कविवर रहीम का कथन है - ''रहिमन अँसुआ नैन ढरि, जिय दुख प्रकट करेइ। जाहि निकासौ गेह ते, कस न भेद कहि देइ।।''  अर्थात् जिस प्रकार आँसू नयन से बाहर आते ही हृदय की व्यथा को व्यक्त कर देता है उसी प्रकार जिस व्यक्ति को घर से निकाला जाता है, वह घर के भेद बाहर उगल देता है। कुछ ऐसी ही आँसू जैसी स्थिति श्री कपिल मिश्रा की भी है जिन्होंने ‘आप’ के मंत्रिमंडल से बाहर होते ही दो करोड़ की मनोव्यथा जग जाहिर कर दी। रहीमदास के उपर्युक्त दोहे से इस प्रश्न का उत्तर भी मिल जाता है कि श्री कपिल मिश्रा ने दो करोड़ का रहस्य पहले क्यों नहीं प्रकट किया ? आँसू जब तक नेत्र से झरेगा नहीं तब तक मनोगत व्यथा व्यक्त कैसे हो सकती है ? वह तो आँसू के बाहर आने के बाद ही सार्वजनिक होगी।

Indian political parties, central gov is again fooling you through vvpat machines. These machines can easily do frauds like Evm  and go undetected. All political parties do hunger strike in front of Parliament until gov is forced to ban evm, vvpat and EC agrees for paper ballot System only. Common VVPAT Frauds are:

Video of voter behavior during an actual election revealed that most voters do not "verify" their choices by reading the VVPAT.

सभी प्रबुद्धजन एवं मीडिया बंधु ध्यान दें...  यूजीसी का भारतीय जर्नल्स के साथ एक अव्यावहारिक निर्णय... उच्च शिक्षा में सुधार की तमाम बातें करने के साथ एपीआई जैसे कई तुगलगी फरमान पारित करने के बाद यूजीसी ने भारतीय शिक्षा व्यवस्था और भारतीय जर्नल्स के साथ एक और मजाक किया है... वह है रिसर्च जर्नल्स की हालिया सूची को जारी करना। 10 जनवरी को आम हुई सूची में यदि आप एक नजर डालेंगे तो पायेंगे कि लगभग 38653 जर्नल्स ( http://www.ugc.ac.in/ugc_notices.aspx?id=1604 ) में देश के तमाम प्रतिष्ठित जर्नल्स नदारद हैं... इससे भी हास्यास्पद बात यह है कि जारी की गई पाँच सूचियों में हर सूची में केवल तीन इन्डेक्सिंग एजेन्सीज क्रमशः WOS (New Yark), SCOPUS (USA) और Index Copernicus International (ICI) (Poland)  द्वारा इन्डेक्स्ड जर्नल्स को छोड़कर चौथी किसी एजेन्सी द्वारा सूचीबद्ध जर्नल्स या किसी भी स्वतंत्र जर्नल्स को स्थान ही नहीं दिया गया है।

खामोश क्यों है वोटो की तिजारत करने वाले उलमा!

मौलाना साहब। आप तो सर्जन हैं सर्जरी करिये, दातों के इलाज में ही मत उलझे रहिये! शरियत की हिफाजत करियेगा तो अवकाफ, कौम, मुसलमान और उनके हुकूक खुद महफूज हो जायेंगे। जिस्म तनदुरुस्त रहेगा तो दन्त, केश, नाखून खुदबखुद चमकेंगे। रूहानियत को संवारये... इसका ख्याल रखियेगा तो जिस्म गलत काम करना छोड़ ही देगा।

सीमा पर तैनात बीएसएफ जवान तेज बहादुर यादव ने घटिया खाने और असुविधाओं का मुद्दा तो उठाया ही, मीडिया की अकर्मण्यता पर भी निशाना साधा ।  सोशल मीडिया पर उसके तीन वीडियो आते ही, कुछ ही घंटों में 34 लाख से ज्यादा देशवासियों ने कड़ी प्रतिक्रिया जाहिर की । यही नहीं, अन्य पैरा मिलेट्री फोर्स के जवानों के विद्रोही तेवर वाले वीडियो की झड़ी भी लग गयी जिनसे देश के अर्ध्य सैन्य बलों में अफसरों की मनमानी और भ्रष्टाचार की झलक मिलती है।

एक पुलिस अधिकारी के वक्तत्व पर समर्पित मेरा यह आलेख! हुआ यूं की मैंने एक मामले को लेकर पुलिस अधिकारी से कल बात की। उस अधिकारी ने अपने पद के रौब में आकर मुझे अर्दब देने के लिए कहा "काजू खान" मैं आपकी हिस्ट्री जानती हूं। पुलिस अधिकारी का यह कहना कितना जायज है, और उसके क्या मायने हैं। मैंने सच को हमेशा सच कहा है कभी कोई प्रशासनिक अधिकारी अगर गलत रहा है तो मैंने उसे गलत ही कहा है। मैं दिन को दिन ही कहूंगा, किसी के दबाव में रात नहीं कह सकता हूं। रही बात मेरी हिस्ट्री की तो इतना समझ लो, किसी ने बदतमीजी की तो मैंने उसे मुंह तोड़ जवाब दिया है, फिर चाहे पुलिस विभाग के सब इंस्पेक्टर ने मुझे गोली ही क्यों न मार दी हो।

