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'अज्ञेय' को अपना उपनाम पसंद नहीं था

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ओम थानवी: यादों का झरोखा-1 : आत्मकथाएं सच को बयान करने के लिए कम, छुपाने के लिए ज्यादा लिखी जाती हैं : उनका जवाब होता था, नहीं; मैं वात्स्यायन बोल रहा हूं : लेख अभी शुरू किया नहीं, और कलम ठिठकी है। ‘अज्ञेय’ लिखूं या अज्ञेय! ‘वात्स्यायनजी’ का संबोधन देकर मैं इस मामूली-सी दुविधा से उबर सकता था। भले उनसे मेरा रिश्ता विद्यानिवास मिश्र, नंदकिशोर आचार्य या रमेशचंद्र शाह की तरह प्रगाढ़ नहीं था। लेकिन जितना भी बना, उसमें उन्हें वात्स्यायनजी कहकर पुकारने का अधिकार शायद अर्जित कर लिया था। पर अब उनके आत्मीय रहे लोगों का इतना बड़ा दायरा सामने है कि अनुभव होता है मेरा काम उस संबोधन से ज्यादा चलना चाहिए, जो व्यापक समाज का संबोधन है। यानी अज्ञेय। या ‘अज्ञेय’? जानता हूं कि नाम में क्या रखा है। लेकिन नाम में कुछ है, जिसकी चर्चा यादों की पोटली खुलने से पहले आप उभर आई है। शायद इसलिए भी कि अज्ञेय भाषा के मामले में बड़े सजग थे। अल्पविराम और अर्द्धविराम के भेद में भी चौकन्ने रहते थे।

वे अपने नाम में उद्धरण-चिह्न का प्रयोग करते थे। एक तो अज्ञेय उनका उपनाम था। दूसरे, यह उपनाम उन्हें पसंद नहीं था। जीवन के अंतिम वर्षों तक वे कहते रहे कि यह मेरा ‘ओढ़ा हुआ’ नाम है। उनके हाथ से जो पांडुलिपि तैयार हुई, हरेक पर ‘अज्ञेय’ लिखा रहता था। ज्यादातर किताबों पर ‘अज्ञेय’ ही छपा मिलेगा। मैं उन भाग्यशाली लोगों में हूं जिन्हें उनकी कुछ किताबें उन्हीं के हाथों भेंटस्वरूप मिलीं। उन सब पर ‘अज्ञेय’ लिखा है।

जब कभी उन्हें फोन पर पूछा जाता, अज्ञेयजी हैं? उनका जवाब होता था: नहीं; मैं वात्स्यायन बोल रहा हूं। हालांकि यह उनकी चुहल होती थी। वे अपने रचनाकार रूप का नाम ‘अज्ञेय’ मानते थे, व्यक्ति के नाते सच्चिदानंद वात्स्यायन थे! इतना ही नहीं, कविता-कथा यानी रची हुई कृति ‘अज्ञेय’ नाम से छपवाते थे; पत्रकारिता हो, विचार-मंथन या आलोचना आदि, वह सब असल नाम से।

लेकिन यह भी सच है कि उपनाम उनके जीते-जी हिंदी समाज में असल नाम की प्रतिष्ठा पा चुका था। उनके अजीज उद्धरण-चिह्न देखते-न-देखते निरर्थक हो गए।

हालांकि अब यह बात जगजाहिर है कि किस तरह विकट परिस्थिति में यह नाम उनके पल्ले अनचाहे आ पड़ा। फिर भी, बताया जा सकता है कि तीस के दशक में अपनी दो कहानियां उन्होंने जेल से जैनेंद्र कुमार के हाथों ‘जागरण’ के संपादक मुंशी प्रेमचंद को भिजवाई थीं। एक कहानी राजनीतिक थी। बंदी लेखक को मुश्किल न पेश आए, यह सोचकर जैनेंद्रजी ने लेखक का नाम ‘अज्ञेय’ सुझाया था।

लेकिन कोई तीन दशक पहले,1981 में, दिल्ली में मुझे अपने घर के ‘जंगल’ की सैर कराते हुए अज्ञेय ने जब कहा कि ऐसा ‘बेहूदा’ नाम वे खुद कभी न रखते, बल्कि किसी तरह का उपनाम ही न रखते- तो मैं चौंक गया था।

वह उनका कैवेंटर्स ईस्ट वाला घर था। छह साल बाद वहीं उनका प्रयाण हुआ। कभी इला डालमिया के पिता रामकृष्ण डालमिया का उद्यम रही कैवेंटर्स डेयरी के आमने-सामने बने दो बंगलों में यह पूर्वी ठिकाना उजड़ी जायदाद की दास्तान आप कहता था। मगर वात्स्यायनजी ने इसमें एक तरतीब ढूंढ़ ली थी। बागवानी में वे सिद्धहस्त थे। घर के आगे एक खूबसूरत बगीचा विकसित किया। पर पीछे का हिस्सा उन्होंने निपट उजाड़ रहने दिया।

