: मेरी विदेश डायरी -2 : इस छोटे से शहर में सड़कें भी बहुत ज्यादा चौड़ी नहीं हैं : बोडा-बोडा यहां की बाइक टैक्सी है : जांच के नाम पर महज खानापूर्ति ही हो रही थी : आज कंपाला की तमाम सड़कें जाम हैं। इन दिनों रोज शाम को ऐसा ही देखा जा रहा है। लेकिन इन पंद्रह दिनों में पहली बार ऐसा हुआ है कि गाड़ी लेकर उसी भीड़ में फंस जाने का साहस नहीं हुआ है। यहां के दफ्तरों में सुबह 8.30 बजे लोग आ जाते हैं और शाम को 5.30 बजे ही छूटते हैं। पर सरकारी दफ्तरों का आलम कमोबेश वैसा ही है जैसा दिल्ली में है। ज्यादातर अधिकारी सुबह 10 के बाद ही आते हैं। पर लौटने में वे घड़ी के कांटे को 5 से ज्यादा नहीं होने देते। यही कारण है कि शाम को कंपाला की लगभग सभी सड़कें कारों से भर जाती हैं। लगभग सभी छोटे बड़े अधिकारी के पास अपनी या सरकारी कार है। पर आज मेरी हिम्मत टूट गई है। इस छोटे से शहर में सड़कें भी बहुत ज्यादा चौड़ी नहीं हैं।
मैंने तय किया कि आज कार को दफ्तर में ही छोड़ दिया जाय और बोडा-बोडा की सवारी की जाय। बोडा-बोडा यहां की बाइक टैक्सी है। इनके लिए सारे सरकारी नियम कागजी होते हैं। वे किसी भी तरफ घुस जाते हैं और किसी भी तरह से बाइक लेकर निकल जाते हैं, पुलिस की आंख के सामने से और पुलिस के सिपाही बस आंखें तरेर कर अपनी जिम्मेवारी पूरी कर लेते हैं। इन पर सवार होने का अपना अनुभव है। कई बार वे दो लोगों को पीछे बिठा लेते हैं और सड़कों पर आड़े तिरछे होकर आपको उछालते हुए या फुटपाथों पर होते हुए भी बाइक निकाल लेते हैं। कोई उन्हें नहीं रोकता।
यहां के संभ्रांत लोगों में तो गजब का रोड सेंस है, पर बोडा बोडा वालों के पास जरा भी नहीं। हो भी कैसे ! उन्हें जल्दी से जल्दी सवारी को मंजिल तक पहुंचाना है और फिर दूसरी सवारी लेनी है। उनकी आमदनी का यही जरिया जो है। मैं भी आज इसी का मजा ले रहा था। अपने आवास पर आने तक मैं कुछ और सोंच ही नहीं पाया। बाइक वाला जिस तरह से मुझे ले आया, वह सोंचने लायक समय तक नहीं दे रहा था। पर जब मैं आ गया तब इतना जरुर लगा कि अगर मैं कार से आया होता तो रात के दस बजे तक भी शायद ही पहुंच पाता। मैंने यह पता करने की जरुर कोशिश की कि आखिर ऐसे जाम का कारण क्या है। पता चला कि पिछली 11 जुलाई को कंपाला में जो विस्फोट हुए थे, उसके कारण सड़कों पर पुलिस एक एक कार की जांच कर रही है।
सुबह मैं भी एक मार्केट कांप्लेक्स में गया था तो मेरी कार रोककर मुझे उतारा गया था और मेरी तलाशी ली गई थी, मेरा पासपोर्ट देखा गया था। पर ऐसी जांच पर मुझे दिल्ली पुलिस की जांच याद आई थी। जांच के नाम पर महज खानापूर्ति ही हो रही थी। ऐसा लगा कि यह दिखाना ज्यादा जरुरी है कि जांच हो रही है और पुलिस सतर्क है। आखिर बोडा बोडा के चालकों और उसकी सवारियों को क्यों नहीं रोका जा रहा है। उगांडा पुलिस को पता है कि 11 की घटना के लिए जो बम लाए गए थे, वे कुछ पहले ही शहर में आ गए थे। वे बोडा बोडा में भी आराम से लाए जा सकते थे।
लगता है कि यहां की पुलिस का भी कमोबेश वैसा ही अव्यावहारिक नजरिया है, जैसा कि दिल्ली की या भारत के दूसरे अनेक शहरों की पुलिस का। कहा जा रहा है कि सोमालिया के नागरिकों को एफबीआई के अधिकारी चुन चुनकर परेशान कर रहे हैं और यहां भी एक एक मुस्लिम नागरिक शक के घेरे में है। इसके बावजूद किसी का कोई विरोध नहीं है। सत्ताधारी दल, नेशनल रेसिस्टेंस मूवमेंट के किसी भी कदम का विरोध करने का साहस किसी विरोधी राजनैतिक दल में नहीं है। एफबीआई के अधिकारियों ने साफ स्वर में कह दिया है कि 11 जुलाई के धमाके के लिए एक पाकिस्तानी मूल के नागरिक ने मेल भेजकर बम फेंकने वालों को बधाई दी थी, इसलिए वे पाकिस्तानी मूल के दूसरे नागरिकों पर भी नजर रख रहे हैं। जाहिर है कि ऐसे में कोई विरोध कैसे कर सकता है। आखिर मरने वाले 80 लोगों में तमाम आम लोग ही थे, जो केवल फुटबाल मैच का आनंद लेने ही तो गए थे।
लेखक अंचल सिन्हा बैंक के अधिकारी रहे, पत्रकार रहे, इन दिनों उगांडा में बैंकिंग से जुड़े कामकाज के सिलसिले में डेरा डाले हुए हैं. अंचल सिन्हा भड़ास4मीडिया पर अपनी विदेश डायरी के जरिए समय-समय पर उपस्थित होते रहेंगे.
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