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अज्ञेय किसी एक विचारधारा के पिछलग्गू होने के खिलाफ थे

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ओम थानवी: यादों का झरोखा 4: रवींद्रनाथ ठाकुर के बाद भारतीय साहित्य में अज्ञेय से बड़ा व्यक्तित्व नहीं हुआ : ऐसी ‘क्रांति’ से उनका विश्वास उठ चुका था : पिछली दफा लखनऊ लेखक शिविर में अज्ञेय के उद्बोधन के बीच एक युवा कवि के व्यवधान का जिक्र किया था। इस तरह के नियोजित-अनियोजित हस्तक्षेप उनके कार्यक्रमों में होते रहते थे। दरअसल अज्ञेय और उनके समानधर्मा लेखकों का हिंदी समाज में असर व्यापक था। तत्कालीन सोवियत राजनीति की प्रेरणा और साधनों पर गोलबंद हुए लेखक संगठनों के एजेंडे में मानो एक अहम लक्ष्य अज्ञेय की छवि को ध्वस्त करना भी जुड़ गया था। इतनी अफवाहें और आक्षेप दूसरे किसी लेखक को शायद ही झेलने पड़े हों! अज्ञेय पर लगाए गए ओछे आरोपों की सूची बनाई जाए तो उसके आधार पर छोटा-मोटा शोध-प्रबंध तैयार किया जा सकता है। अभिजात और व्यक्तिवादी थे, पूंजीवादी और दक्षिणपंथी थे, प्रतिगामी और प्रतिक्रियावादी थे, सीआईए के एजेंट थे, फोर्ड फाउंडेशन और कांग्रेस फॉर कल्चरल फ्रीडम से अमेरिकी धन ऐंठते थे, ब्रितानी एजेंट थे और उसी चाल में फौज में शामिल किए गए, दूसरों की चीजें अपने नाम से छपवाते थे, प्रगतिहीन समाज-विरोधी साहित्य के प्रणेता थे...।

कुछ परस्पर विरोधी आक्षेप भी : कभी कहा गया, आधुनिकता से ग्रस्त हैं, तो कभी परंपरावादी और पुराणपंथी बताए गए। कभी नपुंसक ठहराए गए, कभी एक नाजायज संतान के पिता! इस तरह के नियोजित दुष्प्रचार से अज्ञेय का कितना नुकसान हुआ कहना मुश्किल है। व्यथा को वे झेल गए और इतना कुछ सार्थक काम कर गए कि चरित्र-हनन की पहुंच से ऊपर उठ गए। लेकिन उस अभियान से उन पाठकों का नुकसान जरूर हुआ जो प्रचारकों के बहकावे में आ गए। एक पीढ़ी अंधेरे में धकेल दी गई : कइयों ने अज्ञेय का साहित्य पढ़ा तक नहीं और दूसरों की राय ओढ़ ली, कुछ ने अपने पूर्वग्रहों का चश्मा लगाकर पढ़ा।

1977 की बात है। कलकत्ता में वे अपनी लेखन प्रक्रिया पर बोल रहे थे। कल्याणमल लोढ़ा सभा के अध्यक्ष थे। एक युवा लेखक ने उनके वक्तव्य के
बीच शोर मचाना शुरू कर दिया- आपकी तरह रईसी में जीने वाला लेखक रचनाधर्मी कैसे हो सकता है? वात्स्यायनजी ने जवाब दे दिया और कहा कि अपनी पूरी बात कह लूं, उसके बाद सवाल रखें तो अच्छा होगा। थोड़ी देर बाद युवा लेखक फिर सक्रिय हो गए; इस बार कुछ ज्यादा उग्र अंदाज में। बोले, सुविधाजीवी लेखकों ने हिंदी का बहुत नुकसान किया है। आपने सबसे ज्यादा किया है। आपके हाथों में मुक्तिबोध का खून लगा है। आप चाहते तो मुक्तिबोध की असमय मृत्यु न होती!

अज्ञेय ने जीवन में तरह-तरह के आरोप सुने और झेले होंगे, पर यह अजीबोगरीब आरोप था। उन्होंने इतना ही कहा कि यह विचार अपने आप में क्रूर और बेमानी है। मुक्तिबोध का मैं सम्मान करता था और उनके लिए जो कर सकता था किया, उसका ब्योरा देने की जरूरत नहीं है। बहरहाल, उस शोर-शराबे में वह कार्यक्रम चौपट हो गया। शोर मचाने वाले युवक को और चाहिए क्या था!

