मदन तिवारीअन्ना हजारे का कद इस आंदोलन के बाद बहुत बड़ा हो गया है उन्होंने मुख्यमंत्रियों को प्रमाण-पत्र बांटना शुरू कर दिया है, लेकिन पहले अन्य बातों का जिक्र करुंगा उसके बाद आउंगा प्रमाण पत्र पर। सबको मालूम है मैं शराबी नहीं, कोई पिलाये तो मैं क्या करुं। कुछ इसी तर्ज पर चल रहा है यह सारा ड्रामा। मैं गांधीवादी हूं, अब कोई मुझे भ्रष्ट बना दे तो मैं क्या करुं। आजतक यह मुल्क नहीं जान पाया कि नेहरू के लिये गांधी जी की कमजोरी का राज क्या था? वह कौन सा कारण था जिसके कारण गांधी जी सुभाष चन्द्र बोस को कांग्रेस के अध्यक्ष पद से हटाने के लिये परेशान हो गये थे और अन्तोगतवा हटाकर ही दम लिया।

बजाज और बिरला की सुभाष चन्द्र बोस से क्या दुश्मनी थी? सुभाष चन्द्र बोस में क्या खामी थी? ठीक वैसा ही प्रश्न आज फ़िर खड़ा हुआ है। इस बार भी हथियार वही अनशन का है। सरकार और अन्ना के बीच समझौता हो गया लेकिन प्रश्न अभी भी कायम है। जब टूजी घोटाले में अहम खुलासे हो रहे थे और कुछ नामी बिजनेसमैन तथा पत्रकार उसकी चपेट में आ चुके थे तथा कानून को जानने वाले यह अनुमान लगा रहे थे कि बहुत जल्द कुछ सनसनीखेज गिरफ़्तारी होगी, सीबीआई के द्वारा ए राजा के खिलाफ़ चार्जशीट दाखिल की जा चुकी है। अभी उस चार्जशीट पर चर्चा करने की जरूरत थी, यह देखना था कि सीबीआई ने सही तरीके से साक्ष्य इकट्ठे किये हैं या मनमोहन सिंह या अन्य मंत्रियों के खिलाफ़ साक्ष्य आये है या नहीं, करुणानिधि और उनके कुनबे के खिलाफ़ क्या साक्ष्य सीबीआई ने इकट्ठे किये हैं? लेकिन ठीक उसी वक्त अन्ना का यह ड्रामा जो पूर्व घोषित था शुरू हुआ।

पांच दिन तक चलने के बाद इस ड्रामे का पहला एपिसोड खत्म हुआ। अन्ना के इस समझौते में आमजन की हार हुई और एलीट क्लास जन की जीत यानी 8 से 10 लोग जो खुद को सिविल सोसायटी कहते हैं उनकी जीत हुई। इसमे सरकार नहीं झुकी, अगर कोई झुका-टूटा तो इस देश की टी शर्टआम जनता, जिसके प्रतिनिधि बन गये एलीट क्लास के कुछ लोग। अन्ना के इस पूरे आंदोलन को मैं एक धोखा मानता हूं, देश के करोड़ों लोगों को छलने का पाप। एलीट क्लास के कुछेक लोग जो सिविल सोसायटी का लबादा ओढ़कर पूरे देश की जनता के घोषित (अघोषित नहीं क्योकि उन्होंने शुरुआत ही की जन लोकपाल नाम से) प्रतिनिधि बन बैठे। यह पूरा ड्रामा देश की जनता का भ्रष्टाचार के खिलाफ़ बढ रहे आक्रोश को खत्म करने या कम से कम शांत करने के लिये था और वही हुआ। लेकिन इस ड्रामे के कारण इमानदार पत्रकारों की जिम्मेवारी बढ़ गई। किसको बचाने के लिये अन्ना का ड्रामा शुरू हुआ था, यह पता लगाना पत्रकारों का दायित्व है।

