अंकुर “26 जनवरी को मैंने सोचा है कि आराम से सुबह उठूंगा, फिर दिन में दोस्तों के साथ फिल्म देखने जाना है, इसके बाद मॉल में जाकर थोड़ी शॉपिंग और फिर रात में दोस्तों के साथ दारू के दो-दो घूंट। क्यूं तुम भी आ रहे हो ना अंकुर।” अब आप बताएं कि इतना अच्छा मौका कोई हाथ से जाने देगा। हालांकि मेरे संपादक ने मुझे राष्ट्रपति के भाषण का अनुवाद करने के लिए ऑफिस आने को कहा है लेकिन, फिर भी मैंने इस कार्यक्रम के लिए हामी भर दी है। अधिकांश लोग शायद मुझे गाली देंगे कि देश अपना 62वां गणतंत्र दिवस मनाने की तैयारियां कर रहा है और ये महाशय फिल्म और दारू पर ही अटके हुए हैं। पर जनाब कौन सा गण और कौन सा तंत्र। मेरे जैसे युवा ही नहीं बल्कि देश की आधी आबादी को भी शायद अब इन राजकीय उत्सवों से ज्यादा सरोकार नहीं है। लेकिन इसके जिम्मेदार देश का गण नहीं अपितु तंत्र है।

राजपूत : 65 साल की उम्र में नंग-धड़ंग तस्‍वीर देखने की इच्‍छा नहीं होती : ग्राहकों को लूट रही हैं मोबाइल टाटा और रिलायंस मोबाइल कंपनियां : देश की दो जानी मानी मोबाइल कम्पनियां इन दिनों अपने ग्राहकों को जमकर लूट रहीं हैं, क्योंकि इन कंपनियों की लाखों कोशिशों के बाद भी बाजार पर इनकी पकड़ ढीली होती जा रही है. हम इन कंपनियों के बारे में ऐसा क्यों लिख रहे हैं, आइये कुछ उदाहरण दे देता हूँ. कुछ महीने पहले मैंने रिलायंस कम्पनी का एक मोबाइल लिया, जिसका नंबर 9313444115 था. जो प्रीपेड था. दोस्तों इस मोबाइल में मैं जब भी पचास या सौ रूपये का कूपन डालता तुरंत तीस चालीस रूपये काट लिए जाते. इसकी शिकायत जब मैं कस्टमर केयर में करता तो वहां से जबाब आता कि आपने अपने मोबाइल से आर वर्ल्‍ड खोला है और उस पर बिकनी गर्ल्स को देखा है, तब उनसे मेरा जबाब होता कि भाई मेरे पास कई कंप्यूटर हैं, जिनमें चौबीस घंटे इंटरनेट सेवा की सुविधा है, अगर मुझे बिकनी गर्ल्स या नंग-धड़ंग तस्वीरों को ही देखना होता तो मैं उस पर देख लेता. मैं 1200 के मोबाइल की छोटी स्क्रीन पर ऐसा क्यों करूंगा.

मानवाधिकार संगठन पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज (पीयूसीएल) ने मुख्यमंत्री से तारिक कासमी और खालिद की गिरफ्तारी की जांच के लिए बने आरडी निमेष जांच आयोग की रिपोर्ट तत्काल सार्वजनिक करने की मांग की। संगठन के प्रदेश संगठन मंत्री मसीहुद्दीन संजरी, तारिक शफीक और विनोद यादव ने कहा कि यह दो बेगुनाहों, जिन पर आतंकवाद जैसा राष्‍ट्रद्रोही आरोप लगा है, के मानवाधिकारों का सवाल है, जो सिर्फ इस जांच रिपोर्ट के न आने की वजह से जेलों में रहने के लिए अभिषप्त हैं। तो वहीं यह इससे भी जुड़ा सवाल है कि जिस यूपी एसटीएफ को विशेष अधिकार दिए गए हैं, वो अपने अधिकारों का उल्लंघन कर जहां राष्‍ट्र के आम नागरिकों को गैर-कानूनी तरीके से फंसा रही है तो वहीं गैर-कानूनी तरीके से मानव समाज के लिए खतरनाक विस्फोटक और असलहे को किन राष्‍ट्र विरोधी तत्वों से प्राप्त कर रही है। आज पीयूसीएल के मसीहुद्दीन संजरी, तारिक शफीक, विनोद यादव, अंशु माला सिंह, अब्दुल्ला एडवोकेट, जीतेंद्र हरि पांडे, आफताब, राजेन्द्र यादव, तबरेज अहमद ने मायावती सरकार से मांग की कि आरडी निमेष जांच आयोग की रिपोर्ट तत्काल लायी जाय।

