहभागिता के मुद्दे पर 'अंतिम बलिदान'  के लिये अनशन कर रहे थे और उनकी हार न मानने की जीजिविषा और आम जनता के अपार समर्थन के बाद झुकी सरकार की बिल को मानसून सत्र में लागू करने की मंशा पर स्वीकार्यता और सिविल सोसायटी के पांच सदस्यों को बिल का मसौदा तैयार करने की कमेटी में शामिल करना यह दिखा गया कि कैसे आम जनता की आवाज से दिल्ली के तख्त हिल जाया करते हैं।

भारत में ही ऐसा पहले भी हो चुका है जब एक मामूली सी धोती पहनने वाले लाठीधारी बूढे़ गांधी ने कभी न डूबने वाले अंग्रेजी साम्राज्य की चूलें भी हिला कर रख दी थीं। कभी कांग्रेस के झंडे तले देश में सुधारों की वकालत करने वाले मोहनदास करमचंद गांधी 1919 के अमृतसर में बैसाखी के दिन जलियां वाला हत्याकांड के बाद से ही पूरी तरह अंग्रेजों के खिलाफ हो गये थे और उन्होंने सविनय अवज्ञा आंदोलन, भारत छोड़ो आंदोलन जैसे व्यापक कदम उठाये थे। एक समय सारा देश बापू के बताये रास्ते पर 'करो या मरो' का अनुसरण कर रहा था। आखिरकार द्वितीय विश्‍व युद्ध के बाद जब सारी दुनिया जब परिवर्तन के दौर से गुजर रही थी तब भारतीय आवाम की शक्ति से झुके अंग्रेजों को भी अपना बोरिया बिस्तर समेट कर इस भारत भूमि को अलविदा कहना पड़ा।

कुछ इसी तरह की परिवर्तन लहर सारी दुनिया में चल रही है। जनता ने अत्याचारी शासकों और भ्रष्टाचारी नेताओं के खिलाफ परिवर्तन का बिगुल बजा दिया है। इस साल के शुरू में मिस्र के तहरीर चौक पर जब हुस्ने मुबारक विरोधी आंदोलन प्रारम्भ हुये तो किसी को अंदाजा तक नहीं था कि इस बुजुर्ग हो चुके तानाशाह को चालीस वर्ष पुरानी सत्ता से यूं बेदखल होना पड़ेगा। इसके बाद लीबिया में कर्नल गद्दाफी के खिलाफ जनता ने मोर्चा खोल दिया और फिर तो अन्य कई देशों में भी परिवर्तन की लहर चल पड़ी है।

भारत में भी माहौल कुछ घुटा-घुटा सा था। एक के बाद एक टूजी स्पेक्ट्रम, कामनवेल्थ गेम्स और आदर्श सोसायटी में लाखों करोड़ के घोटाले सामने आने के बाद फिर सीवीसी नियुक्ति और काले धन के मामले में ढिलाई पर सुप्रीम कोर्ट से फटकार पड़ने के बाद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को यह मानना पड़ा था कि गठबंधन में कई तरह से समझौते करने पड़ते हैं, लेकिन तमाम विवादों में छाए ए. राजा को मंत्रिमंडल तथा अशोक चव्हाण को महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री की कुर्सी से विदा करने के बावजूद उन्होंने दिखा दिया कि कलमाड़ी और पवार जैसे भ्रष्ट नेताओं को ढोना सरकार की मजबूरी है और जब तक वह इसी तरह 'मजबूरी' से सरकार चलाते रहेंगे तो देश की जनता को अपने ही चुने हुये नेताओं के भ्रष्टाचार को देख-सुनकर कोसते रहना होगा। लेकिन तमाम बहस-मुबाहिसों के बीच में यह आशा की एक किरण उभरी जब लोगों ने भ्रष्टाचार के खिलाफ सरकार से भिड़े अन्ना की बूढ़ी अस्थियों में बलिदान का जज्बा देखा तो एक के बाद एक शहरों में उनके समर्थन और भ्रष्टाचार के विरोध में लोग सड़कों पर उतर आये और परिवर्तन की आशंका से सहमी केन्द्र सरकार को भी झुकना पड़ा।

