"पत्रिका" जितना बड़ा ब्रांड है, इन दिनों उतना ही परेशान भी है। आये दिन सम्पादक से लेकर रिपोर्टर तक इधर उधर हो रहे हैं। वर्तमान में भी यह सिलसिला जारी है। खबरों के स्तर की बात करें तो कुछ जगह खबरों की बजाय इवेंट्स के दम पर निकलता लगता है। एडिटिंग मिस्टेक्स तो यहां के पत्रकारों के DNA में है। और हो भी क्यों न क्योंकि पेज लगाने वालों को इन्होंने सब एडिटर बना रखा है। अब उनको क्या पता खबर को सम्मान कैसे दिया जाता है। न्यूज़ एडिटिंग किस चिड़िया का नाम है। खबर जगह के मुताबिक छोटी-बड़ी कैसे की जाती है। उन्होंने तो जहां फुल स्टॉप देखा उतना हिस्सा छोड़ बाकी सब डिलीट मार दिया। फिर चाहे खबर की मुख्य बातें उसी हिस्से में हों। आपको बता दूं यह सब मैं सुनी हुई या कहीं से मिली जानकारी के आधार पर नहीं बल्कि खुद वहां काम करते हुये देखा/समझा उसी के आधार पर बता रहा हूं। और इसी वजह से मैंने बड़ी ख़ुशी और सन्तुष्टि के साथ संस्था को अलविदा भी कहा है।

मेरे कॉलेज के दिनों में ही मुझे दैनिक भास्कर से जॉब ऑफर हो गई थी। मेरा पेमेंट भी उतना था जितने में पहुंचने में कई पत्रकारों को 4-5 साल लग जाते हैं। इसके पीछे एक वजह यह भी हो सकती थी कि मुझे टेक्निकल नॉलेज बहुत ज्यादा था। इसलिये बेहद कम समय में मैंने पेज डिजाइनिंग और क्वालिटी कवरेज की बारीकियां सीख लीं। मेरी खबरें अक्सर भास्कर डॉट कॉम के जरिये नेशनल लेवल पर भी चला करती थीं। जिसके चलते पत्रिका ने मुझसे कॉन्टेक्ट किया। हालाँकि मेरे पास जॉब छोड़ने की कोई वजह नहीं थी। फिर भी मैंने स्विच किया। उन्होंने मुझे सप्लीमेंट्री पेज पत्रिका प्लस दे दिया। जॉब ज्वाइन करने के 15 दिनों के भीतर मेरा नाम "प्रशस्ति पत्र" के लिए भी चला गया। लेकिन इतने ही दिनों में मुझे यह भी समझ आ गया कि मैं गलत जगह आ गया। और यहां से दाना पानी उठाने में ही भलाई है। और इसकी एकमात्र वजह थी घटिया मैनेजमेंट।

सुबह मीटिंग में जो खबरें स्थानीय सम्पादक द्वारा एप्रूव की जाती थीं। उनको रात को हटवा दिया जाता था। खबरें एकदम स्तरहीन क्योंकि रिपोर्टर इंटरनेट से न्यूज़ आइडिया चुराकर सुबह अपनी बताकर स्टोरी आइडिया में लिखवा देते थे। लेकिन जब खबर बनती थीं वो तथ्यों के अभाव में छापने लायक नहीं रह जाती थीं। ऐसे में मैंने एक बार मैंने सम्पादक महोदय से बोल दिया कि आप सुबह खबरों को ध्यान से देखकर एप्रूव करेंगे तो रात को पेज बनवाते समय मुझे कष्ट कम होगा। क्योंकि आपके रिपोर्टर जिस स्तर की खबरें लाते हैं। उसमें मेरे पास ज्यादा बैकअप नहीं रहता कि 3 पेज भर सकूँ। बस क्या था महोदय का ईगो हर्ट हो गया। एक अदना सा पत्रकार जिसे अख़बार की गिरती साख बचाने ज्वाइन करवाया वो ज्ञान कैसे दे सकता है।

बहरहाल मेरे साथ ऐसा भी हुआ है कि पीक आवर यानी रात 9 बजे भी मुझे मेरी महिला साथी पत्रकार को "व्हाट्सअप" चलाना सिखाना पड़ा है। जबकि इस समय हमें खबरें एडिट करने और पेज की डिजाइनिंग पर फोकस करना होता है। लेकिन मैं मजबूर था। क्योंकि मेरे मना करने पर मेरी शिकायत होती थी कि मैं टीम के साथ काम नहीं करता। उनसे अच्छी तरह बात नहीं करता। खैर पत्रिका मैं पहले भी छोड़ सकता था लेकिन उससे यही लोग कहते की उसे कुछ नहीं आता था इसलिये भगा दिया। यानी सही होकर भी गलत मैं ही साबित होता. इसलिये मुझे इन्तजार था ऐसे किसी कवरेज का जो सबको गधे और घोड़े का फर्क बता सके।

छत्तीसगढ़ एक CA हब के तौर पर उभरकर सामने आया है। इसलिये वहां CA से जुड़े एग्जाम्स के रिजल्ट बहुत अच्छे आते हैं और उनका कवरेज भी बड़े लेवल पर होता है। बस ऐसा ही एक कवरेज मुझे देने का मौका मिल गया। मौका भी ऐसा की उस दिन मेरी टीम में कोई नहीं था। 2 रिपोर्टर की मौजूदगी में 2 स्पेशल पेज जिसमें पहली बार हो रहे छात्रसंघ चुनाव का फुल पेज कवरेज शामिल था, के साथ पूरे 4 पेज मुझे अकेले निकालने पड़े। लेकिन अगली सुबह पता लगा कि मेरा कवरेज दूसरे अख़बारों से कम्पेयर करते हुये सोशल मीडिया, व्हाट्सअप के अलावा CA एसोसिएशन द्वारा नेशनल लेवल पर सर्कुलेट किया जा चुका था। वो भी मेरे नाम के साथ।

इसके तत्काल बाद मैंने पत्रिका को टाटा कह दिया। क्योंकि मुझे जो साबित करना था वो कर दिया था। बहरहाल इस बात को काफी समय हो गया और मैंने दुबारा पत्रिका की ओर पलटकर नहीं देखा। लेकिन चाहता था कि एक बार कोठारी साहब भी जाने कि क्यों भरपूर पैसा देने के बाद भी पत्रिका समस्याओं से उबर नहीं पा रहा। क्योंकि इसकी मुख्य वजह है वहां काबिल लोगों से ज्यादा सगे वालों का भरा होना।

आशीष चौकसे
पत्रकार, राजनीतिक विश्लेषक और ब्लॉगर
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