सतीशपेशे से वकील और वर्तमान दूरसंचार मंत्री कपिल सिब्बल ने जिस तरह से नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) के रिर्पोट को सिरे से खारिज किया है, वह निश्चित रुप से पूरे मामले पर लीपापोती करने के समान है। सिब्बल ने आंकडों की बाजीगरी में अपने अदालती अनुभव का इस्तेमाल करते हुए कैग के रिर्पोट में बताए गए 1.76 लाख करोड़ के सरकारी खजाने को चूना लगाने वाले दावे को खारिज करते हुए कहा कि सरकारी खजाने को एक पैसे का नुकसान नहीं हुआ है। ज्ञातव्य है कि कैग ने अपनी पड़ताल में मूल रुप से 3जी स्पेक्ट्रम के नीलामी के दौरान जिन दरों पर दूरसंचार कंपनियों को लाइसेंस दिए गए थे, उनको आधार मानते हुए सरकारी खजाने को 1.76 लाख करोड़ का चूना लगाने की बात कही थी। 1.76 लाख करोड़ में से 1,02,490 करोड़ का नुकसान 2008 में हुआ था। जब पूर्व दूरसंचार मंत्री ए राजा ने नियमों की अनदेखी करते हुए 122 नई दूरसंचार कंपनियों को 2001 की दरों पर 2जी स्पेक्ट्रम के लिए लाइसेंस दिया था। 2008 में ही आरकॉम और टाटा को 2001 की दर पर डुअल टेक लाइसेंस दिया गया, जिससे पुनश्‍च: सरकार को 37,154 करोड़ का नुकसान हुआ।

दो राज्यों की राजधानी और केंद्र शासित प्रदेश चंडीगढ़ देश का ऐसा राज्य बन गया है, जहां आबादी के अनुपात में सबसे ज्यादा वाहन हैं। पिछली जनगणना के मुताबिक यहां की आबादी लगभग नौ लाख थी, अभी का आंकड़ा आना है। पिछली गणना में 44 प्रतिशत का इजाफा हुआ था, उससे ज्यादा पचास भी माने तो यहां की आबादी पंद्रह लाख के आसपास होती है। यहां वाहनों की तादाद आठ लाख तक पहुंच जाएगी, अर्थात हर दो में से एक व्यक्ति के पास अपना दुपहिया या चौपहिया वाहन है। यहां पंद्रह से बीस फीसदी आबादी कच्ची या अनधिकृत कालोनियों में रहती है, जहां वाहन खरीद की क्षमता न के बराबर है। इसका अर्थ हुआ कि शहर की 80 प्रतिशत आबादी के पास ही ये साढ़े आठ लाख वाहन हैं, यानी हर दो लोगों के पास तीन वाहन हैं। कुछ घरों में तो सदस्यों के हिसाब से भी ज्यादा वाहन हैं, तो कहीं पूरे घर के लिए एक भी वाहन नहीं है। इस अमीर शहर के गरीब लोगों को वाहनों की बढ़ती तादाद से कोई ईष्‍या नहीं है, उन्हें न वाहन पार्क करने की चिंता है, न रेट बढऩे की। हां जाम में वे भी फंसते हैं लेकिन इसमें उनका कोई कसूर नहीं है। 1952 में पांच लाख की ज्यादा से ज्यादा आबादी को ध्यान में रखते हुए शहर बसाया गया था और उसी लिहाज से यहां की सडक़ें बनाई गई थी, लेकिन आज क्या हुआ है। आबादी तीन गुना हो गई और वाहन की तादाद यहां बीस गुना ज्यादा हो गई।

