रविशंकर टीआरपी को लेकर टीवी चैनल कितने खासे उत्साहित व हर वो कार्य करने को तैयार रहते है, जिससे कि उनके चैनलों की टीआरपी बढ़े। कुछ दिन पहले एक चैनल ने एक प्रोग्राम दिखाया था। ज्योतिषी, वैज्ञानिक व तर्कशास्त्री को लाइव लेकर ये कार्यक्रम बना था। इसको देख कर मुझे जितना गुस्सा आ सकता था, आया था। प्रोड्यूसर ने समाज सेवा के मंशा से कार्यक्रम को बनाया था। कुछ दिनों पहले इसी विषय पर एक कार्यक्रम तो स्पेशल कार्यक्रम था। समाज सुधारने की मंशा तो खैर तारीफ की चीज है। लेकिन इन प्रोगामों को लेकर मैं इस बात से इत्तेफाक नहीं रखता कि ऐसे कोई कार्यक्रम समाज में कोई प्रभाव डालते हैं। हां अगर उस कार्यक्रम की कोई चीज प्रभाव डाल रही थी, तो शायद उस कार्यक्रम मे एंकर, ज्योतिष व तर्कशास्त्री जिस तरह से तर्क के बहाने झगड़ा कर रहे थे, यही बात सबसे ज्यादा प्रभाव डाल रही थी। और वो भी इस बात ने बच्चों के दिमाग को ज्यादा प्रभावित किया होगा।

धीरजहर देश की पत्रकारिता की एक अपनी जरूरत होती है और उसी के मुताबिक वहां की पत्रकारिता का तेवर तय होता है। इस दृष्टि से अगर देखा जाए तो भारत की पत्रकारिता और पश्चिमी देशों की पत्रकारिता में बुनियादी स्तर पर कई फर्क दिखते हैं। भारत को आजाद कराने में यहां की पत्रकारिता की अहम भूमिका रही है। जबकि ऐसा उदाहरण किसी पश्चिमी देश की पत्रकारिता में देखने को नहीं मिलता है। समय के साथ-स‌ाथ यहां की पत्रकारिता की प्राथमिकताएं बदल गईं और काफी भटकाव आया। पश्चिमी देशों की पत्रकारिता भी बदली लेकिन वहां जो बदलाव हुए उसमें बुनियादी स्तर पर भारत जैसा बदलाव नहीं आया। इस बात पर दुनिया भर में आम सहमति दिखती है कि पत्रकारिता के क्षेत्र में गिरावट आई है। इस गिरावट को दूर करने के लिए हर जगह अपने-अपने यहां की जरूरत के हिसाब से रास्ते सुझाए जा रहे हैं। हालांकि, कुछ बातें ऐसी हैं जिन्हें हर जगह पत्रकारिता की कसौटी बनाया जा सकता है।

सलीमरविश कुमार ने तीन दिन पहले फेसबुक पर सवाल किया था कि भड़ास4मीडिया, मोहल्ला लाइव या विस्फोट में से कौन भारत का विकीलीक्स हो सकता है। कुछ लोगों ने इस सवाल को भले ही मजाक में उड़ा दिया हो, लेकिन रविश का सवाल बहुत मौजू है और इस सवाल के बहाने वेब मीडिया के बारे में बहस की जा सकती है। मैं अक्सर सोचता था कि सबकी खबर लेने वाले मीडिया की खबर भी किसी को लेनी चाहिए। मीडिया संस्थानों की अन्दरूनी राजनीति कभी बाहर नहीं आती थी। उनका भ्रष्टाचार भी कभी अखबारों की सुर्खियां नहीं बनता था। अखबारों और न्यूज चैनल पर ऐसा सम्भव नहीं था। लेकिन वेब मीडिया ने यह कर दिखाया। पहले भड़ास ब्लॉग और फिर भड़ास4मीडिया पोर्टल के जरिए मीडिया की अन्दरूनी उठापटक को सार्वजनिक करने की शुरूआत का श्रेय सिर्फ और सिर्फ यशवंत को जाता है। इस तरह से यह तो कह ही सकते हैं कि भड़ास भारत के मीडिया का विकीलीक्स है। हालांकि भड़ास के बाद कई और पोर्टल मीडिया की खबरों को देने लगे, लेकिन जो विश्वसनीयता और लोकप्रियता भड़ास की है, किसी और की नहीं है।

