प्रिय साथियों

अभी कुछ दिनों से फेसबुक और पी गुरु जैसे सोशल साइट पर हम लोगों के महान नेताओं महाबीर सिंह यादव और जान गान्साल्वेज के क्रिया कलापों के बारे में प्रमाण सहित काफी जानकारी उपलब्ध कराइ गयी। जैसे फेडरेशन की सम्पत्ति बिना सभी सदस्यों की जानकारी के अपने बेटे के नाम पर करा लिया और दूसरे नेता पीटीआई मुम्बई में रहते हुए अपनी ब्यक्तिगत कम्पनी चला रहे ह ।जो लगभग शतप्रतिशत सही प्रतीत होती है। यह लोग लगभग 3 से 4 साल पहले रिटायर होने के बावजूद फेडरेशन के महत्वपूर्ण पदों पर लोंगों को अन्धेरे में रखकर बने हुए हैं । इसीलिए यह लोग पिछले 3-4 सालों से लगभग सभी पुराने तथाकथित दलाल एवं प्रमोद गोस्वामी; सुरेश अखैारी जैसे भाडों को कशीदें करने के लिये फेडरेशन की मीटींगों मे बुलाया जाता है जिससे मीटींग में पहुॅचकर इन महान नेताओं के बारे में भाषणबाजी करें और बाकी सभी सदस्यों को गुमराह करके अपना उललू सीधा करते रहे।

खाली अंटी पहुंचे इस फटीचर के पास आर्शीवाद और मर्म से जन्मी शुभकामनाओं के अलावा कुछ है भी तो नहीं देने के लिए । इस लिए हे - यशवंत , तेरा तुझ को ही अर्पण...

ज्वालामुखी से निकला जीवाश्म जिसके यशवंत बनने की कहानी , ब्रह्माण्ड में जीवाश्म से मानव बनने की कहानी से कम रोचक नही है । उन्हीं के शब्दों में ------

“ मेरे पास दुनयाबी होने लायक कोई वजह नहीं थी । सो सच-झूठ , युद्ध-शान्ति , भला-बुरा , धर्म-अधर्म , जीवन-म्रत्यु आदि के परम्परागत विवादों से दो चार होते , सीखते एक दिन ऐसा आया , तय कर लिया कि अब नौकरी नही करनी । अमर उजाला , दैनिक जागरण और आईनेक्स्ट अखबारों में 12 - 13 साल नौकरी करचुक था । ट्रेनी पद से लेकर संपादक तक का सफ़र तय करने के बाद , नौकरी नही करनी ? ईमानदारी , आदर्श , कठोर मेहनत , दुस्साहस , अराजकता , लफंगई-लंठई ---- आदि के छोरों-दायरों में घूमता-तैरता एक वक्त ऐसा आया जब मेनस्ट्रीम  मीडिया में मेरे लिए जगह नहीं थी । अब नौकरी नहीं के संकल्प के साथ , अंतःविरोधी स्वभाव और अबूझ उदंडता के कारण मै खुद के लिए पहेली बनता गया । एक दिन ऐसा आया कि तय कर लिया जो मन में है उसे करो , बको ,निकालो जो द्वन्द है उसे प्रकट करो , सुनाओ , चिल्लाओ ---और ये सब खुल कर करो , खुलेआम करो , नाम-पता-पहचान के साथ करो ।

पिछले सप्ताह ओडिशा के कालाहांडी गांव की एक खबर ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया। दाना मांझी नाम के एक शख्स की दयनीय स्थिति का आलम यह था कि उसे अपनी मृत पत्नी को कंधों पर लादकर 12 किमी तक पैदल चलना पड़ा। मेरी संपूर्ण संवेदानाएं दाना मांझी के साथ हैं। बेचारा मांझी करता भी तो क्या, गरीबी नामक बीमारी से जो ग्रस्त था। दाना मांझी की पत्नी को टीबी की बीमारी थी जिससे वह मर गई लेकिन मांझी तो गरीबी की बीमारी से रोज झूझेगा और हर दिन मरेगा। गरीबी के नाम पर देश में कितने की ढकोसले तैयार किए जाएं लेकिन ये ढकोसले खाली थे, खाली हैं और रहेंगे। क्योंकि इस देश का गरीब केवल वोट बैंक बटोरने का ए मांक जरिया है, इससे ज्यादा कुछ नहीं।

