Pradhanji.com

Home तेरा-मेरा कोना कला में रंग-रेखाओं की फिजूलखर्ची 'अज्ञेय' को गवारा न थी

कला में रंग-रेखाओं की फिजूलखर्ची 'अज्ञेय' को गवारा न थी

E-mail Print PDF

अज्ञेय: यादों का झरोखा-2 : शब्दों की परतों में इस तरह की आमदरफ्त वात्स्यायनजी का खब्त था : शब्दों पर उनका सोच-विचार चलता रहता था : हंसते तो इतना हंसाते हुए कि हंसोड़ भी रश्क करें : अज्ञेय को पहले-पहल बीकानेर प्रौढ़ शिक्षण समिति की एक संगोष्ठी में देखा था। नामवर सिंह और महावीर दाधीच से अविचलित उलझते हुए। नंदकिशोर आचार्य के बुलावे पर वात्स्यायनजी आए थे। डॉ. छगन मोहता के घर ठहरे। आचार्यजी ने लड़कपन के दिनों में ‘अज्ञेय की काव्य-तितीर्षा’ पुस्तक लिख डाली थी। आलोचना के नीरस और अक्सर दुराग्रही पाठ के बरक्स वह कवि-मन से कविता को समझने की ईमानदार कोशिश साबित हुई। उस एक कृति ने अज्ञेय को राजस्थान से आत्मीय रिश्ते में जोड़ दिया। हमेशा के लिए। फिर अज्ञेय कई दफा बीकानेर आए। एक बार निर्मल वर्मा के साथ राजस्थान साहित्य अकादमी के आयोजन में। विश्नोई धर्मशाला में आयोजित कोई नवांकुर लेखक सम्मेलन था। आयोजन में आमंत्रित एक ‘नवांकुर’ मैं भी था। तब कविता में हाथ-पांव मारता था। बड़े आत्मविश्वास से दो-चार लचर कविताएं वहां सुना भी दीं।

जब चाय का वक्फा हुआ तो धर्मशाला के बाहर चौकी पर अज्ञेय बोले, आपको लिखते रहना चाहिए। उन्हें हैरानी हुई जब मैंने बताया कि कॉलेज में वाणिज्य की पढ़ाई करता हूं। हालांकि हैरानी की खास गुंजाइश नहीं थी, क्योंकि कॉलेज के भीतर और बाहर मैं पाठ्य सामग्री को छोड़कर सब चीजें पढ़ता था। वाणिज्य न ठीक से पढ़ा, न सीखा। हिंदी के विद्वान शिक्षक डॉ. आदर्श सक्सेना के कहने पर कॉलेज की पत्रिका का संपादन जरूर किया। अज्ञेय की कविताएं मुझे कंठस्थ थीं। एक छोटी कविता स्कूल के जमाने से, जिसे उस रोज खुद अज्ञेय को मैंने अपने स्वर में सुनाया: ‘चुप-चाप, चुप-चाप/झरने का स्वर/हममें भर जाय...!’ तब नहीं सोचा था कि यह एक संबंध की अंतिम इब्तिदा है।

इसके बाद उनसे मिला दिल्ली में। नंदकिशोरजी के बाबा- पिता के बड़े भाई, जिन्हें राजस्थान में बड़े पिता कहते हैं- बहुत बीमार थे। एक दवा दुर्लभ थी। आचार्यजी के कहने पर दिल्ली की गाड़ी पकड़ी। आपातकाल के हटने के बाद अपेक्षया खुशनुमा दिन थे। अज्ञेय ‘नवभारत टाइम्स’ का संपादन कर रहे थे। पूरी आजादी के साथ, और अपने अंदाज में (हजारीप्रसाद द्विवेदी का निधन हुआ तो अखबार के पहले पेज पर कोई दूसरी खबर न थी!)।

मैं सीधे उनके दफ्तर पहुंचा। उन्हें पहचानने में देर नहीं लगी। कुछ लिख रहे हैं न, जैसी मिजाजपुर्सी के बीच उन्होंने खुद अपने निजी चिकित्सक को फोन मिलाया। उनकी गाड़ी से मैं चिकित्सक के घर पहुंचा। उन्होंने एक दुकान पर जाने को कहा। दुकानदार ने दवा की जगह वितरक का पता दिया। वितरक ने सहानुभूति से मेरी बात सुनी और एक दुकानदार को फोन कर कहा कि संकट का मामला है। जो माल भेजा है उसमें से एक डिब्बा इन्हें दे दो, कल भरपाई कर देंगे; ये अभी आपके पास आ रहे हैं। उस दूसरे दुकानदार से आखिरकार दवा मिल गई।

