: खेल में खरी खरी : भारतीय ओलंपिक संघ को अपने गिरेबान में झांककर देखना चाहिए : वो करिश्माई मुरली के जादू से अभिभूत था : पिछले दिनों पत्नी को हुए हार्ट अटैक और उसके बाद की बाईपास सर्जरी ने परेशान कर रखा था। लेकिन इसी दौरान खेल की दुनिया में कुछ इतनी अहम् घटनाएं घटी कि मैं चाह कर भी विमुख नही रह सका। स्पेन ने जहां जन्मपत्री को ठोकर मारते हुए फीफा विश्व कप का ताज पहली बार वरण किया, वहीं पहली बार यह भी देखने को मिला कि भारतीयों को अंधविश्वासी कहने वाला पश्चिम स्वयं किस कदर अंधविश्वासी हो चुका है। 8 टांगों वाला जलचर ऑक्टोपस, जिसे अब पॉल बाबा कहा जाने लगा है, कि विश्वकप के दौरान की गयी भविष्यवाणियां चर्चा का प्रमुख विषय रहीं।
पॉल बाबा को देखकर भारतीय जनमानस सड़कों पर बैठकर तोते के जरिये भाग्य बांचने वाले ज्योतिषियों के अस्तित्व के बारे में भी सोचता रहा। और यह भी कि क्या ये पंछी या जलचर भगवान या भविष्यदृष्टा होते हैं? खैर, फुटबॉल के जादूगर पेले पहली बार स्पेन को विजेता होता देखकर फूले नहीं समाए होंगे। हों भी क्यों न, आखिर पहली बार भविष्यवाणी की प्रेतबाधा से मुक्त जो हुए हैं पेले। ये बात दीगर है कि पाल बाबा के सुरूर में पेले की सच हुई भविष्यवाणी लोगों को याद नहीं आयी।
चलिए, फुटबॉल में तो हम दूसरों का खेल देख-देखकर चकित-मुदित होते रहे। 'कौन कहां' की सूची में विश्व में 133वें स्थान पर काबिज भारत के फुटबॉल प्रेमी दूसरों के प्रदर्शन पर ताली बजाने के अलावा और कर भी क्या सकते थे। सरकार के खेल संघों के लिए जारी दिशा निर्देशों पर भड़क उठनेवाले भारतीय ओलंपिक संघ को अपने गिरेबान में झांककर देखना चाहिए। अन्त:करण को टटोलना चाहिए कि वो देश में फुटबॉल सहित खेलों के उन्नयन के लिए हैं या उनके पतन के लिए। इतिहास साक्षी है कि खासतौर से ओलंपिक से जुड़े खेलों के मामले में देश आगे बढ़ने की बजाय पीछे गया है। लेकिन हैरत नहीं होती। हम भारतीय विरोध के मुखर स्वर के बारे में शायद कुछ नहीं जानते। हमारी सबसे बड़ी विडंबना भी यही है कि हमें जो मिलता है उसे सहज भाव से स्वीकार कर लेते हैं। मालूम नहीं कब तक यथास्थिति बनी रहेगी।
अब चलिए क्रिकेट की ओर चलें। ये खेल फुटबॉल नहीं है। ये तो देश का धर्म है। और इस धर्म की पिछले दिनों श्रीलंका में क्या फजीहत हुई ये बताने की जरुरत नहीं। और इसकी भी जरुरत नहीं कि तमिल वैष्णव मुथैया मुरलीधरन ने अपने करियर का जो गौरवशाली, अद्वितीय और ऎतिहासिक समापन किया वो इस खेल के बड़े-से-बड़े देवताओं- सर डोनाल्ड ब्रैडमैन, सुनील गावस्कर और विवियन रिचर्ड्स जैसों को भी नसीब नहीं हो सका था। गॉल टेस्ट शुरू होने के पूर्व मुरली को 800 विकेट के आंकड़े को छूने के लिए 8 विकेट की जरुरत थी और टेस्ट के आखिरी विकेट के साथ ही ऎतिहासिक मील का पत्थर जो उन्होंने रखा, वो