पत्रकारिता के लक्ष्य के विषय में चर्चा करने से पूर्व यह जानना आवश्यक है कि पत्रकारिता क्या है? पत्रकारिता कोई व्यवसाय नहीं है जो किसी लाभ या धन के लोभ के लिए किया जाए। यह एक दायित्‍व है, जिसमें पत्रकार या संवाददाता समाचार पत्र अथवा टीवी के माध्यम से आम जनमानस की “जानने” की जिज्ञासा को पूरा करते हैं। यदि हम पत्रकारिता के प्रारभं का जिक्र करें तो हमारे पुराणों में देवर्षि नारद को इस विधा के प्रणेता का श्रेय जाता है। देवर्षि नारद ने बिना किसी भय और लालच के तात्कालीन लोक में समाचार का संचार किया। उन्होंने अपने अन्दर की जिज्ञासा को जन-जन की आवश्यकता मानते हुए समाचार को जानना और उसकी पुष्टि करने के बाद उसको उचित माध्यम से प्राप्तकर्ता तक पहुंचाने को अपने जीवन का एकमात्र उद्वेश्य बना लिया। पत्रकारिता के इस प्रारभं काल के बाद इस विधा का विकास होता गया और यह एक साधारण संचार प्रकिया से विकसित होकर एक वृहद और समाज को एक धागे में पिरोने वाली संस्कृति के रूप में अवतरित हुई।

एएनवैसे तो क्रिकेट के दसवें विश्व कप का आग़ाज़ 19 फरवरी को भारत और बांग्लादेश के बीच खेले गए मैच से हुआ, मगर इस के कुछ दिन पहले से ही भारत पूरी तरह से इस के रंग में रंग गया है। विश्व कप शुरू होने के लगभग एक सप्ताह पहले से ही क्रिकेट की खबरें तो खूब आ ही रही थीं, अब जबसे विश्व कप शुरू हुआ है ऐसा लगता है क्रिकेट के अलावा इस देश में कुछ हो ही नहीं रहा है। समझ में नहीं आता यह क्रिकेट का बुखार है या फिर जनता की बेबसी, जो कई बड़े मुद्दों को छोडकर पूरी तरह से क्रिकेट के पीछे लगी हुई है। जिसे देखो वो सिर्फ और सिर्फ क्रिकेट की बात कर रहा है। जब से विश्व कप की गहमा गहमी शुरू हुई है तब से भारत समेत विश्व के दूसरे देशों में भी कई बड़ी खबरें सामने आयीं हैं, मगर उन खबरों को वैसा महत्व नहीं दिया जा रहा है जैसा क्रिकेट को दिया जा रहा है।

अनंत बेहद सर्द सुबह थी, कोहरा इतना घना था कि हाथ को हाथ नहीं सूझ रहा था। मैं बात कर रहा हूं जनवरी के पहले हफ्ते की जब अचानक से दिल्ली में सर्दी कम हुई थी और कोहरा घना हो गया था। मुझे वर्धा जाना था और उसके लिए नागपुर तक की प्लाइट लेनी थी जो दिल्ली एयरपोर्ट से सुबह सवा पांच बजे उड़ती थी। जाहिर तौर पर मुझे घर से तड़के साढ़े तीन बजे निकलना था। टैक्सी लेकर घर से निकला तो कार की लाइट और कोहरे के बीच संघर्ष में कोहरा जीतता नजर आ रहा था। इंदिरापुरम का इलाका कुछ खुला होने की नजह से कोहरा और भी ज्यादा था। एक जगह तो हमारी गाड़ी डिवाइडर से टकराते -टकराते बची। सामने कुछ दिख नहीं रहा था अंदाज से गाड़ी चल रही थी। लेकिन वर्धा के गांधी आश्रम को और महात्मा गांधी अंतराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय को देखने की इच्छा मन में इतनी ज्यादा थी कि वो कोहरे पर भारी पड़ रही थी।