रामपाल15 अगस्त को जब सारा देश आजादी का जशन मना रहा था वहीं रामपाल पुलिस तंत्र से अपने जीवन को बचाने की गुहार लगा रहा था. बात है पीलीभीत जिले के थाना बरखेडा में हुई घटना की और पुलिसया बहसीपन की. वैसे भी उत्तर प्रदेश पुलिस की करतूतों की हर जगह मिसाल दी जाती है पर यहाँ तो पुलिस ने अपनी सारी हदें लांघ दिया है. बात है 13 अगस्त 2010 की जब ग्राम जारकलिल्या निवासी दलित रामपाल पुत्र अयोध्या प्रसाद को एक मुस्लिम लड़की को भगाने के अपराध में पकड़ा गया. पंचायत के फरमान अनुसार लड़का-लड़की दोनों नाबालिग थे. लड़का तक़रीबन 20-21 साल का और लड़की 16-17 साल की. पंचायत ने लड़की को तो पिता को सौंप दिया पर रामपाल, उसके पिता एवं दो भाई को पुलिस के   हवाले कर दिया. रामपाल की माँ के गुहार लगाने पर पुलिस ने 25000 रूपये की मांग रखी, जिस पर उसकी माँ केवल 19000 रूपये का ही  इंतजाम कर सकी. 19000 के बदले में पुलिस ने रामपाल के पिता और भाई  को तो छोड़ दिया पर रामपाल को बंद रखा और बाकी रुपये मिलने के बाद ही उसे छोड़ने की बात कही.

एक बार फिर नपुंसक कायर अपनी करतूत कर गुम हो गए और तख्त-ओ-ताज के भूखे हमारे सियासतदां आपस में लड़ते ही रह गए. समझ नहीं आता कि एक 11 महीने की बच्ची की हत्या कर किस जिहाद और किस आज़ादी की लड़ाई को सही साबित करना चाहते है ये इंसानियत के दुश्मन. इन निकृष्ट पापियों और अधर्मियों के लिए यदि अपशब्द लिखना प्रारंभ करूं तो शायद एक अखंड काव्य का रूप ले ले, किन्तु स्थान और  परिवेश की मर्यादा का उल्लंघन कर स्वयं की लेखनी को अपमानित नहीं करना चाहता, इसलिए मर्यादित शब्दों में उन तथ्यों को लिखने की कोशिश करूँगा जो नंगी आखों से देखे जा सकते है किन्तु सियासत उसे देख कर भी अनजान हैं. बाटला हाउस दिल्ली में एक एन्काउन्टर होता है, कुछ आतंकी मारे जाते है और कुछ भाग जाते हैं, इस पर बजाय सुरक्षा बलों के घावों पर अपनी जुबान से ही दो शब्द बोलकर दवा लगाने के, एक राष्ट्रीय पार्टी के महासचिव और मध्‍य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री संजरपुर जाकर एक सम्प्रदाय विशेष की खोखली सहानुभूति बटोरने के लिए मुठभेड़ पर ही सवाल खड़े कर देते है, क्या उनको जानकारी है कि माँ गंगा का गुनहगार कसाई (डा.) शाहनवाज इसी बाटला हाउस की मुठभेड़ के बाद फरार हुआ था? निश्चित रूप से उनका जवाब ना ही होगा लेकिन स्वर्गीय स्वस्तिका जरूर उनसे ये पूछ रही है कि कब तक छद्म धर्म निरपेक्षता के नाम पर आतंकियो कि मदद करोगे अंकल?

