Pradhanji.com

Home तेरा-मेरा कोना अव्‍वल दर्जे के धैर्यवान और सहृदय श्रोता थे अज्ञेय

अव्‍वल दर्जे के धैर्यवान और सहृदय श्रोता थे अज्ञेय

E-mail Print PDF

अज्ञेय: यादों का झरोखा 5 : अज्ञेय का स्नेह अपूर्व और अपरिमेय था : आपसी समझ रखने वालों को शब्दों की फिजूलखर्ची की जरूरत कहां पड़ती है :  साहित्य के क्षेत्र में सरकारी संरक्षण के खिलाफ थे : यों वात्स्यायनजी को लेकर बहुत लिख सकता था। पर पिछली दफा लगा कि एक किस्त और लिख कर संस्मरण पूरा कर दूंगा। सो स्तंभ के आखिर में लिखा- ‘‘समाप्य’’। ज्यादातर पाठकों ने ‘समाप्य’ को ‘समाप्त’ पढ़ा और संदेश और चिट्ठियां मिलीं कि अभी सिलसिला कुछ और चलता! इस अनुग्रह का पहले इल्म होता तो धारावाहिक चलाता! बहरहाल, और भी दुख हैं जमाने में। तो यह समापन किस्त। यह जिक्र पीछे कर आया कि अज्ञेय के व्यक्तित्व में जिस बात ने मुझे अपनी ओर ज्यादा खींचा, वह थी मानवीय संबंधों में उनकी उत्कट आस्था। यह एक निराला अनुभव था जो उनके चुप्पे-घुन्ने-एकांतिक होने की प्रचलित धारणाओं के सर्वथा विपरीत था।लखनऊ लेखक शिविर के बाद दिल्ली लौटे तो अपने घर ले गए। यहां तक ठीक था। मुझे जयपुर की राह पकड़नी थी। दिल्ली जरूरी पड़ाव था। नहा-संवर कर झोला उठाकर मैंने इजाजत मांगी तो बोले- ड्राइवर आपको बीकानेर हाउस के बस अड्डे छोड़ आएगा। आइंदा आप जब दिल्ली आएं, यहीं ठहरिए।

मालूम हुआ कि कहीं और ठहरे हैं तो मुझे अच्छा नहीं लगेगा। मैंने कहा, जी जरूर। हमेशा की तरह, बाद में अहसास हुआ कि उन्होंने क्या कहा। आज तक सोचता हूं। दिल्ली में रहते ऐसे लोगों से दिल्लगी हुई कि उनके घर का हुलिया देखने को तरसता हूं! और एक कालजयी साहित्यकार दिल से किसी कस्बाई युवक को मेहमानी का स्थाई न्योता देता था!

लड़कपन में जब साप्ताहिक इतवारी पत्रिका का बेनामी संपादक था- राजस्थानी कवि वेद व्यास के आत्मीय संबोधन में ‘बालक संपादक’- वात्स्यायनजी के कद और रुतबे को भूल कर उनसे कहा कि आप ‘इतवारी’ के लिए क्यों नहीं लिखते? वे बोले, शब्दों की सीमा बताइए। मैंने कहा, आपके लिए क्या सीमा! जो जितना लिख दें। और उन्होंने सचमुच लिखा। कभी चिंतन, कभी ललित।

नोबेल पुरस्कार पाने वाले स्वीडी कथाकार पेर लागरक्विस्त की उपन्यास-त्रयी के नायाब अनुवाद (बाद में ‘महायात्रा’ नाम से एक साथ प्रकाशित) के अंश उन्होंने हमें दिए। युगोस्लाविया यात्रा का लंबा संस्मरण खास तौर पर लिखा। एक दफा मैंने उनसे जिक्र किया कि स्त्री-समाज की समस्याओं पर अच्छी सामग्री नहीं मिल पाती। मेरा खयाल है, इस हवाले से शायद उन्हीं ने बाद में इला डालमिया को हमारे लिए नियमित स्तंभ लिखने को प्रेरित किया होगा।