संजय कुमारसंचार क्रांति के दौर में मीडिया ने भी लंबी छलांग लगायी है। मीडिया के माध्यमों में रेडियो, अखबार, टीवी, खबरिया चैनल, अंतरजाल और मोबाइल सहित आये दिन विकसित हो रहे अन्य संचार तंत्र समाचारों को क्षण भर में एक जगह से कोसों दूर बैठे लोगों तक पहुंचाने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं। बात साफ है, बढ़ते प्रतिस्पर्धा के दौर में मीडिया का दायरा व्यापक हुआ है। राष्ट्रीय अखबार राज्यस्तरीय और फिर जिलास्तरीय प्रकाशन पर उतर आये हैं। कुछ ऐसा ही हाल, राष्ट्रीय स्तर के टीवी चैनलों का भी है। चैनल भी राष्ट्रीय से राजकीय और फिर क्षेत्रीय स्तर पर आकर अपना परचम लहरा रहे हैं। मीडिया चाहे प्रिंट हो या इलेक्ट्रानिक सभी ज्यादा-से-ज्यादा ग्राहकों/श्रोताओं तक अपनी पहुंच बनाना चाहते हैं। यकीनन आज बाजार, मीडिया पर हावी हो चुका है। अखबार और टीवी आपसी प्रतिस्पर्धा में आ गये हैं। मीडिया का स्वरूप आज बदल चुका है। राष्ट्रीय अवधारणा में तबदीली हो चुकी है। एक अखबार राष्ट्रीय राजधानी फिर राज्य की राजधानी और फिर जिलों से प्रकाशित हो रही है। इसके पीछे भले ही शुरुआती दौर में, समाचारों को जल्द से जल्द पाठकों तक ले जाने का मुद्दा रहा हो। लेकिन आज खबर पर, बाजार का मुद्दा हावी है।

मोहम्‍मदमशहूर शायर अकबर इलाहाबादी ने लिखा था - खींचो न कमानों को, न तलवार निकालो, जब तोप मुकाबिल हो तो अखबार निकालो। विकीलीक्स के खुलासे ने इसे चरितार्थ करते हुए तोपों, मिसाइलों, परमाणु बमों और लाखों जल, थल और वायु सैनिकों से लैस सुपर पॉवर अमेरिका को बगले झांकने के लिए मजबूर कर एक बार फिर पत्रकारिता की ताकत का एहसास करा दिया है। 21वीं सदी के आधुनिक ज्ञान, तकनीक और कौशल के दम पर विकीलीक्स नाम की इंटरनेट वेबसाइट के पतले दुबले 39 वर्षीय संपादक जूलियन पॉल असांजे की पत्रकारिता ने ये साबित कर दिया है कि कलम वो हथियार है, जिसके आगे सारे शस्त्र बौने साबित होते हैं। असांजे ने अमेरिकी राजनयिकों के लगभग ढाई लाख गुप्त संदेशों को अपने वेबसाइट पर जारी कर महाशक्ति को ऐसी पटखनी दी है कि इससे चोटिल होने के बाद महाशक्ति का संभलना मुश्किल हो रहा है। पिछले 10 सालों से अफगानिस्तान में और सात सालों से इराक में लड़ रहे लड़ाकों से अमेरिका जितना परेशान नहीं था, आज विकीलीक्स के आगे उससे कई गुणा ज्यादा बेबस नजर आ रहा है।

