एक दर्जन से ज्यादा लोगों का इस्तीफा.... यूपी/उत्तराखंड चैनल के तथाकथित आउटपुट इंचार्ज और अपने सोसाइटी के RWA प्रेसिडेंट से परेशान हो कर पिछले कुछ दिनों में एक दर्जन से ज्यादा लोगों ने इस्तीफा दे दिया है। इससे ठीक पहले चैनल का पूरा ग्राफिक्स डिपार्टमेंट सामूहिक इस्तीफा दे कर चैनल को अलविदा बोला था। संभावना है कि आने वाले कुछ दिनों में चैनल के कुछ मजबूत स्तंभ भी अपना पिंड छुड़ाकर निकलेंगे। कई चैनलों के कंटेट को चुराकर लगातार प्रयोग के कारण टीआरपी की दौड़ में ये चैनल लंबे वक्त से तीसरे-चौथे नंबर पर हैै।
ये स्थिति तब है जब यूपी/उत्तराखंड को लेकर मार्केट में सिर्फ चार चैनल ही हैं। चैनल के कार्यकारी संपादक भी सिर्फ तथाकथित आउटपुट इंचार्ज और RWA प्रेसिडेंट की ही बात सुनते हैं, चैनल के प्रोड्यूसर-एंकर भी इस बात से काफी परेशान हैं।  चैनल में कार्यरत कर्मचारी भी मानते हैं कि, बीते कुछ दिनों में कार्यकारी संपादक को सिर्फ चापलुसों से घिरे रहने की आदत हो गई है। जबकि चैनल के एडिटर-इन-चीफ को इस बात की भनक तक नहीं है कि उनके अपने ही भांजे RWA प्रेसिडेंट के साथ मिलकर चैनल को गर्त में ले जा रहे हैं। सीखने और नया प्रयोग के चक्कर में चैनल का FPC ऐसे बदला जाता है जैसे मुंबई अटैक के दौरान शिवराज पाटिल कपड़े बदल रहे थे। कहा जा रहा है कि नए प्रयोग को देखकर कई बार CEO साहब गश खा जाते हैं। लेकिन कोई कार्रवाई नहीं कर पाते हैं। कुछ दिन पहले ही मोटी तनख्वाह पर कई एंकरों को चैनल ने हायर किया है, लेकिन आउटपुट इंचार्ज के बदतमीज रवैये के कारण एंकर भी टाटा-टाटा बाय-बाय करने के मूड में हैं। मार्केट में इस बात की अफ़वाह भी है कि यह चैनल विधानसभा चुनाव के बाद बंद होने वाला है।

पिछले महीने तनख्वाह में देरी हुई तो चैनल के लोगों के नाम तथाकथित आउटपुट इंचार्ज एवं RWA प्रेसिडेंट ने चापलुसी भरा खुला खत लिख दिया। प्रेसिडेंट साहब का ध्यान कभी स्क्रिन पर नहीं रहता, इससे कहीं ज्यादा ध्यान सोसाइटी के फ्लैटों में हो रही मरम्मत पर रहता है। चैनल से जाने वालों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है ऐसे में कार्यरत लोगों को भी शक की निगाहों से देखा जा रहा है कि क्या पता अगला नंबर इसी का तो नहीं ?

संस्थान बदलने की खबर लगते ही कर्मचारियों के प्रति चैनल के बॉस का नजरिया गिरगिट की तरह बदल जाता है। लगे हाथ अपने पावर का इस्तेमाल कर सैलरी सहित सैलरी स्लिप, रिलिविंग लेटर जैसे डॉक्यूमेंटस भी नहीं देते हैं। ऐसे में संस्थान से नाता रखने वाले संस्थान की बड़ाई कैसे करेंगे क्योंकि यही बीज किसी भी संस्थान का गुणगान करते हैं। शुक्रवार से बुधवार तक सुबह से लेकर रात तक दूसरे चैनलों को ही कॉपी करता है, लेकिन गुरूवार को टीआरपी के दिन चैनल के पिछड़ते ही सारा दोष रनडाउन पर फोड़ देता है और संपादक महोदय एक बार भी नहीं पूछते कि जब निर्देश और आदेश आउटपुट इंचार्ज दे रहा है तो फिर बाकी इसमें दोषी कैसे हुए। हां एक बात और, इस चैनल को सजाने संवारने और इस मुकाम तक पहुंचाने का हाथ रहा है उन तमाम लोगों का विकेट गिराने में RWA प्रेसिडेंट का हाथ बताया जाता है।

संस्थान के पुराने धुरंधर बॉस को पानी पी-पी कर कोसने वालों को अभी भी समझ नहीं आ रहा है कि रिजाइन कर चुके ज़्यादातर लोगों ने उनके ही नए चैनल का हाथ थामा है। इन तमाम बातों के बावजूद आत्मचिंतन के बजाए रिजाइन कर चुके लोगों को आत्ममुग्ध एडिटर साहब और RWA प्रेसिडेंट गद्दार, बेईमान, धोखेबाज बता रहे हैं। चैनल के लोगों को कार्यकारी संपादक की नज़रों में गिराना आउटपुट इंचार्ज के बाएं हाथ का खेल है। चैनल में आई खबर तथाकथित आउटपुट इंचार्ज को एक दिन बाद तब पता चलती है जब किसी दूसरे चैनल पर खबर चल रही होती है। क्योंकि मतलब चैनल से तो है नहीं मतलब है तो सिर्फ चापलुसी से। तथाकथित आउटपुट इंचार्ज खुद के बारे में बताता है कि उसे आगे किसी चैनल में नौकरी नहीं करनी है, लेकिन कहने वाले इसकी कार्यशैली और बदमाश रवैये को देखकर कहते हैं कि इसे नौकरी मिलेगी भी नहीं।

एक मीडियाकर्मी द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.