Ravish Kumar : मीडिया के जरिए आपके साथ एक खेल खेला जा रहा है। किसी व्यक्ति की राजनीतिक महत्वकांक्षा के लिए बहुत सारे लोग राष्ट्रवाद की गौ रक्षा में लगा दिए गए हैं। गुजरात के दलितों ने गौ रक्षा का उपाय कर दिया तो अब गौ रक्षकों ने राष्ट्रवाद को गाय बताकर उत्पात मचाना शुरू कर दिया है। आम आवाम को यह बात देर से समझ आएगी, लेकिन तब तक वह सियासी खेमों की बेड़ियों में इस कदर जकड़ दिया जाएगा कि निकलना मुश्किल हो जाएगा। शिकंजों के जोर से उसके पांव लहूलुहान होंगे मगर वह आज़ाद नहीं हो पाएगा।

देश के चैथे स्तम्भ के रूप में स्थापित मीडिया की स्वतन्त्रता पर लगातार हमले बढ़ने की घटनायें आये दिन सामने आ रही हैं। जिसमें कहीं पत्रकारों की हत्यायें की जा रही हैं तो कहीं उन्हें जेल भेजा जा रहा है। केन्द्र में भाजपा की सरकार हो या फिर दिल्ली में केजरीवाल अथवा यूपी में सपा की सरकार हो या फिर विपक्ष में बसपा सुप्रीमो मायावती, प्रशासनिक अफसर, पुलिस से लेकर माफिया तक हर कोई मीडिया पर हमला करने में जुटा हुआ है। हालत यह हो गयी है कि अब सोशल मीडिया पर जनता भी पत्रकारों को गाली देने में किसी से पीछे नजर नहीं आ रही है। इस हमले के लिये क्या एक तरफा वही लोग जिम्मेदार हैं जो मीडिया पर हमला बोल रहे हैं या फिर स्वंय मीडिया भी इसके लिये जिम्मेदार है? पुराने पत्रकार मानते हैं कि इसके लिये सर्वाधिक 60 प्रतिशत मीडिया के लोग ही जिम्मेदार हैं जिन्होंने अधिक धन कमाने की चाहत में मीडिया की पूरी साख ही सट्टे की भांति दाव पर लगा दी है। जो धन के बदले (विज्ञापन, लिफाफे के नाम पर) मदारी के बंदर की तरह नाचने लगते हैं।

पाकिस्तानी विदेश मंत्री हिना रब्बानी खार 26 जुलाई को भारत दौरे पर आईं और भारतीय विदेश मंत्री एस एम कृष्णा सहित विभिन्न भारतीय नेताओं से कई दिनों तक द्विपक्षीय मुद्दों पर बातचीत की। भारतीय मीडिया ने हिना रब्बानी के इस दौरे में काफी दिलचस्पी दिखाई और विशेषकर उन्हें खासी तरजीह दी। चाहे वह प्रिंट मीडिया हो, चैनल हों या फिर इंटरनेट का न्यू मीडिया। हर जगह हिना रब्बानी छाईं रहीं। अखबारों में छपने वाले कार्टूनों में भी इन तीन दिनों उनको खूब तरजीह मिली। यही नहीं विभिन्न सोशल नेटवर्क साइटों पर भी हिना की ही चर्चा होती रही। हिना की बड़ी बड़ी तस्वीरों को अखबार के पन्नों पर जगह मिली। लेकिन अधिक चर्चा हुई हिना रब्बानी के खूबसूरती, उनके फैशन सेंस आदि को लेकर।

भोपाल। मध्य भारत वर्किंग जर्नलिस्ट यूनियन की शुक्रवार को स्वाराज भवन में पहली कार्यकारिणी की बैठक आयोजित की गई। बैठक में शहर के सभी प्रमुख मीडिया संस्थान के सदस्य शामिल हुए जिसमें इस बात पर जोर दिया गया कि पत्रकारों की सुरक्षा, स्वास्थ्य और बीमा जैसी योजनाओं का लाभ मिले साथ ही जो पत्रकार अधिमान्यता के लिए सालों से परेशान हैं उन्हे सरकार द्वारा कैसे अधिमान्यता दिलाई जाय इन सभी विषयों पर चर्चा की गई। बैठक में विधानसभा अध्यक्ष सीताशरण शर्मा और स्वास्थ्य मंत्री रुस्तम सिंह ने भी हिस्सा लिया।