ऐसे लेखक भी थे जिन्हें मैं पत्र पर पत्र लिखता, पर उनसे जवाब तक नहीं मिलता था। जबकि रघुवीर सहाय, गिरधर राठी, नंदकिशोर आचार्य, ऋतुराज, प्रयाग शुक्ल, रमेशचंद्र शाह, बनवारी, राजकिशोर आदि अनेक लेखकों से खूब सहयोग मिला। पर अज्ञेय का स्नेह अपूर्व और अपरिमेय था। धीरे-धीरे उनसे काफी खुल गया। मेरी झिझक जाती रही। वे हंसी-मजाक करने लगे। मेरी भाषा की अशुद्धियों पर भी इशारे से ध्यान दिलाते थे। मसलन, राजस्थानी के असर में मैं पता चला को ‘पत्ता पड़ा’ बोलता था। वे मौका देखकर अशुद्ध उच्चारण ठीक मेरे अंदाज में दुहराते और मुझे, देर-सबेर, भूल समझ आ जाती। उनसे संपर्क बढ़ता गया। राजस्थान पत्रिका में मेरे एक सहयोगी महेश शर्मा ने कैलास-मानसरोवर की यात्रा की। उनके संस्मरण प्रौढ़ शिक्षण समिति ने पुस्तक रूप में प्रकाशित किए। यात्रा संस्मरण के लोकार्पण के लिए यायावर अज्ञेय से अच्छा नाम नहीं सूझा। सुधेंदु पटेल के साथ- जो तब समिति से जुड़े थे- दिल्ली आकर हमने वात्स्यायनजी से गुजारिश की। उन्होंने हमें कालाजाम खिलाए और मान गए।

एक रोज पहले फोन कर मैंने उनसे पूछा कि किस उड़ान से जयपुर पहुंचेंगे? बोले- प्रौढ़ शिक्षा का काम करने वाली संस्था पर विमान का बोझ क्यों? बस का भाड़ा मैं वहन कर सकता हूं और कल सुबह राजस्थान रोडवेज की दस बजे की बस से आऊंगा। ठहरने का बंदोबस्त करने की जरूरत भी नहीं है, दयाकृष्णजी ने विश्वविद्यालय में कमरा करा दिया है। यानी हमारे जिम्मे कोई काम नहीं छूटा था, सिवाय आयोजन के कार्ड बांटने के। कार्यक्रम हुआ। इतना सफल कि किसी लोकार्पण में इतनी भीड़ मैंने उसके पहले या बाद में जयपुर में नहीं देखी।

जयपुर वे कई बार आए। जैसे बीकानेर, उदयपुर, जोधपुर और जैसलमेर भी। एक दफा इला जी साथ थीं। वे रघुवीर सहाय के बेटे वसंत को भी साथ लाए। इला जी ने कहा, ये आपके साथ जयपुर घूमेंगे। मेरे पास तब मोटरसाइकिल होती थी। उसी पर घूम आए। लेकिन अगली दफा मुश्किल पेश आई। वात्स्यायनजी ने कहा, सुबह बड़े तड़के की उड़ान है। आप छोड़ आएंगे? तपाक से बोला, क्यों नहीं! बाद में सोचता रहा, निकट के किसी मित्र के पास कार नहीं है! वात्स्यायनजी के पास सामान भी है! हिम्मत कर दफ्तर में बात की। गाड़ी का बंदोबस्त हो गया। सुबह चार बजे देखता हूं, अखबारों के बंडलों से भरी एक जीप-नुमा ‘ट्रेकर’ गाड़ी सामने खड़ी है। बस, आगे ड्राइवर के बगल वाली सीट खाली थी। कोई चारा न देख वात्स्यायनजी को आगे बिठाया, पीछे अखबारों और सामान के बीच खुद लदकर किसी तरह हवाई अड्डे पहुंचा आया!

जयपुर एक बार वे रायकृष्ण दास व्याख्यानमाला के आयोजन के लिए आए। व्याख्यान नरेश मेहता, आनंद कृष्ण और भूमित्र देव ने दिए। जयपुर के प्रसिद्ध चित्रकार रामगोपाल विजयवर्गीय से उन्होंने उद्घाटन का आग्रह किया। उनसे उनका पुराना परिचय था। फिर भी चाहते थे निमंत्रण घर जाकर दें। मैं साथ गया। दोनों जाने कितने बरसों बाद मिले होंगे। वात्स्यायनजी ने मिलते ही कहा- आपने पहचाना? विजयवर्गीयजी ने बड़े छायावादी अंदाज में जवाब दिया- कोई सूरज की रोशनी न देख सके तो उसी का दोष होगा। सारी दुनिया आपको जानती है। मैं जानते हुए न पहचानूं, क्या यह संभव है? वहां आधुनिक कविता पर बात चल पड़ी। एक मोड़ पर अज्ञेय ने कहा, आज की कविता में कविता कम है, वह प्रकारांतर से ‘‘लंगड़ा गद्य’’ ही है!

