कहते हैं कि भाषाएं कभी बंधक नहीं होती हैं, अपनी भाषा, अपने लोग सबको अच्छे लगते हैं. मोबाइल के साथ भी कुछ ऐसा ही है, इंग्लिश में तो एसएमएस सभी भेजते हैं, अगर आप अपनी भाषा में भेज सकें तो बात कुछ और होगी लेकिन ऐसा हो नहीं पाता. पर अब ऐसा सम्भव हो पाया है पाणिनि की पैड की मदद से. 'पाणिनि कीपैड'  इस सॉफ्टवेयर की मदद से अब आप अपने मोबाइल से हिन्दी, बंगाली, तेलुगू, मराठी, तमिल, गुजराती, कन्नड़, मलयालम, उड़िया, पंजाबी (गुरुमुखी), असमिया या किसी अन्‍य भाषा में भी संदेश भेज सकते हैं. इस तकनीक को विकसित किया है नोएडा की एक कम्पनी 'लूना एर्गोनोमिक्स प्राइवेट लिमिटेड'  ने.

: जुल्म जारी रखो.. जनता ने खामोश रहना सीख लिया है : राहुल के भट्टा परसौल पहुंचने से एक दिन पहले प्रसारित वीडियो (टीवी रिपोर्टरों के मुताबिक यह गांव से काफी दूर से लिए गए थे) में गांव जलता हुआ दिख रहा था। आग की लपटें दिख रहीं थी। जली हुई गाड़ियां दिख रहीं थी। जली हुई बाइकें दिख रही थी। जलते हुए खेत दिख रहे थे। जलते हुए भूसे और उपलों के बटोरे दिख रहे थे।  मतलब..इसमें कोई शक नहीं कि आग दिख रही थी। आग लगी थी..चारो और आग दिख रही थी।

भास्‍कर: देसी पद्धति सर्वपिष्‍टी से इलाज करने का दावा : चिकित्सा विज्ञान जटिलतम बीमारियों के गूढ़ रहस्यों का पता लगाने के लिए निरन्तर जूझ रहा है। ऐसी अनेक बीमारियां जो मानव जीवन के लिए काल बनी हुई थी, उन्हें पछाड़ कर चिकित्सा विज्ञान ने अपनी उपयोगिता साबित कर दिया है। लेकिन काल से होड़ है की तर्ज पर आज भी चिकित्सा विज्ञान की जंग कैंसर जैसी प्राणघातक बीमारी के साथ जारी है। गौर करने की बात है कि हर साल दुनिया में कैन्सर 80 लाख मानव जिदंगियों को निगल जा रहा है। इंसानी जिदंगी की खुराक पर जिंदा रहने वाले इस रोग पर अगर काबू न पाया गया तो 2020 तक पौने दो करोड़ जिंदगियां हर साल इस की जद में होंगी।

लंबे अरसे बाद गांव पर कुछ समय बिता रहा हूँ. वर्षों बाद भी गांव में पीपल का पेड़ वहीं है, कदंब का पेड़ भी वहीं है और अशोक का पेड़ भी वहीं है तथा आम के बगीचे में आज भी कोयल की आवाज सुनाई देती है, पर गांव अब पहले जैसा नहीं रहा, काफी बदल गया है. एक दशक पहले का गांव कुछ और था तथा आज का गांव कुछ और है. एक दशक पहले जहाँ गांव में कच्ची सड़कें हुआ करती थी, अब पक्की सड़क भी गांव तक पहुँच चुकी है, बिजली आपूर्ति भी गांवों में पहले की अपेक्षा अधिक किया जा रहा है, पहले की झुग्गी-झोपड़ियां अब धीरे-धीरे पक्के मकानों में परिवर्तित हो रही हैं, संचार क्रांति भी गांव के लगभग हर घर तक पहुँच चुका है. मोबाइल फोन की घनघनाहट लगभग हर घर में सुना जा सकता है, तो बहुतायत घरों पर डीटीएच भी देखने को मिल जाता है. परन्तु गांव के जिस बदलाव की बात मैं कर रहा हूँ उसका एक मात्र कारण विकास नहीं है.

