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बदलते दौर में वैकल्पिक मीडिया पर बढ़ रहा भरोसा

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पंकज कुमार झा: मुख्याधारा के मीडिया से जैसे-जैसे लोगों का मोहभंग होते जाएगा वैसे-वैसे हिन्दी के साइटों की मारक क्षमता में भी वृद्धि होती जायेगी : मुख्‍यधारा की मीडिया से गायब हो रहा है आम आदमी : राजनीति विज्ञानी और हावर्ड विश्वविद्यालय के प्रोफेसर रहे सैमुएल हटिंगटन ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘सभ्यताओं का संघर्ष’ में यह स्‍थापना दी थी कि अब विचारों की समाप्ति का युग है. उनकी बातों को थोड़ा सरलीकृत किया जाय तो यह था कि अब संघर्ष, विचारधाराओं के कारण नहीं बल्कि सभ्यताओं के मध्य अंतर के कारण होगा. वर्तमान भारत और मीडिया के सम्बन्ध में इस विचार का थोड़ा पेरोडी बनाया जाय तो कहा जा सकता है कि अब भारत के मुख्यधारा कहे जाने वाले मीडिया में भी विचारों के साथ-साथ समाचारों की समाप्ति का युग भी आ गया है. यहाँ संघर्ष अब किसी बेजुबान को जुबां देने के लिए, किसी अव्यक्त को व्यक्त करने के लिए नहीं अपितु मीडिया(यों) के बीच मौजूद आर्थिक अंतर के लिए होगा या कहे की हो रहा है.

बड़ी-बड़ी कंपनियों का शक्ल लेते जा रहे इन समाचार माध्यमों में कॉरपोरेट हित के अलावा भी कोई बातें होती होंगी, जन सरोकारों की बात भी आपको पढ़ने-देखने-सुनने को मिलती होंगी अब ऐसा नहीं लगता. अगर कुछ समूह गांव-गरीब-किसान की बात करते भी हों तो स्वाभाविक तौर पर नहीं बल्कि लोकतंत्र को कमज़ोर करने वाले तत्वों द्वारा प्रायोजित-प्रभावित हो कर ही. सरकारी विज्ञापनों-रेवडियों की आंधी में चाहे भी तो, सरकार के जनसंपर्क विभाग बन जाने वाले या फिर अ-सरकारी गिरोहों द्वारा उपलब्ध करवाए गए फंड को पा कर लोकतंत्र के खिलाफ युद्ध करने वाले मीडिया समूहों के मध्य, आपको निष्पक्ष मीडिया ढूंढें नहीं मिलेगा.

बात विचारों से ही शुरू हुआ था तो यह याद दिलाना होगा कि ‘पेड न्यूज़’ के मामले में सबसे बदनाम हुए और सर्कुलेशन के हिसाब से देश का सबसे बड़ा अखबार होने का दावा करने वाले समूह ने तो ‘विचारों’ के लिए अपना दरवाज़ा पूरी तरह से बंद ही कर दिया है. विज्ञापन के लोभवश भले ही वो प्रखंड स्तर तक का संस्करण निकालें, लेकिन उसे गांव से लेकर ब्लाक स्तर तक का राजस्व चाहिए. लेकिन जब विचारों की बात आयेगी तो उन्होंने यह तय करके रखा है कि बस दिल्ली के कुछ दसेक उनके स्तंभकार ही विद्वान और विचारवान हैं. अपने “पैनल” के अलावा उन्हें और किसीके विचार सुनने-पढाने है ही नहीं. जहां इस अखबार का भी पहले यह नियम था कि सम्पादकीय पेज का निचला आलेख कम से कम प्रादेशिक संस्करणों में अलग-अलग हुआ करता था. वहीं अब तो चाहे छत्तीसगढ़ के ‘ताड़मेटला’ में सौएक ज़वान मर जाये या फिर कहीं और बस को उड़ा कर सैकड़ों आम नागरिकों की ह्त्या कर दी जाय, उन्हें तो बस तुर्की या अज़रबैजान के बारे में हार्वर्ड से पढ़े विद्वानों का ही लेख चाहिए.