अतुल पिछले दिनों कुछ ऐसा हुआ कि यह पोस्‍ट लिखने बैठना पड़ा। वैसे इस विषय पर दीपावली के बाद ही लिखना चाहता था लेकिन सोचा चलो जाने दो। भगवान इन लोगों को सदबुद्धि दे देगा लेकिन ऐसा कुछ हुआ नहीं और मुझे दीपावली में जो हुआ उसके बाद नए साल में भी उसकी पुनरावृत्ति हो गई। और मैंने कल अखबारों में पढ़ा कि उत्‍तर प्रदेश के मुजफफरपुर में जल निगम के एक अफसर ने वहां के जिलाधिकारी को नए साल पर मिठाई के डिब्‍बे के साथ नोटों का ‘उपहार’ दिया। अपने मातहत अफसर की इस ‘गुस्‍ताखी’ पर जिलाधिकारी महोदय संतोष कुमार यादव हतप्रभ रह गये और उन्‍होंने अभियंता के खिलाफ भ्रष्‍टाचार निवारण अधिनियम के तहत मामला दर्ज करा दिया। हालांकि जिलाधिकारी को नोटों का ‘उपहार’ देने वाले अभियंता इसे ‘गुस्‍ताखी’ नहीं कहते, वे कहते हैं कि वे जल्‍दबाजी में कोई उपहार नहीं खरीद सके इसलिए उन्‍होंने नोट ही दे दिया और उन्‍हें अपने किए पर पछतावा भी नहीं है।

डा. भीमराव अंबेदकर विश्वविद्यालय आगरा के अधीन नारायण महाविद्यालय शिकोहाबाद, जनपद फीरोजाबाद में ‘समकालीन मंचीय हास्य व्यंग्य काव्य का वैचारिक पक्ष’ शीर्षक से शोध प्रबंध पर मैं पिछले कुछ समय से काम कर रहा हूं। मंच की कविता के वैचारिक पक्ष की पड़ताल एक विद्यार्थी के लिये चुनौती का काम है। उसमें भी हास्य जैसा विषय और दुरूह है। अतः इस कार्य में अनेक सुधीजनों के सहयोग की आवश्यकता अपेक्षित है। प्रारंभिक खोज में मंचीय काव्य परंपरा पर प्रकाशित सामग्री का अकाल दिखाई पड़ रहा है। हास्य के नाम पर निरर्थक कविताओं की भरमार दिखाई देती है जो शोध के लिये उपयुक्त नहीं मानी जाती हैं। फिर भी मेरा पूरा भरोसा है कि मंचीय हास्य व्यंग्य पर सार्थक सामग्री भी अनेक विद्वानों पर प्रचुर मात्रा में मिलेगी। पी-एचडी के लिये आलोचनात्मक, परिचयात्मक और विवरणात्मक सामग्री का होना अनिवार्य है। इस दृष्टि से मेरी खोज फिलहाल नगण्य है। कई महानुभावों ने आश्वासन दिया है, लेकिन और अधिक सामग्री की आवश्यकता है। आगरा से प्रकाशित ‘संस्कृत वांगमय में हास्य’ और जयपुर से प्रकाशित कवि सम्मेलनीय पत्रिका जैसी पुस्तकों से कुछ-कुछ सामग्री मिल रही है।

भूपेंद्र यदि भारतीय प्रशासनिक सेवा में होता तो रिटायरमेन्ट सम्बन्धी कागजात बनवाना शुरू कर देता, ताकि सेवानिवृत्ति के उपरान्त बाबुओं की गणेश परिक्रमा न करना पड़े। बहरहाल मैं क्यों बताऊँ कि मेरी उम्र क्या है। 37 वर्ष लेखन-पत्रकारिता के पूरे कर लिए हैं, लेकिन भड़ास के सीईओ से अधिक व्यस्त परसनालिटी से आज तक कभी पाला नहीं पड़ा। जी हाँ भाइयों और बहनों! यदि मैं कभी-कभार इस व्यवस्ततम व्यक्ति के पोर्टल पर प्रकाशनार्थ लेखादि भेजता हूँ तो उन्हें तरजीह न देकर ‘डिलिट’ कर दिया जाता है। आप बताओ मैं इस उम्र में नामचीन बनने की कोशिश कर रहा हूँ और उसके लिए यशवन्त का लोकप्रिय-चर्चित पोर्टल का चयन किया तो क्या बुरा किया? माना कि ‘भड़ास’ में नामचीन से लेकर अभिनव लेखक-पत्रकारों को स्थान मिलता है, बावजूद इसके मेरे आलेखों के प्रकाशन पर पाबन्दी क्यों लगाई गई है, मुझे स्वयं आश्चर्य होता है। साथ ही रेनबो न्यूज की एडिटर मेरी दोस्त रीता विश्वकर्मा को भी इस बात का दुःख होता है कि भेजे गए मेरे आलेखों का प्रकाशन क्यों नहीं किया जाता है?