कहना न होगा, ऐसे पूर्वग्रह ज्यादातर वामपंथी लेखकों में देखे गए। लेकिन इससे यह निष्कर्ष निकालना भूल होगी कि सभी वामपंथी खयालतन अज्ञेय-विरोधी रहे हैं। कृष्णदत्त पालीवाल भारतीय ज्ञानपीठ के लिए अज्ञेय रचनावली तैयार कर रहे हैं। अठारह खंडों में हिंदी में किसी लेखक का यह शायद सबसे विशद संकलन होगा। मुझे अज्ञेय और कुछ वामपंथी रचनाकारों का- जिनमें मुक्तिबोध और शमशेर शामिल हैं- पत्राचार देखने का मौका मिला है। अज्ञेय के प्रति उनका आदर और भरोसा कई लेखकों को हैरान करेगा।

एक घटना का मैं गवाह हूं। आठ के दशक में जयपुर के रवींद्र मंच पर प्रगतिशील लेखक संघ का अधिवेशन चल रहा था। युवा लेखकों में बेबात अज्ञेय-निंदा का जुनून तारी था। त्रिलोचन आयोजन के मुख्य अतिथि थे। उनसे रहा नहीं गया। अपने संबोधन में बेहद दुखी स्वर में बोले- भाई (अज्ञेय) के बारे में ऐसे शब्द सुन कर मन व्यथित हो गया है। या तो आप लोगों ने उन्हें पढ़ा नहीं है, या आप उन्हें जानते नहीं। मेरे मन में उनके प्रति बहुत आदर है और मैं उनके बारे में हलकी बात नहीं सुन सकता। उम्मीद करता हूं कि (सम्मेलन में) आगे ऐसी बात नहीं होगी।

दूसरे कई लेखकों-आलोचकों के उदाहरण दिए जा सकते हैं जिनके विचार अज्ञेय से नहीं मिलते थे, पर उनके साहित्य की वे आज भी बड़ी कद्र करते हैं। केदारनाथ सिंह इनमें अव्वल हैं। राजेंद्र यादव और विजयमोहन सिंह दोनों का कहना है कि रवींद्रनाथ ठाकुर के बाद भारतीय साहित्य में अज्ञेय से बड़ा व्यक्तित्व नहीं हुआ। विष्णु खरे ने अज्ञेय की मृत्यु पर ‘नवभारत टाइम्स’ में जो संपादकीय लिखा, वह आज भी याद किया जाता है। राजेश जोशी की हाल में प्रकाशित कृति ‘समकालीनता और साहित्य’ की भूमिका कविता पर अज्ञेय के उद्धरण से शुरू होती है। और अज्ञेय के काव्य की धुरंधर आलोचना करने वाले नामवर सिंह ने कुछ ही समय पहले ‘अकार’ में अज्ञेय की खुले गले से तारीफ की और ‘शेखर: एक जीवनी’ को हिंदी के पांच महान उपन्यासों में एक बताया। पिछले दिनों राजकमल प्रकाशन के स्थापना दिवस पर दिया अपना व्याख्यान अज्ञेय की कविता ‘नाच’ से शुरू कर भी उन्होंने चौंकाया।

हाल के कई कार्यक्रमों में मैंने लक्ष्य किया कि नई पीढ़ी अज्ञेय को बासी आग्रह-दुराग्रहों से हटकर पढ़ने-समझने को उद्यत दिखाई देती है। क्या जन्मशती वर्ष में हिंदी समाज में अज्ञेय के सहृदय पाठ की यह कोई नई आहट है?

एक बार रघुवीर सहाय ने अज्ञेय से पूछा था कि जीवन में आप क्रांतिकारी रहे, आपका सारा कृतित्व मूलत: क्रांति या परिवर्तन लाने वाला है। लेकिन आज जो लोग अपने को क्रांतिकारी मानते हैं, उनके लिए आप लगभग असह्य क्यों हो गए हैं? वात्स्यायनजी ने जवाब दिया था: अब आप मुझे केवल व्यवस्था-विरोधी या नॉन-कन्फर्मिस्ट कह सकते हैं। आज के क्रांतिकारी के पास तो दूसरी व्यवस्था का बंधा-बंधाया ढांचा होता है। सफल हो गए तो दूसरे ढांचे में पहुंच या लोगों को पहुंचा कर फिर यथास्थितिवादी हो जाते हैं।