चैतन्‍यनया साल आ गया, हर छोटे बड़े अखबारों के संपादकीय कॉलम में बड़ी बड़ी बातें कहीं गईं भ्रष्टाचार, अन्याय, शोषण, असमानता  के खिलाफ संकल्प लेने का कड़वा डोज देश के नेताओं, अफसरों और इन कामों में लिप्त लोगों को पिलाया गया. ये आशा भी व्यक्त की गई कि 2011 का नया साल एक नई सोच और एक नये समाज के निर्माण की सौगात लेकर जहां सब कुछ अच्छा ही अच्छा होगा. ठीक है आपके हाथों में अखबार है तो आप सबको उपदेश की घुट्टी पिला सकते हैं. आप संपादक हो अखबार के मालिक हो जो चाहे लिख सकते हो. अपने अखबार के पन्ने में कोई रोकने टोकने वाला नहीं है पर क्या आपको कोई संकल्प नहीं लेना चाहिये इस नये साल में? क्या आप सचमुच दूध के धुले हैं? क्या आपके दामन पर कोइ दाग नहीं हैं? सोचना होगा, अपनी अंतरात्मा को टटोलना होगा और तब पता लगेगा कि आप भी उसी गंदगी में सराबोर हैं, जिससे बाहर निकलने का उपदेश देकर आप अपने आप को तीस मार खां समझ रहे हैं. किसी को उपदेश देने के पहले अपने गिरेबां में झांक लेना चाहिये कि हम कहां हैं? दूसरे पर पत्थर उछालने के पहले हमें यह भी सोच लेना चाहिये कि हमारे घर भी शीशे के ही बने हुये हैं.

: बदलते मीडिया और उसकी जरूरतों को समझना जरूरी : माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के जनसंचार विभाग में आयोजित एक कार्यक्रम में देश के दो ख्यातिनाम पत्रकारों ने विद्यार्थियों से अपने अनुभव बांटे। ये मेहमान थे बंगला पत्रिका ‘लेट्स गो’ एवं ‘साइबर युग’ के प्रधान सम्पादक जयंतो खान (कोलकाता) एवं प्रवक्ता डॉट काम के प्रधान सम्पादक संजीव सिन्हा ( दिल्ली)। पत्रकार जयंतो खान ने विद्यार्थियों को अखबार व पत्र-पत्रिकाओं की साज-सज्जा के बारे में जानकारी दी। रंगों का विज्ञान समझाते हुए उन्होंने हर रंग की विशेष अपील एवं प्रभावों के बारे में बताया। पत्र-पत्रिकाओं और अखबारों में इस्तेमाल होने वाली छपाई तकनीक के राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय परिदृश्य के बारे में भी जानकारी दी। इसके अलावा उन्होंने विजुअलाइजेशन और ग्राफिक्स के बारे में भी छात्रों को जानकारी देते कहा कि बदलते मीडिया और उसकी जरूरतों को जानना बहुत जरूरी है।

साल 2010 कई मायनों में बहुत महत्वपूर्ण रहा। पूरी दुनिया में ऐसी घटनाएं हुई जिन्होनें विश्व के लगभग सभी देशों में हलचल पैदा की। साल 2010 में कुछ ऐसी घटनाएं भी हुईं जिन्होंने विश्व में नए आयाम स्थापित किए। ऐसी तमाम घटनाओं पर दुनिया भर के समाचार चैनल और पत्रों ने समय-समय पर ख़बरें भी प्रकाशित की। लेकिन जुलाई 2010 में एक अनजान व्यक्ति नें ऐसा कारनामा कर दिखाया जिसने समस्त विश्व की नींद ही उड़ा दी। 2001 में अमरीका के वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर आतंकवादियों के हमले को मानवता पर दशक का सबसे क्रूर हमला माना गया। जब अमरीका के तत्कालीन राष्ट्रपति जार्ज बुश ने इस हमले का जवाब देने का प्रण किया तब पूरे विश्व को यह विश्वास था कि आतकंवाद के साथ उसी की भाषा में ही बात करना उचित होगा। दिलचस्प बाद ये थी कि 2001 में ही अमरीका ने अफगानिस्तान को आतंक का जड़ मान कर उस पर हमला भी कर दिया।

