An open letter to shahabuddin.... मोहम्मद शहाबुद्दीन, माफ़ कीजियेगा आदरणीय के लायक आप हैं नहीं, और आपको सर, साहब और जी कहने का अधिकार तो सिर्फ आपके चमचों, आपके गुर्गे के लोग और आपसे वोट बैंक की उम्मीद रखने वालों के पास है. शहाबुद्दीन, सबसे पहले आपको बधाई कि 11 साल के कारावास के बाद अंततः आप बाहर आए.  अन्य लोगों की भाँती मुझे आपके रिहा होने पर आश्चर्य बिलकुल भी नहीं हुआ. क्योंकि सलमान खान को भी बरी होते हुए देखा है.

दक्षिण पंथी राजनैतिक पार्टियां सिर्फ़ और सिर्फ़ भावनाओं की राजनीति करती हैं . ये पार्टियां जनता की भावनाओं का राजनीतिकरण करती हैं . इनका हथियार हैं भावनाओं का दोहन . ये जन आस्था , धर्म ,राष्ट्रीयता , संस्कृति , संस्कार , सांस्कृतिक विरासत बचाने का दावा करती हैं , दम्भ भरती हैं और इन मुद्दों पर इनको जन समर्थन भी मिलता है पर दरअसल ये पार्टियां इन भावनात्मक मुद्दों का उपयोग अपने शुद्ध राजनैतिक फायदे के लिए करती हैं या यूँ कहें की इनके यही असली राजनैतिक मुद्दे हैं . ये मुद्दे ऐसे हैं जो जनता के करीब होते हैं या सामन्य भाषा में कहें की हर नागरिक के लिए एक तरह से गर्व के , सम्मान के प्रतीक होते हैं  और सामान्य नागरिक इसके बारे में ज्यादा सोचता नहीं हैं .

Subject : reliance tower fraud and forcly selling insurance policy

रेस्पेक्टेड सर

मेरा नाम पंकज सेवालाल चौहान है. मुझे मार्च  २०१६ में रिलायंस टावर डिपार्टमेंट से एक कॉल आई जिसका नंबर (८४४७०५३०४६ निशा) और (८८८२२९२७५६ गौरव) उन्होंने मुझे मेरे प्लाट पर रिलायंस टावर लगाने के लिए ऑफर दी,  यहाँ तक तो ठीक था, उन्होंने मुझे लाइट वेट टावर और हैवी ड्यूटी टावर की इंस्टालेशन प्रोसेस की सारी जानकारी बताई लेकिन उन्होंने (निशा) मुझे सबसे पहले रिलायंस लाइफ इन्सुरेंस की पालिसी लेने के लिए कहा.

बुलंदशहर (22 अगस्त 2016)- कहते हैं जब किसी ख़तरे से आगाह किये जाने के बावजूद लापरवाही की जाती है तो उसके नुक़सान अक्सर दोबारा सामने आते ही रहते हैं। मानसिक तनाव और बेतरतीब ड्यूटी करने वाले पुलिस बल के अंदर का लावा और तनाव कब ख़ूनी खेल बन जाए इसकी एक बार फिर मिसाल मिली है बुलंदशहर में। जहां एक सिपाही ने अपने ही साथियों पर अंधाधुंध फायरिंग कर दी थी, जिसमें दो सिपाही मौत की गोद समा गये।सोमवार रात को हुई फायरिग के दौरान एक सिपाही की मौके पर ही मौत हो गई, जबकि दो सिपाही गंभीर गंभीर रूप से घायल हो गए थे। इसके बाद आरोपी सिपाही ने भी खुद को गोली मारकर आत्महत्या कर ली थी। कहा जा रहा है कि फायरिग करने वाले सिपाही का बार-बार ट्रांसफर किया जा रहा था, जिसको लेकर वो मानसिक तनाव में था और उसने यह खतरनाक कदम उठाया। वहीं, गंभीर रूप से घायल दोनों सिपाहियों को मेरठ के अस्पताल में भर्ती कराया गया है।