जाहिर है, ऐसी ‘क्रांति’ से उनका विश्वास उठ चुका था। वे साफ कहते थे कि देश में जो दल अपने को क्रांतिकारी या प्रगतिवादी मानते हैं, वे अपने ढांचे के अलावा किसी दूसरी प्रगति को प्रगति मानने को भी तैयार नहीं होते, ‘‘जो कि सामाजिक अत्याचार का एक रास्ता है’’।

विचारधारा की लीक पर चलने-लिखने वाले अज्ञेय से छड़क खाते थे। लेकिन अज्ञेय की अपनी विचारधारा क्या थी?

दरअसल, अज्ञेय किसी एक विचारधारा के पिछलग्गू होने के खिलाफ थे। व्यावहारिक राजनीति को लेकर उनके विचारों में बदलाव आता रहा, लेकिन स्वतंत्रता और समता में उनकी मूल्यगत आस्था हमेशा कायम रही। एक दफा उन्होंने कुछ ऐसा कहा था कि विचार में मैं अगर अपना ही खंडन करता हूं तो समझिए जड़ होकर एक जगह रुका नहीं हूं, विकासमान हूं; मेरे बाद के कहे (या किए!) को प्रमाण मानिए।

बहरहाल, अज्ञेय के विचार या विश्वास की गति देखिए। उन्होंने सशस्त्र क्रांति यानी हिंसा से राजनीतिक विचार शुरू किया और गांधी जी की अहिंसा के विश्वास पर जाकर ठहरे। भगत सिंह और चंद्रशेखर आजाद वाले क्रांतिकारी दस्ते के वे सदस्य थे। लाहौर में आजाद के कहने पर भगत सिंह और अन्य साथियों को जेल से भगा लाने के लिए एक ही रोज में ट्रक चलाना सीखा। बाद में वह योजना विफल हो गई और धीरे-धीरे उनका दस्ता भी बिखर गया।

दूसरा विश्वयुद्ध छिड़ने पर जब देश पर संकट मंडराया और पूर्वी मोर्चे पर जापानी सेना की घुसपैठ का खतरा महसूस किया गया तो फौज में भर्ती हो गए। असम, बंगाल और बर्मा की सीमा पर भारतीय सेना की मदद करने वाले नागरिकों का भूमिगत संगठन तैयार करने का जिम्मा लेकर। विश्वयुद्ध में जर्मनी, जापान और इटली के फासिस्ट गुट के आक्रमण के खिलाफ लोकतांत्रिक देश तो एक ही थे, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी भी  ब्रितानी सेना का समर्थन कर रही थी।

फिर अज्ञेय मानवेंद्रनाथ राय के नव-मानववाद से प्रभावित हुए। जवाहरलाल नेहरू के करीब रहे। कविता की उनकी एक किताब (प्रिजन डेज एंड अदर पोएम्ज) की भूमिका नेहरू ने लिखी। बाद में नेहरू अभिनंदन ग्रंथ के संपादक मंडल में भी शामिल हुए। लेकिन, दरअसल, एमएन राय के बाद नेहरू के बजाय वे राममनोहर लोहिया से प्रभावित दिखाई देते थे। वे नेहरू के आजादी से पहले के संघर्ष और ‘खतरनाक जीवन’ के खयाल से प्रभावित थे। लेकिन आजादी के बाद नेहरू के आर्थिक विचारों, खासकर विशाल पैमाने के उत्पादन और केंद्रीकरण, के विरोधी हो गए।

लोहिया के हवाले वे अक्सर देते थे। एक बार जोधपुर में मैंने उनसे ‘इतवारी पत्रिका’ के लिए भाषा पर बातचीत की। उन्होंने लोहिया के इस नजरिए को समुचित बताया कि ‘चाहे पवित्र जीवन हो चाहे छिनाली, भाषा ऐसी हो जो सबके काम पूरी तरह आए’।