26 नवंबर का दिन था, घड़ी में राते के साढ़े नौ बजे थे, आमतौर पर मीडिया हाउस में शिफ्टों में काम होता है और व्यस्तता आमतौर पर 9 बजे के बाद कम हो जाती है, सो हमारे ऑफिस में भी लोग धीरे-धीरे अपने अपने कामों से निवृत हो रहे थे, कुछ खाना खाने के लिए कैंटिन की ओर बढ़ रहे थे तो कुछ टीवी चैनल बदल कर आपस में बहस कर रहे थे कि कौन सा चैनल हमसे बेहतर है और कौन सा हमसे खराब। इसी बहस के दौरान अचानक हमारे डेस्क का फोन बजा, शिफ्ट इंचार्ज ने फोन उठाया, मुंबई के रिपोर्टर का फोन था,  जिसने खबर दी कि हमारी मायानगरी में कुछ नापाक लोग घुस चुके हैं और वो आम लोगों को बंधक बना कर गोलयों की बरसात कर रहे हैं। इतना सुनना था कि डेस्क के अलसाये लोग फौरन अपनी-अपनी सीटों पर पहुंच गये और लगे अपने -अपने हिसाब से खबर को लिखने और दिखाने। करीब पांच मिनट के अंदर हमारा पूरा ऑफिस एक रणक्षेत्र में तब्दील हो गया, जिन चैनलों पर गाने बज रहे थे उन्हें हटाकर न्यूज चैनल लगा दिये गये और ज्यादा से ज्यादा ताजा खबरों का जायजा लेने के लिए बार-बार अपने मुंबई संवाददाता को फोन किया जाने लगा।

संजय द्विवेदी: सूचनाओं ने अपनी मुक्ति के रास्ते तलाश लिए हैं : इन दिनों हम सूचनाओं के एक ऐसे लोकतंत्र में हैं जहां आप उन्हें बांध नहीं सकते। वे आ रही हैं सुनाने हमारे काले कारनामों की कहानियां, उन लौह द्वारों को तोड़कर जो राजसत्ताओं ने बना रखे थे। विकिलीक्स को यूं ही न देखिए। उसकी सूचना की ताकत को देखिए और महसूसिए कि अगले क्षण कौन सी सूचना हमें हिलाकर रख देगी। दुनिया के इस्लामी जगत को तमाम सवालों पर कोसने वाले अमरीकी जनतंत्र के नायक इन खुलासों पर बौखलाए क्यों हैं। वे क्यों जूलियन असांजे के पीछे हाथ धोकर पड़ गए हैं। इसे सोचने की जरूरत है। सूचना व विचारों के जनतंत्र में अगर सलमान रश्दी और तस्लीमा को लेकर इस्लामी अधिनायकवाद गलत है तो अमेरिका की असांजे के मामले में बौखलाहट का आदर कैसे किया जा सकता है। जाहिर तौर पर सूचना एक ऐसे असरदायी हथियार में बदल गयी है कि राजसत्ताएं अपना स्वाभाविक जनतांत्रिक चरित्र भी कायम नहीं रख पा रही हैं।

मनोज कुमार एक नौजवान पत्रकार साथी ने शोषण के संदर्भ में एक अखबार कह कर जिक्र किया है और संकेत के तौर पर साथ में एक टेबुलाइड अखबार देने की बात भी कही है। समझने वाले समझ गये होंगे और जो नहीं समझ पाए होंगे, वे गुणा-भाग लगा रहे होंगे। यहां पर मेरा कहना है कि एक तरफ तो आप शोषण की कहानी साथियों को बता सुना रहे हैं और दूसरी तरफ आपके मन में डर है कि अखबार का नाम बता देने से आपका भविष्य संकट में पड़ सकता है। आप नौजवान हैं और पत्रकारिता के चंद साल ही हुए हैं। अपने आरंभिक दिनों में यह डर मुझे कुछ ठीक सा नहीं लगता है। बोलते हैं तो बिंदास बोलिये वरना खामोशी ही बेहतर। पत्रकारिता में आने वाले हर साथी से हमारा आग्रह है और उन्हें सलाह भी कि पत्रकारिता में हम तो गंवाने ही आये हैं, कमाना होता तो इतनी काबिलियत है कि कहीं बाबू बन जाते और बैठकर सरकार को गालियां देते रहते। ये हमारी फितरत में नहीं है। इस तस्वीर को बदलने के लिये ही हम आए हैं। जहां तब बात शोषण की है तो सभी को यह समझ लेना चाहिए कि यह शोषण हमारी ट्रेनिंग की पहली सीढ़ी है। जब हम खुद शोषित होते हैं तो पता चलता है कि समाज में शोषण किस स्तर पर हो रहा है।

