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जनसरोकार की ख़बरों की तरफ मुड़ेगी ख़बरिया चैनलों की राह?

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कुंवर चंद्रप्रताप सिंह: टीआरपी का यह डब्बा चैनलों का बाज़ार तय करता है : सारा का सारा विधवा विलाप छूमंतर हो जाता है  : प्रतिभावान लोगों के लिये चैनलों में जगह कम है : चैनलों के भीतर पकने वाली खिचड़ी आज किसी से छिपी नहीं है : क्या सही दिशा में जा रही है ख़बरिया चैनलों की राह? क्या आम सरोकार की ख़बरें चैनलों से गायब हो रही हैं? ऐसे कई सवाल हैं जो आम लोगों से लेकर पत्रकार, बुद्विजीवियों के मन में अक्सर उठते रहते हैं। ऐसा इसलिए है कि ख़बरिया चैनल अब आम लोगों से जुड़ी ख़बरों को अपने रन में जगह देने के बजाय भूत प्रेत और धरती पलटने जैसी ख़बरों को ज्यादा प्राथमिकता दे रहे हैं। अगर महानगर में कोई फैशन शो चल रहा है, और उसी दौरान देश के किसी गांव में कर्ज में डूबा किसान आत्महत्या कर लेता है, तो फैशन के आगे आत्‍महत्‍या की खबर कोई मायने नहीं रखती हैं। उनके लिये किसान की आत्महत्या कोई बहुत बड़ी बात नहीं है, लेकिन करीना ने टैटू बनवा लिया है तो बहुत बड़ी ख़बर बन जाती है। पिछिले कुछ दिनों की ख़बरों पर ही नजर डालें तो ख़बरिया चैनल जनसरोकार से जुड़े मामलों को छोड़कर लोगों के व्यक्तिगत जिंदगी में जरूरत से ज्यादा ताक झांक करते नज़र आते हैं।

अभी पिछले दिनों जिस तरह से सानिया मिर्जा के निकाह के प्रकरण को चैनलों ने तूल दिया, अपने रिपोर्टरों को घंटों सानिया के घर के सामने खड़ा रहने को मजबूर किया, वो साफ दिखाता है कि टीवी पत्रकारिता कि दशा और दिशा किस ओर है।इसी दौरान अरबों रुपये के लागत से तैयार पीएसएलवी थ्री के असफल होने की ख़बर को कोई महत्व नहीं दिया गया था। इस बहुउद्देशीय प्रोजेक्ट से पूरे देश को क्या फायदा होने वाला था, इसकी असफलता से देश को कितना नुकसान हुआ? कितने लोगों की मेहनत इस प्रोजेक्ट को बनाने में लगी थी, उनको इसकी असफलता से कितना दुख पहुंचा? इस तरह की ख़बर किसी भी ख़बरिया चैनल पर नहीं दिखाई पड़ी। जबकि सानिया मिर्जा की शोएब मलिक के साथ निकाह करने के बयान से लेकर उसकी सगाई तक की ख़बर हेडलाइंस में दिखी। और तो और कई चैनलों पर तो सानिया की मेहंदी तक ब्रेकिंग न्यूज़ के तौर पर चलाये गये।

अख़बारों पर जनसरोकार की ख़बरें ना लिखने का आरोप लगाने वाले ख़बरिया चैनल अब खुद उस राह की ओर मुड़ गये हैं। जबकि इधर, तमाम अख़बारों के तहसील स्तर पर कार्यालय खुलने के बाद वे पहले से ज्यादा आम सरोकार की ख़बरों को अपने पन्नों पर जगह दे रहे हैं। उनके पन्नों पर अब गली, नाली, खंडंजा से लेकर नहर, पानी, किसान और आम आदमी को जगह मिल रही है। जबकि ख़बरिया चैनलों से आम आदमी लगातार गायब होता जा रहा है। कुकुरमुत्तों की तरह उग आये छोटे छोटे ख़बरिया चैनलों ने स्थिति और ज्यादा ख़राब कर रखी है। इन चैनलों में ना तो वर्किंग माहौल दिखता है, और ना तो इनके कांसेप्ट में ही कुछ नयापन की झलक मिलती है।

