इसी महीने एक तारिख को मजदूर मांग पत्रक के नाम पर दिल्ली के जंतर-मंतर पर एक बड़ी रैली हुई थी। जिसमें छत्तीसगढ़, उत्तर प्रदेश, पंजाब और दिल्ली से मजदूरों का एक बड़ा वर्ग दिल्ली आया था। इनमें सबसे बड़ी संख्या थी, गोरखपुर से आने वाले मजदूरों की। वे संख्या में लगभग दो हजार थे। यह भी उस वक्त हुआ, जबकि उनकी फैक्ट्री का प्रबंधन बिल्कुल यह नहीं चाहता था कि वे लोग दिल्ली आएं। मजदूर दिवस के एक सौ पच्चीसवें साल पर दिल्ली के जंतर मंतर पर इकट्ठे हुए इस मजदूर आंदोलन की खास बात यही थी कि किसी राजनीतिक या गैर-राजनीतिक दल के पास इसका नेतृत्व नहीं था। इस जुटान के संयोजकों ने बताया था कि इस आंदोलन में कई धारा के लोगों की भागीदारी है। वास्तव में इसे देश भर के मजदूरों के सांझा और एकजुट लड़ाई के तौर पर आगे बढ़ाने के प्रयास के तौर पर देखा जा सकता है।

बाज़ार से मीडिया या मीडिया से बाज़ार, ये एक ऐसा सच है जो नि:संदेह मीडिया की खोखली तस्वीर पर कटाक्ष के लिए काफ़ी है। अब जब सभी को अपनी संपत्ति घोषित करने का फ़रमान जारी किया जा चुका है, तो भला ऐसे में पत्रकार या मीडियापर्सन को भी क्यों बख़्शा जाए। आख़िर दूसरे की फटी में जब ये लोग अपनी टांग अड़ा सकते हैं तो फ़िर उनकी भी बखिया क्यों न उधेड़ी जाए, उनके बारे में भी पता लगाया जाए कि उनके पास कितनी अघोषित संपत्ति जमा है। लेकिन बहुत कठिन है डगर पनघट की। आज देश में कितने पत्रकार ऐसे हैं जिन्हें न तो वक्त पर तनख़्वाह मिलती है और न ही वो सुविधाऐं जिनके वो सही मायनों में हक़दार होते हैं, हालात ये हैं कि उन्हें मान्यताप्राप्त बनाने में ही सरकार सालों लगा देती है।

अन्ना ने नयी बहस छेड़ दी है। भ्रष्टाचार मुक्त भारत की कल्पना को लेकर अन्ना के साथ देश ही नहीं, विदेशों में भी लोग फिर से गांधी को याद कर रहे हैं। फेस बुक और दूसरे सोशल नेटवर्किंग साइट पर लोग उलझ रहे हैं। अन्ना का साथ फैशन स्टेटमेंट है, इसीलिए बंद कमरों में तेज एसी के बीच चिंतन मनन करने वाले बुद्धिजीवी बिसलरी की बोतल लिए जंतर मंतर पर कड़ी धूप में आ पहुंचे हैं। एक अंग्रेजी न्यूज चैनल ने जंतर मंतर को भारत का तहरीर स्कावयर बताया है। लग रहा है कि बस अब सब कुछ बदलने वाला है। देश, हम और आप भ्रष्टाचार मुक्त हो जाएंगे। वाकई अच्छा लग रहा है।

आधुनिक तकनीक ने समाचार-पत्रों तथा दूसरे संचार माध्यमों की क्षमता बढ़ा दी है, लेकिन क्या वास्तव में पत्रकारों की कलम ऐसा कुछ लिखने के लिए स्वतंत्र है, जिससे समाज और देश का भला हो? आज जब हम समाचार-पत्र की आजादी की बात कहते हैं, तो उसे पत्रकारों की आजादी कहना एक भयंकर भूल होगी। आधुनिक तकनीक ने पत्रकार के साथ यही किया है, जो हर प्रकार के श्रमिक-उत्पादकों के साथ किया है। वर्तमान में पत्रकार, स्वतंत्र अखबारों के गुलाम बनकर रह गए हैं। दरअसल, 3 मई को प्रेस की आजादी को अक्षुण्ण रखने के लिए विश्व प्रेस स्वाधीनता दिवस मनाया जाता है। हम विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस ऐसे समय मना रहे हैं, जब दुनिया के कई हिस्सों में समाचार लिखने की कीमत पत्रकारों को जान देकर चुकानी पड़ रही है।