संजय स्वदेश

अर्थशास्त्र में मांग और पूर्ति की एक समान्य सी बात बताई जाती है। यदि मांग ज्यादा है तो कीमत भी ज्यादा होगी। यदि कीमत सस्ती होगी, तो आपूर्ति भी काम होगी। अर्थशास्त्र के इस नियम में भले ही बहुसंख्य धंधे फीट बैठते हों, लेकिन खेती-किसानी में यह बात थोड़ी-सी पटरी से उतर जाती है। मांग देखकर यदि किसान किसी अनाज की बुआई करता है और उस वर्ष उसका उत्पादन ज्यादा होता है, तो उस लागत से बहुत ज्यादा इतना भी धन प्राप्त नहीं हो पाता है कि वह कुछ रुपए अपने पास अगली बुआई के खर्च के लिए बचा सके। पूर्ववर्ती और वर्तमान सरकार के किसान हितैषी होने के तमाम दावों के बाद भी अन्नादाता किसानों की परिवारों में के घर वह बरकत नहीं है, जो धन्नासेठों के यहां होती है।

छिलके के नीचे प्याज.... हमारे देश में खाद्य पदार्थों के अलावा एक और चीज का बहुतायत में भक्षण किया जाता है। वह चीज है सौगन्ध यानी कसम। मेरे गोरखपुर जिले में इन शब्दों के लिए ''किरिया'' का इस्तेमाल भी किया जाता है। मगर ये शब्द पेट भरने के लिए नहीं अपितु झूठ बोलने के लिए खाये या खिलवाये जाते हैं। हमारे वहॉं बात-बात में लोग किरिया खाते रहते हैं। अदालतें अभियुक्तों और गवाहों को गीता पर हाथ रखवा कर सौगन्ध खिलवाती हैं। मानो गीता की सौगन्ध्‍ा ऐसी अचूक जड़-बूटी हो जिसे खिला देने के बाद बयान देने वाला सच ही सच बोलेगा, सच के सिवा कुछ नहीं बोलेगा। जड़ी-बूटी का असर उल्टा होता है।

प्रकृति यानी एक ऐसी कृति जो पहले से ही अस्तित्व में है । कभी लोप न होने वाले इस अस्तित्व के कारण ही सभी जड़-चेतन एक सामंजस्य के साथ गतिमान है; यहां तक कि समूचे ब्रह्माण्ड की गतिशीलता का मूल भी प्रकृति ही है। प्रकृति की इस महत्ता को जानने के बावजूद, आज हम प्रकृति रूपी वरदान का अति दोहन करने से हम चूक नहीं रहे। कहने को तो भारत के निर्माता, दुनिया के विकसित कहे जाने वाले देशों के साथ-साथ कदम ताल करने की कोशिश कर रहे हैं, किंतु वे पलटकर यह देखने की कोशिश नहीं कर रहे कि यह कदम-ताल कितनी सार्थक है, कितनी निरर्थक ? इसका उत्तर भविष्य स्वतः दे ही देगा, किंतु तब तक अपनी अस्मिता को वापस हासिल करना कितना मुश्किल हो जायेगा; यह समझना अभी संभव है।

उर्जित पटेल के अंबानी कनेक्शन व सिफारिश और केन्यायी नागरिक होने के सवालों पर मीडिया की खामोशी उसकी गुलामी की दास्तां बयां कर रही है। सलाजीत खाकर कथित राष्ट्रवाद का अलाप रागने वाले एंकरों की जुबान को उर्जित पटेल से जुड़े विवादों पर लकवा मार गया। एक विदेशी नागरिक जो अंबानी का मुलाजिम रह चुका है उसके हवाले देश का खजाना किया जा रहा है। यही है संघ और भाजपा का राष्ट्रवाद? यह भी गहरी पड़ताल का सवाल है रघुराम राजन को लेकर सनसनी स्वामी का अभियान रिलायंस प्रायोजित था? जब अंबानी के मुलाजिम रहे दिल्ली के उप.राज्यपाल नजीब जंग जनता की चुनी हुई सरकार को काम नहीं करने दे रहे, वही सवाल बकौर आरबीआई गवर्नर उर्जित पटेल को लेकर खड़ा हो गया है।