पत्रकारिता जगत में पत्रकारों के मठाधीश छोटे पत्रकारों पर रोब गालिब करते नहीं थक रहे हैं.  देखने में आ रहा है कि पत्रकार संगठन व समाचार पत्र समूह भी इन मठाधीशों के चलते अछूता भी नहीं रहे... जनपदों में समाचार पत्रों के कार्यालयों में गुटबाजी आम हो गयी है,  चाहे वह बड़े समाचार पत्र हो या मझोले,  सभी जगहों पर पत्रकार मठाधीश की तूती बोल रही है... यदि कोई छोटा पत्रकार इन कतिपय मठाधीशों के कहने पर नहीं चल रहा तो उसके खिलाफ मठाधीश रणनीति बनाने से नहीं चूक रहे हैं,  जिस वजह से छोटे पत्रकार समाचार पत्रों के कार्यालयों में घुटन महसूस कर रहे है.  वहीं समाचार समूह के जिम्मेदार लोग मठाधीशी प्रथा को समाप्त करने में अपने को असहाय महसूस कर रहे है, अगर ऐसा ही रहा तो वह दिन दूर नहीं जब समाचार पत्रों में छोटे पत्रकारों का रहना मुश्किल हो जाएगा.

Date: 15-7-2016

To,

The Chief Secretary

Govt. Rajasthan

Sub: Non compliance of the orders of Hon’ble Supreme Court of India by the officials of the labour department at Jaipur Rajasthan.

Sir,

 

साथियों आप तो सब कुछ जानते हैं आपको लेख लिखकर बताने और समझाने की जरूरत नहीं। यह लेख उन लोगों के लिए लिख रहा हूं जो पत्रकारिता से बहुत प्रभावित रहते हैं। ईमानदारी से न्याय प्रिय, कर्तव्यनिष्ठ पत्रकारिता की बात कर स्वस्थ समाज के निर्माण के समर्थक हैं। समाज की हर समस्या पर लगभग रोज समाचार प्रकाशित होते हैं। फिर भी पत्रकारों की समस्याओं को छापने के लिए अखबारों में स्थान क्यों नहीं मिलता। ग्लैमर वाली इस पत्रकारिता की दुनिया पर चर्चा करें। तो इसमें ग्रामीण पत्रकारिता उसी तरह है जिस प्रकार शहरी जीवन और ग्रामीण जीवन है। यहाँ के पत्रकारों के लिए सुविधाओं और साधनों का टोटा है। जो पत्रकारिता जगत में थोड़ी भी पहचान बनाने में कामयाब रहा वह शहर जाकर ही अपना कैरियर बनाता है। जिससे ग्रामीण क्षेत्रों में अच्छे पत्रकार नहीं टिक सके।

मेनस्ट्रीम मीडिया पर चल रही जाकिर स्टोरीज पर सुदर्शन चैनल तीन साल पहले ही कर चुका है गंभीर चर्चा

ईस्लामिक तकरीरों को लेकर मुस्लिम धर्मगुरू डॉ. जाकिर नाईक के जिन वीडियो के आधार पर न्यूज चैनल रोजाना सनसनीखेज खबरें परोस रहे हैं वे वीडियों पिछले पिछले कई सालों से यूटयूब पर मौजूद थे । बांग्लादेश में मारे गये आतंकियों से जाकिर की इन प्रेरणादायी तकरीरों के कनेक्शन की खबरों के बाद ही जाकिर साहब भारतीय मीडिया की नजरों में क्यों चढ़े ? यह बड़ा सवाल है । क्या इससे पहले मैनस्ट्रीम मीडिया सोई हुई थी।