आइये उन कारणों पर विचार करें जिससे अन्ना का यह आंदोलन जनता की आवाज बन गया। पहले तो बीजेपी और तमाम विपक्षी दलों ने टूजी स्पेक्ट्रम घोटाले में जेपीसी की मांग को लेकर संसद का एक सत्र ही चलने नहीं दिया। उधर वीकीलीक्स में प्रकाशित केबल में कैश के बदले वोट का मामला दोबारा चर्चा में आया तो सरकार से न उगलते बना और निगलते। इसके साथ ही अलग-अलग मामलों में सुप्रीम कोर्ट की ओर से केन्द्र सरकार को लगने वाली फटकार से माहौल काफी नकारात्मक हो चला था। लेकिन हर बार बैकफुट पर आने वाली सरकार को उम्मीद नहीं होगी कि एक 73 वर्ष का गांधीवादी इस तरह उसे बोल्ड कर देगा। बात करें अन्ना की टीम की। उनके पास मैग्सेसे अवार्ड विजेता किरन बेदी थीं, जो देश की प्रथम महिला आईपीएस हैं। पुलिस सुधार, जेल में कैदियों की स्थिति में सुधार करने के अलावा विभिन्न मुददों पर मुखरता से अपनी आवाज बुलंद करती रही हैं।

दूसरे खिलाड़ी थे अरविन्द केजरीवाल, जिन्हें लोग सूचना के अधिकार के क्षेत्र में कार्य करने वाले समाजसेवी के रूप में जानते हैं। हरियाणा का इस 43 वर्षीय नौजवान ने 1992 में सिविल सेवा में चयनित होने के बाद भारतीय राजस्व सेवा के तहत आयकर विभाग में नियुक्ति पाई और वहां व्याप्त भ्रष्टाचार को दूर करने के प्रयास भी किये। देश में सूचना के अधिकार कानून को लागू कराने में महत्वपूर्ण योगदान के लिये उन्हें भी 2006 में मैग्सेसे अवार्ड से नवाजा गया। अन्ना के आमरण अनशन की घोषणा के बाद सरकार की ओर से सिविल सोसायटी के प्रतिनिधियों से बातचीत की नौटंकी की हवा केजरीवाल ने ही यह कहकर निकाल दी थी कि सिब्बल कमेटी बनाने की बात मीडिया में तो करना चाहते हैं, लेकिन सरकार इसके लिये आवश्‍यक नोटिफिकेशन करने को तैयार नहीं है। इसके बाद अन्ना के 'अंतिम बलिदान' की घोषणा से घबराकर सरकार जनलोकपाल बिल का मसौदा लागू करने और इसमें आम जनता के प्रतिनिधियों को शामिल करने पर तैयार हुयी। केजरीवाल के साथ ही थे आर्य समाजी स्वामी अग्निवेश, जो देश में बंधुआ मजदूरी, बाल मजदूरी, स्त्री भू्रण हत्या जैसी कुरीतियों की खिलाफत करने वालों में अगुआ माने जाते हैं और नक्सली आंदोलनों को सख्ती से दबाने के भारत सरकार की नीति से भी वह सहमत नहीं हैं।

