कांग्रेस मुख्यालय में जनार्दन द्विवेदी को जूता दिखाने के मामले में पुलिस,  नेता और पत्रकारों की असलियत एक बार फिर उजागर हो गई। इस मामले से ही आसानी से यह अनुमान लगाया जा सकता है कि आज लोकतंत्र की हालत खराब क्यों है? इस मामले में किस ने क्या भूमिका निभाई और क्या निभानी चाहिए थी? पुलिस, नेता और पत्रकारों की भूमिका पर सवालिया निशान लग गया है। राजस्थान के सुनील कुमार ने पहले द्विवेदी से कोई सवाल पूछा। उसके बाद वह द्विवेदी के पास गया और जूता निकाल कर उनको दिखाने लगा। द्विवेदी इस पर कोई प्रतिक्रिया व्यकत करते इसके पहले ही एक पत्रकार आगे बढ़ा उसने सुनील को पकड़ा और उसकी पिटाई करने लगा,  यह देख कर कुछ और पत्रकार भी सुनील को पीटने लगे। न्यूज चैनलों में यह दिखाया गया कि सुनील को पीटने वालों में कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह भी शामिल थे।

न्‍यूज चैनल कितनी गलत सूचनाएं देते हैं और खबरें दिखाते हैं इसकी बानगी है हथिनी कुंड बैराज. पिछले दिनों टीवी चैनल दिखा रहे थे कि जल्‍द ही दिल्‍ली में यमुना से छोड़ा गया पानी दाखिल हो जाएगा और बाढ़ आ जाएगी. लोग डूबने लगेंगे. तमाम तरह की हवाई कल्‍पनाएं करने लगे थे. मैं भी खबर करने हरियाणा के हथिनीकुंड बैराज के पास स्थित जीरो ग्राउंड पर पहुंच गया. मुझे देखकर हैरानी हुई कि जैसा न्‍यूज चैनल चला रहे हैं वैसा वहां कुछ भी नहीं है. सब कुछ ठीक ठाक है. बाढ़ की कोई आशंका नहीं है. खबर देखकर और वास्‍तविक स्थिति देखकर मुझे काफी कोफ्त हुई चैनलों में मची अंधेरगर्दी पर, जो बिना सत्‍यता जांचे सबसे पहले खबर दिखाने के फेर में गलत सूचनाएं देकर लोगों को आतंकित करते रहते हैं.

जौनपुर : पत्रकारिता में महिमामण्डन से बचने की जरूरत है। किसी व्यक्ति विशेष के विषय में उसकी विशेषता को उसके कार्य क्षेत्र में ही पत्रकार दर्शित करें। अमिताभ बच्चन को मीडिया ने सिने महानायक की जगह सदी के महानायक के रूप में स्थापित कर दिया जो कि औचित्यपूर्ण नहीं हैं. इस सदी में अन्य क्षेत्र में भी बहुत से महानायक हुए हैं उनको नजर अंदाज़ किया किया गया हैं. लेखन में शब्दों का बहुत महत्व हैं उसके चयन में सावधानी बरतने की आवश्यकता हैं. उक्त बातें बतौर मुख्य अतिथि वीर बहादुर सिंह पूर्वांचल विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो.सुन्दर लाल ने कलेक्ट्रेट स्थित पत्रकार भवन में हिन्दी पत्रकारिता दिवस पर आयोजित 'हिन्दी पत्रकारिता के समक्ष चुनौतियां' विषयक संगोष्ठी में कही.

उत्तर प्रदेश में एक मीडिया कर्मी के साथ पुलिस की बदसलूकी ने एक बार फिर ये सवाल खड़ा कर दिया है कि सत्ता और प्रशासन वाले मीडिया के लोगों को आखिर समझते क्या हैं? ये सवाल इसलिए भी ज़रूरी है क्योंकि उसके बाद ही मीडिया वाले अपना बचाव कर सकते हैं. लेकिन इससे भी बड़ा सवाल मेरे नज़दीक ये है कि खुद मीडिया वाले अपने आपको क्या समझते हैं? मेरे दोनों सवालों पर ढेर सारे सवालात उठ सकते हैं. खासतौर से ऐसे समय में जब मीडिया वाले अपने ऊपर हुए हमले की निंदा करने और दोबारा ऐसी हरकत ना हो, उसे सुनिश्चित करने के लिए धरना प्रदर्शन कर रहे हैं. लेकिन इन हालात में भी सवाल उठाने का साहस मुझे मीडिया के दस वर्षों से भी ज्यादा के तजुर्बे ही ने दिया है.

