: पता ही नहीं था कि खबरें बेची जाती हैं : लोकतंत्र के मंदिरों को अखाड़ा न बनाएं तो हमें खबर न मिले : नमस्कार। मैं एक पत्रकार हूं। सीखने की शाश्वत परंपरा का पालन करते हुए स्याही की मोहक खुशबू के साथ इतिहास को रोज अखबार के पन्नों पर टांक रहा हूं। खबरें गढ़ना, बुनना, रचना और बेचना यही काम है मेरा। गढ़ना, बुनना और रचना इसलिए क्योंकि अंतत: खबरों को बेचना भी तो है। इसी बेचने की कवायद में सुबह नींद खुलने से रात में नींद आने तक लगे रहते हैं। सच कहूं तो जब पत्रकारिता की पढाई का मन बनाया तब पता ही नहीं था कि खबरें बेची जाती हैं। वो तो इस पेशे में उतरा तब पता चला कि यहां भी कहावत चलती है कि जो दिखता है वही बिकता है। सब अलग अलग तरह के व्यापारी हैं। एक ही खबर को अलग अलग तरह से सजा-संवार कर बेचने में लगे हैं। कई बार तो न्यूजरूमों में भी यह बात होती है कि ऐसे उठेगी तभी बिकेगी। खैर अब जब मैं भी व्यापारी हो गया हूं तो मुझे भी बेचने और खरीदने में कोई शर्म नहीं रही।
बस इतना ध्यान रहता है कि हर पेशे की तरह इस पेशे की भी एक नैतिकता है। गनीमत है कि अभी भी कुछ अखबारों में नैतिकता बची है और मेरी खुशकिस्मती यह है कि मैं भी फिलहाल ऐसे ही अखबार जुडा हूं, जहां बेचने और खरीदने में इंसानी जज्बातों की कदर होती है। जहां व्यावसायिक हित पर पेशेगत नैतिकता हमेशा हावी रहती है। वैसे मैंने अभी तक ऐसा कुछ नहीं बताया जो अलग हो या जो एक्सक्लूसिव हो। इसलिए यह नहीं बिकेगा। चलिए अब आप को बताता हूं कि हम पत्रकार बेचने के लिए माल खरीदते कहां से हैं। इससे पहले मैं यह भी बता दूं माल की जरूरत क्या है।
अखबारों में शाम चार बजते ही लीड स्टोरी तलाशी जाने लगती है। रिपोर्टर से लेकर डेस्क तक सब तलाशते हैं। माल ऐसा होना चाहिए जो पहली नजर में ग्राहक को जम जाए, यूं कहिए कि बिकाऊ होना चाहिए। वो किसी नेता की नोट लेती तस्वीर, आतंकी हमले में मरा आम आदमी, नक्सली निशाना बने पुलिसवाले, करोड़ों के भ्रष्टाचार में फंसा कोई अफसर, नेता, भूख से दम तोड चुका कोई इंसान, किसी गोली का शिकार कोई शेर, बाघ या हिरण, रैंप पर कैटवाक करती मॉडल के फिसल चुके कपड़े, कलावतियों के घर का मखौल उडाता कोई राजकुमार, क्रिकेट के मैदान पर छक्का जड़ते खिलाडी, बालीवुड की कोई मसालेदार चटपटी खबर आदि, या ऐसा ही कुछ जो बिके। तो साहब ये हैं माल जिनकी हमें तलाश रहती है। मैं पत्रकारों का प्रवक्ता तो नहीं लेकिन उस बिरादरी के एक जिम्मेदार सदस्य के नाते मैंने सोचा उन लोगों को शुक्रिया अदा करूं, जिनसे हमें ये माल मिलता है और आपको भी बताऊं कि जो आप तक पहुंचता है वो कौन देता है।
दुनिया का सबसे बडा लोकतंत्र होने के नाते सबसे पहले शुक्रिया हमारे विधायकों, सांसदों का। जो कभी नोट लेते कभी देते, कभी दिलवाते, कभी लहराते, कभी दिखाते हुए हमें खबरें देते हैं। शुक्रिया इसलिए की अगर ये लोग लोकतंत्र के मंदिरों को अखाड़ा न बनाएं तो हमें खबर न मिले। शुक्रिया इसलिए भी कि ये सदन में मां बहन करते हैं, सदन में कुर्सियां मेज चलाते हैं, माइक फेंककर निशानेबाजी का नमूना दिखाते हैं। धन्य हैं हमारे जनप्रतिनिध जो इतनी मेहनत सिर्फ इसलिए करते हैं ताकि हमें खबरें मिल सकें वर्ना उन बेचारों का क्या। वे तो जनसेवक हैं।
फिर मैं शुक्रिया अदा करना चाहूंगा देश के प्रशासनिक और पुलिस अमले का। सुबह से शाम तक जन सेवा। कितना कैसे खाना है, किससे खाना है और किसको खिलाना है सब का ध्यान रखना पडता है। ऊपर से नीचे तक सब तय है। जेल में फाइव स्टार सुविधाएं मुहैया कराना और क्राइम कंट्रोल और क्रिमिनल को जहन्नमुम दिखाने के लिए मुठभेड़ आदि कार्यक्रम की व्यवस्थाएं करना कितना कठिन काम है। फिर हमारे देश में होता है ताकि हमें खबरें मिल सकें। बाढ़ आई तो, सूखा पडा तो ये बेचारे तो हमेशा खबरों के लिए हरा ही हरा करते हैं। सो इनका भी शुक्रिया।