दूसरी बात जो पांच नाम अपने चहेतों के अन्ना ने सुझाये हैं लोकपाल के सदस्य के रूप में उनकी असलियत को जनता के सामने लाना जरुरी है। शांति भूषण, प्रशांत भूषण यानी डायनेस्टी यहां भी। हेगडे़, केजरीवाल तथा खुद अन्ना। ये वह नाम हैं जो अभी तक प्राप्त सूचना के अनुसार अन्ना ने दिये हैं। सबसे पहले मैं बखिया उधेड़ता हूं, अन्ना के ड्रामे का। पारदर्शिता की बात करने वाले अन्ना ने सरकार के नुमाइंदों से सारी बातें बहुत ही गुप्त तरीके से की। क्या-क्या बातें हुईं किसी को नहीं पता। सिर्फ़ अन्ना के दूत और सरकार के प्रतिनिधि जानते हैं। यह कैसी पारदर्शिता थी माननीय अन्ना जी। जो लोग सहानुभूति दिखाने के लिये बोट क्लब पर जमे थे उनको अंधेरे में क्यों रखा? सरकार और अन्ना के दूतों के बीच क्या चल रहा है उसे पूरी परदर्शिता के साथ उन समर्थकों को क्यों नहीं बताया? सहमति के पहले देश की जनता से राय क्यों नही ली?

अब आता हूं अन्ना के द्वारा प्रस्तावित नामों पर। केजरीवाल के बारे में मैं इसके अलावा ज्यादा नहीं जानता कि वह भारतीय रेवेन्यू सेवा में थे और बहुत सारे मलाइदार पद पर रह चुके हैं। इस एलीट बिल के परिभाषा वाली धारा 2 में परिभाषित व्हिसल ब्लोअर वाला प्रावधान केजरीवाल की देन है, जिसके तहत सरकारी सेवक यानी आला अधिकारियों के तबादले, प्रोन्नति, उनके खिलाफ़ विभागीय कार्रवाई जैसे मसले की सुनवाई भी लोकपाल के दायरे में आयेगी। पहले इसके लिये कैट की व्यवस्था थी और कैट के खिलाफ़ अभी तक भ्रष्टाचार की बहुत कम शिकायतें सामने आई हैं। कैट के कुछ फ़ैसले तो बहुत ही अच्छे माने गये हैं, उन फ़ैसलों में से एक रहा है सरकारी ठेके में काम कर रहे मजदूर को भी कैट ने केन्द्र सरकार के अधीन काम करनेवाला मानते हुये क्षतिपूर्ति का आदेश दिया था। अब अन्ना ब्रांड एलीट लोकपाल लागू हो जाने के बाद कैट की कोई जरूरत नहीं रह जायेगी या फ़िर कुछेक मामलों की सुनवाई लोकपाल ही करेगा। किसी भी अधिकारी पर कोई भी विभागीय कार्रवाई होगी तो वह इसे पूर्वाग्रह से ग्रसित कहते हुये लोकपाल का दरवाजा खटखटाना शुरू कर देगा।

खैर अब तो एक नई समिति नये सिरे से लोकपाल बिल ड्राफ़्ट करेगी और उस समय देखा जायेगा कि यह तीसरा मिला-जुला लोकपाल बिल क्या है। मैं केजरीवाल के बारे में प्रभाष जोशी द्वारा कही गई बातों के अलावा कुछ विशेष नहीं जानता इसलिये उनके चरित्र और कार्य के बारे में फ़िलहाल कोई टिपण्णी नहीं करुंगा. अन्ना हजारे के बारे में बहुत कुछ पढ़ चुका हूं, सुन चुका हूं और महाराष्‍ट्र के कुछेक मित्रों ने भी बताया है, सबकुछ ठीक-ठाक तो नहीं है फ़िर भी अभी और तहकीकात कर रहा हूं, इसलिये उनके उपर भी कोई टिपण्णी नहीं करुंगा। अब बच गये जज संतोष हेगडे़, शांति भूषण और प्रशांत भूषण तो इन तीनों महानुभावों को लोकपाल ड्राफ़्ट बनाने वाली समिति का सदस्य बनाने का मैं विरोधी हूं। इस देश का कोई न्यायाधीश यह नहीं कह सकता कि उसने निर्दोष को सजा नहीं दी है, कारण है न्यायिक व्यवस्था। संतोष हेगडे़ उच्चतम न्यायालय तक पहुंचे हैं, बहुत पाप करने के बाद ही वह मुकाम हासिल होता है, अपने से सीनियर जजों की चमचागीरी, तरक्की के लिये निर्दोषों को सजा देने जैसे कार्य को सीढ़ी की तरह इस्तेमाल किया जाता है। संतोष हेगडे़ सदस्य बनने की योग्यता नहीं रखते।