अख़बार के दफ्तरों में अपेक्षाकृत स्थितियां ज्यादा बेहतर हैं। जबकि ख़बरिया चैनलों में छोटे स्तर से लेकर बड़े स्तर तक के लोग ख़बरों पर दिमाग लगाने के बजाय एक दूसरे को निपटाने में ही अपनी सारी ऊर्जा व्यय करते हैं। इस स्थिति में ख़बरों को लेकर जो चर्चा होनी चाहिए नहीं हो पाती हैं। टीआरपी के फंडा ने इस स्थिति को और अधिक बदहाल कर रखा है। व्यूअर रीडर का ये डब्बा सिर्फ कुछ शहरों के दर्शकों की बदौलत चैनलों की टीआरपी तय करता है। जबकि उभरते भारत के असंख्य कस्बाई और ग्रामीण दर्शक इस डिब्बे की जद से बाहर रहते हैं, यानी तार्किक और वैज्ञानिक ना होते हुए भी टीआरपी का यह डब्बा चैनलों का बाज़ार तय करता है। और इस पर विश्वास करते हैं खुद को बुद्घिजीवी कहने वाले पत्रकार और मैनेजमेंट के पढ़े लिखे लोग।

ख़बरों के बदलते रंग रूप और जनसरोकार से दूर होते ख़बरिया चैनलों के शीर्ष पर बैठे लोग इन बातों को लेकर अक्सर विधवा विलाप करते रहते हैं। अख़बारों के संपादकीय पेज पर बड़े बड़े कॉलम में सुधारों और जन सरोकारों के साथ जुड़ने की बात दुहराते हैं। लेकिन जब इनको लागू करने की बात आती है तो सारा का सारा विधवा विलाप छूमंतर हो जाता है। फिर वे अपने पुराने ढर्रे पर लौट कर भूत प्रेत के साथ मिलकर दुनिया उलटने पलटने लगते हैं। किसी को रावण का विमान मिलता है तो कोई महलों में आत्मा खोजने-ढूंढने में लग जाता है। ख़बरिया चैनलों को आम आदमी की समस्या, किसानों की समस्या, छोटी बड़ी खोज या छोटे स्तर पर लोगों की जीवन को सुलभ बनाने वाले आविष्कार नज़र नहीं आते हैं। लेकिन शाह रुख का कुत्ता बीमार पड़ गया तो चैनलों के लिये यह बड़ी ख़बर बन जाती है।महंगाई से आम आदमी दाना-पानी के लिये परेशान है, इसकी ख़बरे कम दिखती हैं, फैशन शो में कपड़े कितने महंगे हैं यह ख़बर लीड बन जाती है। ख़बरिया चैनल के शीर्षस्थ लोग इसमें बदलाव की बात तो करते हैं परन्तु उनकी चाहत होती है कि ये बदलाव लाने वाला भगत सिंह पड़ोस के चैनल में पैदा हो।

ख़बरों के बिगड़ने के कारण तो कई हैं, जिनपर चर्चा की जा सकती है। परन्तु यहां भेड़ चाल में चलने की परम्परा पुरानी होती जा रही है। जैसे मनोरंजन चैनल सास-बहू के साजिशों से उबरे तो अब कस्बाई मानसिकता की बाढ़ आ गई है। यानी बदलाव की बयार के बाद भी भेड़चाल। कुछ ऐसी ही स्थिति ख़बरिया चैनलों की है। किसी एक चैनल पर कोई कार्यक्रम हिट हुआ नहीं कि उस ढर्रे पर दर्जनों चैनल चलने लगते हैं। इसके अलावा ख़बरिया चैनलों की खास लोगों की निजी जिंदगी में ताक झांक भी ज्यादा बढ़ गई है। कई ख़बरिया चैनल कुछ मामलों पर तो जज बनकर खुद ही फैसला सुनाने लग जाते हैं। ऐसी लगातार बढ़ रही प्रवृत्ति ने आम लोगों के मन में ना सिर्फ ख़बरिया चैनलों के प्रति विश्वास कम किया है बल्कि इन ख़बरों को देखकर लोगों का मन भी खट्ठा हो रहा है।

