एक विचारणीय मुद्दा है 'महिला सशक्‍तीकरण'। इस दुनिया की आधी आबादी महिलाओं की है। महिला मां होती है, बहन होती है, पत्नी होती है, दोस्त होती है, सारे रिश्ते महिलाओं के बिना संभव नहीं हैं, फिर भी आज समाज में महिलाओं की स्थिति बड़ी ख़राब है। आज के समाज में महिलाओं ने ये सिद्ध कर दिया है कि वो तमाम सारे कार्य जो पुरुष कर सकते हैं महिलाये भी कर सकती हैं और पुरुष से बेहतर कर सकती हैं। बात मैं पुरुष या नारी की योग्यता की नहीं कर रहा।बात मैं कर रहा हूं, महिलाओं के संबंध में समाज की और मीडिया के लोगों के नजरिये की। क्या समाज का चश्‍मा पहन कर मीडिया के लोग महिलाओं को देखते हैं? जब महिला सशक्‍तीकरण की बात हो और कुछ मीडिया के जिम्मेदार लोग यह कहते मिले, 'जो दिखता है वो बिकता है' तो स्थिति और आधिक नाजुक हो जाती है। या फिर मीडिया के कुछ लोग ये कहते मिलें, 'लोग जो देखना चाहते हैं, हम उन्हें वही दिखा रहे हैं', ऐसे में ये तो स्‍पष्ट है कि ऐसे लोग नारी के देह की बात कर रहे होते हैं। इनके इस सोच का स्तर इतना निम्न इसलिए होता है क्योकि ये समाज, व्यवस्था, बाजार, व पुरुषवाद के पीछे से इस बात को मंचों से सरे आम कह रहे हैं और इन्हें अपनी इस विकृत सोच पर जरा भी शर्म नहीं आती है।

राजीव हिंदी पत्रकारिता में शोषण अपने चरम पर है. पत्रकारों में कम पैसे पाने का तो अवसाद है ही, साथ में नौकरी जाने की असुरक्षा और प्रोमोशन पाने की इतनी प्रतिद्वंदता है कि कोई किसी की हत्या तक करवा सकता है. ऐसे माहौल में कई पत्रकार घनघोर मानसिक अवसाद के शिकार हैं. यह राष्ट्रव्यापी हिंदी पत्रकारिता की समस्या है. इस समस्या का समाधान कई पत्रकारों को माओवाद में नज़र आ रहा है. बातों-बातों में ऐसे शोषित पत्रकार माओवाद का सहारा लेकर इस पूंजीवादी शोषक मीडिया को खत्म करने की वकालत करते हैं. पत्रकारों का माओवाद समर्थक होना स्वाभाविक है क्योंकि मीडिया में हो रहे शोषण की तरफ से सरकार आँख मूंदे हुए है. लगभग सभी अखबार सरकारी विज्ञापन पाने के लिए सरकार की चमचागिरी में लगे हैं. सरकार की वाहवाही में जुटी हिंदी मीडिया पत्रकारों की उस पीढ़ी को पुरस्कार दे रही है, जो पेड न्यूज जुटाने में माहिर है. जन सरोकार से जुड़ी खबर लेने वाले पत्रकारों को बदले में फटकार और गाली मिलती है और अगर वो नहीं सुधरे तो नौकरी से छुट्टी. ऐसे में कोई ईमानदार पत्रकार माओवादी बन जाय तो इसमें इस सामजिक, राजनीतिक और आर्थिक व्यवस्था का दोष है, जो व्यक्ति को अपराधी बनने पर मजबूर कर रहा है.