शांति भूषण तथा प्रशांत भूषण को सबसे पहले यह बताना पडे़गा कि कितना इनकम टैक्स की चोरी किये हैं। इनकम टैक्स की चोरी सभी बडे़ वकील करते हैं। फ़ीस की कोई रसीद तो दी नहीं जाती। चूकिं मैं स्वंय प्रशांत भूषण से एक मुकदमा, जो मेरे क्लाइंट का था, उसके संबंध में बात कर चुका हूं। फ़ीस की बात तो छोड़ दें किसी बनिया से भी बडे़ बनिया हैं प्रशांत जी। दोनों पिता-पुत्र भी सदस्य बनने की योग्यता नहीं रखते। 25 हजार से लेकर 40 हजार तक फ़ीस का दायरा है प्रशांत भूषण का। वह भी तब जब एसएलपी की ड्राफ़्टिंग दूसरे ने की हो। दूसरी बात दोनों भूषण से ज्यादा योग्य-काबिल तथा ईमानदार वकील उच्चतम न्यायालय में हैं, जो वास्तव में लोकपाल बिल को ड्राफ़्ट करने की योग्यता रखते हैं। वेणु गोपाल से लेकर सोली सोराब जी जैसे अनेकों नाम हैं। एक और बहुत बड़ी गलती शांति भूषण ने की है। अवमानना के एक मुकदमे में, जो उनके पुत्र के उपर उच्चतम न्यायालय में चल रहा है, उसमे एक बंद लिफ़ाफ़ा उच्चतम न्यायालय में दाखिल किया था। उस लिफ़ाफ़े में उच्चतम न्यायालय के भ्रष्ट जजों का नाम था, आज तक हिम्मत नहीं हुई उन नामों को उजागर करने की। कारण सिर्फ़ न्यायालय का डर। जो आदमी इतना कायर हो कि कोर्ट के डर से भ्रष्टाचारियों का नाम नहीं उजागर करे वह किसी भी स्तर पर जन आंदोलन से जुड़ने की योग्यता नहीं रखता।

अब यह अन्ना के उपर है कि वे इन तीनों का नाम वापस लेते हैं या इनको योग्य होने का प्रमाण-पत्र देते हैं। वैसे अन्ना अब मुख्यमंत्रियों को भी प्रमाणपत्र देने लगे हैं। हालाकि अन्ना के प्रमाण-पत्र देने के बाद भी मैं खिलाफ़ ही रहूंगा। मैंने अन्ना को एक पत्र लिखना शुरू किया था जिसमें कुछ सवाल थे, परन्तु अन्ना ने अनशन तोड़ दिया इसलिये अब उस पत्र में कुछ संशोधन के साथ अन्ना को भेजूंगा। जवाब तो देना ही होगा। मेरे जैसे लोग भेड़ नहीं बन सकते और भेड़ से अलग मानसिकता वाले करोड़ों लोग हैं इस मुल्क में। पत्रकारों से एक ही गुजारिश है, वे अनशन के पीछे के सच को सामने लायें। इसके लिये बहुत मेहनत की जरूरत नहीं है। दिल्ली में बैठा कोई भी ईमानदार पत्रकार यह कर सकता है। बस आप टेंट से लेकर सारा साजो सामान जो लगा था धरना स्थल पर, वह किसने लगवाया तथा उसका भुगतान किसने किया यह पता लगाना शुरू कर दें सच सामने आ जायेगा।

