अन्ना हजारे व उनके कथित सिविल सोसायटी के लोगों ने भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग का ऐलान किया और उनकी इस मुहिम में भागीदारी की तथाकथित नवधना्ढ्य और प्रोफेशनल्स ने। इस दौरान सरकारी भ्रष्टाचार की तो खुलकर बातें की गई, विदेशों में काले धन पर सरकार को कोसा गया लेकिन निजी क्षेत्र में अजगर की भांति फैल गये भ्रष्टाचार पर किसी ने चर्चा करना भी उचित नहीं समझा। क्या कारण है कि कल के मामूली व्यापारी आज करो़ड़ों और अरबों में खेल रहे हैं। शिक्षा के निजीकरण के नाम पर भ्रष्टाचाररूपी अवैध कमाई को मुनाफे का नाम दिया जा रहा है।

पैसे की अहमियत बच्चे पैदा होते ही समझने लगते हैं। मेरी बचपन की शुरुआत भी 5 और 10 पैसे से हुई थी। उस समय 5-10 पैसे में ही कमपटें आ जाया करती थी। धीरे-धीरे समय बदला और वहीं कमपटें आधुनिक समय की टॉफी बन गयी जो 25 पैसे में आया करती थी। लेकिन उस 25 पैसे को बचपन से ही चवन्नी कहना सिखाया गया था। जैसे-जैसे महंगाई बढ़ी 5-10 पैसे ने बाजार में अपना दम तोड़ दिया। अब बाजार में केवल चवन्नी को पहचाना जाता था। दिन भर के काम खत्म कर जब पिताजी घर आते तो मैं उनसे चवन्नी मांगा करता था। उनके पूछने पर ''क्या लोगे?''  तो मेरे मुंह से एक ही जबाव निकलता था ''टॉफी''  वो चुपचाप से एक चवन्नी निकालकर मेरे हाथ में थमा देते।

निरंजन परिहारराज बब्बर के घर आप जाएंगे, तो मुंबई के जुहू में गुलमोहर रोड़ स्थित उनके बंगले 'नेपथ्य'  के ड्रॉइंग रूम की दीवार पर एक बड़ी सी पेंटिंग देखने को मिलेगी। बरसों पहले की बात है, 'नेपथ्य'  के मुहुर्त पर नादिरा बब्बर ने बहुत सारे लोगों को बुलाया था। लोग आए भी। कार्यक्रम पूरा हुआ। घर के सारे लोग सो गए। आधी रात को अचानक दरवाजे की घंटी बजी, और खोला, तो सामने जो आदमी खड़ा था, उसका नाम मकबूल फिदा हुसैन था। हाथ में एक बैग भी था। बोले- 'दिन भर नहीं आ पाया, इसीलिए अब वक्त मिला तो आ गया।'  अंदर आकर बातचीत करने के साथ हुसैन की नजरें कुछ तलाश रही थी। एक दीवार खाली दिखी तो, उस पर पेंटिंग बनानी शुरू कर दी। फिर बोले- ' नए घर के मौके पर आप लोगों को यह मेरी ओर से गिफ्ट।'

उमेश चतुर्वेदीसाहित्यिक समरोहों की सफलता के लिए पहले मुख्य अतिथि और अध्यक्ष का नाम ही काफी होता था। लेकिन पिछले कुछ सालों में इसमें एक और हस्ती जुड़ गई है -  संचालक की। अव्वल तो सभा-समारोह अध्यक्ष जी की ही अनुमति से आगे बढ़ती है, लेकिन हकीकत में सभा-समारोह में किसे गुलदस्ते देना है और कौन देगा या फिर कौन वक्ता कब बोलेगा और किसको कब बोलने से रोकना है, यह सब संचालक महोदय ही तय करते हैं। कहने का मतलब है कि सभा समारोहों में संचालक महोदय ही चलती है। संचालक का काम वैसे सूत्रधार का होता है।