पंकजराजनीति के अपराधीकरण पर किये गए विभिन्न अध्ययनों के दौरान जो निष्कर्ष प्राप्त हुआ था, वह आज पत्रकारों के राजनीतिकरण पर भी सटीक बैठ रहा है. मोटे तौर पर विधानमंडलों में अपराधियों की बढ़ती संख्या का कारण यह था कि पहले नेताओं ने अपने प्रतिद्वंदियों को दुश्मन समझ उसे निपटाने के लिए किराए के लिए बाहुबलियों की मदद लेना शुरू किया. बाद में उन अपराधी प्रवृत्ति के लोगों को लगा कि जब केवल ताकत की बदौलत ही सांसद-विधायक बना जा सकता है, तो बजाय दूसरों के लिए पिस्तौल भांजने के क्यू न खुद के लिए ही ताकत का उपयोग शुरू कर दिया जाय. फलतः वे सभी अपनी-अपनी ताकत खुद के लिए उपयोग करने लगे और ग्राम पंचायतों से लेकर संसद तक अपराधी ही अपराधियों की पैठ हो गयी. इस विषय पर वोहरा कमिटी ने काफी प्रकाश डाला है. तो अब चुनाव प्रणाली में नए-नए प्रयोगों के दौरान भले ही असामाजिक तत्वों पर कुछ अंकुश लगा हो लेकिन यह फार्मूला अब पत्रकारों ने भी अपनाना शुरू कर दिया है.

राजीवपत्रकारिता में शोषण का गणित समझना आसान नहीं है, क्योंकि यहाँ रिपोर्टर को थोडा सा पैसा देकर समाचार-पत्र हजारों-लाखों की कमाई करता है, वो भी बड़े तरीके से. पूंजीवाद के शोषण का तंत्र बहुत ही संगठित और दिमागी शतरंजी चाल में चतुर तंत्र है. इस चतुर तंत्र के शोषण का आधार है असंगठित और सस्ता मानवीय श्रम, जिसके कामों का सहारा लेकर चंद चतुर लोगों का यह तंत्र करोड़ों कमाता है और ऐश की जिंदगी जीता है. भारत में हिन्दी पत्रकारिता के व्यापार क्षेत्र में तेजी से आगे बढ़ रहे एक समाचार-पत्र में हो रहे शोषण के तरीके का ज़िक्र करना चाहूँगा. यह समाचार-पत्र अपने साथ एक टेब्लायडनुमा अखबार अलग से देता है, जिसमें स्थानीय भ्रष्टाचार की ख़बरें संसेशनल बनाकर छापी जाती हैं. इस छोटे से टेब्लायड का यहाँ के व्यवसायी, प्रशासनिक और राजनीतिक वर्ग में काफी खौफ है. इस टेब्लायड में काम करनेवाले अधिकांश रिपोर्टरों को हर छपे रिपोर्ट के लिए दो सौ से हज़ार रूपये के आसपास दिया जाता है. अस्थाई रूप में नौकरी करनेवाले उन रिपोर्टरों से जमकर काम लिया जाता है और नौकरी छिनने के खौफ से ये रिपोर्टर दिन-रात परेशान होकर काम करने को मजबूर होते हैं.

''ऐसे प्रश्न मत पूछिए। वह सहेगी क्योंकि वह भ्रष्टाचारियों को चुनती है। जिस दिन उसने चुनना बंद कर दिया, उस दिन किसी गांधी और जेपी को व्यथित होने की जरुरत नहीं पडेगी। हम भ्रष्टाचारियों को सूली पर चढ़ाने की बात क्यों करते हैं, जनता को क्यों नहीं चढ़ाते? असल गुनाहगार तो वही है।'' भारतीय आम आदमी के बारे में यह विचार आईबीएन-7 के प्रबंध संपादक और इलेक्ट्रानिक मीडिया के क्षेत्र में एक बहुपरिचित चेहरे आशुतोष के हैं। उन्होंने दैनिक भास्‍कर के 6 दिसम्बर के राष्ट्रीय संस्करण में ‘इस जनता को सूली पर चढ़ाओ' नामक एक आलेख में यह विचार व्यक्त किए हैं। आशुतोष आम आदमी के बारे में जिस लहजे का प्रयोग कर रहे हैं और जिस दृष्टिकोण की वकालत कर रहे हैं, वह अभारतीय होते हुए भी नया नहीं हैं। आम आदमी के प्रति यह दृष्टिकोण औपनिवेशिक शासनकाल की देन है। भारतीयों को हेय समझने और अपने निर्णय लेने में अक्षम मानने की मानसिकता मूलत: ब्रिटिश शासकों की मानसिकता थी। लार्ड कर्जन की भारतीयों के प्रति 1905 में की गयी अपमानजन टिप्पणी इस मानसिकता की पहली बडी अभिव्यक्ति मानी जा सकती है। लार्ड कर्जन ने कलकत्ता विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह में बोलते हुए कहा था कि सत्य आम भारतीय का आदर्श कभी भी नहीं रहा है। विन्सटन चर्चिल ने भी भारतीयों के बारे में ऐसी ही राय व्यक्त की थी। उनका मानना था कि लोकतंत्र के लिए भारतीय उपयुक्त नहीं है। विन्सटन चर्चिल ने कहा कि भारतीय मीठी जुबान और तंगदिल वाले आदमी हैं। वे सभी सत्ता के लिए लडेंगे और इस तकरार में भारत अपना राजनीतिक अस्तित्व नहीं बचा पाएगा।