एक और ड्रामे का जिक्र भी यहां कर देता हूं, हालांकि उसका इस पूरे प्रकरण से कोई नजदीक का रिश्ता नहीं है बस सिर्फ़ रोटी सेंकने और अपने मुंह मियां मिठ्ठू बनने वाली बात है। चूंकि मेरे खुद के राज्य बिहार से जुड़ा है इसलिये जिक्र कर रहा हूं वरना जरूरत भी नहीं थी। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने बडे़ जोश-खरोश के साथ स्वागत किया अन्ना का और अपने बयान में कहा कि बिहार भ्रष्टाचार विरोधी कानून बनाने वाला पहला राज्य है, उन्होंने अन्य राज्यों से इसी तरह का कानून बनाने की अपील की है। बिहार में एक अधिकारी है आईएएस हैं फ़िलहाल पटना के कमिश्नर हैं नाम है केपी रमैया। यह बिहार के भ्रष्टतम अधिकारियों में से एक हैं। इन्‍होंने सरकार की जमीन को भी निजी हाथ में सौपने का काम किया है। मैं एक बार नहीं दसियों बार नीतीश को ई-मेल भेजकर इसके खिलाफ़ जांच की मांग कर चुका हूं। इस पाखंडी नीतीश की हिम्मत नहीं हुई जांच कराने की। आज भी मैं अपने मांग पर डटा हुआ हूं। सीबीआई से केपी रमैया के खिलाफ़ जांच कराओ। मेरे पास बहुत सारे तथ्य भी हैं। नीतीश को भी अन्ना ने ग्राम सभा के क्षेत्र में काम करने के लिये प्रमाण पत्र दिया है। अन्ना के प्रमाण-पत्र की बात पढ़कर मुझे बहुत हंसी आई और अन्ना की बुद्धि पर तरस भी आया।

बिहार में ग्राम सभा लूट का सबसे बड़ा केन्द्र बन चुकी है। नरेगा, आंगनबाड़ी, राशन दुकान, शिक्षकों की बहाली जैसे कार्यों में सिर्फ़ भ्रष्टाचार है। सारे मुखिया भ्रष्ट हैं। अन्ना को मेरी चुनौती है, मात्र 50 मुखिया बताओ जो आपको को भ्रष्टाचारी न लगे अन्यथा यह बताओ कि आपने किस आधार पर बिहार की ग्राम सभाओं की प्रशंसा की। अन्ना हजारे जी आप बुजुर्ग हैं, आपने बहुत सारे अच्छे और प्रशंसनीय सामाजिक कार्य किये हैं, लेकिन मैं उन गदहों में  से नहीं हूं जो आंख मूंदकर आपकी सभी वाहियात और फ़ालतू बातों पर विश्वास कर ले। आगे से मेरा सुझाव है कि इस तरह की तथ्यहीन बात न करें अन्यथा आप हंसी के पात्र बनकर रह जायेंगे। अब बंद करता हूं फ़िर मिलेंगे जब शुरू होगा अन्ना का अगला एपिसोड। अन्ना के आंदोलन की मार्केटिंग भी शुरू हो चुकी है। एक टी शर्ट बनाने वाली कंपनी का अन्ना ब्रांड शर्ट की तस्वीर भी भेज रहा हूं।

लेखक मदन कुमार तिवारी बिहार के गया जिले के निवासी हैं. पेशे से अधिवक्ता हैं. 1997 से वे वकालत कर रहे हैं. अखबारों में लिखते रहते हैं. ब्लागिंग का शौक है. अपने आसपास के परिवेश पर संवेदनशील और सतर्क निगाह रखने वाले मदन अक्सर मीडिया और समाज से जुड़े घटनाओं-विषयों पर बेबाक टिप्पणी करते रहते हैं.