किसी भी राष्ट्र के मजबूत लोकतंत्र के लिए उस राष्ट्र के प्रत्येक मत की अहम भूमिका होती है. हमारे द्वारा चुना गया राजनीतिक नुमाइंदा प्रत्यक्ष रूप से लोकतंत्र का एक हिस्सा बनकर सत्ता तक समाज की विषमताओं को उजागर करके उनका हल निकालता है. नतीजन् जनता, जनप्रतिनिधि और सरकार तीनों की भागीदारी से एक व्यवस्थित, आदर्श और श्रेष्ठ समाज का निर्माण होता है, जोकि हमारे सुन्दर वर्तमान एवं सुनहरे भविष्य के विकास में मील का पत्थर साबित होता है.

ईवीएम से छेड़छाड़ करने में हमें महारत हासिल है। लड़कियों पर फब्तियां कसने में महारत हासिल है। ट्रैफिक कानून की धज्जियां उड़ाने में महारत हासिल है। इश्क और मुश्क छिपाने में महारत हासिल है। दूरदर्शी को लगता है कि सब कुछ छिप सकता है पर ईवीएम का खेल नहीं छिप सकता। उसमें छेड़छाड़ का कारनामा नहीं छिप सकता। एमपी के भिंड में डमी ईवीएम का ट्रायल हुआ तो बड़ा राज खुल गया। बटन तो अलग-अलग दबे, पर निकलीं सिर्फ कमल की पर्चियां। चुनाव आयोग का भी जवाब नहीं। नौ अफसरों को नापकर छेड़छाड़ की पटकथा मिटा दी।

खामोश न होगी यह आवाज़, यह मशाल न बुझेगी जब तक न मिले इंसाफ : मैं भोपाल हूं, 1984 की उस काली रात का गवाह हूं। उन लाशों के ढेर को देखा है मैनें। मानों कल ही की तो बात थी। 30 साल बाद भी आज भी वों मंजर मेरी आंखो के सामने ही है। मुझे आज भी लगता है कि उन लाशों के ढेरो में से एक बच्ची उठ कर आएगी और कहेगी... मेरी मां किस ढेर मे पड़ी है। और मे उसके र्दद भरे सवाल का क्या जवाब दूं। उस मंजर को देखकर  मुझे एहसास हुआ कि मानों मुगल एक बार फिर मुझ पर बुतपरस्तीयों पर आदम हो।

क्या भारत का संविधान किसी भी व्यक्ति को यह अधिकार देता है कि वह दूसरे व्यक्ति पर अपना रोब झाड़ सके एवं दूसरे व्यक्ति कि हत्या भी कर सके। इसको बड़ी गम्भीरता से सोचना पड़ेगा। यह अत्यंत गम्भीर एवं संवेदनशील विषय है। इसपर चिंतन एवं मनन करने की अतिशीघ्र आवश्यक्ता है। यह हमारे देश की एकता और अखंडता पर बहुत बड़ा प्रश्न है। जिससे देश को क्षति हो रही है। मात्र कुछ व्यक्तियों की ऐसी मानसिकताओं से पूरा देश आहत है। ऐसी मानसिकताएँ क्या देश को विकास कि गति दे रहीं हैं। अथवा देश के विकास कि गति में सहायक हैं। सोचिए, समझिए। क्या कारण है। यह उग्रता, यह संविधान के साथ खिलवाड़, यह कानून एवं संविधान का अपमान, यह हमारी एकता को दूषित करने का प्रयास, क्या कारण है। क्या ऐसी मानसिकताओं पर शीघ्र अंकुश लगाने कि आवश्यक्ता है अथवा नहीं?......

नोट बन्दी भविष्य मे अच्छी साबित हो सकती है। पुराने नोट , नकली नोटों पर पांबदी भारत की अर्थव्यवस्था को मजबूत कर सकती है। देश के मेहनतकश अधिकांश लोग इस निर्णय की प्रंशसा कर रहे है। यहा तक कि सभी राजनैतिक पार्टियों अध्यक्षों ने इस कदम को देश हित मे बताया था। इस ऐतिहासिक फैसले के बाद लोगों को नोट बदलने मे परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। ऐसे मे लोगों, खासतौर से समाजसेवियों को चाहिये कि वे लोगों की मदद करे। बैंकों मे जाकर देश की तस्वीर बदलने वाली व्यवस्था को लाईन मे लगे लोगों को चाय, पानी आदि देकर मदद करने बजाय कुछ लोग भारत बंद करने का एलान कर रहे है। नोट बंदी के पहले दिन से जहा लगभग भारत बंद जैसे हालात शुरू के दिनों मे रहे।