पशुपतिजो तुमसे बना है
उसे झुकाओ मत
जरा सम्मान दो
थोड़ी तारीफ करो।

यशवंत जी विप्लव जी का आर्टिकल ढिबरी चैनल का घोषणा पत्र भाग चार पढ़ा. पढ़कर मन इतना दुखी हो गया कि अपने आपको व्यक्त किये बिना नहीं रह सकी। उनका यह विचार दर्शाता है कि मीडिया में काम करने वाली महिलाओं के प्रति उनके विचार कैसे हैं। चूकि मैं भी मीडिया पर्सन हूं, और अच्छी तरह जानती हूं कि मीडिया मे काम करने वाले कुछ पुरुष संकुचित विचारधारा के होते हैं। मुझे लगता है कि विप्लव जी भी कुछ इसी तरह की मानसिकता के शिकार हैं। सब जानते हैं कि आप किसके बारे में बात कर रहे हैं। एक औरत का बहाना लगाकर आप न जाने कितनी औरतों के बारे में गलत बात कह रहे हैं। अगर आज लडकियां वो काम कर रही है, जिसे बडे़ से बड़ा पत्रकार नहीं कर सकता है तो इसमें गलती किसकी है।

सच है मीडिया जगत मल्टीनेशनल कम्पनियों की तरह अकूत कमाई का जरिया तो नहीं जहां साधारण व्यक्ति मालदार बनकर समाज में ख्याति पा सके, लेकिन इस जगत से जुड़े हर व्यक्ति को नौकरशाह हो या नेता, अमीर हो या गरीब हर कोई मान-सम्मान अवश्य देता है। वजह कमलकार बनकर सच्चाई उजागर करने का बेड़ा जो उठाया है। पर यह गुजरे कल की बात ठहरी। अब तो आलम यह है कि जिस सच्चाई को उजागर करने का संकल्प लिया गया था, उसे पत्रकारिता का चोला ओढ़कर शामिल हुए पेशेवर दलालों ने ‘‘मैनेज’’ शब्द से कुचल कर रख दिया है। नतीजतन आज सरकारी महकमों से लेकर सड़कों तक मीडिया बन्धुओं पर जिस तरह रिश्वत के जहर में सने तीरों से हमले हो रहे हैं ऐसे में खुद को पत्रकार बताना ओखली में सर देने के बराबर है।

मनोज कुमारसाल के दो महीने खास होते हैं जिनमें पहला महीना अप्रैल का होता है। इस महीने पंडित माखनलाल चतुर्वेदी, पंडित माधवराव सप्रे और राजेन्द्र माथुर के नाम है तो दूसरा महीना मई का है। मई की पहली तारीख श्रमजीवियों के नाम है जिसे हम मजदूर दिवस के नाम पर जानते हैं। इसी महीने की तीन तारीख को प्रेस दिवस है और तीस मई को हिन्दी पत्रकारिता दिवस मनाते हैं। ये दोनों महीने बेहद अर्थवान हैं, खासकर पत्रकारिता के लिये। यहां मैं मीडिया शब्द से परहेज करने की कोशिश करूंगा क्योंकि मेरा मानना है कि मीडिया का अर्थ पत्रकारिता से एकदम जुदा है।