एलएन शीतलभारत को जीतने के बाद ईस्ट इंडिया कंपनी के अनेक अधिकारियों ने भारत का ‘इतिहास’ लिखा। उन्होंने जगह-जगह लिखा कि भारत पर अंग्रेजों से पहले मुसलमानों का राज था। उन्होंने अपनी इस शरारत के जरिये मुसलमानों के दिमाग में एक गलत धारणा बैठा दी, जिसका नतीजा अंतत: यह निकला कि वे बेचारे घमंड, हठधर्मिता और अदम्य महत्वाकांक्षा का शिकार बन गए। इसकी परिणति 1947 में भारत-विभाजन के रूप में सामने आई। ब्रिटिश हुक्मरानों ने कहा कि उन्होंने मुसलमानों के हाथों से हुकूमत ली। इससे बड़ा झूठ तो कोई हो ही नहीं सकता। उन्हें सत्ता हथियाने के लिए मराठों, सिखों और गोरखाओं से खूनी जंगें लडऩी पड़ी थीं। लेकिन सर सैयद अहमद जैसे कई लोगों को ब्रिटिश हुक्मरानों की यह फंतासी खूब रास आई।

श्रवण : नए साल में नई उम्‍मीद : पूरा साल जहाँ अच्छा करने की कोशिशों के बीच चला गया, वहीं एक व्यक्ति ऐसा भी रहा जिसका पूरा साल जेल के सलाखों के पीछे काली कोठरी में वक्त के घूमते हुए पहिये की गति को समझ पाने में ही गुजर गया। उसको निकालने के लिए छोटे से लेकर बड़े सभी ने प्रयास किया परन्तु थोड़ी बहुत कमी हर बार रह गई। अब उन्हीं सब लोगों की दुआओं से अब नए वर्ष के 12 तारीख को उसके बाहर की जादुई दुनिया में आने का मार्ग प्रशस्त हो चुका है। यहां मैं सिर्फ अपने स्वयं के अनुभव को लिख रहा हूँ, इस साल पूरी दुनिया के बदलाव के लिए जाना जाएगा। एक तरफ जहां पूरी दुनिया में असांजे की धूम रही वहीं भारत देश में यशवंत का यश और भी फैला। यहां आरुषि केस में सीबीआई को हाथ उठाते देख बुरा लगा तो यशवंत की माताजी के साथ उत्तर प्रदेश पुलिस ने जो किया वह निंदनीय और अस्वीकार्य था। सेन को उम्रकैद से लेकर ए. राजा और नेताओं के घोटाले चर्चित रहे, वहीं जम्मू-कश्मीर पर अपने बयानों को लेकर अरुंधति और आज़म विवादों में रहें।

गंगा के नाम पर धंधा चलाने वालो का क्या कहना। गंगा के नाम पर एक भी मौका नहीं चूकते खाने कमाने का। काशी में गंगा का क्या महत्व है इस पर चर्चा करना उनको खूब भाता है जो गंगा के नाम पर अपनी दुकानदारी चला रहे है। ऐसे लोगों और संस्थाओं की कमी नहीं है जो दिन के उजाले में मीडिया के कैमरों के सामने मां गंगा का दुग्धाभिषेक करते है और दूसरे दिन अलसुबह अखबारों में अपनी तस्वीरें देख कर खुश होते हैं। क्या गंगा और क्या गंगा के घाट, यहां तो सबकुछ बेचा जा रहा है। अगर गंगा काशी में प्रदूषित है और उसका जल आचमन योग्य नहीं रह गया है तो गंगा किनारे के ऐतिहासिक घाट भी अतिक्रमण के चपेट में है। टिहरी में कैद मां गंगा के अविरल धारा को छोड़ने के साल भर यहां खूब नाटक होता रहता है। लेकिन शायद ही कभी कोई प्रयास स्थानीय स्तर पर गंगा को प्रदूषण से मुक्त करने के लिए होता है। गंगा सफाई का हर अभियान बिना मीडिया की भीड़ को एकत्र किए शुरू ही नहीं होता इसीलिए इधर कैमरे हटते हैं,  उधर सफाई अभियान चलाने वाले दूर-दूर तक नजर नहीं आते।