अगर समाचार और विज्ञापनों की बात की जाय तो खासकर विगत लोकसभा चुनाव में जिस तरह से पैसा लेकर विज्ञापन को ही समाचार बना देने का चलन शुरू हुआ, उसके बाद तो कुछ कहने को रह ही नहीं जाता. यहां आशय यह नहीं है समाचार कंपनियां ‘साधू’ बन जाय. एक सीमा तक आप अपना व्यावसायिक हित देखें इसमें बुराई भी नहीं है. आखिर मीडिया मालिकों के अनुसार उनको हज़ारो समाचार कर्मियों का पेट भी भरना होता है. लेकिन कोई तो लक्ष्मण रेखा खींची जानी ही चाहिए. जिस तरह से विज्ञापन के लिए हर तरह के हथकंडे अपनाए जाते हैं, उससे भी आगे अब, विज्ञापन को ही समाचार बना दिया जा रहा है. इलेक्‍ट्रॉनिक मीडिया में टीआरपी बढ़ाने के लिए तमाम तरह के हथकंडे अपनाए जाते हैं. जैसा हाल ही में एक बिना दर्शक के अंग्रेज़ी चैनल द्वारा किया गया या फिर भूत-प्रेतों वाले चैनल में किया जाता है. फिर प्रखंड स्तर से लेकर दिल्ली तक अपनी हैसियत के अनुसार कथित पत्रकारों द्वारा वसूली, ट्रांसफर-पोस्टिंग, लाबीइंग से कमाई की जाती है, उसके बाद तो माध्यमों के बारे में कहने को कुछ बच ही नहीं जाता.

अभी झारखण्ड के प्रखंड स्तर के ऐसे ही एक कर्मी को अपने ब्यूरो प्रमुख द्वारा मासिक वसूली के दबाव की बात हो या फिर कारगिल रिपोर्टिंग से ‘देवत्व’ प्राप्त महिला पत्रकार के हाथ घोटाले में काले होने की. पिछली सरकार के अविश्वास प्रस्ताव के दौरान विपक्ष के सहयोग से किये स्टिंग ऑपरेशन को बेच देने का विश्वासघात हो या फिर ‘इशरत’के नाम पर गैरजिम्मेदार रिपोर्टिंग करने की, या फिर पोल खुल जाने पर माफी मांगने वाले बड़े पत्रकार और चैनलों की. एजेंसियों द्वारा बार-बार नक्सल जैसे संवेदनशील मुद्दे पर गलत खबर चला कर या फिर निहित स्वार्थवश प्रतिबंधित नक्सलियों का महिमामंडन कर 76 जावानों की शहादत का पृष्ठभूमि तैयार करने वाली लेखिका की. हर तरफ आपको व्यवसायवाद की ऐसी बेशर्म गली, दुकानदारी का ऐसा अंधा सुरंग दिखेगा, जहां आप वास्तविक जनसरोकारों के विचार-समाचार प्रकाश की व्यवस्था ढूंढ़ते रह जायेंगे. वैसे भी इतने स्वार्थों के मध्य आप निःस्वार्थ सच्चाई की कल्पना कैसे कर सकते हैं? यहां तो ऐसे शर्मनाक हालत हैं कि जहां सैकड़ों चैनल, हज़ारों बड़े मझोले अखबार और लाखों छोटी पत्रिकाएं जहां महंगाई की विकरालता तक को जाने-अनजाने भी मुद्दा नहीं बना पाए, वहां केवल फिल्म ‘पिपली लाइव’ अपने एक गीत सखी सैयां तो खूबे कमात हैं, महंगाई डायन खाए जात हैं, से वह सन्देश देने में सफल रहा है.

