लखनऊ। महाराष्ट की तरह उत्तर प्रदेश में पत्रकारों और मीडिया संस्थानों पर हमला गैर जमानती अपराध हो। यह मांग उत्तर प्रदेश जर्नलिस्ट्स एसोसिएशन (उपजा) ने प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से की है। उत्तर प्रदेश जर्नलिस्ट्स एसोसिएशन (उपजा) के प्रान्तीय महामंत्री रमेश चन्द जैन और लखनऊ जर्नलिस्ट्स एसोसिएशन के अध्यक्ष अरविन्द शुक्ला ने कहा कि उत्तर प्रदेश जर्नलिस्ट्स एसोसिएशन व इसकी राष्ट्रीय इकाई नेशनल यूनियन आफ जर्नलिस्ट्स एनयूजे (आई) पिछले काफी समय से पत्रकार एवं पत्रकार संगठनों पर हो रहे हमलों से आहत होकर पत्रकार सुरक्षा कानून बनाये जाने की मांग कर रहा था और संगठन ने पत्रकार सुरक्षा कानून बनाये जाने की मांग को लेकर गत् 7 दिसम्बर 2015 को संसद का घेराव भी किया था गत् 7 दिसम्बर 2016 को उत्तर प्रदेश के राज्यपाल महोदय को इसी आशय का ज्ञापन भी सौंपा था।

लखनऊ में सहारा कर्मियों ने जिस जज्बे के साथ अपने हक की आवाज उठाई है, वह काबिलेतारीफ है। कर्मचारियों का हक मारकर गरीब जनता की खून-पसीने की कमाई पर बाबा रामदेव के साथ मिलकर धंधा कर रहे ओपी श्रीवास्तव के घर का घेराव कर उसे भी तेवर दिखा दिये गए। नोएडा परिसर से उठी बगावत की चिंगारी अब पूरे देश में आग का रूप ले चुकी है। यह वही संस्था है जिसमें डंडे के जोर पर कर्मचारियों से जहां चाहे हस्ताक्षर करा लिए जाते रहे हैं। चाटुकारिता की सभी हदें पार की जाती रही हैं। हक की आवाज को दमन के बल पर दबा दिया जाता रहा है। चेयरमैन (सुब्रत राय) को भगवान की तरह पूजा जाता रहा है।

To
The News Editor/Chief of Bureau
Dear Sir/Madam,

Kindly find this statement for favor of publication.

The Indian Women's Press Corps strongly condemns the attacks on journalists carried out at the North Campus. It is deeply concerned over the fact the media persons doing their duty in reporting events were singled out and attacked by the police.

इंदौर : दिल्ली से शुरुआत कर भोपाल में पत्रकारिता कर चुके और इन्दौर के पत्रकारिता जगत में बहुत कम समय में ही काफ़ी लोगों का प्यार और इज्जत हासिल कर लेनेवाले, भाषा पर अच्छी पकड़ रखनेवाले, देश दुनिया से लेकर शहर-मोहल्ले की दुरुस्त जानकारी रखनेवाले, पायनियर, डेकन क्रॉनिकल, हिन्दुस्तान टाइम्स आदि में अनेक वर्षों तक जनपक्षधर, हस्तक्षेपकारी पत्रकारिता करनेवाले पत्रकार सईद खान को विगत 13 मार्च को गुज़रे हुए एक साल पूरा हुआ। सईद की स्मृति को ज़िंदा रखने, यादों को ताज़ा रखने, खुशी-खुशी याद करने के लिए 19 मार्च 2017 को इन्दौर के प्रेस क्लब में ‘सईद की याद...सईद के सरोकार..: हमसईद’ कार्यक्रम आयोजित हुआ। इस कार्यक्रम का उद्देश्य कोरी श्रद्धान्जलि के स्थान पर सईद को ऐसे याद करना था कि उन सरोकारों को अपने भीतर फिर से जीवित महसूस करना जिन्होंने सईद को ईमानदार, विश्वसनीय एवं सबका चहेता बनाया। दुखद है कि आम लोगों के जीवन को केंद्र में रखकर पत्रकारिता करने वाले सईद का 46-47 वर्ष की आयु में पिछले वर्ष कैंसर से जूझते हुए असमय निधन हुआ। जब सईद लिवर कैंसर से जीवन की लड़ाई लड़ रहे थे तब उनके चाहने वालों और दोस्तों ने ‘हमसईद’ सहायता समूह बनाया था।

Dhaka: Asia-Pacific Forum of Environmental Journalists (APFEJ), while
appreciating the  Myanmar police for arresting  three persons
suspecting their role in the murder of Soe Moe Tun on 13 December
last, urged  the authority for stringent action against the culprits.
The scribe’s forum argued that killing a journalist because of his
reporting on environmental issues must not be ignored as it is against
the Mother Nature.

Guwahati: Asia-Pacific Forum Environmental Journalists (APFEJ), in the
backdrop of Indian government’s recent initiative to ban a British
Broadcasting Corporation (BBC) scribe on filming in its tiger
reserves, has urged New Delhi to be respectful to the global media
outlets respecting the democratic spirit of the country. The Dhaka
(Bangladesh)-based environment media forum also appealed to the Indian
authority not to think of evoking the British scribe’s visa at any
cost.

