: भाजपा अध्यक्ष की विरदावली गाने को लालायित हैं : दैनिक जागरण के संपादक हरिमोहन गुप्त के नाम से जो छपता था उसे सोमदत्त शास्त्री लिखते थे : गडकरी की भाषा ना बोलें प्रभात झा : सोमदत्त शास्त्री को न जाने दिग्विजय सिंह से क्या उम्मीद थी, जो उन्हें प्रभात झा के बारे में कही गई उनकी बातें नागवार गुजरी। सवाल यहां पत्रकार प्रभात झा का नहीं है। दिग्विजय सिंह ने जो कुछ कहा वो भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष प्रभात झा द्वारा अर्जुन सिंह पर की गई टिप्पणी पर कहा न कि पत्रकार प्रभात झा को। कहा तो दिग्विजय सिंह ने वो भी नाम लेकर, फिर बुरा सोमदत्त शास्त्री को क्यों लगा? अब चूंकि प्रभात झा चौबीसों घंटे पत्रकार नहीं बल्कि भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष हैं। और वो चाहेंगे भी यही कि मीडिया में हमेशा बने रहें। चाहे इसके लिए भाजपाई संस्कृति को ओढ़ना और बिछाना ही क्यों न पड़े। और उन्होंने वही किया भी। और करें भी क्यों नहीं, जब उनके राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी अटल जी की गेरूआई राजनीति की गरिमा में चार चांद लगाने की जगह उसकी भद्द करने में लगे हैं तो प्रभात भला पीछे कैसे रह सकते हैं।
प्रभात झा तो इस बात से वाकिफ हैं, उनके शब्द वही होते हैं, केवल समय और व्यक्ति को देखकर कहने पर उसका असर बदल जाता है। प्रभात झा यदि गडकरी की भाषा बोलेंगे तो दिग्विजय सिंह को भी अपनी कांग्रेसी संस्कृति के दायरे से बाहर निकलना ही पड़ेगा, यदि नहीं निकलेंगे तो लोग क्या कहेंगे? राजनीति का इतिहास उन्हें क्या कहेगा? यही ना,अर्जुन सिंह को अपना राजनीतिक गुरू होने का दावा करते हैं और उनके ही गुरू की तुलना रावण से भाजपा अध्यक्ष ने की और वो खीसें दिखाते रहे। भला एक ठाकुर मौन कैसे रह सकता है। राजनीति के संस्कार दूसरे होते हैं और पत्रकारिता की दूसरी। वैसे राजनीति और पत्रकारिता दोनों का स्तर अब एक सा है। इससे इनकार नहीं कि आज पत्रकारिता राजनीति की रखैल हो गई है। इसीलिए प्रभात झा तो समझ ही सकते हैं कि पत्रकारिता को दिनौधी और रतौंधी क्यों हो जाती है समय समय पर।
सोमदत्त शास्त्री का प्रभात झा का पक्ष लेने से ऐसा लगता है कि वो भी अन्य पत्रकारों की तरह मध्य प्रदेश भाजपा अध्यक्ष की विरदावली गाने को लालायित हैं, जिसे वो मीडिया के जरिये उजागर कर रहे हैं। किसी की भी विरदावली तभी गाई जाती है, जब कोई अति करीब होता है या फिर उससे कोई काम होता है अथवा कभी उसने उसे उपकृत किया हो तो उसका ऋण उसकी विरदावली गा कर उतारने का प्रयास करता है। सोमदत्त शास्त्री किस तरह प्रभात झा से उपकृत हुए हैं ये तो वही बता सकते हैं। या उपकृत होना चाहते हैं?
सोमदत्त शास्त्री से मेरा आमना सामना 1998 में हुआ। वो और जागरण भोपाल से कई लोग रीवां आये थे। दैनिक जागरण रीवां के संपादक मदन मोहन गुप्ता लोकसभा चुनाव लड़ रहे थे। पूरा गुप्ता परिवार रीवां में डेरा डाले हुए था। सेमादत्त शास्त्री उस वक्त भोपाल दैनिक जागरण के प्रभारी थे और मै रीवां दैनिक जागरण का प्रभारी। चौंकाने वाली बात यह है कि वो लिखते स्वयं थे और दैनिक जागरण के स्थानीय संपादक हरिमोहन गुप्त का उस लेख के नीचे नाम छपता था। मैं समझता था कि हरिमोहन गुप्त अच्छे लेखक हैं। लेकिन यह सच नही था। मेरा भ्रम भी जल्द टूट गया।
1998 में रीवां दैनिक जागरण के संपादक मदन मोहन गुप्ता लोकसभा का चुनाव लड़ रहे थे, उस वक्त एक मैटर मैंने लिखा था और उसके आगे एक पैरा सोमदत्त शास्त्री जोड़ दिये। दूसरे दिन मैंने देखा कि प्रथम पृष्ठ पर हरिमोहन गुप्त के नाम से टिप्पणी के रूप में छपा था। तब मुझे पता चला कि अभी तक जो मैटर हरिमोहन गुप्त के नाम से छपता आया है उसे सोमदत्त शास्त्री लिखते थे। ऐसा लोकसभा चुनाव होने तक चला। शास्त्री का अपना यह निजी गुण है, किसी को भी उपकृत करने का। वैसे भी पत्रकार यही तो करते आया है अखबार मालिकों के लिए। अब वो प्रभात झा को भी दिग्विजय सिंह से बेहतर बताकर उपकृत कर रहे हैं।
यह नहीं देख रहे हैं कि हमारे समाज में रावण को बहुत ही हेय नजरों से देखा जाता है, जबकि सच्चाई यह है कि रावण जितना बुद्धिमान कोई नहीं था। रावण तो शास्त्रों का ज्ञाता था। उसके जैसा विद्वान और शिव भक्त कोई नहीं हुआ। बावजूद इसके कोई भी अपनी तुलना रावण से नहीं करना चाहता दुनियां में। फिर प्रभात ने अर्जुन सिंह की तुलना रावण से कर क्या कहना चाहा। अर्जुन को तो पूरा देश राजनीति का चाणक्य कहता है। वैसे भी इस समय भाजपा में बेअदबी सियासत का दौर है। ऐसे दौर में प्रभात झा को उनके ही अंदाज में और भाषा में दिग्विजय सिंह ने जवाब दिया तो किसी को भी एतराज नहीं होना चाहिए। इसलिए भी कि राजनीति सभ्य बनाने की पाठशाला नहीं है। राजनीति के लॉज में ठहरने वाला सभ्य व्यक्ति, असभ्य होकर ही निकलता है। दो सियासियों की जुबानी जंग में किसी एक का पक्ष लेना और दूसरे की खिलाफत करना पत्रकारिता के उसूलों में नहीं है।
लेखक रमेश कुमार रिपु वरिष्ठ पत्रकार हैं.
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