आने वाले समय में दादा-दादी, नाना-नानियों की अमर गाथाएँ बनता रहेगा। जिसने भी यह टेस्ट देखा वो करिश्माई मुरली के जादू से अभिभूत था। विश्व क्रिकेट में नंबर एक के दर्जे के साथ पहली बार श्रीलंकाई धरती पर उतरी टीम इंडिया की दस विकेट से हुई फजीहत नेपथ्य में चली गयी। छाए रहे तो मुरली, उनका आठवां आश्चर्य यानी 800 विकेट और डेनिस लिली-मैल्कम मार्शल सरीखे तेज गेंदबाजों सा उनका आतंकित करने वाला कल्पनातीत स्ट्राईक रेट (22.5 रन प्रति विकेट के आसपास का), जो शायद ही किसी स्पिनर का हो सकता है ।
एक सीधा-सादा स्पिन गेंदबाज, जिसे हम श्रीलंका का सचिन तेंदुलकर कहें तो अतिशयोक्ति नहीं होगी, पर वो सचिन तेंदुलकर की तरह भाग्यशाली नहीं रहा। कोहनी में जन्मजात दोष के चलते गेंदबाजी एक्शन को लेकर विवादों में बुरी तरह से घिरे मुरली ने असाधारण इच्छा शक्ति, समर्पण और जज्बे के बल पर 'चकर' की तोहमत लगाने वाले अपने समस्त आलोचकों की जुबान खामोश कर दी। और वे भी इस कालजयी ऑफ स्पिनर की अलौकिक मुरली की तान पर उस दिन थिरकते नज़र आये।
अब जरा टीम इंडिया की खबर ली जाए। खड्गधारी सिंहों की धरती पर अपनी पराजय के लिए खिलाड़ी दोषी हैं या बीसीसीआई ? ये समय इन बातों पर विचार करने का नहीं है लेकिन यहां एक बात जरुर कहनी होगी कि देश का आयकर विभाग अगर भारतीय क्रिकेट बोर्ड को `लालची ' करार देता है तो कहीं से भी गलत नहीं है। उन्हें मतलब है तो सिर्फ गारंटी राशि और प्रसारण से होनेवाली आय से, परिणाम चूल्हे छोड़ भाड़ में जाय, टीम इंडिया हारे या जीते, इससे उनका कोई मतलब नहीं। ये दौरा आनन-फानन में नहीं रखा गया है। ये कार्यक्रम काफी पहले से तैयार किया गया था। मगर टीम को बिना किसी समुचित तैयारी के रणक्षेत्र में उतार दिया गया तो ये निराशाजनक परिणाम आना ही था।
होना तो ये चाहिए था कि विदेशों में टेस्ट सीरीज खेलने के पहले टीम को कम-से-कम दो तैयारी मैच खिलाए जाते। जिसमें एक तरफ रहती शेष भारत की टीम और दूसरी तरफ टीम इंडिया। मैच अभ्यास से बढ़कर कोई अभ्यास नहीं होता। ये ठीक है कि टीम इंडिया मायने 120 करोड़ में 15 सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी औऱ नि:संदेह वे महामानव हैं। और उनसे वो सारी उम्मीद की जा सकती है जो एक सामान्य जन से हम नहीं कर सकते हैं। लेकिन हम यह भी न भूलें कि वे हैं तो हांड़-मांस के ही। वे कोई रोबो नहीं हैं कि बटन दबा दिया और वांछित परिणाम आ गया। कुल मिलाकर खिलाड़ियों का उतना दोष नहीं हैं जितना बोर्ड के नेतृत्व वर्ग का। बहुत मुश्किल से टेस्ट में जो साख बनी है, उसको बरकरार रखने की जिम्मेदारी सिर्फ खिलाडियों की ही नहीं बल्कि बोर्ड की भी है और अब उसे ये बात समझनी ही होगी।
लेखक पदमपति शर्मा देश के जाने-माने खेल पत्रकार हैं.
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