कल्पना करिये... वैसे अब कल्पना करने की जरूरत नहीं। वह दिन दूर नहीं जब बिना कर्मचारी के अखबार छपे, बिना रिपोर्टर के खबरें लिखी जाएं और बिना उप संपादक के संशोधित हो और बिना हाँकर के अखबार आप तक पहुंचे। 29 दिसंबर 15 को भड़ास पर इसी तरह की खबर पढ़ी तो अटपटा लगा। इस खबर के मुताबिक अमेरिका के " दी लांस एंजिल्स टाइम्स" ने रोबोट पत्रकार द्वारा लिखी गयी खबर छापी। यह खबर भूकंप पर थी। पिछले माह (सितंबर 15) चीन में एक रोबोट पत्रकार के होने का पता चला। इस रोबोट पत्रकार ने बिजनेस पर खबर लिखी। इसने 916 शब्दों की खबर एक मिनट में लिखी वह भी बिना गलती के। हां एक बात और इसने खुद आंकड़े जुटाये, तथ्य जमा किये और लोगों के विचार भी लिये।

भोपाल । देश में अब केबल और टेलीविजन पर किसी भी रुप में पशुओं के प्रति क्रूरता या हिंसा चित्रित नहीं की जा सकेगी तथा पशुओं के लिये अपहानि कारित करने वाले अवैज्ञानिक विश्वास को प्रोत्साहित नहीं किया जा सकेगा और न ही इससे संबंधित विज्ञापन दिखाये जा सकेंगे। इस संबंध में केन्द्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने केबल-टेलीविजन नेटवर्क नियम 1994 में संशोधन कर इसे पूरे देश में लागू कर दिया है।

पढ़ा था दबाव में रहने वाला पत्रकार जनता की कभी भी आवाज़ नहीं बन सकता। ऐसे में उसे पत्रकारिता करने की बजाय किसी सरकारी दफ्तर, कॉरपोरेट कल्चर में नौकरी करनी चाहिए। बॉस और मालिक के आगे पीछे, जी हुजूर, तोहफा कबुल है... टाइप कुछ न कुछ कहते रहना चाहिए। तारीफों में कसीदे पढ़ने चाहिए। आज देश के 95 फीसदी मीडिया हाउसेस को कॉरपोरेट सेक्टर ने दबोच लिया है। कॉरपोरेट सेक्टर सत्ता पक्ष से साथ डंके की चोट पर खड़ा है।

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने वाल्मिकी पर सीरियल बनाने वाले प्रोड्यूसर और चैनल को मुकदमा लड़ने का आदेश देते हुए उनकी याचिका खारिज कर दी है. दोनों के खिलाफ वाल्मिकी समाज की ओर से एफआईआर दर्ज कराई गई थी. प्रोड्यूसर राजन सहाय ने वाल्मिकी पर बिदाई नामक टेली सीरियल बनाया था जिसे एक प्राइवेट चैनल ने अगस्त 2009 में प्रसारित किया था. इसके बाद वाल्मिकी समाज के लोगों ने इस पर वाल्मिकी और समाज के अपमान का आरोप लगाते हुए एफआईआर दर्ज कराई. 

पत्रकारिता बिगाड़ रही युवाओं का भविष्य... देश में हर गली के कोने पर खुले पत्रकारिता संस्थान और मीडिया ग्रुप देश के युवाओं का भविष्य बिगाड़ रहे हैं। बुरे दौर से गुजर रही पत्रकारिता पर मनो शनीचर सा छा गया है। बड़े संस्थान बिना जुगाड़, रिफ्रेंस के लेना नहीं पसन्द करते तो छोटे संस्थान अठनी वांट कर युवाओं को पत्रकारिता के नशे का आदी बना रहे हैं। आलम ये है कि अन्याय के खिलाफ आवाज उठाने वाले पत्रकार खुद के साथ हो रहे अन्याय को नहीं रोक पा रहे है। मीडिया संस्थान पत्रकारिता छोड़ व्यवसाय में जुड़ गए हैं। पत्रकारिता की चका चोन्द में फस कर युवा इस ओर आकर्षित हो रहे है। लेकिन ऊंट के मुंह में जीरे के समान वेतन और बिना लेटर के जोइनिग युवाओं का भविष्य बिगाड़ रहा है। देश में पत्रकारों की दैनीय हालत किसी से छुपी नहीं है। कई संगठन पत्रकार हित की लड़ाई लड़ने का दावा भी करते है ,लेकिन धरातल पर बंजर जमीन के अलावा कुछ नही है। गिने चुने संस्थानों के पत्रकारों के अलावा अन्य मीडिया संस्थानों के पत्रकारों की हालत भूखे मरने की है। जो ईमान बेच पाये है वही परिवार पाल रहे हैं।