1987 में वात्स्यायनजी की मृत्यु हुई तब ‘इतवारी’ का एक विशेष अंक मैंने उनकी स्मृति को समर्पित किया। रघुवीर सहाय, गिरिराज किशोर, पंकज आदि कई लेखकों के साथ रामगोपाल विजयवर्गीय ने भी उसमें एक मार्मिक संस्मरण लिखा। एक प्रसंग उन्होंने ‘अज्ञेय’ के प्रसिद्ध ‘मौन’ पर मुझे व्यक्तिश: सुनाया। कहीं कोई कला प्रदर्शनी साथ-साथ देखते हुए अज्ञेय और रायकृष्ण दास में घंटों कोई बात नहीं हुई। बेचैन होकर विजयवर्गीयजी ने इसका सबब पूछ लिया। अज्ञेय तब भी चुप रहे, पर रायकृष्ण दास जी ने जवाब दिया- हमारी बातचीत तो लगातार होती रही थी, आप ही नहीं सुन पाए! यानी, आपसी समझ रखने वालों को शब्दों की फिजूलखर्ची की जरूरत कहां पड़ती है!

अज्ञेय के साथ जो यात्राएं कीं, उनमें माउंट आबू और उदयपुर-नाथद्वारा की याद ताजा है। फरवरी 1982 की बात है। माउंट आबू में वत्सल निधि का शिविर प्रौढ़ शिक्षण समिति के संदर्भ केंद्र के जरिए आयोजित हुआ। दुर्गा भागवत से लेकर विजयदेव नारायण साही, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना, रामस्वरूप चतुर्वेदी आदि अनेक लेखक-आलोचक वात्स्यायनजी के बुलावे पर राजस्थान आए। गोष्ठियों की कार्यवाही तो सब जगह एक-सी चलती है। जो अलग से याद है, वह उनका बोलना नहीं, दत्तचित्त सुनना!

वे ढलान पर बनी कुटिया में ठहरे। आलोचक मोहनकृष्ण बोहरा ने उनसे दिल्ली में मिलने का समय मांगा था। वात्स्यायनजी को राजस्थान का भूगोल बेहतर मालूम था। उन्होंने पत्र लिखा कि मैं माउंट आबू जा रहा हूं, जो आपके सिरोही जिले में ही पड़ता है। आप वहां आ जाएं तो यात्रा का कष्ट बचेगा। बोहराजी आए और एक शाम एलियट पर अपनी किताब का वह हिस्सा वात्स्यायनजी को सुनाने लगे। शब्द-दर-शब्द।

शालीन और विद्वान बोहराजी से तब तक मेरा परिचय नहीं था। वात्स्यायनजी होठों पर दोनों हाथ की तर्जनी रखे गौर से सुन रहे थे। न घड़ी की तरफ देखा, न मेरी तरफ। इला जी उस वक्त हवाई चप्पल खरीदने गई हुई थीं। वहां होतीं तो शायद कुछ बोलतीं। दशा देखकर मुझे कोफ्त हुई। पूरा अध्याय सुनाकर बोहराजी ने वात्स्यायनजी की ओर देखा। अज्ञेय पर एलियट के प्रभाव और समभाव की उन्होंने लंबी और बारीक व्याख्या की थी। वात्स्यायनजी ने मुस्करा कर गर्दन एक तरफ लचकाते हुए इतना ही कहा- ‘देयर इज नथिंग अनफेयर इन इट!’ और आदर के साथ उन्हें विदा दी। बोहराजी के जाने के बाद मैंने छेड़ की, आपकी हालत उन्होंने पस्त कर दी! वे सहज थे- (इनका) बरसों का परिश्रम है। सुनाना चाहते थे; सो सुना!