भारत की शहरी और ग्रामीण मज़दूर आबादी असहनीय और अकथनीय परेशानी और बदहाली का जीवन बिता रही है। इसमें असंगठित क्षेत्र के ग्रामीण और शहरी मज़दूरों तथा संगठित क्षेत्र के असंगठित मज़दूरों की दशा सबसे बुरी है। उदारीकरण-निजीकरण के बीस वर्षों में जो भी तरक़्क़ी हुई है, उसका फल ऊपर की 15 फ़ीसदी आबादी को ही मिला है। इस दौरान अमीर-ग़रीब के बीच की खाई भारतीय इतिहास में सबसे तेज़ रफ़्तार से बढ़ी है। तेज़ आर्थिक तरक्क़ी के इन बीस वर्षों ने मेहनतकशों को और अधिक बदहाल बना दिया है। आँकड़े इन तथ्यों के गवाह हैं। सरकारें भरोसा दिलाती रहीं और वे इन्तज़ार करते रहे, लेकिन विकास का एक क़तरा भी रिसकर मेहनतकशों की अँधेरी दुनिया तक नहीं पहुँचा।

ओसामा बिन लादेन के मौत के तुरंत बात भारतीय समाचार पत्रों में भारत के थल सेना प्रमुख के बयान आया कि हम भी अमेरिका की तर्ज पर खुफिया अभियान चला सकते हैं। यह बयान इस ओर संकेत करता है कि हमारी सेना सक्षम व आतुर है पाकिस्तान में छुपे हुए देश के दुश्मन का सफाया करने के लिए। यहां जरूरत है सिर्फ राजनैतिक इच्छा शक्ति की। भारतीय थल सेना प्रमुख ने बातों ही बातों में इशारा कर दिया है कि अगर उन्हें मौका मिलता है तो वह पाकिस्तान के सरजमी पर घुस कर भारत के दुश्मनों का सफाया कर देंगे, लेकिन क्या हमारी सरकार के पास इतनी इच्छा शक्ति है कि वह दाउद, टाईगर मेमन, व मुंबई धमाकों में शामिल देश के गद्दारों के खिलाफ कोई कठोर कदम उठा सके या अब भी हम सिर्फ अमेरिका को संतुष्ट करने में लगे रहेंगे।

मदन तिवारीअन्ना हजारे ने  जनलोकपाल बिल की ड्राफ़्टिंग समिति के लिये अपने अलावा चार अन्य लोगों के नाम सुझाये थे। ये नाम हैं जज संतोष हेगडे, पिता-पुत्र शांति भूषण एवं प्रशांत भूषण तथा अरविंद केजरीवाल। ये चारो व्यक्ति ड्राफ़्ट कमेटी के सदस्य हैं। उन चारो सदस्यों की संपति के जो आकडे़ प्रकाशित हुये हैं उसके अनुसार सबसे ज्यादा संपत्ति के मालिक हैं शांति भूषण, ये केन्द्र में मंत्री भी रह चुके हैं। इनकी संपत्ति में शामिल है नोएडा में चार मकान/फ़्लैट,  इलाहाबाद के एक घर में एक चौथाई हिस्सा, बंगलोर में एक फ़्लैट तथा रूड़की में खेती योग्य भूमि,  इसके अलावा बांडस, मुचुअल फ़ड तथा ज्वेलरी की लागत आंकी गई है   2, 09, 72, 80, 000  यानी शांति भूषण जी अरबपति हैं। फ़िर एक बार याद दिला देता हूं कि शांतिभूषण जी केन्द्रीय मंत्री रह चुके हैं।

ज़माना तेज़ गति से बदल रहा है.. ज़ाहिर है इससे कोई बच नहीं सका है.. बात करें जेंटलमेन गेम क्रिकेट की तो सबसे लोकप्रिय खेल माना जाने वाला क्रिकेट भी अब कई तरह के बदलावों से गुजरने के बाद अब जेंटलमेन गेम कहलाने लायक नहीं रह गया है.. जी हाँ.. एक ज़माना था जब क्रिकेट सभ्य यानी जेंटलमेनों का खेल कहा जाता था.. लेकिन आज बीते ज़माने के क्रिकेट और ताजातरीन क्रिकेट में तुलना करें तो शायद ये बात साफ़ हो जाती है कि इस खेल में काफी कुछ बदल गया है.. टेस्ट मैच से वन डे, और वन डे से ट्वेंटी-ट्वेंटी..  और अब टेन-टेन से गली क्रिकेट के इस सफ़र में कहीं न कहीं क्रिकेट से जेंटलमेन का तमगा हटता नज़र आ रहा है.. क्रिकेट के शुरुआती दौर में सफ़ेद कपड़ों में क्रिकेट खेलना सभ्य लोगों के खेल की निशानी माना जाता था.. दौर बदला, कांसेप्‍ट बदला और कपड़ों का रंग भी बदला.. लेकिन साथ ही बदला सभ्य माने जाने वाले क्रिकेटरों का स्वभाव, उनका बॉडी लैंगवेज और उनका एटीट्यूड.