विनय बिहारी सिंहआजकल भड़ास4मीडिया पर पत्रकारों की नैतिकता पर कुछ टिप्पणियां पढ़ीं। मैं भी मानता हूं कि पत्रकारों में नैतिकता होनी चाहिए। धन लेकर खबर को तोड़ना- मरोड़ना नहीं चाहिए, किसी की झूठी तारीफ नहीं करनी चाहिए, किसी की चापलूसी नहीं करनी चाहिए और किसी से डरना नहीं चाहिए। लाभ- लोभ से दूर जनहित में काम करना चाहिए। लेकिन आप इसका क्या करेंगे कि आजकल अनेक नए लड़के (सभी नहीं) पत्रकारिता में कैरियर बनाने आते हैं। और आजकल कैरियर का अर्थ हो गया है नैतिक रूप से या अनैतिक रूप से ऊपर जाने वाली सीढ़ी को फलांगते जाना। सारी बाधाओं को खत्म करते जाना।

विष्‍णु गुप्‍तपत्रकार हैं या कांग्रेसी रखैल गुंडे? पत्रकार है या फिर अपराधी? पत्रकार हैं या फिर दलाल? पत्रकार हैं या फिर पैरोकार हैं? कोई भी पत्रकार क्या कानून को अपने हाथ में ले सकता है और वह भी एक अपराधी के रूप में? अगर पत्रकार अपराधी की तरह कानून को अपने हाथ में लेकर मानवाधिकार हनन जैसा खेल खेलने लगे और वह भी सत्ता धारी कांग्रेस पार्टी को खुश करने के लिए तो ऐसे पत्रकारों को क्या क्या कहा जाना चाहिए? कोई एक-दो पत्रकारों ने अपनी अपराधी प्रवृति दिखायी होती तो शायद इतना बड़ा सवाल न उठता। एक दो नहीं बल्कि दर्जनों पत्रकारों ने एक साथ मिलकर क्रूरता की हदें लांघी/मानवाधिकार का गला घोटा/भारतीय दंड संहिता कानून का मखौल भी उड़ाया।

: जर्नलिज्म की हालत आज बांसुरी की तरह : जिस तेजी के साथ जर्नलिज्म में लोग आ रहे हैं उतनी ही तेजी के साथ इसको छोड़ने वालों की भी कमी नहीं है। आज जर्नलिज्म में सिर्फ़ वही टिक सकता है जिसके लिंक अच्छे हों, चाहे उसे जर्नलिज्म की समझ हो या न हो। मैं ऐसा इसलिए कह रहा हूं कि मेरे सामने न जाने कितने लोगों ने इस फील्ड को अलविदा कह दिया और कुछ ऐसे हैं जो जल्द ही इसे अलविदा कहने के मूड में हैं। उनका साफ़तौर पर कहना है कि इस जर्नलिज्म के चक्कर में कहीं वो बर्बाद न हो जाएं, ऐसा इसलिए कि उन्होंने जर्नलिज्म का बाहरी रूप देखकर इसे अपनाने का फैसला तो कर लिया मगर इसकी ज़मीनी हकीकत को नहीं पहचाना। जिसने जितनी जल्दी इसे पहचान लिया वो कामयाब हो गया मगर कुछ ऐसे हैं जो हार मानने को तैयार नहीं है।

मुंबई के पत्रकार जेडे की निर्मम हत्या के कारणों को लेकर कयासों और अटकलों का दौर जारी है.  मुंबई पुलिस कई एंगल से हत्याकांड की जांच कर रही है. हत्याकांड में अंडरवर्ल्‍ड का नाम भी सामने आ रहा है,  लेकिन ये पहला मामला नहीं है जब किसी खबर को लेकर मुंबई के किसी क्राईम रिपोर्टर को निशाना बनाया गया हो.  इससे पहले भी पत्रकार अपनी ख़बरों के कारण माफिया का निशाना बनते रहे हैं.  मुंबई के जाबांज पत्रकार जेडे अब हमारे बीच नहीं रहे,  लेकिन इस जाबांज पत्रकार की निर्मम हत्या से एक बार फिर से मुंबई में क्राईम रिपोर्टर्स यानी की अपराध जगत की ख़बरें देने वाले पत्रकारों की सुरक्षा पर सवाल खड़े हो गए हैं,  लेकिन ये पहला मामला नहीं है जब मुंबई में किसी पत्रकार को माफिया ने अपना निशाना बनाया हो.