"पत्रिका" जितना बड़ा ब्रांड है, इन दिनों उतना ही परेशान भी है। आये दिन सम्पादक से लेकर रिपोर्टर तक इधर उधर हो रहे हैं। वर्तमान में भी यह सिलसिला जारी है। खबरों के स्तर की बात करें तो कुछ जगह खबरों की बजाय इवेंट्स के दम पर निकलता लगता है। एडिटिंग मिस्टेक्स तो यहां के पत्रकारों के DNA में है। और हो भी क्यों न क्योंकि पेज लगाने वालों को इन्होंने सब एडिटर बना रखा है। अब उनको क्या पता खबर को सम्मान कैसे दिया जाता है। न्यूज़ एडिटिंग किस चिड़िया का नाम है। खबर जगह के मुताबिक छोटी-बड़ी कैसे की जाती है। उन्होंने तो जहां फुल स्टॉप देखा उतना हिस्सा छोड़ बाकी सब डिलीट मार दिया। फिर चाहे खबर की मुख्य बातें उसी हिस्से में हों। आपको बता दूं यह सब मैं सुनी हुई या कहीं से मिली जानकारी के आधार पर नहीं बल्कि खुद वहां काम करते हुये देखा/समझा उसी के आधार पर बता रहा हूं। और इसी वजह से मैंने बड़ी ख़ुशी और सन्तुष्टि के साथ संस्था को अलविदा भी कहा है।

277 अखबारों की मान्यता खत्म...

नई दिल्ली। मोदी सरकार ने अपनी तरह का पहला ‘स्वच्छ अखबार’ अभियान शुरू कर दिया है। इस अभियान में उन 277 अखबारों की मान्यता खत्म कर दी है जो केवल विज्ञापन लेने के लिए अखबार प्रकाशित करते थे। पिछले एक साल में इन प्रकाशनों ने करीब दो करोड़ रपए का विज्ञापन बटोरा है। एक-एक प्रिंटिंग प्रेस से 70 अखबार छापे जा रहे हैं। सरकार केवल आफिस कापी छापने वाले अखबारों से विज्ञापन की राशि वापस लेने की कार्रवाई भी शुरू कर सकती है और उन नौ प्रिंटिंग प्रेस के खिलाफ भी कार्रवाई हो सकती है जो एक दिन में 70 से अधिक अखबार छाप रहे थे।सामान्य तौर पर केंद्र सरकार और राज्य सरकारों के विज्ञापन पाने के लिए कुछ लोग प्रिंटिंग प्रेस, डीएवीपी और राज्यों के सूचना निदेशालयों के साथ मिलकर केवल आधिकारिक कापी छापते हैं और उनको दिखाकर विज्ञापन ले लेते हैं।

चाटुकारिता की हद हो गयी... वाहवाही लूटने के लिए पत्रकारिता में तथाकथित पत्रकारों ने नये पदनाम का कर दिया सृजन... पत्रकारिता में इन दिनों चाटुकारिता की हद हो गयी है। तथाकथित पत्रकारों की भूमिका ने पत्रकार नाम पर एक से बढ़कर एक तरकीब निकाल लिए है। इन दिनों बिहार में एक ऐसे पत्रकारों का गिरोह उत्पन्न हुआ है जिसने एक दशक से फोटोग्राफर का काम किया है। अखबारों में रूटीन खबर देने के काम से मुंह मोड़ रहे पत्रकारों के बदले इन दिनों खबरनबीसों की कमी को झेल रहे विभिन्न दैनिक अखबारों में अब रिपोर्टर का काम करने वाले इन पत्रकारों ने विभिन्न पदनाम का सृजन किया है।

Prashant Rajawat : - मैं दिल्ली एनबीटी सिर्फ प्रसून जोशी के स्तम्भ पेपर वेट के लिए खरीदता हूँ। फ़िलहाल। और लम्बे साक्षात्कारों के लिए।

- दैनिक भास्कर सन्डे जैकेट की खबरों और टाइम्स से करार के तहत प्रकाशित पेज और रसरंग पढ़ने के लिए। रसरंग मेरा दशकों से फेवरेट है। पर अब उतना प्रभावी नहीं रहा।

- एक समय दिल्ली में दैनिक भास्कर सिर्फ और सिर्फ खुशवंत सिंह के स्तम्भ के लिए खरीदता था। जो मंदिरा प्रकाशन से साभार छपता था।