अशोक'भाई साहब'! पूरा अमर उजाला परिवार इसी आत्मीय संबोधन से पुकारता था अतुलजी के लिए। आगरा से शुरू हुए अमर उजाला के सफर का दूसरा पड़ाव था बरेली। यहीं से अतुल माहेश्वरी ने अखबार जगत में पहचान बनानी शुरू की। इसके बाद प्रकाशित हुए मेरठ संस्करण की तो नींव ही उन्होंने रखी और हिंदी पत्रकारिता के इतिहास में अमर उजाला को शानदार मुकाम दिया। अतुलजी अत्यंत व्यवहारकुशल, मृदुभाषी, सहृदय और अद्भुत प्रतिभासंपन्न व्यक्ति थे। उनका कर्मचारियों के साथ व्यवहार इतना आत्मीय था कि सभी को लगता था मानो वह उनके बड़े भाई हैं। यही वजह थी कि सहज ही हर व्यक्ति उन्हें 'भाई साहब' कहकर संबोधित करता था। यह संबोधन खुद उनके लिए भी बड़ा पसंद था।जब प्रबंध निदेशक के रूप में उनकी कामकाजी व्यस्तताएं बढ़ीं तो लंबे समय बाद संपादकीय सहयोगियों के साथ हुई एक मीटिंग में उन्होंने इस बात को दुहराया भी कि मैं तो आप लोगों के लिए 'भाईसाहब' ही हूं। चाहे व्यक्ति उम्र में बड़ा हो या छोटा उसके मुंह से सहज ही अतुलजी के लिए 'भाई साहब' ही निकलता।

शिबलीवही हुआ जो होना चाहिए था। दिल्ली हाईकोर्ट ने देश के खेल महासंघों के अहम पदों पर कई सालों से कब्जा जमाए बुजुर्गों को राहत देने से इनकार करते हुए कहा कि सरकार अपनी खेल नीति लागू करे, जिसके तहत किसी भी खेल महासंघ के प्रमुख पदों पर अब 70 साल से अधिक उम्र का व्यक्ति आसीन नहीं रह सकता। खेल मंत्रालय की अधिसूचना के मुताबिक भारतीय ओलंपिक महासंघ समेत देश के तमाम राष्ट्रीय खेल महासंघों का अध्यक्ष बारह साल से अधिक और अन्य पदों पर बैठा व्यक्ति आठ साल से अधिक समय तक अपने पदों पर नहीं रह सकता। ज्ञात रहे कि राष्ट्रीय खेल संघों के शीर्ष पदाधिकारियों के कार्यकाल की अवधि और बारी तय करने के खेल मंत्रालय के फैसले के बाद यह तय हो गया था कि भारतीय ओलम्पिक संघ के अध्यक्ष सुरेश कलमाडी और उन जैसे कई नेताओं के लिए, जो कई कई सालों से खेल संघों पर कब्जा जमाए हुए हैं, परेशानी खड़ी हो जाएगी। यही हुआ भी।

अमर उजाला के एमडी अतुल माहेश्वरी का निधन निश्चित रूप से पत्रकारिता के लिए एक अपूरणीय क्षति है, जिसे बहुत दिनों तक महसूस किया जाएगा। मैं यहां कुछ उन लम्हों को आप सभी से शेयर करना चाहूंगा, जब अमर उजाला, जालंधर में नौकरी के दौरान मैंने अतुल माहेश्वरी जी के साथ गुजारे। यह 2000 से 2004 के वक्फे का वह यादगार पल है, जो मेरी जगह कोई भी होता तो भुला नहीं पाता। निश्चित रूप से उस दौरान और भी जो साथी रहे होंगे, उन्हें भी वे पल याद होंगे। आप इन लम्हों के साथ महसूस कर सकते हैं कि अतुलजी में अखबार और पत्रकारिता के प्रति कितना समर्पण भाव था, वे अखबार के पन्नों पर सुंदर सोचों को किस कदर ढालने का सपना देखा करते थे और खबरों का दबाव दूर करने की उनकी परिभाषा क्या थी।