डा. विजय अग्रवाललगभग बीस सालों के बाद गया था मैं अपने गाँव चन्द्रमेढ़ा, जो छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले के मुख्यालय अंबिकापुर से मात्र पचास किलोमीटर की दूरी पर है। जिस कच्चे स्कूल में मैं पढ़ता था, वहाँ उस दिन भी बच्चे पढ़ रहे थे, किन्तु उस समय का जवान स्कूल आज दमे के रोग से ग्रस्त बूढ़ा स्कूल नजर आ रहा था। हाँ, इतना जरूर था कि इस स्कूल के ठीक सामने पंचायत सचिवालय नामक एक तथाकथित पक्का मकान जरूर बन गया था, जो नया होने के अहम में इस पुराने स्कूल का मुँह चिढ़ा रहा था, यह भूलकर कि हिन्दुस्तान में सरकारी मकानों की औसत उम्र बहुत कम होती है।

अमेठी के सांसद राहुल गांधी के ऊपर कुछ अर्नगल आरोप लगाते हुए उच्च न्यायालय की लखनऊ खण्डपीठ में दायर दो याचिकाओं का निस्तारण हो चुका है। माननीय न्यायालय ने याचिका कर्ताओं पर 50 लाख रुपये का जुर्माना करते हुए केन्द्रीय जांच ब्यूरो को मामले की तह तक जाने के लिये जांच करने का आदेश दिया है। जांच का विषय यह है कि मनगढ़न्त आरोप लगाकर राहुल गांधी को बदनाम करने और अमेठी के एक संभ्रान्त व्यक्ति ठाकुर बलराम सिंह को परेशानी में डालने के पीछे किसकी साजिश है। शुरू करते हैं इन्टरनेट पर प्रचारित उस कपोल कल्पित कथा से जो हिन्दू यूनिटी डाट आर्ग नामक बेबसाइट पर जनवरी 2007 पर पहली बार देखी गई। उस समय उत्‍तर प्रदेश विधान सभा के लिये चुनाव की प्रक्रिया चल रही थी। मतदान फरवरी में होना था।

हम ईश्‍वर को पूजते हैं, उनकी आरती उतारते हैं और पता नहीं हम धर्म और आस्‍था के नाम पर क्‍या-क्‍या नहीं करते, पर यह सब करते क्‍यो हैं? यह एक ऐसा सवाल है जिसका कोई एक जवाब नहीं होगा। हर एक के अलग-अलग जवाब होंगे। कोई इश्‍वर को प्रसन्‍न करना चाहता है तो कोई आगे के जन्‍मों से मुक्ति चाहता है और कई लोग तो सिर्फ इसलिए ईश्‍वर को पूजते हैं तथा मानते हैं, क्‍योंकि बाकी लोग यह सब कर रहे हैं। इस देश में ऐसे सैकड़ों धार्मिक स्‍थान हैं, जहॉ पर हर वर्ष लाखों करोड़ों लोग जाते हैं और आस्‍था के नाम पर करोड़ों रूपयों की बौछार वहॉ लगी ईश्‍वर की मूर्तियों पर करते हैं।

अद्भुत.. अविस्मरणीय.. मेरे लिए तो अलौकिक.. ऐसा नजारा आज से पहले कभी नहीं देखा इस सरजमीं पर!!! यहीं पैदा हुआ, पला-बढ़ा, बचपन से लेकर आज तक के दौर में देश को अलग-अलग हालातों से गुजरते देखा.. लेकिन ऐसा अनुभव.. ऐसा दृश्य.. कभी आंखों के सामने पैदा नहीं हुआ.. पूरा देश जश्न में डूबा हुआ है.. कश्मीर से कन्याकुमारी तक और विदेशों में भी.. जहां-जहां भारतीय हैं.. होली-दीवाली-दशहरा सब एक साथ मनाए जा रहे हैं और हो भी क्यों न ??? क्रिकेट वर्ल्ड कप के फाइनल में श्रीलंका को मात देकर 28 वर्षों के बाद देश में फिर से कप आया है.. बहार आ गई है.. जन्नत मिल गई हैं.. पांव जमीं पर नहीं हैं हमारे.. देश झूम रहा है.. गा रहा है.. खुशी के तराने... जीत के फसाने।