‘‘उस तरफ जाने की इजाजत हर किसी को नहीं होती’’, कुछ चंचल मुद्रा में मुझ नाकुछ को जैसे विशिष्टता के अनुभव का मौका प्रदान करते हुए उन्होंने कहा। इशारा उठने का था।

उनकी पसंदीदा दार्जीलिंग चाय की महक तब तक मेरे ‘सौंदर्य-बोध’ का हिस्सा नहीं बनी थी। उसे उसी सांस में सुड़क कर मैं उठ खड़ा हुआ। उनकी नजर पैनी थी। उठते हुए प्याली को निहार कर बोले, आप चाय पीते हैं या दूध! मुझे- जैसा अक्सर होता है- तत्काल सवाल समझ में नहीं आया था। या, कहना चाहिए, उनके मजाकिया स्वभाव का अभ्‍यस्त नहीं हुआ था। बहरहाल, हम बगीचे से निकले और घर के बाएं खड़ी दो कारों- एक फिएट, दूसरी एंबेसेडर- की बगल से होते हुए पिछवाड़े के जंगल में प्रवेश किया।

वह सचमुच छोटा-सा जंगल ही था। दिल्ली के बीचोबीच किसी घर की चारदीवारी में ऐसा नजारा मेरे लिए तब भी अजूबा था, आज भी होगा। अलसाए पेड़, बेतरतीब झाड़-झंखाड़। घर के सामने वाले बगीचे में अजीब-सी चुप्पी थी, पर इस जंगल का सन्नाटा मोहक था और सुनाई पड़ता था। उस सन्नाटे को पक्षियों की चहचहाहट वेधती और फिर जैसे उसी सन्नाटे में विलीन हो जाती। प्रकृति पर अज्ञेय की हजार कविताएं होंगी, पर प्रकृति-प्रेम का वह जीता-जागता रूपाकार मेरे दिलोदिमाग पर आज भी ज्यों-का-त्यों छाया है। कहूं तो गलत न होगा कि इस एक याद के असर ने उस रोज की बाकी गतिविधियों की याद को धुंधला दिया है!

तो उस जंगल में उन्होंने अपने नाम को हलके अंदाज में बेहूदा कहा और मैं चौंका। दरअसल, उनका नाम- यानी उपनाम- जेहन में इस तरह जम चुका था कि उस पर सोचने की कभी जरूरत अनुभव नहीं हुई थी। नामों-उपनामों के साथ अक्सर ऐसा ही होता है। उनमें अर्थ कौन ढूंढ़ता है! लेकिन जब उन्होंने ‘अज्ञेय’ नामकरण की दास्तान- जो मुझे तब ज्ञात न थी- सुनाई तो उनका तंज भी समझ में आया।

अज्ञेय यानी जिसे कभी जाना न जा सके। अभिव्यक्ति के काम में रत जो लेखक हमेशा संप्रेषणीयता की वकालत करता हो, अपने आप को अज्ञेय कैसे कह सकता है! भले उनके विरोधी उन्हें अहंवादी करार देते रहे हों, वे विनम्र और सहज थे। एकांत और निजता की चाह रखने वाला हमेशा अहंकारी नहीं होता। अपने साहित्य में वे ‘अहं के विलय’ की बात करते थे। और तो और, वे आत्मकथा-लेखन को भी ‘अहंकारी उद्यम’ मानते थे। अपने जीवन को कोई इतना अहम क्यों माने कि उसकी दास्तान दूसरों को सुनाने लगे। फिर- वे कहते थे- आत्मकथाएं सच को बयान करने के लिए कम, छुपाने के लिए ज्यादा लिखी जाती हैं।

ऐसे व्यक्ति के लिए अपने आप को अज्ञेय बताना शायद ज्यादा अहंवादी लगता था, जो कि वे नहीं थे। फिर प्रयोगशीलता की मानसिकता में ‘अनपुजी परती तोड़ने वाला’ घोर आधुनिक रचनाकार पारंपरिक शैली में अपना उपनाम धरता ही क्यों!

निश्चय ही जैनेंद्रजी का सद्प्रयोजन नाम को महज अज्ञात रखना था। रचना बगैर नाम के छप नहीं सकती थी। ऐसे में ‘श्रेय और प्रेय’ के दार्शनिक लेखक जैनेंद्रजी का शब्द आखिर ‘अज्ञेय’ ही हो सकता था, ‘अज्ञात’ तो नहीं! वात्स्यायनजी के मुताबिक वैसे भी उस दौर में ‘अज्ञेय’ जैनेंद्रजी का अपने विचार-साहित्य में प्रिय शब्द था।

जो हो, ‘अज्ञेय’ नाम वात्स्यायनजी को जंचा नहीं। पर शायद शुरुआत में हासिल हुई अप्रत्याशित प्रशंसा और प्रेमचंद व जैनेंद्र कुमार की भूमिका को देखते उन्होंने नाम खारिज करने का खयाल नहीं किया; या शायद नाम चल पड़ा तो चलता रहा। हिंदी और हिंदीतर समाज के लिए वह उनके नाम का अभिन्न हिस्सा बनता चला गया और लेखक के लिए सदा उद्धरण-चिह्न में दुबका उपनाम!