इस दर्जे का धैर्यवान और सहृदय श्रोता मैंने दूसरा नहीं देखा।

मजे की बात यह है कि बोहराजी के परिश्रम की वात्स्यायनजी ने कद्र की। पर वह किताब छपी ही नहीं। पच्चीस साल बाद कभी यह प्रसंग मुझे अचानक खयाल आया। वाणी प्रकाशन ने उसे अब प्रकाशित किया है।

माउंट आबू की एक और याद। सर्किट हाउस में कवि प्रकाश आतुर ठहरे हुए थे। उनकी कविता का तो पता नहीं, पर आदमी उम्दा थे। कांग्रेसी झुकाव के चलते राजस्थान साहित्य अकादमी के अध्यक्ष थे। मुझसे प्रेम रखते थे। उस रोज उनका जन्मदिन था। बोले, अज्ञेयजी यहां हैं। तुम कहो तो शाम को यहीं आ जाएंगे। तुम्हारी बात टाल नहीं सकते।

मैं बहकावे में आ गया। हवाई गुरूर का बोध हुआ। मैंने कहा, जरूर आएंगे। और जाकर वात्स्यायनजी को बुलावा सुपुर्द किया। वे कुछ सोचने लगे। तब तक मैं भी जमीन पर आ चुका था। अपराध-बोध से ग्रस्त-सा बोला- चलेंगे? उन्होंने कहा- आपने आतुरजी को क्या यह कहा कि मैं आऊंगा? मैंने कहा- जी! बोले- इनकार कर दूं तो इसमें आपकी हेठी होगी। शाम को साढ़े सात बजे आइए, चलेंगे। मुझे थोड़ी राहत तो मिली, पर मन खिन्न रहा।

अज्ञेय, दरअसल, साहित्य के क्षेत्र में सरकारी संरक्षण के खिलाफ थे। मानते थे कि कुछ कलाओं में सरकारी संरक्षण की जरूरत हो सकती है, पर साहित्य का उससे अहित होता है क्योंकि वह लेखक को परमुखापेक्षी बनाता है। सरकारी सहायता के साथ राजनीतिक दलों का हस्तक्षेप चला आता है। राजस्थान साहित्य के मामले में यह बात सौ फीसद सही थी; भाजपा सरकार आई तो प्रकाश आतुर की जगह दक्षिणमार्गी दयाकृष्ण विजय ने ले ली! आगे उसी दिशा में लेखकों के जुड़ाव-सम्मान का सिलसिला चल पड़ता था।

फिर वात्स्यायनजी को लेखक समाज की शाम की बैठकों की हकीकत भी मालूम रही होगी। बहरहाल, शाम को जब हम पहुंचे तो आतुरजी के कमरे में डॉ. मनोहर प्रभाकर और सावित्री परमार भी आमंत्रित थे। बीच में टेबल पर शराब की बोतल रखी थी। मेरे होश उड़ गए। मांस-मदिरा को छूना मैं बुरा समझता था। गदगद आतुरजी ने मदिरा पैमाने में ढाल दी। मैंने वात्स्यायनजी की सेवा में पानी उंडेलने का उद्यम किया। वात्स्यायनजी ने बहुत आहिस्ता हथेली हिलाते कहा- कुछ इसका जायका भी रहने दीजिए! वे बोले तो मेरी जान में जान आई।

बाद में चाय के मामले में भी उनसे ऐसी ही सीख मिली, जब दार्जीलिंग की पत्ती के घोल में मेरे दूध-चीनी के मिश्रण पर उन्होंने विनोदी नुकताचीनी की! उनसे बड़ा रसिक मैंने नहीं देखा। पीने के तो खास नहीं, पर अच्छे खाने के वात्स्यायनजी बहुत शौकीन थे। जयपुर आते तो ‘नीरोज’ रेस्तरां जरूर जाते। वहां का कीमा उन्हें पसंद था। उन्हें पता था कि मांस-मछली मैं नहीं छूता, तो कभी पूछते नहीं थे। रेस्तरां में रोटी की तश्तरी बाईं तरफ रखने को वे मिथ्याचार का नमूना मानते थे। एक दफा बोले कि दरअसल पश्चिम में लोग छुरी दाएं हाथ में रखते हैं और खाना बाएं हाथ के कांटे से खाते हैं। पर हम भारतीय तो सीधे हाथ से खाना खाते हैं। तब उलटे हाथ की तरफ रोटी रखकर उसे सीधे हाथ से उठाने में क्या तुक है! सीधे उठाना है तो तश्तरी भी सीधे हाथ को रखो!