सरकारी छुट्टी के दिन परीक्षा होने के कारण समय या दिनांक परिवर्तन करवाने हेतु.... मान्यवर जी विनम्र निवेदन है कि तकनीकी शिक्षा विभाग मण्डल राजस्थान जोधपुर की पॉलिटेक्निक इंजीनियरिंग सिविल डिप्लोमा तृतीय वर्ष के विषय डिजाइन ऑफ rcc स्ट्रक्चर कोड (303) की परीक्षा बोर्ड की समय सारणी के अनुसार दिनांक 7 जुलाई 2016 को सुबह 8:00 बजे से 11:30 तक होनी है. इसी दिन मुस्लिम समाज का पवित्र त्योहार ईद उल फितर है. इस कारण मुस्लिम समाज के विद्यार्थी इस परीक्षा से वंचित रह सकते हैं क्योंकि ईद उल फितर की नमाज संपूर्ण भारतवर्ष में 9:00 बजे से 10:00 बजे के आसपास होती है.

भारत देश अपनी आजादी का 70वां जश्न (स्वतंत्रता दिवस) मनाने जा रहा है। इस जश्न को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ‘70 साल आजादी, याद करो कुर्बानी’ के नारे के साथ मना रहे हैं। लेकिन क्या वास्तव में अंग्रेजों की गुलामी के बाद देश के आम आदमी को आजादी से जीने का अधिकार हासिल हो सका है? क्या देश को अंग्रेजों द्वारा बनाये कानूनों से मुक्ति मिल सकी? क्या देश को अंग्रेजियत की गुलामी से मुक्ति हासिल हो सकी? क्या सुभाष चन्द बोस, चन्द्रशेखर आजाद, भगत सिंह, राजगुरू आदि शहीदों का आजादी का सपना साकार हो सका? ऐसे तमाम सवाल हैं जिनका उत्तर देश का आम नागरिक तलाश कर रहा है।

फेमस होने के लिए लोग क्या-क्या नहीं करते? तथाकथित राजनेताओं पर वोट बटोरने का ऐसा बुखार चढ़ जाता है कि उन्हें सारी हदें पार करने से भी कोई गुरेज नहीं होता. परिणामतः वो हल्की राजनीति करने पर उतर आते हैं. जान-बूझकर कश्मीर जैसे अत्यंत संवेदनशील मुद्दों पर मुंहफट की तरह अपना मुंह खोल ही देते हैं. वर्तमान वाकया पकिस्तान के तथाकथित नेता इमरान खान का है. भारतीय अख़बारों में छपी खबर के अनुसार क्रिकेटर से राजनेता बने इमरान खान ने पाकिस्तान में अपनी राजनीति चमकाने के लिए कश्मीर मुद्दा उठाया है. लाहौर में एक विशाल रैली को संबोधित करते हुए पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ पार्टी के मुखिया इमरान खान ने कश्मीर से भारतीय सेना के हटाए जाने की मांग की है.

अपनी संस्कृति और मर्यादाओं के लिये विश्वपटल पर अलग छवि रखने वाले भारत देश में बलात्कार यानी रेप ऐसा जुर्म बनता जा रहा है जिसे न निगल पा रहे हैं और न उगल पा रहे हैं। ऐसा इसलिये क्योंकि इस जमानती जुर्म के न सिर्फ आंकड़े बढ़ते जा रहे हैं, बल्कि रेप के तरीके भी अमानवीय होते जा रहे हैं। तो क्या जमानती जुर्म होने और कोई सख्त कानून न होने से बढ़ रही हैं रेप की घटनायें? जाहिर सी बात है कि इनसे बड़े स्तर पर देश की छवि धूमिल हो रही है।

आज कल सुबह-सुबह आँख खोलो और अगर सोच लो की भगवान का दर्शन कर लें तो वो बड़ा मुश्किल है. आजकल तो भगवान से ज्यादा ऊँचा दर्ज़ा आज कल के टीवी वाले बाबा लोगों को मिल गया है. आज कल चैनलों पर बाबा का प्रवचन एक फैशन सा हो गया है. अब तो अलग अलग धर्मों के लिए अलग-अलग बाबा हो गए हैं. कोई हिन्दू धर्मं का तो कोई सिख धर्मं की बातें करता है. धर्म का प्रसार और प्रचार करने वालों ने हमेशा भगवान को एक माना है, पर इन लोगों ने तो पूरी तरह से भगवान को जगह-जगह अलग-अलग समय में भी बाँट दिया है. ये बाबा लोग खुद तो ईश्वर को एक ही बताते हैं पर ये खुद अलग-अलग हो गए हैं.