देश के न्‍यायाधीश, सरकारी अफसर, प्रधानमंत्री, मुख्‍यमंत्री और मंत्रियों की सम्‍पत्ति का ब्‍यौरा सार्वजनिक हो रहा है। लेकिन जब तीन स्‍तम्‍भों की संपत्ति का ब्‍यौरा सार्वजनिक हो रहा है तो ऐसे में कथित चौथा स्‍तम्‍भ को भी अछूता नहीं रहना चाहिए। बात आती है कि मीडिया पर अंगुली नहीं उठनी चाहिए, क्‍योंकि मीडिया ही देश को आईना दिखाती है, लेकिन ऐसा नहीं है। यही मीडिया है, इसी आईने के चक्‍कर में गलत राह भी दिखा देती है। इस लाइन में भी ऐसे मठाधीश हैं कि जिन्‍होंने मीडिया की धौंस में अरबों की संपत्ति अर्जित की है या फिर लोग अपने काले धन को छुपाने के लिए मीडिया का सहारा ले रहे हैं। मीडिया में भी हर तरह का माफिया प्रवेश कर गया है। क्‍योंकि प्रशासनिक तंत्र को अपने रुतबे से भयभीत कर वह काले धंधे में लगे रहते हैं। यह बात निचले स्‍तर के पत्रकारों की नहीं है जो मुश्‍िकल से अपनी गृहस्‍थी का पालन-पोषण करते हैं। बात है ऊंचे ओहदे पर काम करने वाले मीडिया के अफसरों की। जिन्‍हें मीडिया समूह के मालिक भी इधर-उधर नहीं करते।

: पूंजीपति अखबारों की कोशिश लघु अखबारों को निगलने की : यह आज के जमाने का सच है कि मीडिया में तूती पूंजी की बोल रही है। सरस्वती लक्ष्मी की दास बन चुकी हैं। जो खुद को पत्रकारिता के हितों का रक्षक बताते नहीं अघाते। वह पूंजीवादी अखबारों में आफिस की घुटन में रूटीन र्क्लक की तरह काम करने में जुटे हैं, तो दूसरी ओर लघु पत्रकारिता के माध्यम से अपने दिल की बात को बेबाक अंदाज में कहने का दम भरने वाले पत्रकार भी जैसे-तैसे जिंदा रहने के लिए सरकारी निजाम की गुलामी का पट्टा पहने हुए दिखायी दे जाते हैं। किसी समय लघु पत्रकारिता का अपना महत्व था लेकिन आज जिस तरह से पूंजीवादी कम्पनियां अखबार जगत को अपने आधिपत्य में लेने की कोशिश कर रही हैं। उसके चलते एक बात तो साफ हो रही है कि शायद आने वाले अगले दशक में लघु अखबारों पर भी येनकेन प्रकारेण पूंजीवादी एवं आपराधिक तत्वों का ही कब्जा हो जायेगा।

संजय द्विवेदी: जन्‍म शताब्‍दी वर्ष पर विशेष : यह हिंदी पत्रकारिता का सौभाग्य ही है कि देश के युगपुरूषों ने अपना महत्वपूर्ण समय और योगदान इसे दिया है। आजादी के आंदोलन के लगभग सभी महत्वपूर्ण नेताओं ने पत्रकारिता के माध्यम से अपना संदेश लोगों तक पहुंचाया और अंग्रेजी दासता के विरूद्ध एक कारगर हथियार के रूप में  पत्रकारिता का इस्तेमाल किया। इसीलिए इस दौर की पत्रकारिता सत्ता और व्यवस्था की चारण न बनकर उसपर हल्ला बोलने वाली और सामाजिक जागृति का वाहक बनी। लोकमान्य बालगंगाधर तिलक, लाला लाजपत राय से लेकर महात्मा गांधी, पं. जवाहरलाल नेहरू, गणेश शंकर विद्यार्थी, अजीमुल्ला खान, पं. माखनलाल चतुर्वेदी, माधवराव सप्रे सबने पत्रकारिता के माध्यम से अपनी आवाज को लोगों तक पहुंचाने का काम किया। ऐसे ही नायकों में एक बड़ा नाम है पं. मदनमोहन मालवीय का, जिन्होंने अपनी पत्रकारिता के माध्यम से जो मूल्य स्थापित किए वे आज भी हमें राह दिखाते हैं।