एक बार वे फिर माउंट आबू आए। इस दफा राजस्थान लेखक सम्मेलन में शिरकत के लिए। वहां से उनके साथ उदयपुर और आगे नाथद्वारा जाना हुआ। खाने-पकाने के शौकीन अरुण कुमार (अब पानीबाबा) तब राजस्थान पत्रिका के उदयपुर संस्करण के संपादक थे। वे भी साथ हुए। नाथद्वारा मंदिर में पहले हमने दर्शन किए। वात्स्यायनजी घड़ी भर के लिए खुलने वाले मंदिर के पट के सामने निर्विकार खड़े रहे- न आस्तिक की तरह, न नास्तिक की बेरुखी में। उसके बाद जमीन पर बैठकर ‘प्रसाद’ यानी पत्तल को ग्रहण किया।

आप जानते होंगे, नाथद्वारा परिसर में शुद्ध घी के ‘कुएं’ हैं। ‘ठाकुरजी’ के लिए छप्पन भोग बनाने में इतना घी लगता है कि उसे कुओं में ही जमा किया जा सकता है। पानी की तरह घी बाल्टी से उलीचा जाता है। मैं मंदिरमार्गी तो नहीं, पर नाथद्वारा के उन व्यंजनों का स्वाद यकीनन दिव्य होता है। तीनों ने पत्तल के सारे व्यंजन चट का डाले। हमने मुंह साफ भी कर लिया, पर अरुण कुमार जी खाली पत्तल में अभी भी कुछ खोज रहे थे। देखा, वे सूखे पत्तों में फंसी एक-एक सींक निकाल कर उसमें सने खाद्य का भोग कर रहे हैं।

इससे पहले कि मैं हैरानी प्रकट करूं, वात्स्यायनजी ने मेरे कान में कहा- वैष्णव संप्रदाय के आस्थावान लोग प्रसाद को गहरी भावना से लेते हैं, इसलिए सींक का प्रसाद भी जाया नहीं होने देते। मुझे अपने अल्पज्ञान पर खीझ अनुभव हुई।

जैसे उनसे निखालिस पेय का सलीका पाया, दक्षिण भारत- जहां वे किशोरावस्था में रहे- के व्यंजनों की समझ भी अर्जित की। अपनी अंबेसेडर कार तेजी से हांकते हुए अंबेसेडर होटल पहुंचते और भीतर चलने वाले दक्षिणी भोजन के रेस्तरां ‘दासप्रकाश’(अब बंद) में ले जाते। शायद मेरे शाकाहार की कद्र में! डोसा-वडा को छोड़कर वहां कुछ भी आजमाने की सूझ देते। वहां तीन बार गए। इला जी- वे भी शाकाहारी थीं- हर बार साथ थीं। दक्षिणी रसोई कितनी विविध है, यह मैंने तभी जाना। या बाद में कभी दक्षिण जाने पर।

मोटापे की चिंता में मैंने खाने में कमी की। पर वजन घटता न था। यों वात्स्यायनजी भी अच्छी-खासी कद-काठी के थे। मेरे प्रयासों में उन्होंने एक उपाय का इजाफा किया। उन्होंने सुझाया, खाने से पहले खूब मट्ठा पीया करो। उसके बाद खाने की मात्रा अपने आप कम होगी!

अभिजात कहे जाने का खतरा है, फिर भी बता दूं कि ब्राउन-ब्रेड नामक रोटी के दर्शन सबसे पहले वात्स्यायनजी के घर खाने की मेज पर किए। बीकानेर में तो मैदे की सफेद डबलरोटी भी खास चलन में न थी, आटे (या आटों) की भूरी-मटमैली ब्राउन-ब्रेड की क्या बिसात। वात्स्यायनजी मशीन में उस ब्रेड का कतला खुद सरकाते। सेंक कर, अदा से उस पर मक्खन पसार कर मेहमानों को पेश करते। श्रेष्ठ ब्राउन-ब्रेड का ठिकाना बताना भी नहीं भूलते थे कि वह अशोका बेकरी की होती है। अब इन चीजों की थोड़ी जानकारी मुझे हो गई है। अरुण कुमार जी- जो पड़ोसी हैं- के आधिकारिक हवाले से कह सकता हूं कि अरविन्दो आश्रम की डबलरोटी दिल्ली में श्रेष्ठ है!