पंकजएक सामान्य से सवाल पर गौर कीजिये. रावण से लेकर ओसामा बिन लादेन तक के व्यक्तित्व में कितनी समानता है? सभी काफी संपन्न, अति ज्ञानी, अपने विचारों के प्रति निष्ठावान, समर्पित. किसी के भी इन गुणों पर आप शायद ही किसी को इनकार हो. लेकिन इन तमाम गुणों के होते भी सभ्य समाज में उन सबको हिकारत की नज़र से, समाज पर एक बोझ की तरह ही देखा जाता है. मानव समाज इन तमाम चरित्रों के मौत तक का उत्सव मनाते हैं. यह इसलिए क्यूंकि ज्ञान होते हुए भी उसके अहंकार से ग्रस्त, तमाम विपरीत विचारों के प्रति अव्वल दर्जे का असहिष्णु होना और मानव मात्र को अपने आगे कीड़े-मकोडों से बेहतर नहीं समझना आदि ऐसे अवगुण हैं, जो इंसान को सर्वगुण संपन्न होते हुए भी दुर्गति को प्राप्त होने का कारण बनता है. बात अगर पत्रकारिता या बौद्धिकता का करें तो यहां भी आपको ऐसे समूह मिलेंगे जिनकी विद्वता, निष्ठा या समर्पण किसी में भी उन्हें आप उन्नीस नहीं पायेंगे.

बी पी : राष्‍ट्रीय पत्रकारिता दिवस पर विशेष : परिवर्तन होना आश्चर्य की बात नहीं है, क्योंकि सामाजिक, राजनैतिक, वैज्ञानिक और आध्यात्मिक क्षेत्रों में जैसे परिवर्तन हुए हैं, वैसा ही परिवर्तन पत्रकारिता क्षेत्र में भी हुआ है। श्वेत-श्याम अखबारों से शुरु हुआ सफर रंगीन ग्लेज्ड पेपर तक आ गया है, जिसमें वक्त के साथ अभी और भी परिवर्तन आने वाले दिनों में देखने को मिलेंगे। हम स्वयं को गौरवशाली ही कहेंगे, क्योंकि उस दौर की धुंधली तस्वीर हमारे जेहन में है, तो इस दौर को साक्षात देख रहे हैं, लेकिन दु:ख और हैरत की बात यह है कि एक-दो संस्करणों के रूप में निकलने वाले श्वेत-श्याम अखबारों के बेहद सस्ते कपड़े पहने हुए और गले में लंबा थैला डाल कर पैदल विचरण करने वाले पत्रकारों की लेखनी में जो ताकत थी, वह अब हाई-फाई गाडिय़ों में घूमने वाले और मंहगी जींस-शर्ट आदि पहन पर लैपटॉप पर काम करने वालों की लेखनी में दिखाई नहीं दे रही। इसके पीछे तमाम कारण हो सकते हैं, जिनके बारे में पत्रकार चर्चा तक करने से बचते हैं, जबकि पत्रकारिता को बचाने का अभी वक्त शेष है, इसलिए सच्चे मन से कारणों को खोज कर पत्रकारिता को बचाने के प्रयास शुरु कर देने चाहिए, अन्यथा राष्ट्रीय पत्रकारिता दिवस मनाने का कोई औचित्य नहीं है।

अच्छी छवि बनाने की होड में आज का बाज़ार नैतिक छवियों का दुरूपयोग करने में माहिर है. पत्रकारिता का धंधा करनेवाले एक बड़े और विश्वप्रतिष्ठित कंपनी (समूह) ने भोपाल में एक बड़ा मॉल खड़ा किया है, जिसकी दीवारों पर इसने पहले गांधी की दो बड़ी- बड़ी तस्वीर टांग रखी थी. उसके नीचे गांधी के नैतिक वचन भी लिखे गए थे. गांधी के साथ इस समूह के द्वारा किया गया यह पहला घोर मजाक था. गांधी कभी भी इस तरह के बाजार और मॉल के पक्ष में नहीं बोले. लेकिन इस समूह ने जैसे उन्हें अपना ब्रांड एम्बेसडर बनाकर मॉल के ऊपर टांग दिया और भोपाल के किसी गांधीवादी ने इस पर चूं तक नहीं किया. गांधी सरेआम नंगे बदन लाठी लिए मॉल पर टंगे थे और उनके नीचे विदेशी ब्रांड के पेंट-शर्ट का शोरूम था.