क्या अब ख़बरिया चैनल अपना चोला बदलने की पहल करेंगे? क्या अब ख़बरिया चैनलों में जन सरोकार की ख़बरे देखने को मिलेंगी? क्या पत्रकारिता की गर्विली परम्परा का सुनहरा दौर वापस आयेगा? ऐसे कई सवालों का जवाब मिल पाना बहुत मुश्किल है, क्योंकि जनससरोकार से जुड़ने के लिये ना सिर्फ ख़बरों को सूंघने-समझने और पहचानने की क्षमता होनी चाहिए वरन टीआरपी जैसे बाजारू दबाव को झेलने की ताकत भी। लेकिन ज्यादातर चैनलों में जो सबसे बड़ी दिक्कत है वो है पत्रकारों की जमात। ख़बरिया चैनल ज्यादातर सुंदर चेहरों को मौका प्रदान करते हैं, प्रतिभा बाद की मानक होती है।

भागती दुनिया में ख़बरिया चैनलों के भीतर पकने वाली खिचड़ी आज किसी से छिपी नहीं है। यहां पसरी गंदगी अंदर का स्वाद तो ख़राब करती ही है, बाहर के लोगों का मन भी कसैला करती है। प्रतिभावान लोगों के लिये चैनलों में जगह कम है, ज्यादातर काम इंटर्न या फिर ट्रेनी करते हैं, इन्हें कम पैसा जो देना होता है। ऐसे में प्रतिभावन लोग की जगह रंगीन चेहरे व कम अनुभवी पत्रकारों के साथ टीआरपी का डब्बा और बाजार का दबाव होगा तो बदलाव कैसे होगा समझना मुश्किल नही है। यानी ख़बरों की ये दुनिया ना तो ठीक से कारपोरेट कल्चर को आत्मसात कर सकी है और ना ही पूर्ण रुप से पत्रकारिता को। ऐसे में क्या हम ख़बरिया चैनलों से उम्मीद कर सकते हैं कि हमें निकट भविष्य में जनसरोकारों की ख़बर देखने को मिल सकती है! है इसका जवाब किसी ख़बरिया पुरोधा के पास?

लेखक कुंवर चन्द्र प्रताप सिंह टीवी पत्रकार हैं.

Comments
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Pratikriya
Kamaljeet singh 2010-07-25 17:16:50

Mitr aapne bahut kuch sahi likha hai ...lekin aapko yeah bhai bata du ki jaha television ko trp ke bhoot ne pakad ke rakha hai wahi akhbaro me circulation ka bhoot ... jaise television me jaise trp pe aid milte hai waise he kuch akhbar ke sath bhi mamla juda hai ...aapko bata du ki akhbar me bhi kai ek bar uss sarkari snasthan ya office me against khabar hote hue isleaye nahi chappi jati ki agar wo anti khabar lag gayi toh waha se uss akhbar ko aid milna bandh ho jayega ....toh akhbar ho ya phir television kamobesh har jagah lagbhag ek he tarah ke halaat hai ...aab kis tarah ki khabre dikhani chaheye toh dost iss me sedhe taur pur mai editor loby ko zimeddar manta hu keyo ki channel ho ya akhbar waha aap aur hum jaise log yeah taye nahi karte hai ki kaun c khabar ya programe jayega ....toh bhai aapko bata du ki hamare seniors jo bhi editor loby ke log hai wo aaj acche editor nahi balki acche marketing ke executive ho chuke hai ...aur maze ki baat patrkarita me aa rahi girawat ka sabse zyada haall bhi yahi bade bade ediot loby ke yeah loh he mazhate hai .....
ambujesh kumar 2010-07-25 19:10:48

patrakarita me jo kuchh bhi chal raha hai iske liye sabse jyada doshi khud patrakar hai, halat ye hai ki aaj imandaar wo hi rah gaya hai jise ki beimani karne ka chance nahi mila hai ....udyogpatiyo aur netao ki hath ka khilauna ban chuke media sansthan aaj kale ko safed me badlane ka jariya bhar rah gaye hai ....lekin is bahti ganga me hath dhona bhala kise achha nahi lagta hai .....kya ek lota paani aur sattu khakar patrakarita karne ke liye koi taiyaar hoga.....kunwar ji aap bhi is bat se ittafak rakhenge ki 1 se 2 lakh rupya kharch karne ke bad har navodit patrakar ko kewal ek hi ichcha rahti hai ....aur wo hai jaldi se jaldi apni chatipurti karne ki....aap jis patrakarita ki bat kar rahe hai uska jamana to teen dashak pahle hi gujar chuka hai ...hal -filhaal to corporate journalism ki jo shart hai ussi ke hisaab se sab kuchh chal raha hai....
pramod kumar 2010-07-26 10:45:12

