कल्पना करिये... वैसे अब कल्पना करने की जरूरत नहीं। वह दिन दूर नहीं जब बिना कर्मचारी के अखबार छपे, बिना रिपोर्टर के खबरें लिखी जाएं और बिना उप संपादक के संशोधित हो और बिना हाँकर के अखबार आप तक पहुंचे। 29 दिसंबर 15 को भड़ास पर इसी तरह की खबर पढ़ी तो अटपटा लगा। इस खबर के मुताबिक अमेरिका के " दी लांस एंजिल्स टाइम्स" ने रोबोट पत्रकार द्वारा लिखी गयी खबर छापी। यह खबर भूकंप पर थी। पिछले माह (सितंबर 15) चीन में एक रोबोट पत्रकार के होने का पता चला। इस रोबोट पत्रकार ने बिजनेस पर खबर लिखी। इसने 916 शब्दों की खबर एक मिनट में लिखी वह भी बिना गलती के। हां एक बात और इसने खुद आंकड़े जुटाये, तथ्य जमा किये और लोगों के विचार भी लिये।

अभी हाल में एनडीटीवी के रवीश कुमार ने अपने कार्यक्रम प्राइम टाइम में घटती नौकरियों " बेरोजगारी क्यों नहीं करती परेशान" पर चर्चा की। प्रहार नाम की संस्था ने लेबर ब्यूरो के सर्वे के जरिये बताया कि देश में हर रोज 550 नौकरियां गायब हो रहीं हैं। जो हैं भी वे तीन से पांच हजार के बीच वाली हैं। इस साल के कैंपस सेलेक्शन में 20 % की गिरावट संभव है। 90 % इंजीनियर (पत्रकारों का परसेंटेज मालुम नहीं)  काम के लायक नहीं हैं। अस्पताल और स्वास्थ्य सेवा के क्षेत्र में काम करने वालों में एक तिहाई बेकार हैं। ऐसा आँटोमेशन की वजह से हो रहा है।

ज्यादा पीछे जाने की भी जरूरत नहीं। 90 के बाद के दशक में आने वाले परिवर्तन पर ध्यान दें। इसके पहले अखबारों में मानव श्रम पर आधारित काम ज्यादा होते थे। अब अधिकतर काम कंप्यूटर से हो रहा है। कंप्यूटराइजेशन ने प्रूफ, पेस्टिंग आदि विभागों को निगल गया। इसके पहले तो कंपोजिंग भी लोहे के अक्षरों को बैठाकर होती थी। कंप्यूटर ने एक अखबार के कंपोजिंग विभाग को, प्रूफ विभाग को, कटिंग-पेस्टिंग विभाग को और मशीन से कई उप विभागों में काम करने वाले कर्मचारियों को सड़क पर ला दिया। यही नहीं यह कंपोजिटर, प्रूफरीडर और पेस्टर आदि पदों को ही निगल गया। फिर किसी भी तरह का आधुनिकीकरण हो वह जाता मालिकानों के ही पक्ष में है।

मालिकानों ने कार्यस्थल पर जो भी आधुनिक उपकरण लगाये हैं या कर्मचारियों को दिये हैं वह उनका मुनाफा बढ़ा रहे हैं। सेवा यानी नौकरियों के अवसर दिन-प्रतिदिन कम होते जा रहे हैं किंतु हमारी पेशानी पर बल ही नहीं पड़ रहे हैं। हम सड़कों पर उतरकर आंदोलन करने के बजाय मुलायम सिंह की समाजवादी पार्टी के टूटने से दुबले हुए जा रहे हैं, जयललिता की बीमारी का रहस्य ढूंढने में दिन रात एक किये हुए हैं। कुछ को इसी का गम खाये जा रहा है कि इतनी चांप के खबर लिखी फिर यश भारती सम्मान फलाने को मिल गया या श्रमजीवियों के साथ रहे होते तो श्रीलंका जाने का मौका मिल जाता।

आज रोबोट आर्टिकल लिख रहा है, खबरों की हेडिंग लगा रहा है कल को पूरा अखबार निकालेगा। अब जब रोबोट काम करेगा तो वह न प्रमोशन मांगेगा और न बोनस। उसे ईएल,सीएल और एमएल भी नहीं चाहिए। जब रोबोट को वह सब नहीं चाहिए तब वेज बोर्ड मजीठिया की भी क्या जरूरत है।

अरुण श्रीवास्तव
देहरादून
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