कुछ मुट्ठीभर लोगों ने देश में ऐसा माहौल पैदा कर दिया है कि आम आदमी का जीना मुश्किल हो गया है। वैसे तो किसान-मजदूर निजी संस्थाओं में काम करने वाले लोग तरह-तरह की परेशानियों से जूझ रहे हैं पर सबसे ज्यादा दयनीय हालत उन मीडियाकर्मियों की है जो दूसरों के हक़ की लड़ाई लड़ने का दम्भ भरते हैं। यह देश की विडम्बना है कि देश और समाज के लिए चलाये जाने वाले मीडिया का इस्तेमाल काफी मीडिया मालिक अपने और अपनी पसंद के दलों के लिए कर रहे हैं। अधिकतर समाचार पत्रों के संपादक मैनेजरों का काम कर रहे हैं। हालत यह है कि कुछ पत्रकारों को छोड़ दो तो मीडिया की कमान दलालों व् कमजोर लोगों के हाथों में है। पैसे के बल पर बड़े स्तर पर अयोग्य लोग मीडिया घराने खोल कर बैठ गए हैं। इन सबके बीच यदि कोई पिस रहा हैं तो वह है स्वाभिमानी कर्त्तव्यनिष्ठ व् योग्य मीडियाकर्मी।

पठानकोट एयरबेस पर हुए आतंकी हमले की कवरेज को लेकर एनडीटीवी पर एक दिन का प्रतिबंध क्या लगा दिया कि देश में बवाल मच गया। मीडिया में हो रहे शोषण को लेकर कोई क्यों नहीं बोलता? अधिकारी अपने कनिष्ठों को अपने घर का नौकर समझते हैं। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद प्रिंट मीडिया मजीठिया वेजबोर्ड के हिसाब से वेतन देने को तैयार नहीं। जिन समूहों ने दिया भी है वह भी सही तरीके से नहीं दिया। मजीठिया मांगने पर विभिन्न समाचार पत्रों से सैकड़ों मीडियाकर्मियों को नौकरी से निकाल दिया गया। सड़कों पर भटक रहे ये मीडियाकर्मी धरना-प्रदर्शन से लेकर कोर्ट तक अपनी लड़ाई लड़ रहे हैं। कोई समाजसेवक कोई नेता और कोई भी पत्रकार इनके पक्ष में बोलने को तैयार नहीं। इस मामले कहां सोये हुए हैं, समाज के ठेकेदार ?

नाथद्वारा : राज्य सरकार द्वारा पत्रकारों को भूखंड आवंटन हेतु पूर्व में उपखंड अधिकारी की अध्यक्षता में कमेटी गठित की गई थी। नगरपालिका के बाबुओं द्वारा आवेदनों की जाँच के नाम फोरी लीपापोती कर जम कर मनमर्जी करते हुए 25 आवेदकों में से कई संपादको व पत्रकारों को नजरअंदाज कर नाथद्वारा के 4 पत्रकार व 3 अधिस्वीकृत पत्रकारों (राजसमंद के भी शामिल)के नाम करोडों रुपयों की कीमत वाली सुखाड़िया नगर की जमीन गोटियां डाल बाँट दी गई थी।

एक दर्जन से ज्यादा लोगों का इस्तीफा.... यूपी/उत्तराखंड चैनल के तथाकथित आउटपुट इंचार्ज और अपने सोसाइटी के RWA प्रेसिडेंट से परेशान हो कर पिछले कुछ दिनों में एक दर्जन से ज्यादा लोगों ने इस्तीफा दे दिया है। इससे ठीक पहले चैनल का पूरा ग्राफिक्स डिपार्टमेंट सामूहिक इस्तीफा दे कर चैनल को अलविदा बोला था। संभावना है कि आने वाले कुछ दिनों में चैनल के कुछ मजबूत स्तंभ भी अपना पिंड छुड़ाकर निकलेंगे। कई चैनलों के कंटेट को चुराकर लगातार प्रयोग के कारण टीआरपी की दौड़ में ये चैनल लंबे वक्त से तीसरे-चौथे नंबर पर हैै।