आज के गांधी के रूप में विख्यात अन्ना हजारे महाराष्ट्र के अपने गांव रालेगांवसिद्धि, जो उनकी कर्मभूमि भी है, पहुंच चुके हैं। बीबीसी हिन्दी वेबसाइट में प्रकाशित आलेख 'अन्ना का आदर्श गांव' बताता है कि कैसे अन्ना ने पांच साल के अथक प्रयासों के बाद गांव के लोगों को शराब पीने से रोका। जिस गांव में शराब की भट्टियां हुआ करती थी वहां कैसे पान-बीड़ी सिगरेट, तम्बाकू की दुकान तक नहीं है। अब वहां बैंक हैं, साफ सुथरी सड़कें हैं और बाहर से आने वालों के लिये जगह है, इंटरनेट और लाइब्रेरी की सुविधा है। सुबह पांच बजे उठकर योग प्राणायाम से अपनी दिनचर्या शुरू करने वाले अन्ना अब भी गांव के उसी लकड़ी के मंदिर में रहते हैं, जहां से 1975 में उन्होंने फौज की ड्राइवर की नौकरी छोड़ने के बाद से समाज सेवा शुरू की थी।

भास्करबचपन की कुछ बातें याद हैं मुझे / याद है मेरी मां का आशाओं से भरा वो चेहरा

सपनों से भरी वो आंखें / जिसमें उन्होंने कितनी उम्मीदों को पाला था

रातों को जाग-जागकर / मां का वो शांत सा चेहरा।

 

लोकेंद्र भारत की 15वीं जनगणना के प्रथम और द्वितीय चरण के आंकड़े जारी हो गए। आंकड़ों के मुताबिक हमारे कुनबे का विस्तार हो गया है। देश की राजधानी दिल्ली में 31 मार्च को जनगणना आयुक्त सी. चन्द्रमौली ने बताया कि जनगणना के प्रारंभिक आंकड़ों के मुताबिक भारतीय एक अरब इक्‍कीस करोड़ हो गए हैं। खैर अभी धीरे-धीरे और भी आंकड़े समाचार पत्र-पत्रिकाओं और टीवी चैनलों के माध्यम से हमारे सामने आएंगे। इसमें कई आंकड़े बहुत ही भ्रामक होंगे। उन्हें झूठे आंकड़े भी कहा जा सकता है। इन्हीं भ्रामक और झूठे आंकड़ों के सहारे भारत की जनता के लिए भविष्य में कल्याणकारी (?) योजनाएं बनाईं जाएंगी।

डा. नूतन ठाकुरहम लोग जब भी किसी अंतर्राष्ट्रीय भाषा की बात करते हैं हमारे जेहन में मात्र एक भाषा आती है अंग्रेजी. इंटरनेशनल यानी इंग्लिश. और हिंदी? वह तो एकदम से देहाती भाषा है. मात्र हिंदी गो-पट्टी की भाषा, जिसे अब तक पूरे भारत देश के लोगों ने भी ना तो समुचित मान्यता दी है और ना ही हृदय से स्वीकार किया है. जब तक मैं भारत से बाहर नहीं गयी थी,  तब मैं भी ऐसा ही मानती थी. पर अब जब अमेरिका से घूम आई हूँ तो मुझे यही एहसास हो रहा है कि हम लोग वास्तव में हिंदी के साथ बहुत बड़ा अन्याय कर रहे हैं.