मुझे जैसे संजीवनी हासिल हुई। गाड़ी वापस करने अज्ञेयजी के दफ्तर पहुंचा। चश्मा उतार कर उन्होंने उस दवा के डिब्बे की इबारत पढ़ी। कोई दिक्कत तो नहीं हुई, मुझसे पूछा। उनकी कार दिन भर से मेरे पास थी, इस अपराध-बोध को थोड़ा हलका करने की गरज से मैंने सारी रामकहानी सुना डाली। थोड़ा-सा मुस्कुराए और कहा- चक्कर न कटवाए तो दिल्ली क्या हुई! चलिए, काम हो गया। उनके चेहरे पर राहत का भाव था। जैसे दवा की जरूरत उन्हें रही हो! मैंने धन्यवाद कहा, तो बोले: खुद का धन्यवाद नहीं करते! चला तो दरवाजे के बाहर तक छोड़ने आए। हाथ जोड़ते हुए विदा दी। उनके इस मानवीय पहलू ने मुझे उनका और मुरीद बना दिया।

पढ़ाई पूरी कर आठवें दशक के लगते-न-लगते मैं पत्रिका समूह के साप्ताहिक ‘इतवारी पत्रिका’ में काम करने जयपुर आ गया। छह महीने के भीतर समूह के संस्थापक कर्पूरचंद कुलिश ने मुझे साप्ताहिक के संपादन का जिम्मा सौंप दिया। संपादक के रूप में मेरा नाम नहीं छपता था, पर काम की पूरी छूट थी। मैं तब तेईस वर्ष का था। ‘इतवारी’ के राजनीतिक स्वरूप में थोड़ा घालमेल करते हुए मैंने संस्कृति यानी साहित्य, कला, रंगमंच, संगीत-नृत्य, दर्शन, शिक्षा आदि की सामग्री बढ़ा दी। साप्ताहिक की बीस हजार प्रतियां बिकती थीं। ज्यादातर राजस्थान में। लेकिन लिखने वाले बाहर के बहुत थे। जैसे राजकिशोर, रमेशचंद्र शाह, बनवारी, पंकज आदि। रघुवीर सहाय, प्रयाग शुक्ल और वागीश कुमार सिंह नियमित स्‍तंभ लिखते थे, जो लंबे अरसे चले। कला-परख पर प्रयागजी की अनूठी किताब ‘देखना’ ‘इतवारी’ में छपे लेखों का ही संकलन है।

जयपुर ने मेरे लिए दिल्ली की दूरी घटा दी। अब अज्ञेयजी से उनके घर में मिलना शुरू हुआ। कैवेंटर्स ईस्ट, कैवेंटर लेन।

दिल्ली में इतवारी पत्रिका के बहुत-से पाठक थे, पर मैं यह जानकर बड़ा खुश हुआ कि अज्ञेय ‘इतवारी’ बराबर पढ़ते हैं। इला डालमिया भी पढ़ती थीं। इलाजी ने बाद में स्त्री-समाज की समस्याओं पर हमारे लिए एक पाक्षिक स्तंम्‍भ लिखा। पता नहीं क्यों, गीर्वाणी दास नाम से। वात्स्यायनजी ने उस स्तंभ को नाम दिया- समांतर संसार। मैं ‘समानांतर’ शब्द से ज्यादा परिचित था, सो वही सुना। उन्होंने फौरन साफ किया कि जब समांतर कहने से काम चल सकता है तो एक अक्षर फिजूल क्यों खर्च हो! लेखन में शब्दों-अक्षरों की और कला में रंग-रेखाओं की फिजूलखर्ची उन्हें गवारा न थी।

उसी वक्त यह भी समझ आया कि महिला और स्त्री, नारी या औरत शब्द एक अर्थ के नहीं हैं। संभ्रात स्त्री को महिला कहा जा सकता है, लेकिन पत्थर तोड़ने वाली मेहनतकश औरत को तो नहीं। सब महिलाएं स्त्रियां होंगी, लेकिन सब स्त्रियों को महिला करार देना उनके साथ अन्याय होगा। शब्दों की परतों में इस तरह की आमदरफ्त वात्स्यायनजी का खब्त था। यह राग मेरे पिताजी में भी था- अब भी है- जो ‘तबियत’ और ‘तबीयत’ के बीच तब तक उलझे रहते, जब तक पुख्ता प्रमाण न जुटा लाते कि ‘तबीयत’ ही सही है (हिंदी में; अरबी/उर्दू में ‘तबीअत’ रहता है, बकौल जनाब शीन काफ निजाम)।