अमिताभजीमैंने अपने फेसबुक वाल पर कुछ प्रश्न पूछे. मसलन- “आईआईएम हेतु कैट की परीक्षा केवल अंग्रेजी में ही क्यूँ- क्या हिंदी या अन्य भारतीय भाषाओं के बोलने वाले अच्छे मैनेजर नहीं बन सकते?” तथा “आईआईएम प्रवेश के लिए कैट परीक्षा हिंदी तथा अन्य भारतीय भाषाओं में भी क्यों नहीं?” इस पर, मुझे कई तरह की टिप्पणियाँ प्राप्त हुई हैं, जिनमे से कुछ मैं प्रस्तुत करना चाहता हूँ. एक सज्जन कहते हैं- “कैट के काटने से ख़तरा है आईआईएम वालों को, इसीलिए शायद” तो दूसरे ने कहा- “जब तक इस देश में अंग्रेजी को प्रतिबंधित नहीं किया जाता तब तक हिंदी और क्षेत्रीय भाषा के अस्तित्व पे खतरा मंडराता रहेगा... और ऐसा तबतक नहीं हो सकता जबतक अंग्रेजों के दलालों के कब्जे में ये देश रहेगा... अंग्रेज तो चले गए लेकिन उनके कुकर्मों से उत्पन्न दलाल का वंश यहीं है.” एक और व्यक्ति ने कहा- “सही कहा आपने, हमारे देश की राष्ट्रभाषा हिंदी है. इसीलिए कैट हिंदी में होनी ही चाहिए.”

इक्कड़ बिक्कड़ बम्बे बो, अस्सी नब्बे पूरा सो..पोसम्बा भाई पासेम्बा डाकिये ने क्या किया..ये वो शब्द हैं, जो आजकल गली मोहल्लों में सुनने को नहीं मिलते हैं। इन शब्दों के साथ बच्चों का बचपन निकलता था और बच्चे इस तरह के सैकड़ों शब्दों के साथ अपना बचपन भरपूर जीते थे। आजकल ये शब्द सुनने को नहीं मिलते हैं। हमने विकास के साथ क्या पाया और क्या खोया कि अगर गणना करें तो बच्चों के हिस्से से हमने उनका बचपन छीन लिया है और उनके बचपन को हमने यांत्रिक बचपन बनाकर रख दिया है। याद करो वो दिन जब आप और हमारे जैसे बच्चे सुबह और शाम को अपने मोहल्ले में टोलियॉं बनाकर घूमा करते थे और दुनिया भर की चिंता से मुक्त होकर खुले आसमान में कभी गिल्ली डंडा खेला करते थे तो कभी किसी बाग में लुका छिपी का खेल खेलकर अपने साथियों को ढूंढा करते थे।

जिस प्रकार जुआरी जल्दी धन कमाने की लालसा में खाली होने के बावजूद दांव पर दांव खेलता है और अन्तत: कंगाल हो जाता है। यही हालत आजकल राजस्थान प्रदेश के हाड़ौती क्षेत्र (कोटा-बूंदी-बारां व झालावाड़) के किसानों की हो रही है। अब शीत ऋतु में ही गांवों में पेयजल किल्लत की खबरें आना शुरू हो गई हैं तो ग्रीष्म काल का अंदाजा अपने आप लग जाता है। गत तीन चार वर्षो से अल्प वर्षा के चलते हाडौती अंचल का किसान पानी की लालसा में अपनी जीवनभर की कमाई को जमीन के दोहन में लगाकर कंगाल होने की श्रेणी में आ गया है। वर्षा की कमी के कारण कृषक वर्ग ने अपनी फसलों को पानी की कमी पूरा करने के लिए धरती के सीने को छेदा, हजारों की तादाद में किए बोरवेलों से भरपूर पानी निकाला और कृषि कार्य को अंजाम दिया। लेकिन अब भू जल भी जवाब दे गया है।

जगमोहनजीप्रभाष जी अगर जिंदा होते तो 12 मार्च के नागपुर वनडे पर कागद नहीं मुंह कारे करते. ज़रूर पूछते गौतम गंभीर और अपने चहेते सचिन से कि 25 ओवरों में पूरे सात की औसत से 175 रन बन चुकने के बाद वे अपने ही ड्रेसिंग रूम में किसी एक के आउट होने की प्रार्थनाएं क्यूं करवाने लग गए थे. क्यूं टीम चाहने लग गयी थी कि कोई एक तो आउट हो और कोई नया जा के बताए कि टुक टुक नहीं आज तो दो टूक करना है. सच पूछिए तो कप्तान धोनी, कोच गैरी और मैदान में आए बैठे चीफ सलेक्टर श्रीकांत ही नहीं पूरे स्टेडियम ने सुख की सांस ली थी जब तेंदुलकर के आउट होते ही यूसुफ पठान को भीतर भेजने का मौका मिला.