1983 में जबलपुर के पास बरगी नगर में हुए वत्सल निधि शिविर के उद्घाटन के वक्त उन्होंने नेहरू के विचारों की कटु आलोचना की। बरगी में नर्मदा पर बांध का निर्माण जोर-शोर से चल रहा था। परियोजना के कर्मचारी ही हमारे मेजबान थे। अज्ञेय आधुनिकता की नेमतों पर बोलते हुए नेहरू के बांध संबंधी विचारों पर आ गए। बोले, इन बांधों को ‘‘आधुनिक भारत के मंदिर’’ बताया गया है। यह आने वाला वक्त बताएगा कि ये सचमुच ‘‘मंदिर’’ साबित होते हैं या ‘‘शैतान का घर’’। मुझे याद है, ठीक यही शब्द थे। उनका कहना था कि आधुनिक विकास की अवधारणा यांत्रिक विकास की अवधारणा है जो बुनियादी तौर पर लोक का हित नहीं, अहित साधती है।

बरगी परियोजना पूरी हुई, तब तक अज्ञेय चल बसे। लेकिन तारीख गवाह है कि बरगी बांध पूरा खड़े होते ही बयासी गांवों का जीवन लील गया; एक सौ साठ गांव बांध की डूब से आहत हुए। इंदिरा गांधी की नीतियों के अज्ञेय ज्यादा मुखर आलोचक होकर सामने आए। खासकर आपातकाल में। उन्होंने उस दौर में ‘आतंक’ और ‘बौद्धिक बुलाए गए’ जैसी अनेक कविताएं लिखीं, जो ‘‘महावृक्ष के नीचे’’ संग्रह में संकलित हैं। पूरा आपातकाल कारागार में काटने वाले गिरधर राठी ने इस पर सुखद आश्चर्य प्रकट किया था, जब मैंने बताया कि उन कविताओं पर आपात-अवधि की तारीखें पड़ी हैं।

नवंबर 1976 में अज्ञेय बीकानेर आए। तब रामपुरिया कॉलेज में एक भारी सभा में उन्होंने कहा था: ‘‘देश आतंक के साये में जी रहा है और बौद्धिक समुदाय मौन है’’। असल में अनेक बौद्धिक उस वक्त मौन ही नहीं थे, आपातकाल के हक में वे दस्तखत कर और करवा रहे थे। प्रो. आनंद कृष्ण ने भी एक लेख में लिखा है कि आपातकाल में अज्ञेय ‘‘बहुत क्षुब्ध थे और अपने स्वभाव के अनुसार आक्रोश व्यक्त करते थे।’’ एक बार आनंदजी को वात्स्यायनजी ने (संभवत: हलके अंदाज में) कहा कि वे पशुपालन पर एक शास्त्रीय पुस्तक लिखना चाहते हैं, जिसमें आपातकाल पर टीका होगी कि किस तरह मनुष्य पशुवत बना दिया जा सकता है! आनंद   कृष्ण के अनुसार, ‘‘अक्सर वे अपने यहां आने-जाने वालों को (भी) इस तरह का साहित्य लिखने के लिए उत्साहित करते रहते थे’’।

मेरे पास बरगी नगर शिविर के वक्त की एक रेकार्डिंग है। एक दोपहर अज्ञेय हमें सैर पर भोड़ाघाट ले गए। संभागियों के आग्रह पर संगमरमरी चट्टानों पर बैठे-बैठे धुआंधार प्रपात के नाद के बीच उन्होंने अपनी चुनिंदा कविताओं का पाठ किया। एक कविता ‘संभावनाएं’ सुनाने से पहले उन्होंने कहा,‘‘यह कविता इमरजेंसी में लिखी थी, हालांकि इस उल्लेख की कोई उपयोगिता नहीं है, या शायद हो भी...!’’ कविता यों है:

अब आप ही सोचिए
कितनी संभावनाएं हैं।
-कि मैं आप पर हंसूं
और आप मुझे पागल करार दे दें;
-या कि आप मुझ पर हंसें
और आप ही मुझे पागल करार दे दें;
-या आप को कोई बताए कि मुझे पागल करार दिया गया
और आप केवल हंस दें...
-या कि
हंसी की बात जाने दीजिए
मैं गाली दूं और आप-
लेकिन बात दोहराने से लाभ?
आप समझ तो गए न कि मैं कहना क्या चाहता हूं?
क्यों कि पागल
न तो आप हैं
न मैं;
बात केवल करार दिए जाने की है-
या, हां, कभी गिरफ्तार किए जाने की है।

तो क्या किया जाए?
हां, हंसा तो जाए-
हंसना कब-कब नसीब होता है?
पर कौन पहले हंसे?
किबला, आप!
किबला, आप!

