: आलोक मेहता ने इनकार करके अपनी ही पत्रकारिता प्रश्न चिन्ह लगा दिया : एक पल में मेरे सारे सपने चकनाचूर हो गए : दो जून भी सिसकियों के बीच गुजर गया : पति के हत्यारों को कभी माफ नहीं करूंगी : 30 तारीख की सुबह हवा कुछ ठंडी थी। मैं सुबह उठ गयी थी। मैंने हेम को चाय के साथ उठाया। वह हमेशा ही सुबह उठ जाते। आज कल कुछ थकान भी थी। काम की थकान। 29 की रात 2 बजे उठकर पढ़ने लगे। पढ़ाई के लिए वह हमेशा समय निकाल लेते। सुबह उठकर मैंने नाश्ता बनाया। दोनो ने नाश्ता किया। ऑफिस जाते समय बोले बबीता आज नागपुर जाना है, अखबार के काम से, तुम मेरे लिए खाना तैयार कर देना। आज मैं बहुत खुश थी।
खुश तो मैं उनके साथ हमेशा से ही थी, उनका व्यक्तित्व ही ऐसा था कि जो मुझे हमेशा उनकी और खींचता। अभी तीन दिन पहले ही की तो बात है, जब वह ऑफिस से आये। दोनों बालकनी में चाय पी रहे थे और मैं उन्हें गौर से देख रही थी। बोले क्या बात है? आज बड़े गौर से देख रही हो। मैं बोली हेम शादी के इतना समय होने के बाद मैं तुमसे और ज्यादा प्यार करने लगी हूं। उनके गुण ऐसे थे जो मुझे अपनी और खीचतें चले जा रहे थे। उन्होंने मुझे गले लगा लिया। हेम मुझे बहुत प्यार करते थे। हम दोनों का साथ मछली और जल का था। एक दूसरे के बिना जीने की कल्पना कभी न की थी। अब यह पहाड़ जैसा जीवन उनके बिना कैसे बीतेगा पता नही?
1.30 बजे वह ऑफिस से घर पहंचे। मैं भी अब तक खाना और उनका बैग तैयार कर चुकी थी। मैं उनका बहुत ख्याल रखती, कई बार वह परेशान हो जाया करते। बोलते- बबीता इतना भी ख्याल मत रखा करो। चाय नाश्ता करके वो स्टेशन के लिए चल दिए। दिल्ली के निजामुद्दीन स्टेशन से 3.30 बजे उनकी गाड़ी थी। जाने से पहले उन्होंने मुझे गले लगाया। वह बहुत कम बोलने वाले शख्स थे। मुझसे तो जब भी बोलते हमेशा पढ़ाई की ही बात करते। घर से निकलकर हम दोनों मुख्य मार्ग पर पहुंचे। रिक्शा किया। मैं बोली- मेट्रो तक आऊं। तो मना कर दिया।
वह चले गये। मेरी आंखों में आंसू थे।मैं घर आयी। मैंने साफ-सफाई की। शाम 3.30 बजे हेम का फोन आया कि गाड़ी लेट है। और हंसते हुए कहने लगे कि मेरी सीट में दो मोटे लोगे बैठे हैं। मैंने कहा, 'उन्हें उठाओं और अपनी सीट पर बैठो।' यही मेरी उनसे अंतिम बात थी।
रात को भी मैंने उनसे कोई बात नहीं की। मैं उन्हें डिस्टर्ब नही करना चाह रही थी। सोच रही थी कि आराम कर रहे होंगे। मैंने भी कुछ देर टीवी देखा और सो गई। एक जून की सुबह उठकर मैं अपने काम में व्यस्त हो गई। 11.30 बजे हेम को फोन लगाया तो नॉट रिचेबल आ रहा था। मैंने फिर 12.30 बजे किया तो फोन स्चीच ऑफ मिला। एक घंटे बाद फोन करने पर भी फोन नहीं खुला। मैं परेशान हो गयी। चिंता में पूरा दिन गुजर गया। पूरी रात मैं रोती रही। 2 जून सुबह मैंने 8 बजे तक खाना बना दिया। मैंने सोचा कि वह 9 बजे तक आ जाएंगें। जब वह 9 बजे तक भी नहीं आये तो मैं नई दिल्ली रेलवे स्टेशन भागी और गाड़ी का पता किया, पर हेम नही आये। अब मेरी चिंता और बढ़ गयी थी। मैंने हेम के गायब होने की सूचना अपने चचेरे भाई को दी।
दो जून को हमने अपने सभी निकटस्थ लोगों को हेम के बारे में जानने के लिए संपर्क किया, लेकिन उसका पता नहीं लगा। भाई-भाभी के आश्वासन के बावजूद दो जून भी सिसकियों के बीच गुजर गया। 3 जून की सुबह हेम के दोस्त भूपेन बसेड़ा से हमने संपर्क किया। उन्होंने भी अपने स्तर से तलाश शुरू की। इसी बीच मेरे भाई विजयवर्धन उत्प्रेती के फोन पर नैनीताल समाचार के संपादक राजीव लोचन साह का फोन आया। साह जी ने एक कार्यक्रम के दौरान इनाडु अखबार में हेम का फोटो देखा। इसकी पुष्टि के लिए उन्होंने मेरे भाई से संपर्क किया। इसके बाद मेरे हेम और पुलिस के क्रूरतम चेहरे की पुष्टि हुई।