इस शीर्षक को पढ़कर आप सोच रहे होंगे कि मैं कैसी बेतुकी बातें कर रहा हूं। भला महेंद्र सिंह टिकैत को सत्य सांई बनने की क्या जरूरत है। टिकैत एक किसान नेता थे और सांई प्रख्यात संत। सांई में आस्था रखने वालों में बड़ी-बड़ी हस्तियां शामिल थी। वहीँ टिकैत अभाव में जी रहे किसानो क़ी आवाज़ थे। सांई लोगों क़ी नज़रो में भगवान और टिकैत मामूली नेता किसान। फिर एक किसान को संत बनने की क्या जरूरत है। पर जरूरत है।  देश के दिग्गज किसान नेता महेंद्र सिंह टिकैत का निधन हो जाता है। उनके निधन की खबर शायद ही किसी न्यूज चैनल की ब्रेकिंग खबर बन पाती है। किसी ने भी इस खबर को अपने तेज-20 या 100 में जगह देना उचित नहीं समझा।

असम और पूर्वोत्तर में कार्य कर रहे पत्रकारों की सुरक्षा पर चिंता व्यक्त करते हुए इंडियन फेडरेशन आफ वर्किंग जर्नलिस्ट के महासचिव परमानंद पांडेय ने कहा है कि असम के साथ पुर्वोत्तर के अन्य राज्यों में कार्यरत पत्रकारों की सुरक्षा के लिए यहां की सरकारों को गंभीरता से विचार करनी चाहिए। उन्होंने कहा है कि मुख्यमंत्री तरुण गोगोई की सरकार को पश्चिम बंगाल, मध्यप्रदेश, छतीसगढ़ और यूपी के साथ अन्य कई राज्यों की तरह यहां के पत्रकारों के लिए पेंशन और बीमा सुरक्षा योजनाएं लागू करनी चाहिए। ताकि लोकतंत्र के चौथे स्तंभ की रक्षा में लगे लोगों का कल्याण हो सके।

मनोज कुमारविकीलीक्स की पत्रकारिता जनसरोकार की न होकर खोजी पत्रकारिता का आधुनिक चेहरा है बिलकुल वैसा ही जैसा कि कुछ साल पहले तहलका का था। विकीलीक्स और तहलका के होने का अर्थ अलग-अलग है। तहलका खोजी पत्रकारिता का भारतीय संस्करण है और उसका रिश्‍ता खोजी होने के साथ-साथ जन के सरोकार का भी था। उसके निशाने पर तंत्र और राजनेता, अफसर थे तो इसका अर्थ समाज को दिशा से देने से था, किन्तु विकीलीक्स का होने का अर्थ कुछ और ही है। पहला तो यह कि विकीलीक्स हमारी भारतीय पत्रकारिता से बिलकुल अलग है। अचानक उदय हुए इस इंटरनेटिया पत्रकारिता ने कई देशों की नींद उड़ा देने के बाद भारतीय तंत्र को भी भेदने की कोशिश की है। कहना न होगा कि वह कई मायनों में कामयाब भी रहा है। विकीलीक्स की पत्रकारिता पर संदेह नहीं किया जा सकता है और न ही किया जाना चाहिए।

इस रहस्य को समझ पाना बेहद कठिन है कि नए अखबार खोलने वाले संस्थानों पर आयकर विभाग के छापे क्यों पड़ जाते हैं,  इस रहस्य को बूझने के लिए गहन चिंतन करना पड़ेगा। हाल ही बसंल ग्रुप पर पड़े आयकर विभाग के छापों ने इस रहस्य को और भी ज्यादा गहरा दिया है। बंसल न्यूज आरंभ हुए कुछ ही दिन हुए हैं और यहां छापे पड़ गए। इसके पहले पीपुल्स समाचार के साथ भी यही हुआ था अखबार चालू हुआ और छापा पड़ गया। इसके पीछे यही कारण हो सकता है कि इन संस्थानों द्वारा अखबार यह सोचकर निकाला गया कि अब उनकी तरफ कोई भी झांक नहीं सकेगा लेकिन आयकर विभाग ने ऐसे लोगों का मुगालता सबसे पहले दूर कर दिया।