कहना यह कि चिंतन और सृजन में ही नहीं, खाने-पीने, पहनने-ओढ़ने, चलने-फिरने, सुनने-बोलने और यहां तक कि न बोलने में भी मैंने अज्ञेय में एक अनूठी सुरुचि देखी। ऐसी सुरुचि का धनी व्यक्ति कभी रूखा या बेजौक नहीं हो सकता। कहने वाले कहें।

अज्ञेय पढ़ते खूब थे। अक्सर लेटे-लेटे; आराम और इत्मीनान की मुद्रा में। यों यह सिलसिला उनकी हर मेज पर देखा जा सकता था। एक बार बैठक की गोल मेज पर रखी किताबों को मैं उलट-पलट कर देख रहा था। एक किताब सूसन के. लेंगर की ‘फीलिंग एंड फार्म: ए थियरी ऑफ आर्ट’ थी, दूसरी चेखव की प्रेमिका लिडिया एविलोवा के संस्मरणों का अनुवाद ‘चेखव इन माइ लाइफ’। बाद में पता चला कि दोनों किताबें मांगी हुई हैं, जबकि घर में किताबें रखने को ठौर न थी! पहली किताब निर्मल वर्मा के यहां से आई थी, दूसरी पर राजेंद्र यादव नाम लिखा था। बाद में अज्ञेय बोले- हिंदी में ये दोनों ‘‘सबसे वेल-रेड’’ लेखक हैं!

राजेंद्रजी से मैंने इस प्रसंग का जिक्र किया। उन्होंने कहा, वह किताब उनसे शायद रघुवीर सहाय या सर्वेश्वर दयाल ले गए थे।

एक किताब उन्हें देने का सौभाग्य मुझे भी प्राप्त हुआ। वह उनकी अपनी पहली काव्यकृति ‘भग्नदूत’ थी। हनुमान चालीसा की तरह गुटके के आकार में लाहौर से छपी किताब मुझे बीकानेर के लेखक-अनुवादक रामनरेश सोनी ने दी थी। मैंने वात्स्यायनजी से इस बात का जिक्र किया। एक दिन इला जी ने कहा- ओम, वह किताब तुम वत्सल को दे दो! उनके पास नहीं है। मैंने दे दी। उन्हीं की थी!

वात्स्यायनजी नए लेखकों को भी बहुत पढ़ते थे। तभी अधिकार से कह सकते थे कि ‘आज की कविता बहुत बोलती है, जबकि कविता का काम बोलना है ही नहीं।’ युवा लेखकों की चिट्ठियां भी उन्हें बहुत आती थीं।। कुछ युवकों से सिलसिलेवार पत्राचार चलता था। पता नहीं कैसे, पर कमोबेश हर चिट्ठी के जवाब के लिए वक्त निकाल लेते थे। रोज नहीं। फुरसत का कोई एक रोज। जवाब देकर मूल पत्र पर दर्ज करते ‘उत्तरित’ और साथ में तारीख! उनके घर से निजी कागजात-पांडुलिपियों आदि के जो बीसेक बक्से मिले हैं, उनमें ज्यादातर पत्र-व्यवहार है। एक पत्राचार छप्पन साल पुराना देखिए: विजयमोहन सिंह (अब प्रतिष्ठित आलोचक) ने इलाहाबाद के इविंग क्रिश्चियन कॉलेज के छात्रावास से लिखा: ‘शेखर’ पढ़कर मैं आपको अपने काफी निकट महसूस कर रहा हूं... मेरे प्रिय लेखक शरतचंद्र रहे हैं, पर मेरी सबसे प्रिय पुस्तक ‘शेखर’ है... ‘शेखर’ की आलोचनाओं को भी पढ़ता रहा हूं। मुझे दुख होता है कि आपने इनका मुंह तोड़ उत्तर क्यों नहीं दिया। यदि आप आज्ञा दें तो मैं अपनी अल्पमति से इनका उत्तर देने की चेष्टा करूंगा यदि आप मेरी इसमें सहायता करें... विजयमोहन सिंह (10.11.54)

उस जमाने में साधारण डाक भी आज के कूरियर से पहले पहुंचती होगी। दस नवंबर के पत्र का जवाब अज्ञेय ने तेरह नवंबर को ‘उत्तरित’ कर दिया: ‘‘रचना किसी को प्रिय लगे, इससे हर लेखक प्रसन्न होता है... आलोचना की हिंदी में बहुत गिरी हुई अवस्था है। प्रशंसा और निंदा दोनों ही निराधार या बहुत कम आधार लेकर होती है... लेकिन साहित्य का मूल्यांकन अन्ततोगत्वा पेशेवर आलोचक नहीं, विवेकशील पाठक करते हैं।... कृतिकार का श्रेष्ठ साधन (और कह लीजिए अस्त्र) उसकी कृति ही है: अगर वह कोई काम नहीं कर सकती तो उसकी पैरवी से वह काम कैसे होगा?’’