हेम को आदिलाबाद में फर्जी मुठभेड़ में मारा हुआ दिखाया गया था। इस एक पल में मेरे सारे सपने चकनाचूर हो गए। वह नागपुर के लिये रवाना हुए थे। उन्होंने तो कभी किसी चींटी को भी नहीं मारा, फिर उनका ऐसा कौन सा अपराध पुलिस को दिखा कि उनकी हत्या करनी पड़ गई। जिन्होंने ने भी मेरे पति को को मारा है, मैं उन्हें कभी माफ नहीं करूंगी। आज नहीं, कभी तो वो दिन आयेगा जब न्याय होगा। मैंने इस सच्चाई को कैसे स्वीकार किया, मैं बता नही सकती। मुझे आज भी विश्वास नही होता कि मेरे हेम नही रहे। हम ने तो एक दूसरे से वादा किया था कि हम जब भी जायेंगे साथ ही जायेंगे। हेम मेरे लिए क्या थे, ये कभी कोई नही जान सकता। वह मेरे पति ही नही बल्कि मेरे सबसे अच्छे दोस्त थे। वह हमेशा मुझसे एक दोस्त का व्यवहार करते। हम दोनों एक दूसरे का बहुत ख्याल करते। वह हमेशा मुझे आगे बढ़ने की प्रेरणा देते।
तहलका उनकी पसंदीदा मैगजीन थी। इन सालों में कभी ऐसा नही हुआ, जब घर में तहलका न आई हो। वह एक ही दिन में इसे पढ़ लेते और मुझे पढने के लिए देते। तहलका मेरी भी पसंदीदा मैगजीन है। वह हमेशा कहते, 'तुम कुछ ना कुछ तहलका में लिखा करो।' वह तहलका की सच्चाई वह साहस की हमेशा सराहना करते।
वह ऐसे इंसान थे जो खुद मुफलिसी में रहकर भी दोस्तों की मदद करते थे। अपने सिद्धातों से उन्होंने कभी समझौता नही किया। मैंने भी यह गुण उनसे सीखा। शादी के बाद वह मेरे जीवनसाथी ही नही बल्कि एक अच्छे शिक्षक थे। जब से उन्होंने नई दुनिया, राष्ट्रीय सहारा व दैनिक जागरण में लिखना शुरू किया, तबसे हर विषय पर मेरी राय भी जरूर लेते। लेकिन जब नई दुनिया के संपादक तथाकथित बुद्धिजीवी आलोक मेहता ने इस बात का खण्डन किया, इस नाम का शख्स हमारे अखबार से कभी जुड़ा ही नहीं तो मुझे बहुत ही गहरा दुखः हुआ। जिस व्यक्ति ने कई आर्टिकल इस नई दुनिया को दिये, उसी ने उनकी पहचान को नकार दिया। ऐसे समय जब इस अखबार की ज्यादा आवश्यकता थी, उसने इनकार करके अपनी ही पत्रकारिता पर प्रश्न चिन्ह लगा दिया। हालांकि आलोक मेहता द्वारा भेजे कई चेक मेरे पास आज भी हैं। इस घटना के बाद इस तथाकथित आदमी का चेहरा भी देश के सामने आ गया।
साहित्य में हेम की विशेरू रूचि थी। 'मां' उनकी प्रिय पुस्तक थी। अरुंधती के लेखों को वह बड़े चाव से पढ़ते। अरुंधती के साहस के वह कायल थे। अभी कुछ समय पहले ही आउटलुक में अरुंधती का माओवादियों के गढ़ में बिताये हुए 32 पन्ने उन्होंने एक ही दिन में पढ़ लिए। मुझे इसका सार हिन्दी में समझाया। एक अनुशासित जीवन इस तरह खत्म कर दिया जाएगा, कभी सोचा नहीं था।
असल में हेम को जिस तरह फर्जी मुठभेड़ में मार गिराया गया है, उससे साफ पता चलता है कि सरकार कहीं से नहीं चाहती कि सच्चाई सामने आये। सरकार को अपने बनाये संविधान व कानून पर ही विश्वास नहीं है। एक तरफ सरकार कसाब जैसे आंतकवादियों सुरक्षा दे रही है। दूसरी तरफ मेरे पति को फर्जी मुठभेड़ में मार दिया जाता है। अगर उसे शक था कि मेरे पति माओवादी थे, तो क्या वह उन्हें जेल में बंद करके उनके उपर कार्यवाही नहीं कर सकती थी। असल में वह इस समाज से सच्चाई मिटाना चाहती है। लेकिन मैं इतना जानती हूं कि सच्चाई किसी युग में नहीं मिटी है। आज अगर मेरे हेम ने शहादत दी है तो कल और सच्चे इंसान फिर खड़े होंगें। आपने भगतसिंह को मार गिराया, लेकिन उसके बाद बहुत से भगत सिंह ने अपनी जान देकर यह बता दिया कि शरीर तो मर सकता है पर विचार कभी खत्म नही होते।
लेखिका बबीता पुलिस द्वारा मारे गए होनहार पत्रकार हेमचंद्र पांडेय की पत्नी हैं.