सत्ता के लोभियों ने जंग-ए-आज़ादी के दौर से ही मुसलामानों के साथ खेलना शुरू कर दिया था. कभी मज़हबी हिंसा में झोंक कर तो कभी भेदभाव करके, मुस्लिम कौम का महज़ वोट की राजनीति करने वालों नें भरपूर दोहन किया है. नेहरु और जिन्ना ने तो अपने स्वार्थ के कारण मुल्क को दो टुकड़ों में बाँट दिया लेकिन भारतीय मुसलामानों को अपनी मिट्टी जुदा न कर सके. जिस देश में अशफाकुल्लाह जैसे शहीद रत्न ने भारत माँ के दामन को दागदार होने से बचाने के लिए अपने जान की कुर्बानी दे दी, उस देश का मुसलमान जिन्ना के बहकावे में भला कैसे आ सकता था? मुल्क का बंटवारा होना जब लगभग तय हो गया था, उसी समय लाहौर ला कॉलेज में एक दिन मोहम्मद अली जिन्ना का भाषण हुआ. कुलदीप नैय्यर (वरिष्‍ठ पत्रकार) उस समय वहां पढ़ाई कर रहे थे, जब जिन्ना का भाषण ख़त्म हुआ तो नैय्यर साहब ने उनसे पूछा कि जब देश बाँट दिया जायेगा और उसके बाद कभी अगर भारत पर कोई आंच आती है तो पाकिस्तान का क्या रुख होगा?

पदमपतिजीदक्षिण अफ्रीका के हाथों अंतिम ओवर में टीम इंडिया को मिली हार को लेकर उसका पोस्टमार्टम, टीका-टिप्पणी और किसिम किसिम के विश्लेषण मैच के पांच दिन बाद भी बदस्तूर जारी हैं. प्रिंट मीडिया में तो गनीमत है कि बेसिर-पैर की बात कम हो रही है, मगर निजी टेलीविजन चैनलों के परम विद्वान एंकर्स और विशेषज्ञ अनाप-शनाप बके जा रहे हैं. यूँ तो देश में एक अरब से ज्यादा क्रिकेट विश्लेषक हैं और गाँव का होरी और कल्लू भी धौनी को अपनी बेशकीमती सलाह देता है पर इन दिनों जबसे विश्व कप शुरू हुआ है, टीवी चैनल अपनी दुकान चलाने और चमकाने के लिए ''कुछ भी बोल दो, सब चलेगा'' शैली में खुद को ज्यादा सहज पा रहे हैं. वे जानते हैं अपने देश के व्यूवर्स यानी दर्शकों को, कि उनको जो भी परोस दो वे उसे सहज भाव से स्वीकार कर लेते हैं और कोई प्रतिक्रिया नहीं देते.

प्रस्तुत उत्तेजक गीत हिन्दी फिल्म जगत की सुपरहिट कृति और सर्वप्रिय चलचित्र 'दबंग' से लिया गया है. इसकी पंक्तियाँ एक नर्तकी की सामान्य जीवन से बदनाम जीवन तक की रोचक यात्रा का बड़ा ही मनभावन चित्रण करती हैं. नर्तकी अपने प्रेमी को अपनी इस दशा का कारण बताती है और अपने आस-पास शराबी पुरुष-मित्रों को अपनी व्यथा सुनाती है.

Munni badnaam hui, darling tere liye - 3 times
Munni ke gaal gulabi, nain sharabi, chaal nawabi re
Le zandu balm hui, darling tere liye 
Munni badnaam hui, darling tere liye
Munni ke gaal gulabi, nain sharabi, chaal nawabi re
Le zandu balm hui, darling tere liye - 2 times
Munni badnaam hui, darling tere liye - 2 times

दिनेश जीअभी तक ना तो आपने ऐसा देखा होगा और ना ही आपने सुना होगा। अब जो कुछ आप पढ़ने जा रहे हैं, शायद इससे पहले कोई दूसरी ऐसी खबर हिंदुस्तान से ना आई हो। इसे मजाक कहा जाये, संस्कृति पर हमला या फिर सिरफिरापन... इस काम को कुछ भी कहा जा सकता है। वैसे तो रविवार की रात को सैकड़ों की तादात मे बारातें निकल रही थीं, लेकिन एक ऐसी बारात को लेकर कौतूहल बना हुआ था, और होता भी क्यों नहीं, जो खास लोगों की शादी थी। इंसानों की शादी तो होते हुये देखी गई, लेकिन कुत्ते-कुतिया की शादी को होते हुये पहली बार इटावा वासी देख कर अंचभें मेंपड़ गए थे।