अज्ञेय कविता का पाठ बहुत जानदार करते थे। पर गाते बेसुरा थे। गुनगुनाने का उन्हें शौक था। काव्य-पाठ के वक्त कभी अपने रचे गीत का पन्ना खुलता तो उनका स्वर भी खुल जाता। पाठ के लिए एक कापी में उन्होंने अपनी सुघड़- साथ में उतनी ही स्वच्छंद- हस्तलिपि में चुनिंदा कविताएं करीने से लिख रखी थीं।

आपातकाल से पहले और देर बाद तक जयप्रकाश नारायण से अज्ञेय की बड़ी निकटता रही। जेपी के आंदोलन में वे एमएन राय की छाया देखते थे। जेपी खुद एमएन राय के विचारों से प्रभावित रहे। जेपी के साथ मिलकर 1973 में वात्स्यायनजी ने ‘एवरीमेंस वीकली’ निकाला। उनकी छोटी मगर महत्त्वपूर्ण किताब ‘स्रोत और सेतु’ जेपी के ही नाम है: ‘‘निरंतर सेतु बनाते रहकर जो स्रोत को कभी नहीं भूले, उन लोकनायक जयप्रकाश नारायण को सादर निवेदित’’।

लेकिन इस सबके बावजूद अज्ञेय अपने को गांधी-विचार के ज्यादा करीब पाते थे। ऐसा मैंने पहले-पहल एक चहलकदमी के दौरान अनुभव किया। मैंने उनसे पूछा था कि क्या आप कभी गांधी जी से मिले? उन्होंने मेरी तरफ देखे बगैर हंसते हुए कहा, ‘‘अरे! हमारे जैसे कार्यकलाप थे, गांधी जी के हम सामने होते तो देखते ही मारने दौड़ते!’’ बाद में उन्होंने साफ कहा कि ‘‘तब हमें अपना (हिंसा का) रास्ता सही लगता था। अब लगता है गांधी जी का रास्ता ही सही था।’’ वे गांधी जी के ‘नैतिक बल’ को ज्यादा बड़ा समझते थे और इस दृष्टि से उनके व्यक्तित्व को ‘महान’ मानते थे।

उस रोज मुझे लगा कि एक नायाब जानकारी हाथ लग गई है। जबकि- बाद में मालूम हुआ- 1977 में दिल्ली में राजेंद्र प्रसाद स्मारक व्याख्यान देते हुए उन्होंने कहा था: ‘‘गांधी जी लगातार राजनीति को एक वृहत्तर संदर्भ देने का प्रयत्न करते रहे और उसमें सफल भी हुए: सफल हुए अपनी निष्ठा, प्रतिष्‍ठा और त्रिकालदर्शिता के कारण... आजादी हमें मिली; लेकिन यह हमारा दुर्भाग्य था कि आजादी पाने के साथ-साथ हमने गांधी जी को खो दिया।’’

उसी व्याख्यान में उन्होंने अफसोस की मुद्रा में कहा कि ‘‘गांधी जी का कोई उत्तराधिकारी नहीं हुआ।’’ फिर गांधीवादियों और जनसंघियों दोनों पर टीका: ‘‘कुछ थे जिन्होंने ‘सर्व-सेवा’ और सर्वोदय के नाम पर अध्यात्म की भूमि पर बल दिया; लेकिन उनका अध्यात्म भी इतना थोथा और संकीर्ण था कि उससे किसी दूसरे को प्रेरणा मिलना तो दूर, गांधी जी की संचित आत्मबल की पूंजी धीरे-धीरे चुका कर वे स्वयं बौने हो गए।... कुछ दूसरे थे जिन्होंने संस्कृति की बात की; लेकिन उनकी राष्ट्र की कल्पना भी वैसी ही संकीर्ण और थोथी थी। बल्कि उनकी धर्म की और संस्कृति की नैतिक आधार-भित्ति की अवधारणा भी संकीर्ण और थोथी रही।’’

1984 में आकाशवाणी अभिलेख के लिए हुई बातचीत में भी वात्स्यायनजी ने स्वीकार किया कि वे गांधी जी के जीते-जी तो विरोधी थे, लेकिन अब ‘‘गांधी जी के विचारों के समर्थक’’ हैं।

लेखक ओम थानवी वरिष्‍ठ पत्रकार और जनसत्‍ता के संपादक हैं.



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