हिंदी दिवस, हिंदी पखवाड़े और हिंदी माह लगभग सभी सरकारी विभागों में आयोजित किये जाते हैं। जिसमें कि हिंदी के प्रतिष्ठित कवि-पत्रकार-कथाकार भाग लेते हैं। हिंदी के प्रोत्साहन के लिए ऐसे कार्यक्रम हों ये बहुत ही अच्छी बात है मगर कई विभागों में रचनाकारों को पारिश्रमिक के रूप में जो पत्रं-पुष्पम भेंट किये जाते हैं वे आज की मंहगाई के दौर में बहुत हास्यास्पद से लगते हैं। दिल्ली शहर नहीं है। पूरा प्रदेश है। यहां यदि कोई विद्वान अपने साधन से भी जाता है तो पांच-सात सौ रुपए का पेट्रोल आयोजन स्थल तक पहुंचने में खर्च हो जाता है। आयोजन में दो-तीन घंटे खर्च करने के बाद यदि किसी को बतौर मेहनताने के महज 100 रुपए का चेक पकड़ा दिया जाए तो क्या यह उचित है। जबकि यही संस्थान अपने प्रचार के लिए करोड़ों रुपए खर्च करते हैं।

अपनी बातें दूसरों तक पहुंचाने के लिए पहले रेडियो, अखबार और टीवी एक बड़ा माध्यम था। फिर इंटरनेट आया और धीरे-धीरे उसने जबर्दस्त लोकप्रियता हासिल कर ली। हजारों और लाखों की संख्या में वेबसाइटस बन गई और लोग इस से लाभ उठाने लगे और उस पर लिखने लगे। चूंकि वेबसाइट चलाते रखने का कुछ खर्च भी आता है इसलिए नेट पर भी हर किसी के लिए लिखना आसान नहीं रहा। ऐसे लोग जिन्हें लिखने का शौक है मगर न तो वह अखबार में लिख सकते हैं और न ही उनका लेख इस लायक होता है कि वह किसी वेबसाइट पर प्रकाशित हो सके। ऐसे लोगों के लिए "ब्लॉग" एक ऐसा वरदान बन कर आया जिस पर जो जैसा चाहे मुफ्त में लिख सकता है।

देश के तमाम बुद्धिजीवियों ने अन्ना हजारे के आंदोलन की अपने-अपने तरीके से आलोचना प्रारंभ कर दी है। वे जो सवाल उठा रहे हैं वे भटकाव भरे तो हैं ही, साथ ही उससे चीजें सुलझने के बजाए उलझती हैं। किंतु हमें एक निहत्थे देहाती आदमी की इस बात के लिए तारीफ करनी चाहिए कि उसने दिल्ली में आकर केंद्रीय सत्ता के आतंक, चमकीले प्रलोभनों और कुटिल वकीलों व हावर्ड से पढ़कर लौटे मंत्रियों को जनशक्ति के आगे घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया। आंदोलन में एक बेहद भावात्मक अपील होने के बावजूद देश में घटी इस घटना को एक ऐतिहासिक समय कहा जा सकता है। सत्ता और राज्य (स्टेट) की ओर से उछाले गए प्रश्नों के जो उत्तर अन्ना हजारे ने दिए हैं, वे भी जनता का प्रबोधन करने वाले हैं और लोकतंत्र को ताकत देते हैं।

हिंदी हमारी राष्ट्रभाषा नहीं बल्कि हमारी राज भाषा है. संविधान के भाग-१७ के अनुच्छेद ३४३ के अनुसार हिंदी को संघ की राजभाषा का दर्ज़ा दिया गया है. आज भी हिंदी भाषा की पहुँच सबसे ज्यादा क्षेत्रों में हैं...पर आज आधुनिकता और बदलते वातावरण के चलते हिंदी से हमारा नाता खत्म होता हुआ सा नजर आता है. पहले की पढ़ाई और अब की पढ़ाई में ज़मीन और आसमान का अंतर है. आज लोग हिंदी की बजाय अंग्रेजी को ज्यादा महत्व दे रहे हैं. आज कल जिसे दो वाक्य अंग्रेजी नहीं बोलने आती उसे समाज से पीछे का समझा जाता है. आज लोग अपने बच्चों को शिक्षा देने के लिए कॉन्वेंट स्कूलों का सहारा ले रहे हैं. आज लोग परा-स्नातक की उपाधि तो ले लेते हैं पर दो लाइन न शुद्ध हिंदी लिख पाते हैं न बोल पाते हैं.