गोपालपिछले बीस वर्षों में भारत में कृषि भूमि 21.4 लाख हेक्टेयर कम हो गयी है। बड़े पैमाने पर बांधों, कारखानों, विशेष आर्थिक क्षेत्र, शहरी विस्तार व राजमार्गों आदि के लिए खेती की भूमि का प्रयोग हो रहा है। जिसके चलते कृषि भूमि लगातार कम होती चली जा रही है। भारत में 1991 के बाद प्रति व्यक्ति अनाज की उपलब्धता लगातार गिर रही है, जो 1991 में प्रतिव्यक्ति 468.5 ग्राम के मुकाबले 2008 में 274.6 ग्राम रह गयी। कृषि उपज व रोजमर्रा की खाने की चीजों को वायदा कारोबार के दायरे में लाने से जहाँ तेजी से मंहगाई बढ़ी वहीं इस खेल के मकड़जाल में फँस कर लोग कंगाल हो रहे हैं। जबकि, सट्टा खिलाने वाले लाखों-करोड़ों का लाभ कमा रहे हैं। अगर ऐसी ही स्थिति बनी रही तो प्रति व्‍यक्ति अनाज की उपलब्‍धता और भी कम हो जाएगी।

राजेशजीहमारे देश ने इतनी तरक्की की है कि हम दुनिया के दूसरे देशों से प्रगति में मुकबला करने के काबिल हो गये हैं। स्वाधीनता के पहले हम जहां सुई तक नहीं बना सकते थे, आज विमान तक बनाने लगे हैं और अब तो हमारा हौसला चंद्रमा तक को नाप लेने का है। हम दुनिया के उन महान गणतंत्रों में गिने जाते हैं, जहां वाणी आजाद है, हवा आजाद है और विचार आजाद है। परतंत्रता की बेड़ियों की मुक्ति के बाद से ही गणतंत्र पर हमारी आस्था अक्षुण्ण और अटल है। बीच के कुछ अवधि के अंधेरे को छोड़ दें तो गणतंत्र का आलोक अपने पूरे गौरव के साथ देश के आलोकित कर रहा है। हम तकनीक में दुनिया से किसी मायने में उन्नीस नहीं हैं। जहां तक साहित्य का प्रश्न है, हमारे लेखक (अंग्रेजी वाले ही सही) विश्व स्तर पर समादृत और पुरस्कृत हो चुके हैं और हो रहे हैं। ऐसे में हमें एक भारतीय या कहें हिंदुस्तानी होने में गर्व है, परन्‍तु इस गर्व के साथ एक बड़ा सा लेकिन जुड़ा हुआ है।

‘शीशी-बोतल तोड़ दो, दारू पीना छोड़ दो’, ‘शराब दुकान हटाओ, छत्तीसगढ़ बचाओ’, ‘सरकार को जगाना है, नशामुक्त समाज बनाना है’ जैसे कई नारे लगाते हुए नवागढ़ की सैकड़ों महिलाएं शराब दुकान बंद कराने सड़क पर उतर आईं। महिलाओं ने कचहरी चौक जांजगीर से रैली की शुरुआत की, जो विवेकानंद मार्ग होते हुए बीटीआई चौक पहुंची और फिर कलक्ट्रेट पहुंची। यहां कलक्टर को महिलाओं ने एक ज्ञापन सौंपा और शराब दुकान को अगले वित्तीय वर्ष से बंद कराने की मांग की। यहां कलक्टर ब्रजेश चंद्र मिश्र ने मामले से राज्य शासन को अवगत कराने की बात कही। जिला मुख्यालय से 20 किमी दूर नगर पंचायत नवागढ़ में पिछले बरसों से लाइसेंसी शराब दुकान संचालित है। शराब दुकान के अलावा गलियों में भी शराब की अवैध बिक्री के कारण महिलाओं को जीना दूभर हो गया है।

दिनांक 10 नवम्‍बर 2009, यह वह दिन था जब रेलवे में पहली बार करप्‍शन की बात वहॉं के कर्मचारियों ने जबर्दस्‍त ढंग से उठायी। उस दिन पता चला कि किस तरह माफिया, अधिकारी और नेताओं की सांठ-गांठ रेलवे को एक अभेद किला बना दिया है। आश्‍चर्य की बात है कि फोर्स तक के घोटालों की बात तो बाहर आ जाती है किन्‍तु रेलवे के किसी भी घोटाले की बात न आज तक पेपर में आयी है और ना ही इलेक्‍ट्रानिक मीडिया में। आन्‍दोलन के एक ही दिन बाद सारी यूनियनों ने हाथ खड़ा कर दिया। यहॉं तक कि बनारस के सांसद मुरली मनोहर जोशी भी एक दिन बाद आंदोलनरत कर्मचारियों को उल्‍टा डांटना और धमकाना शुरू कर दिया। ऑल इण्डिया रेलवे मेन्‍स फेडरेशन (रेलवे बोर्ड द्वारा मान्‍यता प्राप्‍त संगठन) के महामंत्री शिवगोपाल मिश्रा ने आंदोलन में शामिल अपने ही यूनियन के कर्मचारी नेता को यूनियन से निकाल दिया तथा ऐलान कराया कि इस आंदोलन में किसी भी प्रकार से यूनियन शामिल नहीं है।