- राष्ट्रीय सहारा एक समय सिर्फ हस्तक्षेप पढ़ने के लिए खरीदता था।

अपने हक, बकाया वेतन और मजीठिया वेज बोर्ड की मांग को लेकर आंदोलन करने वाले मीडिया के बर्खास्त, निष्कासित और स्थनांतरित किये गये कर्मचारियों को एकजुट होकर भ्रष्ट प्रबंधन के खिलाफ लडऩा होगा। हम लोगों के बिखरे होने का ही फायदा मीडिया प्रबंधन उठा रहा है। अदालती कार्यवाही चलती रहे। हम लोगों को लामबंद होकर देश व समाज को धोखा दे रहे भ्रष्ट मीडिया घरानों के खिलाफ मोर्चा खोलना होगा। सबसे पहले हम लोग राष्ट्रीय सहारा से ही निपटे। राष्ट्रीय सहारा पर बर्खास्त 25 हमारे साथी धरना दे रहे हैं। हम सभी लोगों को एकजुट होकर हमारे इन साथियों का साथ देना होगा। हम लोग इस आंदोलन को बड़ा रूप दें और अन्य प्रिंट मीडिया संस्थाओं को भी अपनी बातें मनवाने के लिए मजबूर कर दें।

हम मुद्दों से ज्यादा ऑल टाइम मीडिया पर लिख रहे हैं। पत्रकारों पर लिख रहे हैं। बेवजह उन्हें घसीट रहे हैं। दो-चार जाने-पहचाने चेहरों को पकड़ लेते हैं, और उन्हें ट्रोल करा देते हैं। ख़बरर्ची ख़बर से बड़ा बना दिया गया है। लोग एंकर के मुंह से ख़बर सुनने की बजाय दूसरों से एंकर की ख़बर सुन रहे हें। पत्रकार ख़बरों का विश्लेषण करने की वजाय मीडिया का विश्लेषण ही करने में लगे हैं। हर कोई हर दूसरे घंटे पर मीडिया पर बैठा लेक्चर दे रहा है। मीडिया बर्बाद है, बिक गई है, वो उसका चमचा है, वो भक्त है, वो आपिया है। सब मुद्दे गायब हैं। ईमानदारी से बोल रहा हूं- हम पत्रकारों से अच्छी वैश्या होती हैं (हालांकि वो समाज में सबसे अच्छी होती हैं) कम से कम अपने प्रोफेशन पर गर्व तो करती हैं। यहां तो पत्रकारों ने ही पत्रकारिता को गेट के बीच में फंसी हुई कुतिया बना दिया है। हर कोई आता है और मारता है।

अगर आपको छवि की परवाह नहीं और कम समय में पब्लिसिटी पाना चाहते हैं तो सबसे आसान रास्ता है बीच बाजार कपड़े उतारकर खड़े हो जाइये। आज का दौर कॉन्ट्रोवर्सी का दौर है। अच्छी खबरें दब जाती हैं और अश्लील खबरें जमकर परोसी जाती है। बिलकुल ऐसे ही मीडिया के तमाम माध्यमों में अश्लीलता परोसने में "वेब मीडिया" सबसे आगे है। 10 में से 8 खबरें बेडरुम, कपल, MMS और स्कैंडल की होती है। जैसे की दुनिया में जो कुछ भी है इन्हीं के बाद है। कुछ न्यूज़ पोर्टल्स तो ऐसे हैं जहां विज्ञापन भी एडल्ट चलते हैं। सच बताऊं तो उनको ओपन करते समय देखना पड़ता है आसपास कोई है तो नहीं। मानो न्यूज़ की वेब साईट न हुई एडल्ट साईट हो गई।

बरेली । यशवंत जी, आपके माध्यम से यह बताना चाहता हूँ कि कई चैनलों के स्ट्रिंगर्स को पिछले कई माह से भुगतान नहीं मिला है। इसके बावजूद भी चैनल के स्ट्रिंगर्स ने अपने अपने चैनलों के बैनर को ऊँचा रखकर यूपी में चुनाव कवरेज कर रहे हैं। किसी ने भी यह नहीं लिखा या कहा होगा कि भुगतान नहीं मिलने के चलते उनका परिवार मुसीबत में है फिर भी स्ट्रिंगर्स उधार मांगकर अपने अपने चैनलों को कवरेज देता रहा। यशवंत जी इसके बाद भी चैनल के मालिक अपने स्ट्रिंगर्स को वह मान सम्मान नहीं देते जिसके वह हक़दार होते हैं।

The Delhi Union of Journalists condemns the detention and questioning of journalist Kunal Shankar of the Frontline magazine in Hyderabad on January 17. Kunal was picked up from outside the Life Sciences Building within the premises of the Hyderabad Central University where he had gone to cover a protest to mark the first death anniversary of Dalit research scholar Rohith Vemula.

पश्चिम बंगाल के वरिष्ठ हिंदी पत्रकार तारकेश कुमार ओझा को पत्रकारिता के लिए अनन्य सम्मान से सम्मानित किया गया है। विगत 21 फरवरी को मातृ भाषा दिवस पर राज्य के उनके गृहशहर में यह सम्मान प्रदान किया गया।  यह सम्मान पश्चिम बंगाल सरकार के सूचना व संस्कृति विभाग , खड़गपुर रिपोर्टस क्लब तथा बांग्ला साप्ताहिक आजकेर दर्पण के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित किया गया था।जिसे जंगल महल सांस्कृतिक उत्सव के तौर पर आयोजित किया गया था। सम्मान के तौर पर उन्हें मानपत्र व स्मृति चिन्ह भेंट किया गया।