ऊपर वर्णित ऐसे हालत में फिलहाल तो उम्मीद की किरण कुछ वैकल्पिक माध्यमों में ही नज़र आता है. खासकर स्थान-समय-काल की सीमाओं से परे इंटरनेट एक ऐसे माध्यम के रूप में उभर कर सामने आया है जहां हिन्दी के कुछ मुट्ठी भर ब्लागरों-मॉडरेटरों ने ऐसा काम कर दिखाया है, जो हज़ारों करोड़ के बुनियादी ढांचा वाले और लाखों के पैकेज पर काम करने वाले लोग भी नहीं कर पाए. कुछ साइटों का ही नाम लेना मुनासिब ना होते हुए भी कहना होगा कि ‘भड़ास4मीडिया.कॉम, रविवार.कॉम, विस्फोट.कॉम, प्रवक्ता.कॉम, मोहल्ला लाइव’ सरीखे साइट अपने नाम मात्र के संसाधनों की बदौलत ही बड़ा पाठक वर्ग हासिल करने में सफल रहा है. यहां तक कि देश के ढेर सारे अखबार जो स्तंभकारों को पैसा देना मुनासिब नहीं समझते उनका काम भी इन्‍हीं साइटों के आलेख से चल जाता है.

इस तरह के तमाम साइटों का संचालन करने वाले लोगों की विचारधारा चाहे जो हो लेकिन उनमें यह समानता है कि सभी जनसंचार माध्यमों को समझने वाले, सामान्यतः उससे ऊबे हुए तथा अल्प संसाधन में किसी सिरफिरे की तरह जुटे हुए लोगों द्वारा शुरू किया गया है और सफल रहा है. जैसे-जैसे लोगों में जागरूकता आयेगी, मध्य वर्ग की आर्थिक क्षमता में वृद्धि होगी, नेट इस्तेमाल करने वाले लोगों की संख्या बढ़ेगी. जैसे-जैसे लोगों की व्यस्तता बढ़ेगी, मुख्याधारा के मीडिया से जैसे-जैसे लोगों का मोहभंग होते जाएगा वैसे-वैसे हिन्दी के साइटों की मारक क्षमता में भी वृद्धि होती जायेगी.

यहां बहुत से इस तरह के साइटों का नाम लेना संभव नहीं हुआ है. और जिनका लिया भी गया है वह उनकी पवित्रता का लाइसेंस नहीं है. लेकिन इतना ज़रूर है कि जब-तक यहां भी गलाकाट प्रतिस्पर्द्धा का दौर शुरू नहीं हो जाता. जब-तक व्यावसायिकता पूरी तरह घुसपैठ नहीं कर पाती. जब तलक अखबारों का रीडरशिप के लिए किये जाने वाले युद्ध और चैनलों का टीआरपी की आस में उल-जुलूल हरकतों की तरह यहां भी एलेक्सा रेटिंग के लिए संघर्ष शुरू नहीं कर दिया जाता, तब तक तो उम्मीद की किरण यहां से फूटती ही है. चूंकि इन तमाम लोगों के भी बीवी बच्चे होंगे और समाज के आम लोगों की तरह इनकी आशाएं-आकांक्षायें भी कल को परवान चढ़ेगी ही. लेकिन जब-तक ऐसा अवसर इन्हें नहीं मिलता तब-तक यह कहा जा सकता है कि फिलहाल तो वैकल्पिक मीडिया ही विकल्प है. रही कल की बात तो कल किसने देखा है.

पंकज कुमार झा रायपुर से प्रकाशित दीप कमल पत्रिका के संपादक हैं. 

Comments
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Anonymous 2010-07-29 17:28:28

बहुत बढ़िया और सटीक लिखा है आपने.... ये सही है की मीडिया पैसा कमाने के चक्कर में अपना दायित्व भूल गया है... अगर मीडिया चाहे तो लाभ कमाने के साथ पैसे भी कमाए जा सकते है.... सब हो सकता है बस रास्ता तलाशना होगा...
bharosa
girish pankaj 2010-07-29 19:44:49

shaabaash pankaj...sundar lekh, samyik hai. aane vala kal ka daur isi ka hai.
rachanaravindra.blogspot.com
rachana dixit 2010-07-29 20:57:19

sahi kah rahe hain aapse sahmat hun
sahajsamachar.blogspot.com
Akhilesh Upadhyaya 2010-08-07 13:25:09

very nice depicted, thanks.
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