इसके अतिरिक्त नर्मदा बचाओ आंदोलन की अगुआ मेघा पाटकर, कर्नाटक के लोकायुक्त और सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश संतोष हेगड़े, पूर्व कानून मंत्री शांति भूषण और जनहित याचिकाओं के जरिये भ्रष्टाचार के कई मुद्दों को सुप्रीम कोर्ट में ले जाने वाले जाने माने वकील प्रशांत भूषण भी उनकी टीम का ही हिस्सा हैं। अपने योग शिविरों में भारत स्वाभिमान अभियान के जरिये पूरे देश में भ्रष्टाचार और काले धन के खिलाफ अलख जगाने वाले बाबा रामदेव ने भी जंतर-मंतर और मीडिया में उन्हें खुला समर्थन दिया। ऐसे में राजनेताओं के भ्रष्टाचार से आजिज आ चुकी जनता ने अन्ना को अपनी पलकों पर बैठा लिया। देश ही नहीं पूरी दुनिया में भारतीयों ने हाथों में बैनर, पोस्टर लिये अन्ना के समर्थन में जुलूस निकाले और मोमबत्ती जलाकर आंदोलन को बल दिया। उनका पूरा साथ दिया मीडिया ने।

विश्‍व कप समाप्त होने के बाद किसी चटपटी खबर का इंतजार कर रहे देश भर के अखबारों और टीवी चैनलों ने न सिर्फ इस आंदोलन का भरपूर कवरेज किया वरन समर्थन भी किया। इंटरनेट पर सोशल वेबसाइटों पर अन्ना के समर्थन में संदेशों का आदान-प्रदान होने लगा। पहला सबसे बड़ा असर तब दिखाई पड़ा जब शरद पवार ने भ्रष्टाचार पर बने मंत्री समूह से हटने की घोषणा की तो अन्ना की खुली चुनौती थी कि पवार आखिर मंत्रिमंडल से इस्तीफा क्यों नहीं दे देते। राजनेताओं के खिलाफ जनता का गुस्सा जब फूट पड़ा जब आंदोलन को समर्थन देने पहुंचे हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री ओमप्रकाश चौटाला और बीजेपी की पूर्व फायर ब्रांड नेता उमा भारती को लोगों ने मंच तक पहुंचने ही नहीं दिया और आंदोलन स्थल से भगा दिया।

फिल्मी सितारों में आमिर खान ने प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर अन्ना हजारे के आंदोलन को समर्थन पेश किया तो अनुपम खेर, फराह खान, आशुतोष गोवरिकर अन्ना के साथ मंच साझा किया। मीडिया में चलने वाली बहसों ने भी सरकार के खिलाफ वातावरण तैयार किया। जब काबिल वकील दूरसंचार मंत्री कपिल सिब्बल और प्रवक्ता सत्यव्रत चतुर्वेदी राजा और चव्हाण का उदाहरण देकर यह साबित करने की पुरजोर कोशिश कर रहे थे कि सरकार भ्रष्टाचार के मुद्दे पर गंभीर है तो हजारे टीम के इस तर्क के आगे उनकी बोलती बंद थी कि 1968 में लोकसभा की मंजूरी मिलने के बाद जन लोकपाल बिल अब तक क्यों नहीं बन सका है और उच्च स्तरों पर भ्रष्टाचार को रोकने के लिये सरकार के उपायों का कोई असर क्यों नहीं दिखाई देता है। खैर अब आंदोलन समाप्त हो चुका है। सरकार ने जनलोकपाल बिल से सम्बन्धित समिति गठित करने की अधिसूचना जारी कर दी है। मसौदा तैयार करने के लिये सरकार 10 सदस्यीय संयुक्त समिति का गठन करेगी, जिसमें पांच सदस्य सिविल सोसायटी के भी शामिल होंगे। सरकार की तरफ से कहा जा रहा है कि 30 जून तक मसौदा तैयार करने का काम खत्म हो जायेगा। यह जनता की जीत है लेकिन असल चुनौती तो अभी बाकी है और सुधारों के लिये जनता को संगठित होकर अपनी ताकत का प्रदर्शन करने को तैयार रहना होगा।

लेखक निखिल अग्रवाल दैनिक जागरण, अमर उजाला और हिंदुस्‍तान अखबारों को अपनी सेवाएं दे चुके हैं.