अबतक सियासी किस्सागोई और बहस का कारण बंधुवर बनते रहे हैं। लेकिन नवलेश की गिरफ्तारी के बाद इन दिनों बंधुवर ही खासे चर्चे में हैं। बंधुवर करना तो बहुत कुछ चाहते हैं लेकिन ज्यादा बोले तो डरते हैं कि अगला नंबर उनका न हो। अब बंधुवर नौकरी बचाये की आंदोलन बचाये दुविधा में पड़े हैं। हालत ये है की अब तो राह चलते लोग मजाक उड़ाने लगे हैं कि जैसे पत्रकार न हुए कोई अपराध हो गया। अब कुछ दिनों पहले की ही बात है बंधुवर हाईकोर्ट गये प्रतिक्रिया लेने कुछ वकीलों की। मामला था सुप्रीम कोर्ट ने बिहार की निचली अदालतों की कार्यप्रणाली सुधारने के बारे में टिप्पणी की थी। प्रतिक्रिया लेते उससे पहले ही वकीलों ने बंधुवर से पूछ लिया कि भाईजी का क्या हाल है। बंधुवर पहले तो समझे ही नहीं, तो वकील साहब ने कहा- अरे वही भाई आपके नवलेश भाई। देखिये खबर आपलोग बहुत छापते हैं। जरा संभल के रहियेगा की अगला नंबर आप ही का मत हो।

एएनपिछले दिनों एनडीटीवी पर उमाशंकर सिंह की एक खास रिपोर्ट इस्लाम के नाम पर पेश की गयी। प्रोग्राम देखने के बाद दिल से एनडीटीवी और उमाशंकर सिंह दोनों के लिए दुआ निकली। दिल से दुआ निकलने की वजह यह नहीं थी कि मैं एक मुसलमान हूँ और मैंने यह रिपोर्ट इसलिए पसंद की   क्‍योंकि इसमें मुसलमानों की सही तस्वीर पेश की गयी थी। रिपोर्ट पसंद आने की वजह यह थी कि इसमें पुलिस ज़ुल्म के शिकार हुये मुसलमानों की सच्ची और ईमानदार तस्वीर पेश की गयी थी, जिसकी उम्मीद आमतौर पर भारतीय मीडिया से नहीं की जाती। अगर सच कहूँ तो ऐसी हिम्मत उमा शंकर सिंह या एनडीटीवी जैसा चैनल ही कर सकता है। इस रिपोर्ट में बताया गया कि कैसे मक्का मस्जिद धमाके के बाद बेक़सूर मुसलमानों को गिरफ्तार किया गया और उन पर कैसे-कैसे ज़ुल्म ढाये गए।

संतोष2008 में जब मुंबई पर हमला हुआ तो सवाल उठा कि आखिर खुफिया एजेंसियों को इसकी भनक तक क्यों नहीं लगी? कुछ जानकारों ने इसका एक जवाब भी ढूंढ़ा कि खुफिया एजेंसियों में मुस्लिम चेहरे तो हैं ही नहीं। अर्थात इन एजेंसियों में किसी बड़े पद पर कोई मुस्लिम अफसर नहीं है। कहने का तात्पर्य यही था कि हम जिस धर्म या जाति से सम्बंधित होते हैं उसके बारे में बाकी के मुकाबले ज्यादा जानते हैं। हम कार्रवाई करना चाहें तो कर सकते हैं, बचाना चाहें तो बचा सकते हैं। बहुत कुछ यही भाव था मालेगांव और समझौता एक्सप्रेस में धमाकों के बाद। जो भी आतंकवादी घटना होती- मुस्लिम युवक को पकड़ कर खानापूर्ति कर दी जाती। असीमानंद के स्वीकारने के बाद तस्वीर एकदम बदल गई। मीडिया में भी ये साम्प्रदायिक भाव बहुत गहरे है...एक वाक्या याद आ रहा है.

राजकुमार: पांच अगवा जवानों को नक्‍सलियों द्वारा छोड़े जाने का मामला : छत्तीसगढ़ के नारायणपुर जिले के धौड़ाई के पास माहराबेड़ा से यात्री बस को रोककर गणतंत्र दिवस के ठीक एक दिन पहले 25 जनवरी को 5 जवानों तथा एक स्थानीय युवक को मुखबिरी के शक में नक्सली अगवा कर ले गए थे। बाद में युवक को नक्सलियों ने छोड़ दिया। इसके बाद अगवा किए गए जवानों के परिजन, नक्सलियों से लगातार गुहार लगा रहे थे, लेकिन नक्सली अपनी कुछ मांगों पर अड़े रहे। इस बीच मीडिया द्वारा मामले को कवरेज दिया जाता रहा। यहां बताना यह आवश्यक है कि जब से जवान अगवा किए गए थे, उसके बाद विपक्ष भी सरकार पर दबाव बनाए हुए था कि किसी भी तरह से जवानों को छुड़ाया जाए। साथ ही परिजन भी सरकार के समक्ष गुहार लगा रहे थे।