शब्दों को लेकर अपनी मगजपच्ची का एक दिलचस्प वाकया अज्ञेय ने खुद बयान किया है। उन्हें दिल का दौरा पड़ा। अस्पताल में भरती थे। चिकित्सक ने दरियाफ्त की कि दर्द कैसा है? जवाब दिया, तीव्र (सीवियर) है। चिकित्सक ने पूछा, असहनीय (अनबियरेबल) है? अज्ञेय : तीव्र है। चिकित्सक : क्या सहन नहीं होता? अज्ञेय : मैंने बताया न आपको, तीव्र है। अगर असहनीय होता तो मैं कराह रहा होता। आप देख रहे हैं कि मैं होश में हूं और सहन कर रहा हूं। चिकित्सक को कोफ्त हुई। बाहर आकर बोले- अजीब मरीज है, इस दशा में भी शब्दों पर बहस करता है! किस्सा बयान कर अज्ञेय की टीप : क्यों न करता बहस? सहन तो कर रहा था, शब्दों के प्रति उस ज्यादती को भी सहन कर रहा था!

ऐसा ही एक प्रसंग आचार्यजी बताते हैं। ‘नवभारत टाइम्स’ के दिनों में, जब अज्ञेय गोल्फ लिंक्स में रहते थे, शहर में कहीं रेतीला चक्रवात आया। एक जगह तो मोटरसाइकिल उड़कर पेड़ पर जा टंगी। हक्का-बक्का हर शख्स कहता, साहब क्या तूफान था। अज्ञेय सुधार करते : तूफान नहीं, घूर्णावात (वर्लविंड) रहा होगा। राजस्थानी में इस किस्म के बवंडर के लिए ‘भूतोलिया’ शब्द है।

शब्दों पर उनका सोच-विचार चलता रहता था। कोई शाम को नमस्कार कर विदा हुआ तो जाने के बाद पूछते, आपको पता है प्राचीन भारत में सुबह-शाम के अभिवादन क्या थे? बताते- प्रात: स्वस्ति और सायं स्वस्ति! शब्दों के रूढ़ प्रयोगों में भी वे संशोधन खोजते थे, मसलन मितव्ययिता विशेषण की जगह सीधे मितव्यय; पूर्वाग्रह के बदले पूर्वग्रह, अपेक्षाकृत की जगह अपेक्षया। कभी-कभार जान-बूझ कर प्रयोगों में बांकपन ले आते- प्रत्यक्ष या रूबरू की जगह अपरोक्ष!

हिंदी में अनेक शब्द अज्ञेय ही चलन में लाए। मसलन यायावर, जिजीविषा, पूर्वग्रह, लोकार्पण। लोकार्पण के लिए विमोचन शब्द उन्हें नाकाफी लगता था। एक दिन बोले, पुस्तक का विमोचन तो छापेखाने में ही हो चुका होता है! विमोचन के विकल्प की खोज शुरू हो चुकी थी। कुछ रोज ‘संतारण’ (पार उतरना) पर अटके, फिर शब्द दिया ‘लोकार्पण’। आज हिंदी में हर पुस्तक का ‘लोकार्पण’ ही होता है। भोपाल में भारत भवन के एक आयोजन समवाय-1 में अशोक वाजपेयी द्वारा संपादित ‘पूर्वग्रह’ के विशेषांक का ‘लोकार्पण’ कर अंक अज्ञेय को सौंपते हुए नामवर सिंह जी ने कहा था- यह अंक उनके हाथों में देता हूं, जिन्होंने हमें पूर्वग्रह और लोकार्पण दोनों शब्द दिए हैं।

ऐसे अज्ञेय के करीब पहुंच कर लगा कि ज्ञान की एक नई खिड़की खुल गई है। बीकानेर में पिताजी से, डॉ. छगन मोहता और आचार्यजी से बहुत सीखने को मिला। जयपुर में विद्वान बहुत थे, पर किसी से इतनी घनिष्ठता कायम नहीं हुई। फिर उमंगों भरी उम्र में संपादक बन जाने से लगी गांठ हरेक के आगे कहां खुलती है। यों वात्स्यायनजी खुद हरेक से नहीं खुलते थे। लेकिन जिससे खुल गए, सारी दीवारें-खाइयां ढहा देते थे।