समाज में चौथा स्तंभ का दर्जा हासिल है मीडिया को। बहुत पावरफुल है मीडिया। मीडिया की आड़ में कुछ भी किया जा सकता है। खासकर ऐसा कार्य, जिसे सामान्य तरीके से अंजाम नहीं दिया जा सकता है। इसमें भले ही किसी तरह का कुकृत्य हो या दलाली। इस तरह का अवैध कार्य केवल बड़े शहरों में ही नहीं बल्कि छोटे-छोटे शहरों में भी मीडिया की आड़ में धड़ल्ले से हो रहा है। कुमाऊं का प्रमुख शहर हल्द्वानी भी इसकी चपेट में है। पिछले दिनों सहायक पुलिस अधीक्षक पी रेणुका देवी ने एक सैक्स रैकेट का पर्दाफाश किया। शहर की अच्छी-खासी आबादी वाले कॉलोनी में लंबे समय से जिस्मफरोशी का धंधा चल रहा था। जब इस धंधे में लिप्त महिला संचालक को पकड़ा तो उसने खुलेआम इलेक्ट्रानिक मीडिया से जुड़े एक पत्रकार का नाम लिया। उसने यहां तक कह डाला कि यह पत्रकार पैसा तो लेता था, साथ ही जिस्मफरोशी के धंधे में भी था। इसमें कुछ पुलिस कर्मी भी संलिप्त थे।

सातवें वेतन आयोग की सिफारिशें लागू करने के लिये कैबिनेट की मंज़ूरी मिलते ही केन्द्रीय कर्मचारियों की तन्ख्वाह में बढ़ोत्तरी तो होगी ही साथ ही इसका असर राज्यों के कर्मचारियों की सैलरी पर भी पड़ेगा । केन्द्रीय कर्मचारी इस बात का हिसाब किताब लगाने में जुट गये की उनकी सैलरी में क्या बदलाव आयेगा । कुछ लोग तो अपनी पुरानी जिम्मेदारियों और कर्ज के बारे में सोचने लगे । कुछ ऐसे भी हैं जो आने वाले समय में क्या नया खरीदेगें और कहां निवेश करेगें इस पर अभी से माथापच्ची करने लगे । खैर अच्छी बात है कुल एक करोड़ लोग ही सही जिनमें कार्यरत और पेंशनभोगी शामिल हैं उनकी तन्ख्वाह बढ़ने से उनके परिवार को फायदा होगा, बच्चों की फीस जमा करने में आसानी होगी, घर की ज़रुरतों पर मन मसोच के नही रहना पड़ेगा और परिवार में किसी की गम्भीर बीमारी की हालत में खर्च करने के लिये दस बार नही सोचना पड़ेगा।

ये उत्तर प्रदेश नहीं पतन प्रदेश है, इस पतन में मीडिया की हिस्सेदारी किसी भी राजनैतिक पार्टी से कहीं ज्यादा है. भ्रष्ट सरकार, अतिभ्रष्ट नौकरशाहों के इस प्रदेश में मीडिया की नयी फसल तैयार है इस फसल में आपको पत्रकार भी मिलेंगे, अखबार भी मिलेंगे और वो सभी साजो समान भी मिलेंगे,  जिनसे अखबार सिर्फ और सिर्फ बाजार की चीज बनकर रह जाता है. यकीन न आये तो लखनऊ से प्रकाशित जनसंदेश टाइम्स और डेली न्यूज एक्टिविस्ट में पिछले एक सप्ताह से छापी जा रही प्रथम पेज की ख़बरों को देख लें. एक्टिविस्ट ने अपने प्रथम पृष्ठ पर विवादित और प्रदेश के महाभ्रष्ट मंत्रियों में शुमार बाबू सिंह कुशवाहा के महासचिव पद से हटाये जाने और मुख्यमंत्री द्वारा उनसे किनारा कस लेने के सम्बंध में एक खबर छापी, ठीक अगले ही दिन जनसंदेश टाइम्स ने बसपा के हवाले से इस खबर का खंडन छापा ही एक्टिविस्ट के पत्रकारिता को लाल बुझक्कड़ी करार दिया.

हाल ही में अमर उजाला ने ट्रेनी पत्रकारों की भर्ती हेतु एक विज्ञापन प्रकाशित किया, जिसमें उसने 23 साल तक के ऐसे नवयुवकों और युवतियों से आवेदन मांगे हैं, जो किसी भी विषय से केवल स्‍नातक हों और पत्रकारिता में आने का जज्‍बा रखते हों। पत्रकारिता में डिग्री डिप्‍लोमा वालों को आवेदन करने के लिए साफ मना कर दिया गया। पत्रकारिता प्रशिक्षण को लेकर यह बेरुखी सिर्फ अमर उजाला ही नहीं बल्कि कई बड़े अखबारों के संपादक दिखा चुके हैं। हालांकि यह पहला मामला है जब किसी अखबार ने खुले तौर पर पत्रकारिता प्रशिक्षण देने वाले संस्‍थानों को चुनौती दी है।