ये उँची-लंबी, विशालकाय बहुमंज़िला इमारते, सरपट दौड़ती-भागती गाड़ीयाँ, सुंदरता का दुशाला औड़े चकमक सड़के, बेवजह तनाव से जकड़ी जिंदगी, चौपालों से ज़्यादा क्लबों की भर्ती, पान टपरी की बजाए मोबाइल से सनसनाती सभ्यता, धोती-कुर्ते पर शरमाती और जींस पर इठलाती जवानी, मनुष्यता को चिड़ाती व्यवहारशीलता, मेंल-ईमेंल में उलझी हुई दास्तानों और शहरी चाक-चौबंध पर पैबंध लगे पाजामें के लिबास में स्वच्छंदता की ग्रामीण शहनाई भारी हैं| हर रोज मेरे शहर के भीतर एक नया शहर पैदा हो रहा है, सूर्योदय से अधिक रोशनी शहरों की सड़को पर सुबह-सुबह बिखरी मिल जाती हैं | और सूर्यास्त के बाद शहर अपने लिए एक नया सूर्य विकसित कर चुका होता हैं, जहाँ आधुनिक सभ्यताये अपनी भाषा के आईने में अपना व्याकरण गड़ती हैं | इतनी सारी यांत्रिक गतिविधियाँ संचालित होने के बाद भी, शहर के किसी भी आदमी के पास अपना ऐसा चेहरा भी नहीं जो लोगों के लिए चौराहा भी साबित हो सके|

अपनी स्थापना 24 जून, 1991 से अब तक आकाशवाणी कुरुक्षेत्र ने इस क्षेत्र की संस्कृति, इतिहास और सृजनशीलता को न सिर्फ वाणी दी, बल्कि उसे धरोहर के रूप में भी संरक्षित किया है. कितने ही प्रस्तोताओं , कलाकारों, कवियों, वार्ताकारों, अपने विषय के विशेषज्ञों ने इस मंच से अपने को प्रस्तुत किया , अपने अनुभवों को निखारा और आकाशवाणी को भी समृद्ध किया . कुरुक्षेत्र के कितने ही प्रस्तोताओं , कलाकारों और विद्वानों को इस आकाशवाणी ने ही पहचान दिलाई और फिर उन्होंने देश भर में नाम कमाया .शांति से सब व्यवस्थाएं यहाँ काम करती रहीं और कोई नकारात्मक बात यहाँ से कभी सुनने को नहीं मिली।

पत्रकारिता विश्वविद्यालय के शोध केंद्र के रूप में कार्य करेगा प्राच्य विद्या प्रतिष्ठानम, नईदिल्ली

भोपाल । माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल और डॉ. गोस्वामी गिरधारी लाल शास्त्री प्राच्य विद्या प्रतिष्ठानम, नईदिल्ली के बीच शोध कार्य के क्षेत्र को विस्तार देने के लिए संस्थागत सहयोग सहमति पत्र पर हस्ताक्षर किए गए हैं। एमओयू के अनुसार प्राच्य विद्या प्रतिष्ठानम, नईदिल्ली में विश्वविद्यालय के शोध केंद्र के रूप में कार्य करेगा। संस्थागत सहमति पत्र के मुताबिक डॉ. गोस्वामी गिरधारी लाल शास्त्री प्राच्य विद्या प्रतिष्ठानम, नईदिल्ली विशेषकर संस्कृत और प्राच्य ज्ञान की संचार परंपरा के क्षेत्र में माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के शोध केंद्र के रूप में कार्य करेगा। प्रतिष्ठानम दिल्ली राज्य सरकार की पंजीकृत संस्था है और यह शोध के क्षेत्र में कार्यरत है।

To, All Presidents and General Secretaries of State unions, Members of the IFWJ working committee, National Council and special invitees.

Draft Bill on Protection for Journalists... Base paper for debate at Jaisalmer session....

Dear Friends

As promised at the Chennai conference (12 June 2016) here is the Draft Bill on the Protection of Journalists included in the agenda of the 71st session of the Nationl Council at Jaisalmer (23-26 September 2016). As President K. Vikram Rao suggests, the Bill, finalized after the debate, will be handed over personally to the Speaker of the Lok Sabha, Smt. Sumitra Mahajan, and the Chairman of the Rajya Sabha, Shri Mohammad Hamid Ansari, Vice-President, in Parliament House. Member should persuade their area M.P.S. to pursue it in Parliament during the winter session.