: पत्रकारिता के क्षेत्र में आज हर वर्ग, समाज का व्यक्ति उतर आया है : पुलिस ने अब अपने मुखबिरों को पत्रकार बना दिया है : कभी सम्मान की नजर से देखे जाने वाले पत्रकार और पत्रकारिता को आज समाज में हिकारत की नजर से देखा जाने लगा है, और इसके लिए वे सब जिम्मेदार हैं, जो ऐसे लोगों को इस क्षेत्र में मौका देते हैं, जिनका न कोई दृष्टिकोण होता है न सामाजिक सोच। वे सिर्फ उल्टे सीधे तरीके से धन कमाने के लिए इस पेशे में आते हैं, ब्लैकमेल करना और पत्रकारिता के नाम पर झूठा रौब गांठना ही उनका काम होता है। फिर भी पत्रकारिता को लेकर चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं।पत्रकारिता की घटती लोकप्रियता और साख के बावजूद लोगों का रुझान अब भी पत्रकारिता में बना हुआ है।
एक ताजा सर्वे के अनुसार देश में 63 फीसदी पुलिस वाले, 27 फीसदी ग्रामीण शिक्षक और 73 फीसदी वकील अपने पुत्रों और पुत्रियों को पत्रकार महज इसलिए बनाना चाहते हैं कि पत्रकारों से बड़े-बड़े लोग घबराते हैं, इसमें भी टीवी वाले पत्रकार तो कहीं भी किसी के आगे माइक लगाकर उसे मंजन कराने लग जाते हैं। इनके अलावा सरकारी विभागों में मोटी कमाई वाली सीटों पर बैठे 20 फीसदी राजपत्रित अधिकारी और 41.2 फीसदी बाबू अपने पुत्र-पुत्रियों को इस पेशे में भेजने के इच्छुक हैं, जबकि इस पेशे का कड़वा सच ये है कि इस पेशे में काम करने वाला बड़े से बड़ा पत्रकार अपने पुत्र पुत्रियों के लिए पत्रकारिता के पेशे को महफूज नहीं मानता। क्योंकि वह हकीकत से वाकिफ होता है। कुल मिलाकर सभी छोटे-छोटे बड़े पत्रकारों में मात्र 2.3 फीसदी लोग ही अपने पुत्र-पुत्रियों को अपने पेशे में लाना चाहते हैं। कुछ लोग ऐसे भी हैं जिन्हें कहीं कोई काम नहीं मिलता तो वे पत्रकारिता को ही बेहतर समझते हैं।
समाज के लिए समर्पित पत्रकारिता में हर किसी के लिए द्वार खुले हुए हैं। यही एक ऐसा क्षेत्र हैं यहां गरीब और अमीर बुद्धु और विद्वान दोनों को काम करने का मौका मिल जाता है, और किसी क्षेत्र में ऐसी उदारता नहीं है। पत्रकारिता के क्षेत्र में आज हर वर्ग, समाज का व्यक्ति उतर आया है। उदाहरण के लिए यहां नाम भी दिये जा सकते हैं, लेकिन किसी की भावनाओं को ठेस नहीं लगे इसी उद्देश्य से, उन टैक्सी चालकों, जूता गांठने वालों, चोरी करने वालों, मिलावट खोरों और गर्मगोश्त के दलाल जो पत्रकारिता कर रहे हैं, उनके नाम नहीं लिखे जा रहे हैं।
पुलिस के लिए मुखबिरी करने वाले भी पत्रकार हैं, पुलिस ने अब अपने मुखबिरों को पत्रकार बना दिया है। चूंकि दरोगा जी का एक मुखबिर पत्रकार उनके कप्तान की मुखबिरी कर उन्हें सब कुछ बता देता है। यहां तक कि कहां किस थाने में किस की पोस्टिंग होने वाली है, किस चौराहे पर किस की ड्यूटी लगने वाली है, फलां घटना के लिए जिम्मेदार किस पुलिस वाले पर गाज गिरने वाली है या फिर कोई मामला बनाना बिगाड़ना हो तो ये पुलिसिया मुखबिर पत्रकार अपने दरोगा जी की झूठी तारीफ भी कर देते हैं। जिसको जहां मौका मिल रहा है वह पत्रकारिता के नाम पर अपना काम चला रहा है। अगर ऐसी ही स्थिति बनी रही तो पत्रकारिता के और रसातल में जाने से रोक पाना असंभव हो जायेगा।
लेखक ऋषि दीक्षित पत्रकार हैं.