योगगुरु बाबा रामदेव और गांधीवादी समाजसुधारक अन्ना हजारे के आमरण अनशन से देश में कई राय दिखाई पड़ती है. एक तरफ दोनों के आन्दोलन को बड़ी संख्या में देश, समाज, गैरसरकारी संसथान, गैर राजनितिक लोगों, दिग्गज, युवाओं को समर्थन मिला. तो दूसरी और कानून के जानकार, कांग्रेस पार्टी के वरिष्‍ठ नेताओं का ये मानना है कि अन्ना हजारे और बाबा रामदेव के आन्दोलन से देश के संविधान और पार्लियामेंटरी डेमोक्रेसी को ख़तरा हो सकता है. अन्ना हजारे और बाबा रामदेव जिस तरीके से अपनी मांगें मानने के लिए हथियार अख्तियार कर रहे,  वो एक जमाने में महात्मा गांधी ब्रिटिश सरकार के खिलाफ किया करते थे .किन्तु दोनों आन्दोलान में जमींन आसमान का अंतर दिखाई पड़ता है. महात्मा बापू जी ने जिन ब्रिटिशों के खिलाफ आन्दोलान चलाया था उस में देश की आज़ादी ही केवल प्रमुख लक्ष्य था. अन्ना हजारे और बाबारामदेव के आन्दोलन में देश और समाज से ज्यादा खुद की पब्लिसिटी पाने में ज्यादा दिलचस्पी है.

प्रसूनकिस्सा दधीचि और इंद्र का बनाम अन्ना और सरकार का...  कहानी पढ़ने से पहले पाठकों से अनुरोध है कि जहां राक्षस लिखा है... उसे कृपया विरोध पढ़े और जहां इंद्र लिखा है.. उसे सरकार समझें और जहां दधीचि लिखा है... उसे भ्रष्टाचार के खिलाफ मुहिम छेड़ने वाले माने। जहां देव लिखा है उसे नेता और सफेदपोश दलाल समझें, फिर पढ़े पूरा लेख... और आखिरी पैराग्राफ जरूर पढ़े।

लोकेंद्र आप अपना काम करें, देश की समस्याओं पर बोलने का कोई अधिकार आपको नहीं है। अगर आप डाक्टर हैं तो लोगों का इलाज करें। शिक्षिक हैं तो सिर्फ वही पढ़ाएं जो किताबों में लिखा है। इंजीनियर है तो बिल्डिंग बनाएं, देश निर्माण करने की आवश्यकता नहीं। यही संदेश दिया है कांग्रेस ने चार-पांच जून की दरमियानी रात रामलीला मैदान में योग गुरु बाबा रामदेव के अनशन पर बर्बर कार्रवाई कर। कांग्रेस और उनके नेताओं ने मीडिया के सामने खुलकर कहा कि हमने भ्रष्टाचार के खिलाफ अनशन कर रहे इस देश के नागरिकों पर आंसू गैस के गोले दागकर और लाठियां भांज कर एकदम सही किया है।

नेहा : फादर्स डे पर विशेष : ज़िन्दगी की शुरुआत तो होती है उन दो रिश्तों से जिनसे हम सब कुछ सीखते हैं, वो हैं हमारे माता और पिता.धरती पर आने के बाद जब हमारी आंखें खुलती है तो हमारे सामने यही दो शख्स होते हैं जो हमें जीने की राह सिखाते हैं. यही वो दो हैं जो हमारे लिए सबसे महत्वपूर्ण होते हैं. अभी हाल में ही कुछ दिनों पहले मदर्स डे बीता है. माँ शब्द का ज़िक्र हर जगह कविता, कहानी आदि में भरपूर तरीके से किया जाता रहा है और मदर्स डे पर मैंने अपनी माँ पर कुछ लाइन लिखी थी. उसी तरह आज फादर्स डे पर मैं कुछ बातें अपने पापा के बारे में लिखना चाहती हूँ. शायद हर किसी को अपने माता पिता सबसे ज्यादा अच्छे लगते है और उन्हें वो दुनिया से ज्यादा प्यारे भी होते हैं.

