सरकार की लापरवाही ने आग लगायी है, बाकी सभी अपनी रोटियां सेंकने में जुट गये हैं। किसानों की भलाई से ज्यादा राजनीतिक दलों को भविष्य के चुनाव दिख रहे हैं। किसानों की बड़ी संख्या है तो बड़ी ताकत भी। महेंद्र सिंह टिकैत, अमर सिंह, राज बब्बर, अजित सिंह, जयंत सभी नजर गड़ाये हुए हैं। मत चूको चौहान के हालात हैं। सभी अपनी-अपनी ताक में हैं लेकिन सभी जानते हैं कि किसान को अभी इनमें से किसी की चिंता नहीं है। उसने दिखा दिया है कि अगर कोई न भी आता तो भी वे अपनी लड़ाई लड़ते और उसे अंतिम अंजाम तक ले जाते।

किसान पूरी तैयारी और मुस्तैदी से लामबंद हो गये हैं। सरकारें हमेशा से किसानों को ही सबसे निरीह और कमजोर कौम समझती आयीं हैं। वे फसल उगाते हैं, सबका पेट भरते हैं, पर उनकी अपनी जिंदगी में अभावों की भारी गठरी के अलावा कुछ नहीं होता। जो लाभ उन्हें उनकी फसलों  का मिलना चाहिए, उसका बड़ा हिस्सा बिचौलियों और व्यापारियों की जेब में चला जाता है। कितनी बड़ी विडंबना है कि जो सबका पेट भरता है, उसे अपने परिवार की खुशियों के लिए अपना पेट काटकर जीने के लिए मजबूर होना पड़ता है। सरकारें किसानों की बातें तो बहुत करती हैं, उनके हित के लिए बजट में लुभावनी घोषणाएं भी करती हैं पर पता नहीं किसानों और गांवों की भलाई की स्कीमों का पैसा किन बड़े पेटों में समा जाता है। हर साल नयी घोषणाओं के बावजूद उनकी तकदीर में कोई बदलाव आता नहीं दिखता। उल्टे देश के कई हिस्सों से किसानों की आत्महत्याओं की खबरें जरूर आती हैं। भारत जैसे कृषि प्रधान देश में किसानों की यह दुर्दशा शर्मनाक है। विकास के नये दौर में उन्हें अपनी उपजाऊ जमीनों से भी हाथ धोना पड़ रहा है। बड़े पूंजीपतियों को फायदा पहुंचाने के लिए सरकारें किसानों का गला घोटने पर आमादा दिखती हैं।

उत्तर प्रदेश सरकार के ऐसे ही एक फैसले ने पश्चिम उत्तर प्रदेश के किसानों को अपने अस्तित्व की, अपनी जमीन की रक्षा की लड़ाई लड़ने के लिए एकजुट कर दिया है। दरअसल उत्तर प्रदेश सरकार ने यमुना एक्सप्रेस वे के लिए नोयडा, अलीगढ़, मथुरा और आगरा के किसानों की जमीनों का अधिग्रहण किया। सड़क के किनारे टाउनशिप के निर्माण की भी योजना थी। किसानों के साथ छलपूर्ण बर्ताव किया गया और हर जिले के लिए मुआवजे की अलग-अलग और कम से कम राशि तय की गयी। इस सिलसिले में किसानों से कोई बातचीत करने की जगह मनमाना निर्णय लिया गया। जब किसानों ने इस पर आपत्ति की तो उनकी बात सुनी-अनसुनी कर दी गयी। कई सप्ताह शातिपूर्ण प्रदर्शन के बाद उन्हें विवश होकर सड़कों पर आना पड़ा।

किसान अब समझने लगे हैं कि मीठी-चुपड़ी बातें करने वाली सरकारें बिना संघर्ष के उन्हें उनका हक देने वाली नहीं हैं। सभी भ्रष्टाचार और लूट की पतितसलिला में डुबकी लगाने में मस्त हैं। चाहे केंद्र हो या राज्य, सरकारों में शामिल नेता येन-केन-प्रकारेण धन बटोरने और अपनी थैली भरने में लगे हैं। यह सही बात है कि आजाद भारत में सर्वाधिक अन्याय अगर किसी तबके के साथ हुआ है तो वह किसान ही है। चाहे उसकी फसलों की कीमतों की बात हो या उसकी जमीनों को हथियाने की, उसे ही सबसे कमजोर शिकार समझा जाता है। सत्ता के नशे में राजनेताओं को नंदीग्राम और सिंगुर का संग्राम याद नहीं रहा। गरीब किसानों ने वामपंथी सरकार के खिलाफ जो युद्ध छेड़ा, वह अब इस मुकाम पर आ पहुंचा है कि अपने गढ़ में भी वाम दलों के पांव डगमगाने लगे हैं। क्या वैसी ही सूरत पश्चिम उत्तर प्रदेश में बनाने की कोशिश नहीं की जा रही है? कितनी बड़ी विडम्बना है कि एक ओर तो किसान को अन्नदेवता कहकर उसकी भलाई के संकल्प दुहराये जाते हैं और दूसरी ओर उनके साथ धोखाधड़ी की जाती है। पूंजीपतियों को फायदा पहुंचाने के लिए उनके हक पर डाका डालने की कोशिश की जाती है।