टेनिस सनसनी के नाम से पूरी दुनिया में प्रसिद्धि पा चुकी सानिया मिर्ज़ा अपने खेल के माध्यम से ही भारत में मशहूर नहीं हुई बल्कि भारत में सानिया के दीवानों की एक बड़ी फ़ौज है, जो सानिया को किसी कीमत में खोना नहीं चाहता. सानिया का भारत में क्रेज का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि  अब तक सानिया के नाम से भारत में कई गीत आ चुके हैं और उन गीतों पर यहाँ के युवा जम कर थिरकते हैं. पूर्वी उत्तर प्रदेश, झारखण्ड और बिहार,  जहां की खासकर बोली भोजपुरी है,  में भी अब तक सानिया के नाम तीन गीत काफी फेमस हुए.

: 5 सितम्‍बर को जगदेव प्रसाद के शहादत दिवस पर विशेष : महात्मा ज्योतिबा फूले, पेरियार साहेब, डा. आंबेडकर और महामानववादी रामस्वरूप वर्मा के विचारों को कार्यरूप देने वाले जगदेव प्रसाद का जन्म 2 फरवरी 1922 को महात्मा बुद्ध की ज्ञान-स्थली बोध गया के समीप कुर्था प्रखंड के कुरहारी ग्राम में अत्यंत निर्धन परिवार में हुआ था. इनके पिता प्रयाग नारायण कुशवाहा पास के प्राथमिक विद्यालय में शिक्षक थे तथा माता रासकली अनपढ़ थी. अपने पिता के मार्गदर्शन में बालक जगदेव ने मिडिल की परीक्षा पास की. उनकी इच्छा उच्च शिक्षा ग्रहण करने की थी, वे हाईस्कूल के लिए जहानाबाद चले गए.

मौजूदा दौर में हमारा देश जबरदस्त राजनैतिक और संवैधानिक संकट से गुजर रहा है. तमाम घोटालों और राजनेताओं की कुत्सित स्वार्थपरता ने लोक का भरोसा तंत्र पर से डिगा दिया है. पहले रामदेव और अब अन्ना हजारे ने देश में रक्तबीज की तरह बढ़ रहे भ्रष्टाचार को काबू करने के लिए जनांदोलन को हथियार बनाया, मीडिया के कुछ घराने भी 'आँखे-खोल,भ्रष्टाचार पर हल्ला बोल' नारे के साथ अन्ना को हर पल कवर करते हुए टीआरपी बटोर रहे हैं. जनता भ्रष्टाचार के विरोध में अन्ना के साथ हैं और राजनेताओं और नौकरशाहों को शाश्वत भ्रष्टाचारी मानकर इन्हें कानून की जंजीरों में जकड़ने पर आमादा है. देश में पहला ऐसा मौका है जब स्वतंत्रता दिवस के दिन भी इतने तिरंगे नहीं लहराए, जितने इसके बाद लहरा रहे हैं.

अन्ना आन्दोलन की जीत ने देश में काफी समय बाद जनता की प्रभुसत्ता को स्थापित किया है। इस आन्दोलन ने पुनः साबित किया कि सत्ता और सरकार चाहे कितनी भी ताकतवर क्यों न हो उसे सच और इस सच के साथ खड़ी हुई जनता की भावनाओं के सामने झुकना पड़ता है। इस आंदोलन ने पिछले बीस वर्षों के आर्थिक सुधार के दौर में देश में पैदा हुई इस निराशा की भावना के कि कुछ नहीं हो सकता, को भी एक हद तक कम करने का काम किया। कम्युनिस्ट घोषणा पत्र में मार्क्स ने लिखा था कि पूंजीवाद विकास के क्रम में मात्र उन हथियारों को ही पैदा नहीं करता बल्कि उन्हें चलाने वालों को भी पैदा करता है, जो उसके विनाश का कारण बनते है।

