कुछ मुट्ठीभर लोगों ने देश में ऐसा माहौल पैदा कर दिया है कि आम आदमी का जीना मुश्किल हो गया है। वैसे तो किसान-मजदूर निजी संस्थाओं में काम करने वाले लोग तरह-तरह की परेशानियों से जूझ रहे हैं पर सबसे ज्यादा दयनीय हालत उन मीडियाकर्मियों की है जो दूसरों के हक़ की लड़ाई लड़ने का दम्भ भरते हैं। यह देश की विडम्बना है कि देश और समाज के लिए चलाये जाने वाले मीडिया का इस्तेमाल काफी मीडिया मालिक अपने और अपनी पसंद के दलों के लिए कर रहे हैं। अधिकतर समाचार पत्रों के संपादक मैनेजरों का काम कर रहे हैं। हालत यह है कि कुछ पत्रकारों को छोड़ दो तो मीडिया की कमान दलालों व् कमजोर लोगों के हाथों में है। पैसे के बल पर बड़े स्तर पर अयोग्य लोग मीडिया घराने खोल कर बैठ गए हैं। इन सबके बीच यदि कोई पिस रहा हैं तो वह है स्वाभिमानी कर्त्तव्यनिष्ठ व् योग्य मीडियाकर्मी।

साथियों आज वह स्थिति पैदा हो गई है कि जो सबकी लड़ाई लड़ रहे हैं उनकी लड़ाई लड़ने वाला कोई नहीं। यहां तक कि खुद मीडिया कर्मी भी नहीं। अब समय आ गया है कि मीडिया में हो रहे शोषण के खिलाफ आवाज उठाई जाए। हालत ऐसी है कि मीडिया मालिकों व् अधिकारियों ने ऐसा भय का माहौल बना दिया है कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद अखबारकर्मी मजीठिया वेज बोर्ड की मांग नहीं कर पा रहे हैं। जो साथी हिम्मत करके मजीठिया वेजबोर्ड की हिसाब से वेतनमान  लागू करने की मांग कर रहे हैं। उन्हें बर्खास्त कर दिया जा रहा है। ऐसा नहीं है कि टीवी चैनलों में स्थिति ठीक है। वहां पर भी जमकर शोषण का खेल खेला जा रहा है।

साथियों कुछ साथी मीडिया कर्मियों के हक़ की लड़ाई लड़ने सड़क पर उतर गए हैं। मैं इन साथियों के हिम्मत को सलाम करता हूं। इन लोगों की हिम्मत देखिये कि बेरोजगार होकर भी ये क्रांतिकारी साथी सभी मीडियाकर्मियों के हक़ में अपनी आवाज बुलंद कर रहे हैं। इस लड़ाई में वैसे तो कई मीडिया घराने से जुड़े लोग हैं पर दैनिक जागरण और राष्ट्रीय सहारा के बर्खास्त मीडिया कर्मी अहम् रोल अदा कर रहे हैं। साथियों आइये हम सब मीडियाकर्मी अपंने हक़ में अपनी इन साथियों की आवाज बुलंद करें।

आपका
चरण सिंह राजपूत
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