वात्स्यायनजी को कला की गहरी समझ थी। लेखक की जगह उन्होंने पहले चित्रकार और बाद में मूर्तिकार बनने के सपने  देखे थे। सतीश गुजराल की पहली चित्र प्रदर्शनी के लिए दिल्ली में जब कोई दीर्घा नहीं मिल रही थी, इंदरकुमार गुजराल ने अज्ञेय के घर पहुंचकर मदद की गुजारिश की। वात्स्यायनजी ने युवक सतीश की कलाकृतियां मंगवाई और बाद में जनपथ पर प्रदर्शनी की व्यवस्था कराई। इस प्रसंग का जिक्र इंदरकुमार गुजराल ने अज्ञेय की मृत्यु पर लिखे लेख में किया है और सतीश गुजराल ने अपनी जीवनी में भी।

वात्स्यायनजी का घर अनेकानेक कलाकृतियों से सुसज्जित था। बैठक में ठीक सामने की दीवार पर एक कृति चित्रकार-कथाकार रामकुमार की थी। उसके बारे में एक बार उन्होंने बताया कि अपने जन्मदिन पर वे कहीं बाहर थे। इला जी भी घर पर नहीं थीं। पीछे रामकुमार बगैर इत्तला आए और यह कलाकृति रखकर लौट गए! वात्स्यायनजी के कहने पर रामकुमारजी ने कविताओं के अंगरेजी अनुवाद की पुस्तक ‘नीलाम्बरा’ के लिए अनेक रेखांकन बनाए थे।

अज्ञेय के जन्मदिन पर एक बार कुमार गंधर्व ने स्वेच्छा से कैवेंटर ईस्ट की बगिया में गाने की इच्छा जाहिर की। घरेलू महफिल जमना तय हो गया। अभी इला जी बैठने के बंदोबस्त को सलीका दे रही थीं कि कुमारजी संगीतकारों के साथ शाम ढलने से पहले आ पहुंचे। व्यवस्था के निरीक्षण में उन्होंने खुद हाथ बंटाया और फिर अनवरत तीन घंटे निर्गुण संगीत की धूनी रमाई।

अंत में थोड़ी घर की बात; क्षमायाचना के साथ। पिछले दिनों बेटे का जयपुर में विवाह हुआ। वहीं पर चिकित्सक है। विवाह की घड़ी में तीन दिवंगतों की याद ने बहुत सताया। अपनी दादी की, जो पोते को गोद खिलाने की आस लगाए उसके जन्म से कुछ पहले चल बसीं। प्रभाष जोशी जी की, जो उसे एमबीबीएस पूरा करते ही संभावनाओं और ठिकानों की राह सुझाते थे। और वात्स्यायनजी की, जिन्होंने बेटे का नाम रखा था- मिहिर!

मृत्यु से कुछ रोज पहले इला जी ने हम सबको घर बुलाया था। पत्नी को नेपाली मंगलसूत्र दिया। बेटी को धन। बेटे के सिर पर हाथ फेरा और फिर एक नीले रंग का जैकेट देते हुए बोलीं: यह वत्सल का है, अब तुम्हें पूरा आएगा।

वह वस्त्र हम सबको पूरा आया है। हमारे लिए घर में वह अज्ञेय की शाश्वत मौजूदगी है। उसकी गरमाई घर में हरदम महसूस होती रहेगी।

(समाप्त)

लेखक ओम थानवी वरिष्‍ठ पत्रकार और जनसत्‍ता के संपादक हैं.

Comments
Add New Search RSS
Agey ko gey banayen
sanjay singh 2010-07-29 10:51:41

sir, samapt nahin karen. ek sans me padh gaya pura byora. laga abhi bahut kuchh hai aapke pas batane ko, pls, ese jari rakhe.
maine agey jee ko patna me dekha tha. patna chidiyaghar ke tree house me ve thahre the. suchna milne par gaya tha, mila tha. unki kitaben to pahle se hi padhta raha tha.
Anonymous 2010-08-05 15:36:53

:D
Write comment
Name:
Email:
 
Title:
:D:angry::angry-red::evil::idea::love:
:x:no-comments::ooo::pirate::?::(
:sleep::););)):0
 

Latest

Popular