: मेरी किताब भाग -3 : छद्म मित्रतापूर्ण अन्तरविरोधों का मायाजाल रचा जा रहा है : सारे फैसले अब साम्राज्यवादी शक्तियों के हस्तक्षेप के बिना लेना संभव नहीं रह गया है : जब कोई देश अपने कल-बल-छल से जबरदस्ती दूसरे देश के संसाधनों को हडपनें के लिए उस पर नियंत्रण करके अपना साम्राज्य स्थापित करता है तो इसे साम्राज्यवादी गुलामी कहते हैं। आज अमेरिका भारत में बहुत ही धूर्तता के साथ यही कर रहा है। इसका रामशरण जोशी ने अपने एक लेख में बड़ा ही सटीक वर्णन किया है वे लिखते हैं-‘‘यह सदी वैश्वीकरण के नारे की आड़ में दुनिया के पूंजीपतियों का अमेरिकी नेतृत्व में एकीकरण की सदी है। यह चरण उपभोक्तावाद, बाजारवाद और उच्च प्रद्यौगिकी का युग है। यह सदी एकल ध्रुवी विश्वसत्ता, व्यावस्था के गिरफ्त में आ चुकी है। शीत युद्ध की समाप्ति के बाद अब विश्व का एक ही मसीहा है, सयुंक्त राज्य अमेरिका। अब हम एक ही शक्ति शिविर के सदस्य बनने के लिए मजबूर किये जा रहे हैं। अब आफगानिस्तान व ईराक में लाखों लोगों के नरसंहार की घटनायें छोटी-मोटी घटनाओं के रूप में दर्ज होती हैं। अमेरिका के जख्म और उनकी जंग हमारे जख्म और हमारी जंग बन गये हैं। अब वे ही हमारे मददगार व मुक्तिदाता हैं।‘‘
विश्व व्यापार संगठन, विश्व बैंक, अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष जैसी उनकी भुजाओं का हमें मदद प्राप्त है, वे हमारी योजनाओं को निर्धारित करते हैं। हम उनकी आंखों से दुनिया को देखते हैं, वे जैसा दिखलाते हैं हम वैसा ही स्वीकार कर लेते हैं। वे सच को झूठ कहें तो हम झूठ मान लेते हैं और अगर झूठ को सच कहें तो हम सच मान लेते हैं। उनकी अवधारणायें हमारी अपनी बनती जा रही हैं। उनके द्वारा दिये गये आधुनिकता, लोकतंत्र, मानवाधिकार, सभ्यता, संस्कृति, राज्य, संम्प्रभुत्ता, आतंकवाद, आर्थिक समानता या विषमता, विकास आदि की परिभाषाएं व मानदण्ड हमारे लिये शिरोधार्य हैं। उनसे ही नियन्त्रित होते हैं हमारे चुनाव व सरकारें।
वास्तव में वैश्वीकरण की प्रक्रिया ने वैश्विक उपनिवेशों को जन्म दिया है। बीती सदियों का उपनिवेश प्रत्यक्ष मौजूद होता था, विदेशी शासन व शासक उस देश में सामने मौजूद होते थे। औपनिवेशिक शासक व औपनिवेशिक जनता के बीच सीधा टकराव था। दोनों पक्ष एक दूसरे को पहचानते थे। कौन किसका दोस्त है और कौन किसका दुश्मन, लोग इसे आसानी से समझ लेते थे दोनों के बीच प्रमुख शत्रुतापूर्ण अन्तर विरोध पर किसी तरह की धुंध नहीं छाई हुई थी। यही वजह थी कि गुलाम सामाजों की कोख से लगातार स्वतंत्रता संग्राम उभरते रहे, लेकिन नई गुलामी के दौर में शत्रुतापूर्ण अन्तरविरोधों के स्थान पर छद्म मित्रतापूर्ण अन्तरविरोधों का मायाजाल रचा जा रहा है।