हमारी उस रोज की मुलाकात के थोड़े ही समय बाद उन्होंने अपने घोषित शिष्य मनोहर श्याम जोशी के आग्रह पर ‘साप्ताहिक हिंदुस्तान’ में एक संस्मरण शृंखला शुरू की। बाद में जो ‘स्मृति-लेखा’ नाम से पुस्तक-रूप में छपी। प्रेमचंद पर ‘उपन्यास सम्राट’ शीर्षक से लिखे लाजवाब संस्मरण में उन्होंने लिखा कि ‘‘कहानी छप गई और (जेल में) उसकी कतरन मेरे पास आई तो लेखक का नाम देखकर मुझे वितृष्णा हुई। नाम मुझे भारी लगा और मैंने अपने विरोध की सूचना जैनेंद्रजी को भिजवा दी। तभी उन्होंने बताया कि नाम कैसे ‘अपने आप चुन गया’, उन्होंने नहीं चुना।’’

मृत्यु से लगभग तीन साल पहले आकाशवाणी के लिए अभिलेख के बतौर अज्ञेय से एक लंबी बातचीत रघुवीर सहाय और गोपाल दास ने की। भविष्य के लिए सुरक्षित रखी जाने वाली इस बातचीत को आकाशवाणी के अधीर अधिकारियों ने कुछ ही वर्षों बाद छपवा दिया। उसमें भी अज्ञेय ने कहा कि उनका यह नामकरण उन्हें तब बुरा लगा और आज भी अच्छा नहीं लगता है, ‘‘लेकिन अब तो ओढ़ लिया है।’’

लेकिन यह तो मैंने बताया ही नहीं कि अज्ञेय के यहां उनके नाम-उपनाम या जैनेंद्र-प्रेमचंद वाला प्रसंग छिड़ा कैसे?

उस शाम वत्सल निधि का खास आयोजन था। त्रिवेणी सभागार में अज्ञेय के पिता हीरानंद शास्त्री की स्मृति में स्थापित व्याख्यानमाला का पहला कार्यक्रम। गोविंदचंद्र पांडे उसमें ‘‘भारतीय संस्कृति के मूल स्वर’’ पर बोलने वाले थे। जैनेंद्र कुमार को अध्यक्षता करनी थी। मैं इसी कार्यक्रम के लिए जयपुर से दिल्ली आया था। कैवेंटर्स ईस्ट में उमंग का माहौल था। इलाजी खुद मंच की सजावट का सामान जुटाने-संवारने में लगी थीं।

वात्स्यायन जी ने मेरा जिम्मा जैनेंद्रजी को उनके दरियागंज के घर से मंडी हाउस लिवाने में लगाया। विनोदी अंदाज में यह कहते हुए कि टैक्सी का खर्च याद से हमें देना होगा, ‘‘इस मामले में जैनेंद्रजी शुरू से अल्पव्ययी हैं!’’ और इसी के आगे-पीछे जैनेंद्रजी से उनके आधी सदी से ऊपर के संबंध की बात निकली। कैसे संभव था कि जैनेंद्र के हाथों ‘अज्ञेय’ बन जाने की हुड़क उनकी जबान पर न चढ़ आती?

दरियागंज की एक गली में जैनेंद्रजी रहते थे। उसी घर में कभी अज्ञेय और प्रेमचंद की पहली मुलाकात हुई थी। जैनेंद्रजी को लेकर गदगद भाव से त्रिवेणी की ओर रवाना हुए तो पाया कि वे चुप के लिए मशहूर अज्ञेय से कहीं ज्यादा चुप्पे हैं। उनकी मुख-मुद्रा बेहद गंभीर थी, पर चेहरे पर उम्र की सलवटों के बीच अपनापे की रेखाएं नुमायां थीं। एक और सज्जन साथ थे, जिनका नाम खयाल नहीं आ रहा। उन्हीं से बातचीत होती रही। पर मन में सुबह की बात घुमड़ रही थी। किसी मोड़ पर जैनेंद्रजी ने आयोजन के बारे में कुछ पूछा। जैनेंद्रजी वात्स्यायनजी के मित्रों के आत्मीय संबोधन से हटकर ‘अज्ञेयजी’ कहकर बात करते थे।

मौका देखकर मैंने कहा- ‘अज्ञेय’ नाम तो आपका ही दिया हुआ है? उन्होंने सहज भाव से कहा- हां, मैंने ‘‘ये और वे’’ में इस प्रसंग का उल्लेख किया है। वे फिर चुप लगा गए। उनकी चुप्पी को मैंने यों पढ़ा कि बाकी वहां पढ़ो!

कहना मुश्किल है, जैनेंद्रजी को यह मालूम था या नहीं कि ‘अज्ञेय’ की अपूर्व लोकप्रियता के बावजूद ‘अज्ञेयजी’ की ‘अज्ञेय’ के बारे में कमोबेश वही राय है, जो उन्होंने पचास साल पहले जैनेंद्रजी को व्यक्त की थी!

लेखक ओम थानवी वरिष्‍ठ पत्रकार और जनसत्‍ता के संपादक हैं

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