पंकजझाअभी अपने कुछ दिनों के दिल्ली प्रवास के दौरान लागातार यहां के पत्रकारों-संपादकों के संपर्क में आने, उनसे संवाद का अवसर मिला. निश्चित ही मेरे अपने सरोकार हैं और अपना एजेंडा भी जिसके कारण सबसे मिलना हो रहा था. लेकिन आश्चर्य लगा सबसे बात कर कि किस तरह बिहार से भी बड़े भू-भाग में अवस्थित होकर भी छोटा कहलाने की विनम्रता वाला प्रदेश ‘छत्तीसगढ़’ इन सबकी प्राथमिकता में निचले पायदान पर भी नहीं आता. अगर वे छत्तीसगढ़ के बारे में जानते हैं तो महज़ इतना कि वहां नक्सली अराजकता के अलावा कुछ नहीं है. छत्तीसगढ़ का द्रूत विकास, उसकी अपनी सांस्कृतिक विशेषताएं, शानदार भौगोलिक परिवेश आदि कुछ भी न इनके रूचि का विषय है और न ही उनसे ‘दिल्ली’ का कोई सरोकार.

अरविंद कानपुर भी देश के अन्य प्रमुख और पुराने शहरों की ही तरह से अतिक्रमण की समस्या से बुरी तरह ग्रस्त है. शहर आने वाले देश और प्रदेश की जानी-मानी राजनैतिक, सामाजिक और प्रशासनिक पदों पर आसीन अति महत्वपूर्ण व्यक्तिओं को कानपुर आगमन पर इस समस्या के कारण सड़क के 'जाम के झाम'  से अक्सर दो-चार होना पड़ता रहा है. जिला प्रशासन और कानपुर नगर निगम इस समस्या से निजात पाने के लिए तमाम प्रयासों के बावजूद जन-सहयोग की कमी के कारण कभी सफल नहीं हो पाया है. शहर के किसी भी एक मुख्य मार्ग या बाजार को पूरी तरह से अतिक्रमण-मुक्त अभी तक नहीं किया जा सका है.

पवनसहारनपुर। ‘दैनिक जनवाणी’ के वरिष्ठ उप संपादक और अनुभवी पत्रकार पवन शर्मा ने अपनी रचनाशीलता को नया मोड़ देते हुए महत्वपूर्ण उपलब्धि दर्ज की है। उन्होंने हाल में सहारनपुर में आयोजित दो दिवसीय इंटरनेशनल सेमिनार के तहत ‘भारत-आसियान के बीच समझौते : जगी रिश्तों में बहुस्तरीय सुधार की उम्मीद’ विषय पर सम-सामयिक शोध पत्र प्रस्तुत करके यह उल्लेखनीय आयाम स्थापित किया। यूजीसी की ओर से प्रायोजित सेमिनार के समापन समारोह में उन्हें को प्रशस्ति पत्र भी प्रदान किया गया। सहारनपुर के जेवी जैन कॉलेज में गत 12-13 मार्च को इंटरनेशनल सेमिनार का आयोजन हुआ।

श्रवण कुमाररात में 10.30 बजे मैं जंतर मंतर पहुंचा। सुबह की शिफ्ट 8 बजे से शाम 4 बजे तक होती है। इसके बाद काम से विश्वविद्यालय गया था। रात को पहुंचने पर जंतर मंतर पर जोश के साथ हमारा स्वागत किया गया। काफी सारे लोग जो पहले से ही इस मुहिम से जुड़े हुए थे, उनसे मिला.. अन्ना जी आराम करने जा चुके थे. वहीं अनुपम खेर जी ने आन्दोलन को अपने समर्थन पर रुख स्पष्ट करते हुए युवाओं से जुड़ने की अपील की। रात 11.30 बजे आज समाज के ग्रुप एडिटर राहुल देव जी से मिला... यूं तो मैं छोटा आदमी उनसे जान-पहचान नहीं फिर भी जिस गर्मजोशी से वे युवाओं से इस चर्चा में जुटे हुए थे वह काबिले तारीफ था।