समाचार पत्रों में युवा पत्रकारों को प्राथमिकता देते हुए वरिष्ठ पत्रकारों के साथ धोखाधडी का खेल खेला जा रहा है। जो पत्रकार अपना सम्पूर्ण जीवन पत्रकारिता में बिता देता है और जब वह 50 वर्ष के आंकड़े को पार करता है तो उसको एक युवा पत्रकार के आगे प्राथमिकता नहीं दी जाती। कारण साफ है कि वरिष्ठ पत्रकार के पास अनुभव होता है जिसके बलबूते पर वह अधिक सैलरी का हकदार होता है, लेकिन एक युवा पत्रकार जिसका कैरियर बहुत कुछ सीखने की ओर होता है, वह वरिष्ठ पत्रकारों की अपेक्षा काफी कम सेलरी पर काम करने को तैयार हो जाता है। कोटा शहर का दैनिक नवज्योति संस्थान एक ऐसा ही संस्थान है, जहां पर वरिष्ठ पत्रकारों के साथ धोखाधड़ी की जा रही है। उनके अनुभव का ख्याल नहीं किया जा रहा है।   नए और कम वेतन वाले पत्रकारों के आगे पुरानों को महत्व नहीं दिया जा रहा है।

दैनिक भास्कर ग्रुप के डीबी पावर प्लांट द्वारा छत्तीसगढ़ के जांजगीर-चांपा जिला अंतर्गत डभरा क्षेत्र में कराए जा रहे अवैध निर्माण पर चंद्रपुर नगर पंचायत ने रोक लगाते हुए प्रबंधन को नोटिस जारी किया है। पावर प्लांट प्रबंधन द्वारा नियम-कानूनों को दरकिनार कर अपनी मर्जी से नगर पंचायत से अनुमति लिए बिना ही इंटकवेल के लिए गड्ढ़ा खुदवा दिया गया है। नोटिस जारी होने के बाद डीबी पावर के कर्मचारी इस मामले को निपटाने में लगे हुए है और उनके द्वारा नगर पंचायत के सीएमओ पर बार-बार दबाव डाला जा रहा है। छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा जांजगीर-चांपा जिले में 34 पावर प्लांट लगाने के लिए विभिन्न कंपनियों से एमओयू किया गया है। इसी के तहत डभरा विकासखंड अंतर्गत ग्राम टुण्ड्री तथा आसपास के क्षेत्र में डीबी ग्रुप का 1200 मेगावाट का पावर प्लांट निर्माणाधीन है।

भूपेंद्र आज कल हमारे यहाँ के पत्रकार जगत में एक सर्वथा डैसिंग-डायनामिक परसनैलिटी उभर कर सामने आई है, जिसे देखकर बॉलीवुड की जासूसी/स्टंट फिल्मों की यादें आती हैं। क्या परसनैलिटी है- शार्ट शर्ट, जीन्स पैण्ट कमर में कैमरा शर्ट की जेबों में पेन और स्लिप पैड। देखने से ही लगता है कि यह नवजवान ‘क्राइम रिपोर्टर’ हो सकता है। उम्र कोई 20-22 वर्ष, कद बिग बी के बराबर, छरहरा बदन, रंग साँवला, बोलचाल में सबसे बीस। आँखों का गॉगल सिर माथे पर फिल्मी हीरो की तरह। शिक्षा-दीक्षा-यह पत्रकारिता का मापदण्ड (मानक) नहीं है। पत्रकार होना कठिन है, लेकिन कहलाना बड़ा आसान। किसी छोटे अखबार की दस प्रतियाँ मंगवाने लगो, संस्था का अधिकार-पत्र जारी। उसकी फोटो प्रतियाँ बांट दो- बस पुराने पत्रकारों में पैठ बन गई। लिखने का मौका ही नहीं सुबह से लेकर देर शाम तक लाखैरागर्दी से ही फुर्सत नहीं। यदि फुर्सत भी मिले तो भूसा भरे दिमाग से लेखन जैसा सुकार्य कैसे कर पाएगा कोई? मैं तो उसे पहले ‘गोबर’ कहता था, अब उसके हाव-भाव से ‘किंग गोबरा’ कहने लगा हूँ। क्यों न कहूँ आदमी (स्त्री/पुरूष) अपने परिधान (वेशभूषा) से ही सर्व प्रथम पहचान छोड़ता है। कौआ और कोयल में अन्तर बोलने के बाद पता चलता है। क्या जरूरत है कि बोला जाए।