अन्ना के साथ आज पूरा देश खड़ा है। यह हूजूम पूरे जोश में है। धूप में, पानी में भींगते, सोशल नेटवर्किंग साइटों पर, नेट पर, देश भर के मीडिया में लबालब- ठसाठस भरे। इससे यह तो जरूर उजागर होता है कि अवाम भ्रष्टाचार से त्रस्त है और इससे हर हाल में छुटकारा पाना चाहती है। भ्रष्टाचार से मुक्ति के लिए ही आज अन्ना और सिविल सोसाइटी के साथ देशवासी एक सशक्त लोकपाल के लिए आंदोलन कर रहे हैं। मीडिया भी लगातार सजीव प्रसारण में चैबीसो घंटे लगी हुई हैं। शायद देश में इसके अलावा और कुछ घटित नहीं हो रहा है! मैं इस उद्देश्य से पूरा इत्तेफाक रखते हुए और अण्णा की गिरफ्तारी व सरकार का उनके प्रति रवैये का पुरजोर विरोध करते हुए भी कई सवाल उठाना चाहती हूं (इस खतरे के साथ भी कि आज इस पर कोई सवाल उठा देना मात्र भी देशद्रोह की श्रेणी में जा रहा है)!

मेरे कार्यालय के बाहर से मोटर साइकिल चोरी हो गयी। मौखिक बहस के बाद दूसरे दिन एफआईआर दर्ज हुई। हार्ड कॉपी की प्रतिलिपि के लिए मुंशीजी को दो सौ की फीस न देने के कारण तीन दिन मामला लटका रहा। एक सप्ताह बाद विवचेना अधिकारी का खड़ी भाषा वाला फोन आया "क्या इंश्योरेंस से क्लेम लेना है।" "वो तो लेना पड़ेगा या तो वाहन मिले वर्ना क्लेम" हमने फोन पर यह उत्तर दिया। उसके जवाब में हमें व्यक्तिगत रूप से मिलने का हुक्म दरोगा जी ने दिया। मिलने का स्थान व समय विस्मयकारी था। सुबह 8 से पहले या रात 8 के बाद, चौकी या थाने पर न बुलाकर अन्यत्र मिलने को कहा।

: असहमति को स्वीकारने का साहस हमारे सत्ताधारियों में कहां है : असहमति को स्वीकारने की विधि हमारे सत्ताधारियों को छह दशकों के हमारे लोकतंत्र ने सिखाई कहां है? इसलिए अन्ना हजारे के साथ ऐसा कुछ नहीं हुआ जो अनपेक्षित हो। यह न होता जो आश्चर्य जरूर होता। लोकतंत्र इस देश में सबसे बड़ा झूठ है, जिसकी आड़ में हमारे सारे गलत काम चल रहे हैं। संसद और विधानसभाएं अगर बेमानी दिखने लगी हैं तो इसमें बैठने वाले इस जिम्मेदारी से मुक्त नहीं हो सकते। साढ़े छह दशक का लोकतंत्र भोग लेने के बाद लालकिले से प्रधानमंत्री उसी गरीबी और बेकारी को कोस रहे हैं।

आज कल तो बस सुबह से शाम पूरे देशवसियों की निगाहें भ्रष्टाचार के खिलाफ सबसे बड़ी जंग लड़ रहे अन्ना हजारे पर ही टिकी है..कुछ सही रास्ता न मिलने पर पूरा देश आज आज़ादी की दूसरी लड़ाई में बढ़-चढ़ कर हिस्सा ले रहा है. आज अन्ना ने गाँधी जी के रूप में अपनी मिसाल पूरे देश को दी है कि हर मुद्दा मार-पीट, अस्त्र-शस्त्र से ही नहीं सुलझाया जा सकता बल्कि उसके लिए अहिंसा के पथ से बढ़कर और कोई रास्ता नहीं है. आज पूरे देश में बड़े से लेकर बच्चे-बच्चे तक की ज़ुबान पर एक ही नारा है "अन्ना तुम संघर्ष करो हम तुम्हारे साथ है''. बल्कि उस भीड़ में कुछ ऐसे लोग भी है जो जनलोकपाल के बारे में शायद अच्छे तरीके से न जानते हो पर बात अपने देश की है तो इस मुहिम में वह पूरा साथ दे रहे हैं.

