पिछले सप्ताह ओडिशा के कालाहांडी गांव की एक खबर ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया। दाना मांझी नाम के एक शख्स की दयनीय स्थिति का आलम यह था कि उसे अपनी मृत पत्नी को कंधों पर लादकर 12 किमी तक पैदल चलना पड़ा। मेरी संपूर्ण संवेदानाएं दाना मांझी के साथ हैं। बेचारा मांझी करता भी तो क्या, गरीबी नामक बीमारी से जो ग्रस्त था। दाना मांझी की पत्नी को टीबी की बीमारी थी जिससे वह मर गई लेकिन मांझी तो गरीबी की बीमारी से रोज झूझेगा और हर दिन मरेगा। गरीबी के नाम पर देश में कितने की ढकोसले तैयार किए जाएं लेकिन ये ढकोसले खाली थे, खाली हैं और रहेंगे। क्योंकि इस देश का गरीब केवल वोट बैंक बटोरने का ए मांक जरिया है, इससे ज्यादा कुछ नहीं।

खैर दाना मांझी की दुर्दशा पर संवेदाना रूपी जितने भी मरहम लगाए जाएं वह कम ही साबित होंगे। लेकिन मेरा गुस्सा यहां इंसानियत के उन कथित ठेकेदारों और कथित लोकतंत्र का चौथा स्तंथ बने मीडिया पर है। कोई दाना मांझी अपनी पत्नी को कंधे पर लेकर 12 किमी तक ढोहता है और मीडिया के लोग अपने कैमरे से मांझी की दयनीयता को कवर करने में लगे थे। शायद पत्रकारिता के धर्म में इतने सराबोर हो चुके थे मेरे पत्रकार भाई की उन्हें इंसानियत का धर्म याद ही नहीं रहा। उनके लिए स्टोरी और दिन भर चैनल पर चलाने के लिए, सरकारों को कोसने के लिए मसाला जरूरी था और पत्रकारों ने ऐसा करके भी दिखाया।

किसी पत्रकार के जेहन में इंसानियत नहीं जागी, जहां तक जानता हूं ज्यादातर पत्रकारों के पास चैनल द्वारा दिया गया एक चारपहिया वाहन होता है जिस पर शान से बैठकर वह अपनी पत्रकारिता का धौंस दिखाते हैं। प्रशासन ने चलो कोई एंबुलेंस मुहैया नहीं करायी, लेकिन क्या पत्रकारों की भी संवेदनाएं मर चुकी थी। क्या कोई पत्रकार दाना माझी और उसकी मृत पत्नी को अपनी गाड़ी में नहीं बिठा सकता था? क्या मांझी की मदद करना पत्रकारों की नैतिक और प्राथमिक जिम्मेदारी नहीं बनती थी? सब हो सकता था लेकिन खबर बनाने के नशे ने कुछ होने नहीं दिया।

12 किलोमीटर का सफर यदि पैदल तय करना है को एस स्वस्थ्य व्यक्ति को भी करीब डेढ़ से दो घंटों को समय लगेगा और जब कंधे पर एक 60-70 किलो की लाश हो तो मैं समझता हूं ये समय करीब 5-6 से घंटे का हो सकता है। एक गरीब 5-6 घंटे अपनी पत्नी की लाश लेकर चलता रहा और देश का मीडिया कैमरों की आड़ में, खबरों के कारोबार के लिए केवल तमाशा देखता रहा। इससे ज्यादा शर्म की बात कुछ और नहीं हो सकती। खैर, मेरा यही सवाल उन तमाम लोगों से भी है जो दाना मांझी के मजबूरी भरे 12 किमी के इस सफर के दौरान तमाशबीन बने रहे। यहां केवल यही सोचने पर मजबूर होना पड़ रहा है कि वर्तमान के परिपेक्ष में क्या सचमुच इंसानियत का गला इस कदर घोटा जा चुका है।

अंत में केवल इतना ही.....

“इंसानियत खुलेआम दम तोड़ती है सड़कों पर,
अब तो बंद कर दो हमदर्दी की ये कथित दुकानें।“

विनोद यादव
(पत्रकार)
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