राजीवआज की अंग्रेजी पत्रकारिता में पी साईनाथ का बड़ा नाम है, वह भी एक ऐसे बीट पर काम करने के कारण जिसकी जड़ें गांव की वादियों में रची बसी समस्याएं हैं. एक अंग्रेजी पत्रकार का गांव-गांव भटककर खबर खोजने की इस कवायद ने कुछ तात्कालिक परिणाम भी पैदा किये हैं, लेकिन मीडिया में आये चंद सुर्ख़ियों से न तो गाँवों की तकदीर बदलनेवाली और न ही तस्वीर. पी साईनाथ को इस वजह से बड़ा नाम मिला है और कई अंग्रेजी पत्रकार उनकी ही तरह मशहूर ग्रामीण पत्रकार बनने का सपना संजोते हैं. यह सच्चाई का सिर्फ एक पहलू है. सच्चाई का दूसरा पहलू गाँव की सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक संरचना है, जिसमें जब तक स्थाई परिवर्तन नहीं लाया जाता तब तक हजारों पी साईनाथ मिलकर भी गाँव में व्याप्त शोषण, गरीबी, अशिक्षा, बेरोजगारी, ऊंच-नीच, पिछड़ापन को दूर नहीं कर सकते. साईनाथ की पत्रकारिता से शहर के लोगों को सिर्फ गाँव की रत्ती भर जानकारी मिलती है. उनकी पत्रकारिता में गाँव के लोगों के व्यापक सामाजिक स्थिति का चित्र नहीं मिलता, जिसके स्थाईत्व से गाँव की समस्या ज्यों की त्यों बनी रहती है.

सैफई (इटावा) प्रदेश का पत्रकार खादी व खाकी के साये में अपने को निरन्तर असुरक्षित महसूस कर रहा है। प्रदेश सरकार पत्रकारों को सुरक्षा उपलब्ध कराये तथा तहसील स्तरीय पत्रकारों को मान्यता प्राप्त पत्रकार घोषित करे। यह बात राष्ट्रीय जर्नलिस्ट एसोसिएशन के प्रदेश प्रशासनिक सचिव सुघर सिंह जाटव ने इटावा पक्का तालाब स्थिति विक्टोरिया मेमोरियल हॉल में एसोसिएशन के पदाधिकारियों व पत्रकारों को सम्बोधित करते हुये कही। उन्होंने कहा कि आज प्रदेश का पत्रकार सुरक्षित नहीं है। प्रदेश में 40 पत्रकारों की हत्या हो चुकी है। प्रदेश सरकार पत्रकारों की सुरक्षा करने में विफल साबित हुयी है। भाजपा सरकार में राजनाथ सिंह ने तहसील स्तर के पत्रकारों को मान्यता प्राप्त पत्रकार घोषित करने की सहमति दी थी, लेकिन विपक्षी सरकारों ने तहसील स्तरीय पत्रकारों की मान्यता पर रोक लगा दी, इसके अलावा प्रदेश की मुख्यमंत्री ने अखबारों की सूचीबद्धता पर रोक लगी, मान्यता प्राप्त पत्रकारों को लखनऊ सचिवालय में बिना सचिवालय पास के न घुसने देने का आदेश जारी करने के बाद सरकार का पत्रकार विरोधी चेहरा जनता के सामने आ गया है।