इन दिनों जो नया शिगूफा देश में निकला है वह है अन्नागिरी, यानि तमाम नए-नवेले ढंग से लोगों को लगातार अन्ना के जन लोकपाल बिल के लिए उद्धत किया जाए, मानो यह लोकपाल बिल यदि नहीं आया तो देश में अनर्थ हो जाएगा. कोई ऐसा दिन नहीं जब अलग-अलग किस्म के ई-मेल और एसएमएस की बरसात नहीं हो रही हो. किसी एसएमएस में लिखा होगा-'भारत सरकार ने यह शर्त रखी है कि पचीस करोड़ हिन्दुस्तानी भारत सरकार को एसएमएस भेजें तो वह जन लोकपाल कानून ला देगी, अतः आप भी फलां नंबर पर एसएमएस भेजें.'  किसी दूसरे ईमेल में कोई दूसरा शिगूफा होगा यानी कुल मिला कर तकनीकी का व्यापक प्रयोग करते हुए पूरे देश में एक हवा सी बना दी गयी है कि अन्ना, अन्ना, लोकपाल, लोकपाल.

अन्ना के समर्थन के समर्थन में पूरे देश में रैली, प्रदर्शन, कैंडिल मार्च, पीस मार्च आदि निकाले जा रहे हैं,  सभी चाहते हैं कि देश से भ्रष्टाचार खत्म हो और आम आदमी को राहत मिले, लेकिन कुछ आवारा युवकों ने अन्ना हजारे की भ्रष्टाचार के खिलाफ मुहिम को मजाक बनाकर रख दिया है.  ऐसे युवकों के लिए अन्ना हजारे द्वारा किए जा रहा अनशन महज एक मस्ती का जरिया बन गया है। सड़कों पर तेज गति में अन्ना तुम संघर्ष करो हम तुम्हारे साथ हैं, मोटर साइकिलों पर हाथ में तिरंगा लिए निकलना उनके लिए आंनद का जरिया बन गया है। इतना ही ऐसे युवक-युवतियों के मोबाइलों में भी मैसेज ही ऐसे ही मिलते हैं.

हर साल 15 अगस्त आते ही एक अजब सी खुशी सा अहसास होता है। हर तरफ राष्‍ट्रीय गीत बजते रहते हैं। स्कूलों में बच्चे रंग-बिरंगे प्रोग्राम पेश करते हैं। हर किसी के हाथ में झण्डा होता है। लोग अपने उन मासूम बच्चों के हाथ में भी तिरंगा थमा कर खुद भी खुश होते है और उसे भी खुशी का अहसास दिलाते हैं, जो ठीक से तिरंगा को संभाल भी नहीं पाता। यह सब देखकर जो खुशी मिलती है उसे लफ्जों में बयान नहीं किया जा सकता। हमें आज़ाद होने का अहसास होता है। हमारे बड़े हमें यह कहानी सुनाते हैं कि किस तरह हमारे बाप दादाओं ने अंग्रेजों से लड़ाई की, अपनी जानें गँवाईं और न जाने कितने लोगों की कुर्बानी के बाद हमें यह आज़ादी नसीब हुई है और हम एक आज़ाद मुल्क में सांस ले रहे हैं। मगर ईमानदारी से देखा जाये तो यह सब चीज़ें कहने-सुनने में जितनी अच्छी लगती हैं प्रैक्टिकल में उतनी अच्छी नहीं हैं।

अन्ना हजारे के जन लोकपाल के मुद्दे पर किये जा रहे अनशन के साथ देश का युवा वर्ग मानो इस कदर उत्साहित होकर एक वायवीय समर में कूद पड़ा है, जैसे देश में जन लोकपाल कानून के लागू हो जाने से समग्र क्रांति आ जायेगी। देश के चंद भ्रष्ट मंत्रियों तथा अधिकतम प्रधानमंत्री तथा उनकी मांग के अनुसार चंद भ्रष्ट न्यायाधीशों तक को जन लोकपाल के जांच के दायरे में लाकर देश से तमाम समस्याओं को जादू की छड़ी से समाप्त किया जा सकता है। अन्ना हजारे देश की 110 करोड़ की आबादी में से आज एक ऐसा व्यक्तित्व उभर कर सामने आये हैं, जिनके पीछे एक बार देश का युवा चलने की सोच रहा है। हालांकि स्वयं अन्ना की दृष्टि क्या इस भ्रष्टाचार रूपी दानव के विराट स्वरूप को पहचान पाने में सक्षम है। कम से कम मुझे तो ऐसा नहीं लगता है। आज बेहिसाब बढ़ती आबादी में जब एक बालक जन्म लेता है, तब सरकारी अस्पताल से लेकर नर्सिंगहोम तक में किस प्रकार उस दंपति का आर्थिक शोषण होता है, संभवतः इस शोषण के स्वरूप से अन्ना बेखबर हैं।