मेरा रंग दे बसंती चोला... गीत से लोगों में जोश और ओज भरने वाले बाबा रामदेव रामलीला मैदान में दिल्ली पुलिस की कार्रवाई के दौरान कायरता क्यों दिखा गए? उन्हें खाकी वर्दी के खौफ ने ऐसा करने विवश किया या फिर अचानक हुई पुलिसिया कार्रवाई में वे डर गए और आपा खो बैठे। उनका मंच से कूदना, लोगों में शामिल होना, भीड़ में गुम होना फिर महिलाओं के वस्त्रों में मिलना यह सब क्या था? गेरुआ लंगोटी वाले बाबा को बाद में झक सफेद कपड़ों में जिसने भी देखा हैरान रह गया। उनके चेहरे पर हवाइयां उड़ रही थी और तमतमाए क्रोध में उनसे बोलना मुश्किल हो रहा था। हरिद्वार में अपने आश्रम में पत्रकार वार्ता के दौरान उनके आंसू भी निकल आए इसके बाद वे जो बोले उससे लोगों को उनके प्रति सहानुभूति उपजी जिसकी दरकार कहां थी? अपने योग कार्यक्रमों में वे लोगों में देशभक्ति का जज्बा भी पैदा करते रहे हैं।

मदन तिवारीगांधी सादा जीवन उच्च विचार के सिद्धांत में यकीन करते थे। ट्रेन के तीसरे दर्जे में सफ़र और कपड़ों में सादगी। कांग्रेस के अधिवेशन में स्वेच्छा से अस्थायी पाखाने को साफ़ करने का जिम्मा गांधी लेते थे। आज गांधीवादी कहलाने वाले अन्ना प्लेन से चलते हैं। बिसलरी का पानी पीते हैं। उनके भी गुरु हैं रामदेव अरबों की संपत्ति, दवाओं का कारोबार, टीवी चैनल के मालिक। यह सारी संपत्ति कहां से आई नहीं बताते हैं। हां यह जरुर बोलते हैं सरकार जांच करा ले। अन्ना के पास भी करोड़ों की जमीन है लेकिन खुद के नाम पर नहीं। महाराष्ट्र के अहमदनगर के लोगों को सब पता है। चार अप्रैल को अन्ना ने एक नये कानून को पास कराने के नाम पर ड्रामा शुरु किया था,  एक हफ़्ते के अंदर बंद कर दिया। पांच दिन तक चले अन्ना के ड्रामे के लिये लगे शामियाने का खर्च था पांच लाख और पानी पर भी चार-पांच लाख खर्च हुये थे। तकरीबन ३२ लाख रुपये खर्च हुये थे।

एक मदारी और जंबूरा मैदान में आ गए थे. मदारी डुगडुगी बजा कर मजमा लगा रहा था. लोगों की भीड़ उन्हें चारों और से घेर कर खड़ी थी.  मदारी भीड़ पर एक नजर से देख कर पुन: डुगडुगी बजाने लगा. थोड़ी देर में ही भीड़ काफी बढ़ चुकी थी. मदारी जम्बुरे को संबोधित करके बोला-

जंबूरे,

"हाँ, उस्ताद"

भूमिका रायआस्था और अंधविश्‍वास में एक सूत जितना ही फर्क होता है। जहां आस्था और विश्वास इन्सान को संबल देते हैं, भरोसा करना सिखाते हैं वहीं अंधविश्‍वास इन्सान को निष्क्रिय और कमजोर बना देता है। ईश्वर में विश्वास करना सही है, क्योंकि ईश्वर के प्रति आस्था मनुष्य की सोच को सकरात्मक बनाती है। लेकिन हाथ-पैर छोड़कर सिर्फ भगवान के भरोसे बैठ जाना विश्वास नहीं अंधविश्‍वास है। कहा भी गया है कि 'अजगर करे न चाकरी, पंछी करे न काम। दास मलूका कह गये सबके दाता राम।' सबकुछ छोड़-छाड़ कर भगवान के भरोसे बैठ जाना ईश्वर में आपके विश्वास को नहीं बल्कि आपकी अकर्मण्यता को बयान करता है। और वास्तविकता भी यही है कि कर्म ही सर्वश्रेष्ठ है। इन्सान के कर्म ही उसके भविष्य और वर्तमान के लिए उत्तरदायी होते हैं। गीता में भगवान श्री कृष्ण ने भी कर्म को ही सर्वोपरि बताया है।