सुमंगल दीप त्रिवेदी

यूपी में सरकार बदलने के बाद से एक शब्द लगभग हर एक सख्श की जुबान पर आ रहा है, वह है ‘रोमियो’। उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा स्कूली छात्राओं, बालिकाओं एवं युवतियों से आये दिन होने वाली बदसलूकी, छींटाकशी पर विराम लगाने के उद्देश्य एवं महिलाओं के प्रति बढ़ रही आपराधिक वारदातों पर विराम लगाने की मंशा से सूबे के नये मुख्यमंत्री आदित्यनाथ योगी ने पुलिस विभाग को निर्देशित किया। फलस्वरूप, गठन हुआ ‘एंटी रोमियो स्क्वैड’।

500-1000 रुपये के नोटों पर बंदी के बाद जिस तरह से कुछ स्वयंघोषित तर्कशास्त्रियों ने हाहाकार मचाया है उससे काफी हैरान हूं और उतना ही ज्यादा अंर्तमन से दुखी भी हूं। खैर कुछ मुट्ठी भर लोगों के उद्देशीय और निजी विरोध से ज्यादा महत्वपूर्ण ये है कि देश, सरकार के इस फैसले से साथ खड़ा है।  बिना तथ्यों को जाने, बिना समझें कुछ स्वार्थी लोग सरकार के इस फैसले का विरोध कर रहे हैं। ये ठीक उसी तरह है जैसे कहा जाता है ना अधूरा ज्ञान ज्यादा खतरनाक होता है, नोट बंदी पर अधूरे ज्ञान वाले मुझे कुकुरमुत्ते की फसल की तरह दिखाई दे रहे हैं। ये लोग सरकार का कोसने में लगे हुए हैं, कैसे भी करके कहीं से भी लूप होल्स खोज रहे हैं कि आखिर कैसे सरकार के इस फैसले को गलत साबित करें। जितना प्रयास वह लूप होल्स खोजने में कर रहे हैं, उससे कम प्रयास उन्हें बैंकों की लाइन में लगकर अपनी रोजमर्रा के खर्च के लिए पैसे निकालने के लिए लगेंगे। लेकिन नहीं हम यदि ऐसा कर लेंगे को मौजूदा सरकार को कोसने की कसमें जो खाई हैं वह टूट जाएंगी।

हर हमले से मजबूत होते हैं हम...  जब पांच राज्यों के चुनाव परिणाम यह दर्शा रहे थे कि राजनीति में न हार अटल है और ना जीत, ठीक उसी वक्त बस्तर के सुकमा में आतंक के दहशतगर्द नक्सलियों ने आईईडी ब्लॉस्ट कर 12 जवानों को शहीद कर दिया और कुछ को घायल। नक्सलरोधी-नीति पर सवालिया निशान खड़े करती इस घटना के तत्काल बाद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह और गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने जो तत्परता-सह्दयता-उदारता दिखाई, उसने शहीद परिवारों के जख्मों पर मलहम तो जरूर लगाया है लेकिन मुंहतोड़ जवाबी कार्रवाई की दरकार बनी हुई है।

प्रिय बापू

"हैप्पी बर्थ डे!" हम जब से स्कूल जाना शुरू किये तभी से आपका जन्मदिन मना रहे,ये अलग बात है कि कभी दो लड्डू के लालच में और बाद में छुट्टी के रूप में। जब भी आपकी चर्चा होती है गोल चश्मे और लाठी लिए, इस गीत के साथ "दे दी हमें आजादी बिना खड्ग बिना ढाल" आपकी छवि सामने आ जाती है। आप बहुत सौभाग्यशाली लोगों में से एक थे जिनको गुलाम भारत में भी लंदन पढ़ने का मौका मिला और आपने इस अवसर का भरपूर दोहन किया तथा एक स्वाभिमानी बैरिस्टर और प्रभावशाली वैश्विक नेता बने जिसे हम नटॉल से नौआखली तक आपके संघर्षों में देखते हैं। आपने जीवन में बहुत प्रयोग किये जिनमें सबसे बेहतरीन उदाहरण आपकी आत्मकथा "सत्य के प्रयोग में" है।

साथियों,
मैं उन मीडियाकर्मियों से नहीं कह रहा हूं जो अपना जमीर बेचकर दलाली कर बड़ा पत्रकार होने का दंभ भरते घूम रहे हैं। मैं उन कर्मियों से भी नहीं कह रहा हूं जो लालची, निर्लज्ज, बेशर्म और कायर हैं। मैं उन कर्मियों से भी नहीं कह रहा हूं जो कुछ पाने के लिए कुछ भी कीमत चुकाने को तैयार रहते हैं। मैं कह रहा हूं उन कर्त्तव्यनिष्ठ, साहसी, खुद्दार और देशभक्त मीडियाकर्मियों से जिन्होंने अपनी परेशानी भूलकर हमारे दूसरे अन्य साथियों के हक में अपनी आवाज बुलंद की।