बहुतों को यह समझना मुश्किल हो रहा है कि विश्व व्यापार संगठन, विश्व बैंक, अन्तराष्ट्रीय मुद्राकोष, जैसी अमेरिकी साम्राज्यवाद द्वारा नियन्त्रित संस्थाओं के माध्यम से पिछड़े व विकासशील देशों पर ऐसी शर्तें थोपी जा रही हैं, जिनसे राष्ट्र-राज्यों की सम्प्रभुता भी खतरे में पड़ गयी है। छोटी-छोटी योजना की मंजूरी के लिए इन वित्तीय संगठनों के दरवाजे खटखटाने पड़ते हैं। चाहें बिजली की दरें हो या सार्वजनिक परिवहन के किराये, पानी का निजीकरण हो या बांधों का निर्माण, जीवन रक्षक दवाओं का निर्धारण हो या किसानों को सब्सिडी देना, उत्पादों का पेटेन्टीकरण हो या अनावश्यक वस्तुओं की आयात की मजबूरी। यह सारे फैसले अब साम्राज्यवादी शक्तियों के हस्तक्षेप के बिना लेना संभव नहीं रह गया है।
अब तो हमारे देश में हालात यहां तक पहुंच चुका है कि हमारा परमाणु व सैन्य फैसले भी उन्हीं के इशारे पर होने लगे हैं। यह हस्तक्षेप अदृश्य होता है, यदि दृश्यमान भी होता है, तो भी राष्ट्रीय स्तर पर शत्रुतापूर्ण अन्तर्विरोध में इसका रूपान्तरण नहीं हो पाता। क्योंकि देश का शासक और पूंजीपति और प्रभावशाली मध्यम वर्ग अपने स्वार्थो के वशीभूत हो इन हस्तक्षेपों को महिमा मण्डित करता है। इन हस्तक्षेपों के माध्यम से बढ़ती गुलामी का सामान्य जन में ऐसे मिथक गढ़कर प्रचारित करता है, मानो ये गुलामी के नियन्ता न होकर हमारी मुक्ति व विकास के सबसे बड़े मददगार महानायक हैं। नई साम्राज्यवादी व्यावस्था के नियन्ता लगातार अपनी तानाशाही, कमजोर, पिछड़े और विकासशील राष्ट्रों पर लादते जा रहे हैं। यदि कोई राष्ट्र इनकी मनमानीपन के खिलाफ आवाज उठाता है, तो यह उसे दण्डित करने के लिये सारे मुखौटे उतारकर मौत के साजों समान के साथ प्रत्यक्ष हमला करके खून की नदियां बहाने पर उतारू हो चुके हैं।
इसका सबसे ताजा उदाहरण ईराक है। अगर सद्दाम हुसैन अमेरिका के सामने नतमस्तक हो जाते तो न उन्हें अपदस्थ किया जाता और न फांसी दी जाती। लेकिन सद्दाम हुसैन ने इन साम्राज्यवादी राष्ट्रों के सामने घुटने नहीं टेके तो न सिर्फ उन्हें फांसी दी गयी बल्कि इन नरपिशाचों ने लाखों ईराकियों के खून भी पिये। विडम्बना यह है कि यह सबकुछ लोकतंत्र, मानवाधिकारों, राष्ट्रों की स्वतंत्रता और मानव सभ्यता की रक्षा के नाम पर किया जा रहा है। जन संघारक रासयनिक शस्त्र के जिस झूठे बहाने की आड़ में ईराक को नेस्तनाबूद किया गया, वे हथियार अमेरिका की सभी गुप्तचर एंजेसियों, अमेरिकी संसद की जांच समिति, संयुक्त राष्ट्र संघ की जांच समिति किसी को भी आज तक नहीं मिले। जबकि ईराक में वर्तमान में अमेरिका की कठपुतली सरकार है। इस तरह की झूठे संभावनाओं के सिद्धान्त को किसी भी देश पर लागू किया जा सकता है जो नई साम्राज्यवादी गुलामी के विरूद्ध प्रतिरोधी राष्ट्र के रूप में उभरने की दुस्साहसिकता दिखलायेगा। चूंकि भारत का शासक वर्ग प्रतिरोध की जगह समर्पण व सहयोग की भूमिका में अमेरिकी गैंग का हिस्सा बन चुका है, इसलिए भारत की जनता को स्वयं भारत की पूर्ण आजादी के लिये तीसरा स्वाधीनता आंदोलन की बागडोर संभालनी पड़ेगी।
लेखक गोपाल राय तीसरा स्वाधीनता आन्दोलन के राष्ट्रीय संगठक है.
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