उन्होंने ‘इतवारी’ के लिए लिखा भी। जब उन्हें साम्यवादी युगोस्लाविया ने कविता के सबसे बड़े सम्मान ‘स्वर्णमाल’ से नवाजा तो एक संस्मरण हमारे लिए विशेष रूप से लिखा था। छिटपुट और चीजें भी।

साप्ताहिक के लिए उन्होंने कई सुझाव दिए। उसमें सुधार हुआ सो हुआ, मुझे सीखने को बहुत मिला। उनके कई सुझाव याद आते हैं। जैसे यह कि एक ही विचार के लोग आपके यहां क्यों लिखते हैं; अखबार कोई मुखपत्र तो नहीं होता। यह गलती रघुवीर सहाय ने की। उनसे सीखिए। अंतरराष्ट्रीय मामलों पर आपके यहां कुछ नहीं होता। अपने पाठकों को कुछ दुनिया की खबर भी दीजिए। कविताओं की आपको समझ है (उन्होंने कहा था, मैं नहीं कहता), सो कविताओं के चुनाव का जिम्मा सिर्फ अपने पास रखिए, वरना कविताओं की जगह लंगड़ा गद्य छपने लगेगा। अब तो छपाई के साधन बेहतर हैं, तस्वीरें बढ़ा सकते हैं। इत्यादि।

उनके इस लगाव और सरोकार से अभिभूत मैं तरह-तरह की सलाह मांग कर लेता। जैसे एक दफा मैंने समस्या बताई कि हमारा चिट्ठियों का स्तंभ  बेजान है। आम अभिव्यक्ति के पत्र आते हैं, यह लेख अच्छा या वह बुरा लगा। बस। उन्होंने कहा, कुछ समय के लिए ‘मॉडल’ (फर्जी) पत्र अपने सहयोगियों से लिखवाइए। छद्म नामों से छापिए। उन्हें पढ़कर पाठक वैसे पत्र भेजने लगेंगे। यह प्रयोग हमने ‘दिनमान’ में ‘मत और सम्मत’ के लिए किया था। लंबे और बेहतर पत्र आने लगे। पहले हमें भी आप वाली दिक्कत पेश आई थी।

आप सोचते हों कि अज्ञेय जैसा दिग्गज साहित्यकार और सिद्ध संपादक एक कमइल्म युवक से इतना कैसे खुल सकता है। असल में अज्ञेय के व्यक्तित्व की यह खूबी वे लोग अच्छी तरह जानते होंगे, जिन्होंने उन्हें करीब से देखा। वे ऐसे ही थे।

‘सारिका’ में कमलेश्वर के वक्त छपी श्रृंखला ‘(लेखक) अपनी निगाह में’ के तहत उन्होंने खुद लिखा कि एक सीमा है जिसके आगे वे अस्पृश्य रहना पसंद करते हैं; जैसे कि एक सीमा के आगे वह दूसरों के जीवन में प्रवेश या हस्तक्षेप नहीं करते। ‘‘इस तरह का अधिकार (अज्ञेय) बहुत थोड़े लोगों से चाहता है और बहुत थोड़े लोगों को देता है। जिन्हें देता है उन्हें अबाध रूप से देता है, जिनसे चाहता है उनसे निर्बाध भाव से चाहता है।’’

दरअसल उनके व्यक्तित्व के दो सिरे थे। वे घोर आधुनिक थे और कभी पुराणों की बात करते हुए जय-जानकी या भागवत-भूमि यात्रा पर निकल पड़ते थे। वे अपने में सिमटे लगते थे पर बहुत खुल जाते थे। चुप रहते थे और अपनों में होते तो खूब बतिया लेते थे। मितव्ययी थे और फिजूलखर्च भी। हंसते नहीं थे। और हंसते तो इतना हंसाते हुए कि हंसोड़ भी रश्क करें।

एक बार दिल्ली से लखनऊ जाते हुए गोमती एक्सप्रेस में उन्होंने पुराने कवियों के पाठ की सस्वर मजाकिया नकल उतारी। इसका जिक्र अगली बार।

लेखक ओम थानवी वरिष्‍ठ पत्रकार और जनसत्‍ता के संपादक हैं.

Comments
Add New Search RSS
Bahut Khoob
Rajeev Pathria 2010-07-26 14:45:11

Apka likha pad kar lagta hai ki abhi bhi desh main vidwan sampadkon hain. apke dwara kiya jane wala shabdon ka chayan, vakya sarnchna aur subject ka gian bahut khoob hai,
Write comment
Name:
Email:
 
Title:
:D:angry::angry-red::evil::idea::love:
:x:no-comments::ooo::pirate::?::(
:sleep::););)):0
 

Latest

Popular