मजीठिया वेज की रिपोर्ट पर देश के एक बड़े अखबार प्रतिष्ठान दैनिक जागरण का विधवा प्रलाप देखने लायक है। समूह मालिकानों के पेट में उठ रहे मरोड़ का दर्द बाहर छलकने लगा है। नंबर वन का तमगा लगाकर इतराने वाले अखबार के मालिकान सरकार से नंबर वन कैटेगरी की सुविधाएं व छूट तो लगातार बटोरते हैं पर कर्मचारियों को थर्ड क्लास का वेतन, सुविधाएं देने में इनकी नानी काहे को मरती है। दैनिक जागरण ने 21 जून को संपादकीय पेज पर मुख्य फीचर लिया है। जागरण समूह के कार्यकारी अध्यक्ष संदीप गुप्ता ने इसमें एक पक्षीय तर्क और अनाप-शनाप उदाहरण देकर न सिर्फ एक नई बहस को जन्म दिया है बल्कि अपनी दोगली नीयत को जगजाहिर भी कर दिया है।

हिंदी भाषियों के विरोधी और मराठी नागरिकों के तथाकथित नेता राज ठाकरे गुजरात दौरे पर जा रहे हैं.  इस दौरान गुजरात के विकास कार्यो पर चर्चा करेंगे और कई लोगों से मुलाकात करने वाले हैं. इस दौरान गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात भी करने वाले हैं. हम बताना चाहते हैं कि जब से राज ठाकरे ने शिवसेना छोड़ कर अपनी नयी पार्टी मनसे बनाई तभी से हिंदी भाषी लोगों का विरोध करना शुरू किया है.  इस से पहले जब शिवसेना में थे तब भी हिंदी भाषी पत्रकारों द्वारा हिंदी में सवाल किए जाने पर जवाब मराठी में ही देते आ रहे हैं,  जब कि उन्हें हिंदी बहुत अच्छी आती है.

इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के विस्तार, जल्दी ख़बरें पेश करने और दृश्यों की प्रधानता ने अख़बारों को सोचने पर मजबूर कर दिया। न्यूज़ चैनलों के मार्केट में आने से न सिर्फ़ अख़बार के पाठकों की संख्या में कमी आई बल्कि पाठकों ने उन अख़बारों को तरजीह देना शुरू कर दिया जो अपने आप में संपूर्णता परोसते हैं। उन्हें ख़बरों में भी मनोरंजन नज़र आने लगा। ऐसे में अख़बारों के सामने नई चुनौती पेश आ गई, कुछ बड़े ब्रांड ने हाथों-हाथ अपने कंटेंट में परिवर्तन कर लिया और कुछ ने मार्केट में रिसर्च कर ये पता लगाने की कोशिश की कि आख़िर सुधी पाठक इस कंपटिशन के दौर में कैसी ख़बरें पढ़ना पसंद करते हैं। ज्यादातर अख़बारों ने न सिर्फ़ अपना क्लेवर बदला बल्कि अपनी ख़बर को पेश करने का अंदाज़ भी बदल डाला, आख़िर मार्केट में जो टिके रहना था। कुछ अख़बारों ने अपनी भाषा में आम बोलचाल यानी हिंग्लिश को तरजीह दी तो किसी ने अपनी भाषा को हिंदी के साथ-साथ दूसरी भाषाओं के शब्दों को अपनाने से भी गुरेज़ नहीं किया।

संजय कुमार सरकारी मीडिया को गरियाने का पुराना रिवाज रहा है। गाहे-बगाहे सरकारी मीडिया को गरियाने वाले लोग भले ही किसी न किसी रूप में सरकारी मीडिया से फायदा उठाते रहते हैं। वर्षों से सरकारी मीडिया के कार्यकलाप को लेकर खिंचाई होती रही है। लेकिन सरकारी बनाम निजी मीडिया की असलियत जनता जान चुकी है। वह जानती है कि कौन कितना सच खबर देता है। निजी मीडिया पर अपुष्ट खबरों के प्रकाशन व प्रसारण पर सवाल उठते रहते हैं लेकिन सरकारी मीडिया के साथ यह नौबत नहीं आती।