शांतिपूर्ण तरीकों  से जब वे अपना अधिकार मांगते हैं तो उन्हें दुत्कार खानी पड़ती है और धैर्य खोकर जब वे सड़कों पर आते हैं, अपनी आवाज बुलंद करते हैं तो उन पर गोलियां चलायी जाती हैं। ये गोलियां उन्हें आखिर कब तक डरायेंगी? जिसकी जमीन चली गयी, जो लुट गया, उसकी जुबान भी बंद करने की साजिश रचने वालों को अब शायद यह यकीन हो गया होगा कि छल और बल से अगर किसान को मूड़ने और दबाने के प्रयास किये गये तो उसका खामियाजा भुगतने के लिए भी तैयार रहना पड़ेगा। अभी तो दो किसानों ने गोली खाकर शहादत दी है, हालात नहीं बदले तो यह तादात बढ़ सकती है। इसके लिए किसान तैयार दिखते हैं। विकास की योजनाओं से किसी को गिला नहीं है, सड़कों का जाल फैले, इससे किसी को शिकायत नहीं है पर इसके लिए जिनको अपनी जमीनें गंवानी पड़ रही हैं, उन्हें उसका वाजिब मुआवजा तो मिलना ही चाहिए। इसे संवेदनहीनता कहें या धूर्तता कि सरकार नोयडा, अलीगढ़, मथुरा और आगरा में किसानों को अलग-अलग दर से मुआवजा दे रही है। नोयडा में भी किसानों को लड़ाई लड़नी पड़ी थी पर उसके बाद भी सरकार नहीं चेती। मजबूर होकर उसी रास्ते पर अलीगढ़, मथुरा और आगरा के किसानों को भी जाना पड़ा।

ऐसा भद्दा सुलूक केवल किसानों के साथ ही क्यों होता रहा है? क्या सरकार इस संबंध में किसानों से बात करके उनकी सहमति से विकास योजनाओं के लिए खेती की जमीन के अधिग्रहण के बारे में एकसमान नीति नहीं बना सकती थी? हालात इतने भयानक होने के पहले सरकार के पास पूरा मौका था लेकिन जानबूझकर इस मसले पर न्यायपूर्ण निर्णय टालने की रणनीति अपनायी गयी। यह खेल बहुत लंबा नहीं चलने वाला है। किसानों ने अब जता दिया है कि वे अपनी बेचारगी की छवि से बाहर निकल आये हैं और अपने अधिकार के लिए बड़े से बड़ा बलिदान देने में कोई संकोच नहीं करेंगे। उनके समर्थन में जिस तरह राजनीतिक दलों के नेता और अन्य राज्यों के किसान सामने आ रहे हैं, उससे बसपा सरकार में खलबली जरूर है, परंतु अभी भी सरकार तदर्थवाद की नीति अपना रही है। आंदोलन को ठंडा करने के लिए मुआवजे की रकम थोड़ी बढ़ा दी गयी है पर किसान इससे पिघला नहीं है। सरकार को किसान और कृषि क्षेत्र के लिए स्पष्ट नीति बनानी होगी अन्यथा मुश्किलों का सामना करने के लिए तैयार रहना होगा। छल, कपट या दमन  का कोई भी रास्ता अगर अख्तियार किया जाता है तो किसानों को भी उसके प्रतिकार का विकल्प चुनना पड़ेगा। बेहतर होगा कि सरकार मुआवजे के लिए छिड़े इस आंदोलन को नंदीग्राम या सिंगुर जैसी लड़ाई में बदलने की भूमिका न बनाये, अधिग्रहण का अंग्रेजी कानून बदले और इस संबंध में स्पष्ट एवं एकसमान नीति बनाये। और सबसे महत्वपूर्ण बात कि इस मसले को और उग्र होने से पहले इस पर फैसला करे।

लेखक सुभाष राय वरिष्ठ पत्रकार हैं. लंबे समय तक अमर उजाला, आगरा के संपादक रहे और इन दिनों आगरा में ही 'डीएलए' अखबार में संपादक (विचार) पद पर कार्यरत हैं. सुभाष से संपर्क 09927500541 के जरिए किया जा सकता है.

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