मेरी कोई जाती दुश्मनी नहीं है.. प्रभु चावला से। न कभी होगी। यह दुर्भाग्य है,  देश के उन संस्थानों का जो नई पीढ़ी को बताने और सिखाने के लिए इस तरह के पत्रकारों से उन्हें रु-ब-रु कराया जाता है। देश में सुरेश डुग्गर। राम बहादुर राय। और भी बहुत पत्रकार हैं। जो नई पीढ़ी को सही दिशा और ज्ञान के अलावा पत्रकारिता की पवित्रता को समझा सकते हैं। लेकिन नहीं। हालांकि प्रभुजी तो सीधी बात करते रहे हैं...। मैं भी सीधी बात करता हूं... हिम्मत हो तो आएं आगे.. मीडिया के वो मठाधीश... दे जबाब उन लाखों स्ट्रिंगरों का। जो जान पर खेलकर स्टोरी करते हैं। और उसमें स्‍ि‍क्रप्‍ट के साथ शब्दों से थोड़ा उलटफेर करके एअरकंडीशन में बैठने वाले टीआरपी बटोरते हैं। प्रमोशन भी ले लेते हैं। कोई नहीं आएगा सामने। लेकिन एक शर्त है.. जो सामने आए उसमें एक पवित्रता होनी चाहिए..।

हरदोई के सुन्‍नी में 30 मई को 'हिन्दी पत्रकारिता दिवस'  मनाया गया। जिसमें पत्रकारों, समाजसेवियों ने पत्रकारिता पर अपने विचार व्यक्त किए। एक स्वर से साफ और स्वच्छ पत्रकारिता करने के लिए पत्रकारिता के इतिहास को दोहराया गया। मुख्य अतिथि ने हिन्दी पत्रकारिता की तुलना माँ के प्यार दुलार से कर उसको खूब दुलराया गया। पत्रकारिता के मूल्यों पर गम्भीरता से चर्चा हुई। टावर प्लाट सुन्नी में आयोजित 'हिन्दी पत्रकारिता दिवस'  पर पत्रकारों ने अपने मन की भड़ास निकाली। कार्यक्रम में मुख्य अतिथि प्रभारी चिकित्साधिकारी कछौना डा. आरपी दीक्षित ने 'निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल'  का अर्थ बताते हुए कहा कि अपनी भाषा का प्रचार प्रसार विस्तार ही विकास की जड़ है। आज इस जमाने में कितना भी हिन्दी का प्रभाव कम हुआ हो उसके बावजूद सबसे ज्यादा हिन्दी भाषी अखबार ही पढ़े जाते हैं।

एक क्रार्यक्रम में भारत-नेपाल के पत्रकारों को बुलाया गया था। उस कार्यक्रम में हम भी संयोगवश बिन बुलाये शामिल हो गये थे। इसी कार्यक्रम में नेपाल के एक प्रतिष्ठित पत्रकार और सौभाग्य से हमारी अच्छी मित्र श्रृजना आर्चाय ने वहां सभा में बोलते हुए एक सवाल उठा दिया। उन्होंने कहा कि यहां बहराइच से कोई महिला पत्रकार क्यों नही दिखाई पड़ रही हैं। श्रृजना ने आगे भी महिलाओं के उत्थान और उनके शोषण के बारे में कहा। परन्तु हमारा ध्यान उनकी इसी बात पर उलझकर रह गया। हमने सोचा या तो उन्हें भारत की पत्रकारिता में बहराइच का स्थान मालूम नहीं हैं। या नेपाल की पत्रकारिता में महिलाओं को कोई विशेष आरक्षण प्राप्त है।परन्तु उनका प्रश्न तो अपनी जगह एकदम सही है। यहां जिलों की पत्रकारिता में महिलायें क्यों नही आती हैं।

आनंद सिंहअयोध्या प्रवास और वहां से लौटने के बाद यशवंत जी आपने जो कुछ लिखा उसे पता नहीं कितनों ने पढ़ा, नहीं पढ़ा पर मैंने पढ़ा (पढ़ने के लिए क्लिक करें- अयोध्याकांड : पत्रकारिता दिवस यात्रा वाया मच्छर से लिंग तक) और यकीन जानें शिद्दत से पढ़ा। यशवंत जी, आपका दर्द है कि आप 10 फीसद करप्ट हैं। मैं बेहद उद्वेलित हुआ। यह लगभग वैसा ही है कि दोनों सलामत आंखों वाला बंदा अपनी एक आंख में इसलिए गरम सलाखें घुसेड़ ले क्योंकि सारे लोग अंधे हैं। सच में, मैं मर्माहत हूं। मुझे पता है कि यशवंत जी करप्ट नहीं हैं। पर, मैं कौन होता हूं सर्टिफिकेट देने वाला।