kunwar ji sabse pahale apko bahut-bahut badhai...
anand kumar adubey 2010-07-26 17:31:00

kuwar bhai..wo gana suna hai na ganda hai pra dhandha hai ye...isliye in baato ko chodo

ye alag baat hai ab mujhko mera haq na mile waise to mujhko bhi haqdar kaha jata hai
digvijay singh rathor 2010-07-28 17:01:28

aaj kal ki patrakarita se aap ummid hi kya kar sakte hai...............
comment
avinash yadav 2010-08-01 11:00:59

patrakarita me aaj sabse bada sankat ye hai ki patrakar bazaar ko nahi dekhta.....jis tarah se multinatinational companies ne dusre deshon me apne business ko phailane ke liye vahaan ke locals ko apna product bechne ka jariya banaya aur unhe safalta mili theek usi prakar patrkarita ko bhi ekdaam saaf-saaf tarikey se dekhne ki jarurat hai ki media ab desh sudharne ka aandolan nahi raha balki media ab industry ho chuka hai to mere bhaiyon aap logon ko jara saaf aayen se dekhna hoga ki advertisement kisi bhi news channel ya akhbaar ke liye Oxygen hai.agar advt. ka flow cum hoga to koi bhi channel ya akhbaar ko baithne me vakt nahi lagega.....aise kai example hum kai bandh hui channel aur kai AKHBAARON KE ROOP ME DEKH SAKHTE HAI.....TO BHAIYA YE DHANDHA TO CHALTA RAHEGA....AUR ISME HO RAHE PARIVARTONO KO AATMSAAT KARNA PADEGA KAI LOG INDIA T.V. KI BURAI KARTE HAI KI YE BHOOT PRET AUR ANDHVISWAAS KO BADHAAVA DETA HAI... LEKIN YE NAHI DEKHA JAATA KI JAB KABHI RAHTRIYA SAROKAR SE JUDEY MASLE HOTE HAI TO KYA INDIA T.V. YA KOI AUR CHANNEL VO APNE ADVERTISEMENT KO ROKKAR RASHTRIYA MAHATV KI KHABRON PER BANE RAHTE HAI....SIR AB YE VIDHVA PRALAAP BANDH KARIYE KE YE CHANNEL SAMAJ KO GALAT DISHA DE RAHE HAI.... BALKI KABHI YE AAKAR DEKHIYE KI KISI BHI CHANNEL AUR NEWS PAPER ME KAAM KARNE WALA VYAKTI KITNE PRESSURE AUR JADDOJAHAD KE BEECH KAAM KARTA HAI....DUS ACCHI KHABREN DIKHATA HAI TO DO ENTERTAINING KHABREIN AGAR DIKHA BHI DETA HAI TO USKE AADHAR PER POOREY MEDIA KE PRATI APNA NAZARIA NAHI BANA LENA CHAHIYE....THANKS
Anonymous 2010-08-02 09:46:36

Hey Kunwar,
Nice yaar. Tumhara lekh dekhkar mujhe yeh mahsoos ho gaya ki apni Originality ko tumne chhora nahi hai.

Bidas Andaj, Straight forward personality, kisi bhi baat ka postmartam katne ki chhmta aaj bhi tumhaare andar koot koot kar bhari.

Ye bate mai apne vichaaro ko vyakt karne ke liye nahi likh raha hoon. Ye wo baate hain jo aaj ke 15 saal pehle ke kuwar aur aaj ke Patrakaar Kunwar ko dekhkar apne aap nikal rahi hain.

Agar mai professional andaj me dekhu to mujhe ye pata chal raha hai ki Media ki positive/ negative karya shaili se tum achchi tarah parchit ho aur apni baato ko apne NATURAL andaj me vyakt karne me mahir bhi.
Ek promish karo, TRP increase karne ke liye aisa tum mat karna.

I wish you all the best.

Tumhaara Bhai---- Er. Mithilesh
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