मदन तिवारीअन्ना हजारे का कद इस आंदोलन के बाद बहुत बड़ा हो गया है उन्होंने मुख्यमंत्रियों को प्रमाण-पत्र बांटना शुरू कर दिया है, लेकिन पहले अन्य बातों का जिक्र करुंगा उसके बाद आउंगा प्रमाण पत्र पर। सबको मालूम है मैं शराबी नहीं, कोई पिलाये तो मैं क्या करुं। कुछ इसी तर्ज पर चल रहा है यह सारा ड्रामा। मैं गांधीवादी हूं, अब कोई मुझे भ्रष्ट बना दे तो मैं क्या करुं। आजतक यह मुल्क नहीं जान पाया कि नेहरू के लिये गांधी जी की कमजोरी का राज क्या था? वह कौन सा कारण था जिसके कारण गांधी जी सुभाष चन्द्र बोस को कांग्रेस के अध्यक्ष पद से हटाने के लिये परेशान हो गये थे और अन्तोगतवा हटाकर ही दम लिया।

: सब कुछ मिस ही मिस : मिस अण्डर स्टैण्डिंग, मिस ऑपरेटिंग, मिस टेकिंग : आजकल कुछ ऐसे रिपोर्टर्स देखने को मिलेंगे जो न चाहते हुए भी आप के मेल पते पर ऊल-जुलूल किस्म की खबरें भेजते हैं। शायद ऐसा करना उनकी आदत है जो एक 'ड्रग एटिक्ट'  की तरह कई मेल आईडी पर एक साथ अपने वाहियात 'आर्टिकल्स' भेजते हैं। हाई प्रोफाइल कहलाने के चक्कर में ब्लाग/फेसबुक आदि इत्यादि वेब स्पेस पर अपनी सिरदर्द जैसी बकवासों को लिखने/चैटिंग करने वालों से एक तरह से 'एलर्जी'  हो गई है। इन्टरनेट की सेवा प्रदान करने वालों ने थोड़े से पैसों में असीमित डाउन/अपलोडिंग की सुविधा दे रखा है,  सो वेब का बेजा इस्तेमाल करने वाले अराजक तत्वों की भरमार हो गई है। इन लोगों ने इन्टरनेट को मजाक सा बना लिया है। कुछेक कथित लेखकों ने हमें भीं अपने लेख/न्यूज आदि मेल करना शुरू कर दिया। खीझ होने लगी थी, यह कहिए कि ऐसे लोगों से एलर्जी होने लगी। सैकड़ों मेल आईडी पर भेजे गए इन तत्वों के 'आलेख' न तो सारगर्भित होते हैं, और न ही प्रकाशन योग्य।

प्रिय श्री अन्ना हज़ारे जी, आपके आन्दोलन को मिल रहा अपार जनसमर्थन इस बात का द्योतक है कि लोग व्यवस्था में बदलाव चाहते हैं. टीवी देख कर, समाचार पत्रों को पढ़ कर तो ऐसा लग रहा है कि अगर आपका आन्दोलन सफल हो गया तो भ्रष्टाचार फिर किताबों में ही पढ़ने को मिलेगा या फिर दादी-नानी के किस्से कहानियों में. ऐसा होता है तो इससे अच्छा और क्या होगा, पर मैं दो-चार बातें कहना चाहूंगा. उपवास का मैं विरोधी नहीं, उपवास करना चाहिए. गाँधी जी भी करते थे और उन्होंने कहा भी है कि भोजन करना एक अशुचितापूर्ण कार्य है ठीक उसी तरह जैसे मल त्याग करना. अंतर सिर्फ इतना है के मल त्याग करने के बाद हम राहत महसूस करते है और भोजन करने के बाद बेचैनी.

पंजाब में इन दिनों मांगें मनवाने के लिए अजीबो-गरीब तरीके अपनाए जा रहे हैं। मसलन सरकार पर दबाव बनाने के लिए कोई पेट्रोल की बोतल और माचिस लेकर पानी की टंकी पर चढक़र आत्मदाह की धमकी दे रहा है तो कोई बहुमंजिला इमारत पर चढक़र वहां से कूदने की धमकी देकर मांग मंजूर करने को कह रहा है। शोले फिल्म की तर्ज पर धमकी का यह फार्मूला कुछ मामलों में सफल भी रहा है। पिछले दिनों हड़ताली कर्मियों ने ऐसा किया तो पंजाब सरकार की जान सांसत में आ गई, यकीन माने उनकी नौकरी की मांग मंजूर हो गई और टंकी पर चढ़े लोगों को नियुक्ति पत्र थमाए तब कहीं जाकर नीचे उतरे। यह तो बात हुई कर्मचारियों की जीत की लेकिन पंजाब के कपूरथला में महिलाकर्मियों ने टंकी पर चढक़र जब दबाव बनाने का प्रयास किया तो हाथ में आग और पेट्रोल की बोतल लिए एक महिला आग की चपेट में आ गई और बुरी तरह से झुलस गई बाद में उसकी मौत भी हो गई।