जगमोहनजीप्रभाष जी अगर जिंदा होते तो 12 मार्च के नागपुर वनडे पर कागद नहीं मुंह कारे करते. ज़रूर पूछते गौतम गंभीर और अपने चहेते सचिन से कि 25 ओवरों में पूरे सात की औसत से 175 रन बन चुकने के बाद वे अपने ही ड्रेसिंग रूम में किसी एक के आउट होने की प्रार्थनाएं क्यूं करवाने लग गए थे. क्यूं टीम चाहने लग गयी थी कि कोई एक तो आउट हो और कोई नया जा के बताए कि टुक टुक नहीं आज तो दो टूक करना है. सच पूछिए तो कप्तान धोनी, कोच गैरी और मैदान में आए बैठे चीफ सलेक्टर श्रीकांत ही नहीं पूरे स्टेडियम ने सुख की सांस ली थी जब तेंदुलकर के आउट होते ही यूसुफ पठान को भीतर भेजने का मौका मिला.

यूसुफ़ को ही इसलिए कि दरअसल अफ्रीका की बजाय अपने ही बन्दों को बताया जा सके की ज़रूरत आठ के पार का औसत बनाये रखने या चार सौ का आंकड़ा छूने की ही नहीं, अफ्रीका की हिम्मत पस्त कर देने की है. वही नहीं हो रहा था, शतकवीर सचिन और असल मकसद की बजाय अपनी हाफ सेंचुरी (या उससे ज्यादा) के लिए फिकरमंद गौतम गंभीर से. अरे भैया विकेट ही गंवाना था तो कुछ मारधाड़ करके तो गंवाओ. आपने अपनी अपनी सेंचुरी, हाफ सेंचुरी बनाई, अच्छी खासी चली आ रही रफ़्तार को धीमा किया और चलते बने गैरज़िम्मेदाराना तरीके से कुर्बानी दे के.

यूसुफ़ टीम में न बालर की तरह थे, न बल्लेबाज़ की तरह. यूसुफ़ को इतने अरसे से टीम में इसलिए रखती आ रही थी टीम इंडिया कि उसे किसी क्रंच मैच में पिंचहिटर के तौर पर इस्तेमाल किया जाएगा. सहवाग की तरह नहीं, शायद सहवाग के साथ. सच पूछिए तो टीम की इस चाल को अफ्रीका के साथ इस मैच में चला नहीं जाना चाहिए था. उसे भेजा तो दरअसल अपनों को ये समझाने के लिए गया कि पहलवान को नीचे गिरा लेने के बाद उसके ऊपर बैठ के रोया नहीं करते. अब ये अलग बात है कि वही करने के चक्कर में यूसुफ़ की किस्मत (या बुद्धि) दगा दे गई. वो भी चाहते तो गंभीर की तरह पहली बीस गेंदों में पांच रन बनाने के बाद आगे की सोच सकते थे. मैच का जो भी होता यूसुफ़ की किस्मत तो बन ही गई होती. पर वो अपनी बजाय टीम के लिए खेले और मर्दानगी वाले एक शाट पर कैच दे बैठे. पर बाकियों से भी दरअसल वही हुआ. 350 से कम रन बनते तो कोई माफ़ नहीं करता. 267 पे 2 से 296 आल आउट की बड़ी वजह वही है. कहने को आप इसे गैरज़िम्मेदाराना से लेकर बेवकूफाना तक कुछ भी कह सकते हैं. ये भी कि 350 नहीं तो 320 रन तो बना ही सकते थे.वगैरह वगैरह.

किसी को अच्छा लगे, बुरा. चाहे कोई कहीं केस ठोक दे मुझ पर. एक बात जो कहते लाखों हैं इस देश में. लिख मैं रहा हूँ. सचिन तेंदुलकर कई बार देश नहीं, अपने लिए खेलते हैं. सच कह रहे हैं धोनी. देश के लिए खेले होते तो बीस ओवर पुरानी हो चुकी गेंद पर टुक टुक नहीं करने लगते आप. वे अक्सर बैटिंग अजहरुद्दीन से भी ज्यादा बोर कर रहे गंभीर को दे रहे थे. खुद भी पूरे पूरे ओवर को एक रन में निबट जाने दे रहे थे. रनों की रफ़्तार को छोडिए, लड़ने की इच्छाशक्ति भी मरने सी लगी थी. हर कोई हैरान था कि पंद्रह ओवर तक आठ की औसत के बावजूद हम हांफने क्यूं लगे हैं.

मैच मज़ाक होता दिखने लगा था. सचिन के रवैये पर हूट नहीं तो हूक तो उठने लग ही पड़ी थी. फिर जो शाट लगा के वो आउट हुए वो तो यकीनन निन्यानबे सेंचुरियां बना चुके किसी बल्लेबाज़ का शाट नहीं हो सकता. लग ही रहा था कि अपना काम हो चुकने के बाद वो जा रहे हैं. देश जाए भाड़ में. सचिन ने ऐसा पहले भी कई बार किया है. उनकी सेंचुरी बन जाती है. वो चले जाते हैं मंझधार में छोड़ के. ऐसी हालत में कि कोई दूसरा आके रिपेयर भी न कर सके. टीम डूब जाती है. आंकड़े गवाह हैं. सचिन की सेंचुरियां तो बनी हैं पर टीम कई बार डूबी है.

ज़रा बारीकी से देखिए. सचिन जमने और लय पाने के बाद स्लो और आउट हुए हैं. दूसरे कम समय में उनके सुस्त किए काम को दुरुस्त करने की खातिर. धोनी की पीड़ा समझिए जनाब. वो कप्तान हैं और सही परेशान हैं. साफ़ साफ़ दिखती जीत जब हार में बदलती है तो देश को जवाब देना ही पड़ता है. देश की बजाय दर्शकों के लिए खेलने का इलज़ाम जिन पर लगा रहे हैं उनमें सचिन शामिल हैं. बस उनका नाम ही नहीं ले पा रहे वो. सचिन के पास इतना नाम, दाम और दम है कि धोनी क्या शरद पवार जैसों को अपने खूंटे से बाँध सकते हैं. पर एक बार आप एक सीमा के बाद सचिन की सुस्त रफ्तारी को मान लें तो बाकी की कमियाँ आपको समझ में आने लगेंगी. हाँ मगर, भज्जी को थोड़ा पहले लगाना ही चाहिए था और आखिरी ओवर के लिए नेहरा जैसे नकारा बालर को बाल नहीं देनी चाहिए थी. ये वही नेहरा हैं जिन्हें वो अफ्रीका दौरे के दौरान लगातार खिलाते तो रहे हैं पर किस एक एकदिवसीय में भी पूरे दस ओवर फिंकवाने से बचते रहे है. घोड़े और गधे के बीच का फर्क तो धोनी को भी समझना ही पड़ेगा.

लेखक जगमोहन फुटेला वरिष्ठ पत्रकार हैं और इन दिनों वेब मीडिया की दुनिया में सक्रिय हैं.