सुबोधपुलिस एसोसिएशन एक सामाजिक पुलिस कल्याणकारी संगठन है और जिसको मजबूत करने के लिए हर पुलिस कर्मी की जिम्मेदारी है, क्योंकि इसके माध्यम से ही हम पुलिस कर्मी एक दूसरे की मदद कर सकते हैं. यह जानकारी इटावा में उत्तर प्रदेश पुलिस एसोसिएशन के उपाध्यक्ष सुबोध यादव ने देते हुए कहा कि हम लोग इस संगठन के माध्यम से प्रदेश पुलिस के आला अफसरों को अपनी समस्याओं से अवगत करा सकते हैं. पुलिस एसोसिएशन के उपाध्यक्ष ने सभी चार लाख अराजपत्रित पुलिस जनों को संगठन की जानकारी देते हुए कहा कि जितना अपना संगठन मजबूत होगा उतना ही हर पुलिस कर्मी मजबूत होगा और हम लोग इसी संगठन के माध्यम से अपने साथियों की व उनके परिजनों की विपत्ति में मदद कर सकेंगे.

आख़िरकार एलोपैथिक आईसीयू ने योग को छुट्टी दे ही दी और ये सलाह भी की योग गुरु योग ही न करें, मतलब एक तरीके से बाबा को भी भी छुट्टी दे दी उनके काम से, अब बाबा क्या करेंगे वो अलग बात हैं पर योग अब क्या करेगा वो देखना दिलचस्प होगा. वैसे अब तक योग के फायदे ही सुने थे नहीं पता था योग नुकसान भी कर देता हैं। 1924 में गांधी ने 21 दिनों तक नमक-पानी पर उपवास किया। जतिन दास ने 63 दिनों तक उपवास किया और जान दे दी। पोट्टी श्रीरामुलु ने 82  दिनों तक उपवास किया। ममता बनर्जी ने सिंगुर के लिए 23 दिनों का उपवास रखा। बाबा का नौंवां दसवां दिन चल रहा है। हर जगह यूरिन रिपोर्ट का फ्लैश चल रहा है। सवाल एक और है बाबा एलोपैथिक आईसीयू में क्यों गए। उन्हें योगशक्ति से मुकाबला करना चाहिए था।

कल रात का दिल्ली के रामलीला मैदान पर लोकवाणी का जिस क्रूरता से दमन करवाया गया, वह भारत के नागरिकों के ऊपर गुजारा गया दमन था. सरकार के नुमाइंदों ने जिस तरह से कानून को अपने बाप की दौलत समझ कर दुरूपयोग किया वह हमें मुग़ल कालीन आततायियों की याद दिलाते हैं. क्या लोकशाही का अर्थ और अंजाम यही आना था या आगे भी इसी तरह के सितम भारतीयों पर इटली की रानी के हुक्म से गुजारे जायेंगे. हे! महात्मा, अगर इसी तरह की आजादी के लिए आपने अंग्रेजों से लोहा लिया था तो आप जहां से भी इस घटना क्रम को देख सकते हैं तो अब सिर्फ आप पछता सकते हैं, क्योंकि आप तो इस देह में नहीं हैं. हे! बापू, क्या आपका अंहिसक सत्याग्रह का शस्त्र जिसे आपने भी समय-समय पर खूब आजमाया था, अब धार खो चुका है? क्या निर्दोष भारतीयों को अब अपनी जायज बात कहने का हक़ खत्म हो गया है?

आलोक कुमार प्रधानमंत्री के आर्थिक सलाहकार परिषद के चेयरमैन सी रंगराजन ने देश के वित्तीय घाटे के रोकथाम के लिए पेट्रोल की कीमत में फिर इजाफा करने की सलाह दी है। रंगराजन की सलाह के साथ ही सभी पेट्रोलियम पदार्थों के कीमत का इजाफा करने के लिए सरकारी तंत्र ने कसरत करना शुरू कर दिया है। आईए, महंगाई के मूल वजहों में से एक पेट्रोल की महंगाई को एक मिसाल से समझते हैं। मुख्यमंत्री नल्लारी किरण कुमार रेड्डी के राज्य की राजधानी हैदराबाद के पेट्रोल पंप पर 70 रुपए 70 पैसे प्रति लीटर की दर से पेट्रोल मिल रहा है। अब कीमत कहां पहुंचेगी और आम इंसान के जीवन को कितना दूभर कर देगी कहा नहीं जा सकता।