रविशंकरपिछले कुछ वर्षो में भारतीय मीडिया ने जो कुछ झेला वो शायद किसी और देश की मीडिया ने नहीं झेला होगा। खबरों की गरिमा में कमी, पेड न्यूज, मीडिया के लोगों की तमाम अपराधिक गतिविधियों में संलिप्तता और ना जाने क्या-क्या पिछले कुछ सालों में मीडिया की उपलब्धियां रही। भारतीय मीडिया के लोग अपने खबरों का सबसे बड़ा ऐविडेंस तस्वीरों को व विजुअल को मानते हैं। किन तस्वीरों को प्रकाशित करना है, किन विजुअल को ऑन एयर करना है, इसकी समझ मीडिया के काम कर रहे लोगों में शायद नहीं है या आवश्यकता से अधिक मार्डन हो गयी है भारतीय मीडिया। तभी तो सहारा के लोगों द्वारा समाचारों में गालियों का इस्तेमाल और ईटीवी ब्लू फिल्म जैसे विजुअल आन एअर कर दे रहा है। लाइव रिर्पोटिंग के नाम पर फेक विजुअल आज भारतीय मीडिया की हकीकत हो गयी है।

सुरेशमीडिया के चूल्हे पर दलाली की रोटी। साल 2010 इस रोटी के साथ सत्ता की दलाली के बटर का स्वाद चखता रहा। हां इसने दलाली के कुछ पर्यायवाचियों के पेट का हाजमा जरूर खराब कर दिया। कहा जाए तो ये साल सत्ता की सबसे बड़ी दलाली की नई इबारत लिख गया। कुछ चेहरे जो टीवी स्क्रीन पर देश को ज्ञान बांटते थे। अखबारों-पत्रिकाओं में अपनी कलम का जादू बिखरते। लोकतंत्र में मीडिया की किरकिरी करा दी। साल 2010 इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गया। पर अपने आगे के वक्त के लिए छोड़ दिए काली स्याही से लिखे शब्द दलाली, धंधा और मीडिया। इस पर कई लेख लिखे गए। मीडिया के धुरंधरों ने लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ के दामन पर लगे दागों को धुलने की कोशिश की। मीडिया के खाते में आई कई कामयाबियों का जिक्र किया। पर कुछ कामयाबियों का जिक्र करना भूल गए। बस सब अपने आपको पाक साफ बताने में जुटे रहे। उन्होंने इस पर एक बार भी प्रकाश नहीं डाला कि चैनलों के अंदरखाने क्या होता है? खबरों के लिए क्या-क्या खेल पर्दे के पीछे खेले जातें है? शायद ये बात मीडिया के धुरंधर बताना भूल गए।

श्‍यामलोकतंत्र के तीन मुख्य स्तम्भ है विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका और लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ के रूप में सर्वमान्य तरीके से प्रेस या मीडिया को स्वीकार किया गया है। वर्तमान में अगर हम सारी व्यवस्था पर नजर डालें तो पता चलता है कि लोकतंत्र के इस चौथे स्तम्‍भ ने बाकी तीनों स्तम्भों पर हावी होने की कोशिश की है। वर्तमान में मीडिया अपना जो चेहरा पेश कर रहा है वह अब अपने खतरनाक रूप में सामने आ रहा है। मीडिया अपनी भूमिका को ज्यादा आंक कर एक ऐसी तस्वीर पेश कर रहा है कि लोकतंत्र के बाकी तीनों स्तम्भों की कार्यप्रणाली पर इसका प्रभाव पड़ने लगा है। वास्तव में मीडिया का कार्य है कि वह जनता के सामने सच की तस्वीर लाए और सरकार का जो तंत्र है उसको जनता के सामने प्रस्तुत करे, चाहे वह अच्छा हो या बुरा।