भूपेंद्र जीकहते हैं कि कहने पर धोबी गधे पर नहीं बैठता है। मेरा अपना मानना है कि धोबी गधे की सवारी करना ही नहीं जानता, या फिर उसे भय सताता है कि कहीं गधा बिदक गया तो दुलत्ती झाड़ देगा, ऐसे में उसकी इज्जत पर दाग लग जाएगा। कोई जरूरी नहीं कि मेरा मानना आप लोग माने ही। धोबी और गधे की याद क्यों आई, जैसे-जैसे यह आलेख आप सब पढ़ेंगे तो वास्तविकता का ज्ञान हो जाएगा। हुआ यूँ कि मैंने अपने शहर के कुछेक कथित नामीगिरामी पत्रकारों से मौखिक एवं एसएमएस के जरिए आग्रह किया कि वह लोग हमारे वेब पोर्टल के लिए अपने विचार, लेख एवं समस्याएँ भेजें उनका प्रकाशन किया जाएगा और साथ ही अपनी-अपनी नवीनतम फोटो भी दें। बस इसके बाद से उन भाइयों को जैसे साँप सूँघ गया हो। मिलना-जुलना तो दूर सेलफोन के जरिए हैलो तक कहना बन्द कर दिया। अब इसी पर मैंने मंथन शुरू कर दिया।

संजय कुमारआखिर में भ्रष्टाचार के राजा को जेल की हवा खानी ही पड़ी। यह तो होना ही था। 2जी स्पेक्‍ट्रम घोटाला मामला ने देश में भ्रष्टाचार को लेकर एक नई इबादत लिख दी। इस पूरे मामले में जहां राजनीतिक माहौल भ्रष्टाचार की गिरफ्त में दिखा वहीं लोकतंत्र का प्रहरी मीडिया भी राजा के भ्रष्टाचार में फंसा दिखा। राजा व मीडिया के भ्रष्टाचार के खेल को मीडिया ने ही सामने लाया। हालांकि इस भ्रष्टाचार ने मीडिया की जय कर दी है। जय की वजह है मीडिया के शिखर पर बैठे लोग एक्सपोज हुए तो वहीं भ्रष्टाचार से खेलते राजनेता भी जनता के सामने नंगे हुए।

हिन्दी पत्रकारिता में स्त्री धन की बात भले ही कुछ अटपटी लगे मगर ऐसा कुछ हिन्दी पत्रकारिता में लगभग पिछले दो दशक से हो रहा है। सवाल यह भी किया जा सकता है कि जब स्त्री धन है तो फिर दुल्हन कौन है और स्त्री धन क्या है। इसके जवाब में कहा जा सकता है कि दुल्हन सम्पादक हैं और स्त्री धन इनके साथ चिपके रहने वाले पत्रकार। इन सम्पादकों को दुल्हनियां सम्पादक कह सकते हैं। जिस प्रकार नई दुल्हन जब ससुराल जाती है तो अपने साथ बहुत सा सामान उपहार के रूप में ले जाती है, जिसे दहेज या स्त्री धन कहा जाता है। ससुराल से जब उस का सम्बंध विच्छेद होता है तो वह अपने इस स्त्री धन को अपने साथ ले जाती है। अगर कोई सामान ससुराल में रह जाता है तो उसे या तो किसी कोने में उपेक्षित कर के डाल दिया जाता है या फिर बड़ी बेदर्दी के साथ उसका इस्तेमाल किया जाता है।

चैतन्‍य भट्ट भ्रष्टाचार के खिलाफ 72 साल के सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे के अनशन और आन्दोलन को भारत भर का मीडिया जबरदस्त कवरेज दे रहा है. इससे यह संदेश देने की कोशिश की जा रही है कि इस देश का मीडिया भ्रष्टाचार के पूरी तरह से खिलाफ है, पर जानने वाले समझते हैं कि अन्ना हजारे को कवरेज देना मीडिया की मजबूरी है, क्योंकि जिस आन्दोलन में लाखों लोग स्वंयस्फूर्त जुड़ रहे हों उसकी अनदेखी करना मीडिया के लिये मुष्किल का काम है. वैसे मीडिया को एक मुद्दा चाहिये होता है जो उन्हें दिन भर को मसाला दे दे. मीडिया जिस तरह से अन्ना हजारे के आन्दोलन को समर्थन दे रहा है, उससे मीडिया के भ्रष्टाचार मुक्त होने की तस्वीर बनती है, पर क्या यह सचाई है?