एक तरफ देश इक्कीसवीं सदी की ओर दौड़ लगा रहा है वहीं दूसरी ओर करोड़ों की संख्या में पीड़ित जनता प्रतिदिन मुंसिफ न्यायालय से लेकर देश की सुप्रीम कोर्ट तक न्याय पाने के लिये दौड़ लगा रही है। लेकिन उसे हर बार तारीख पर तारीख के दौर से गुजरना पड़ रहा है। जिससे सबको को न्याय देने वाली न्याय पालिका जजों के अभाव के चलते खुद न्याय पाने के लिये सिसक रही है। केन्द्र की नरेन्द्र मोदी सरकार हो या फिर कांग्रेस की सरकार हो अथवा किसी भी राज्य में किसी भी दल की सरकार हो जनता के रहनुमा होने के लम्बे चैड़े दावे या वायदे करने में कभी भी पीछे नहीं रही हैं। प्रत्येक सरकार ने वोट की चाहत में दलित, मुस्लिम, अल्पसंख्यक, पिछड़े, अगड़े, गरीब, मजदूर, व्यापारियों, उद्योगपतियों के हितों के लिये तमाम योजनाओं के नाम पर लाखों-करोड़ों हजार की राशि तो पानी की तरह बहायी है। लेकिन न्याय व्यवस्था के साथ लगातार खिलवाड़ किया जाता रहा है। यही कारण है कि जैसे-जैसे देश की आबादी बढ़ती गई वैसे-वैसे जजों की संख्या बढ़ने के स्थान पर लगातार घटती चली गई। वहीं मुकदमों की संख्या में लगातार बढ़ोत्तरी होती गई जो अब करीब 2.20 करोड़ तक पहुंच गई है।

इस वक्त पूरे देश में जहां भ्रष्टाचार पर बहस छिड़ी हुई  है तथा एक मजबूत एवं सशक्त लोकपाल कानून बनाये जाने की कवायद चल रही है वहीं एक और कानून जिसने भ्रष्टाचार पर नकेल डालने में कामयाबी हासिल की है, अपने छह वर्ष पूरे कर लिए हैं। संयुक्त प्रगतिशील सरकार ने अपने पिछले कार्यकाल में जानने के अधिकार को लागू किया। भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश है तथा यहां अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सहित अन्य अधिकार आम आदमी को संविधानतः प्राप्त हैं। इसी कड़ी में सूचना का अधिकार लागू किया गया। अक्टूबर 2005 को ही राज्यों ने इसे अपने यहां लागू किया। इस लिहाज से यह कानून अपना छह वर्ष का सफर पूरा कर चुका है।

राजनीति कितनी घिनोनी, दिखावटी, बेशर्म, क्रूर और दिलचस्प होती है इसका नजारा उत्तर प्रदेश में दिख रहा है । दयाशंकर-बसपा के संस्कारयुक्त बयानों से एक दूसरे को नीचा दिखाने की होड़ में शर्मनाक और निंदनीय गाली-गलोज की गंदी राजनीति परवान चढ़ती दिख रही है। सवाल ये है कि क्या वास्तव में एैसे शर्मनाक अपशब्द हमारे नेताओं के मुँह पर अचानक आ जाते हैं । क्या अपने विरोधी का विरोध करने के लिये नेताओं की सभ्यता, विचार, आचरण इतना नीचे अचानक से गिर जाते हैं कि उन्हें ‘वैष्या’ जैसे शब्दों का प्रयोग करना पड़ता है । और क्या मति इतनी मारी जाती है कि इसकी प्रतिक्रिया में विरोधी गड्डा खोदकर उससे भी नीचे गिरकर ‘बहन-बेटी’ पेष करो जैसे असभ्य नारे लगाने को ही वाजिब जवाब समझते हैं । यकीनन नहीं।