अब शुक्रिया दुनिया की सबसे बडी यातायात व्यवस्था यानी भारतीय रेल का जिसमें सबसे ज्यादा कर्मचारी सेवारत हैं। साहब है ऐसा किसी देश में। बीस साल में पांच हजार हादसे और चार हजार की मौत का आंकड़ा और किसी विकसित या विकासशील देश के देने की हिम्मत है। नहीं। यह सिर्फ सिर्फ हमारी भारतीय रेल में ही हो सकता है। साल में औसतन दो सौ की जान लेने वाला रेल महकमा क्या कम खबरें देता है। लगे हाथ वायु सेवा की भी बात करते चलें। कभी टायर फटा, कभी कुत्ता पहुंचा, कभी चिडिया फंसी, कभी हवा में भिड़े, कभी जमीन से फिसले यानी नाना प्रकार के व्यवधान हमारी वायु सेवा कंपनियां सिर्फ इसीलिए तो लेती हैं ताकि हमें खबरें मिल सकें। सो शुक्रिया।
शुक्रिया मैदान के धुरंधरों का। हां भाई सही समझे आप। मैं अपनी टीम इंडिया की ही बात कर रहा हूं। भले उन्हें देश के लिए पदक लाने का शौक नहीं लेकिन छक्के जड़ने में क्या कम मेहनत लगती है। शतक मारना क्या मामूली काम है। यही नहीं खेलने के बाद क्लबों में जाकर सिर्फ इसलिए मारपीट, मां बहन करना ताकि अखबारों को मसाला मिल सके, क्या कोई पराया इतना करता है? हमें कौन सी कोल्डड्रिंक पीनी चाहिए, कौन सी गाड़ी चलानी चाहिए, यानी आप तो यूं समझों कि सुबह सोकर उठने से रात में सोने और उसके बाद तक हमें क्या यूज करना चाहिए सब ये बेचारे खिलाड़ी हमें बताते हैं। धन्य हैं ये, तभी तो इनक शुक्रिया अदा किया।
अब बात पर्दे के सितारों की। आम इंसान की किस भावना को कैसे कैश कराया जा सकता है। कैसे लाखों खर्च करके लोगों से करोडों कमाए जाते हैं, कब किस फिल्म को हिट कराने के लिए किसके खिलाफ क्या और कितना बोलना है, किस फिल्म में क्या मसाला डालना है, सब तो करते हैं बेचारे हमारे हीरो, हिरोइन। इनका क्या इनके पास पैसे की कमी थोड़े है, यह तो सिर्फ इसलिए ताकि अखबार छप सकें।
अब बात आतंकियों, नक्सलियों व अलगाववादियों की। अखबारों में इनका बहुत योगदान है। भले खबर बनाने के लिए इन्हें मजलूमों की जान लेनी हो लेकिन ये लेते हैं। भले उन्हीं लोगों को मारना पड़े जिनके हक की लड़ाई लड़ने का ये दावा करते हैं। ये लाशों पर जश्न मनाते हैं ताकि हमें खबरें मिल सकें। अपने ही देश और अपने ही लोगों पर पत्थर, लाठी, गोली, बम बरसाते इन्हें कितना कुछ करना पड़ता होगा यह तो सिर्फ यही जान सकते हैं। मैं तो सिर्फ इनका शुक्रिया अदा करता हूं।
शुक्रिया ठेकेदारों का। मुंबई से मदुरई तक, कश्मीर से कटक तक। हर तरफ फैले हैं ये। अरे ठेकेदार मतलब भाषाई, जातिगत, धार्मिक, क्षेत्रीय पंचों की बात कर रहा हूं। कब कहां कौन सी भाषा बोली जाए, कपडे पहने जाएं, कौन कहां आए कहां न जाए आदि आदि, संविधान के खिलाफ जाकर अगर ये शूरवीर न तय करें तो क्या उस दिन अखबार छपेगा भला। कभी नहीं। धरने प्रदर्शन के नाम पर अपनी सम्पत्ति का नुकसान करना, सड़क, रेल जाम करना, फूंकना। कब मंदिर के आगे गाय फिकवानी है कब मस्जिद के आगे वाराह, कब मंदिर के नाम पर आंदोलन शुरू करना है कब मस्जिद के नाम पर जिहाद, सब यही बेचारे तो करवाते हैं, सिर्फ इसलिए ताकि हमें माल मिलता रहे। यह सब इसलिए ताकि हम पत्रकारों की रोजी रोटी चलती रहे। तो क्या हमारा फर्ज नहीं बनता कि हम इनका शुक्रिया अदा करें।
कहते हैं कोई भी बात बिना पड़ोसी की चर्चा के खत्म नहीं होती। फिर इस मामले में तो हमारे मुल्क और हमारे मुल्क के अखबारों की किस्मत से तो दूसरी और पहली दुनिया के लोग भी खार खाते हैं। चीन, भूटान, आफगानिस्तान हो या धार्मिक सहोदर नेपाल या फिर हमारा ही अंश पाकिस्तान और बांग्लादेश, क्या नहीं करते। कहां हमारी जमीन पर कब्जा करना है, कब, कैसे, कितने, कहां और किन आयुधों से सुसज्जित जिहादी भेजने है, इसकी व्यवस्था करना। कब बातचीत और मुलाकात के आयोजन के साथ ही सीमा पर आतिशबाजी करनी है। कब कब और कहां कहां जिहादियों का मार्गदर्शन करना, उन्हें हिदायतें देते रहना कोई आसाना काम है। चोरी करना और फिर सीना जोरी करना, मेरा तो दावा है कि अगर कुछ पडोसी मुल्क अपनी जात से बाज आ जाएं तो कितने अखबारों को अपने पेज कम करने पडेंगे यह अंदाजा नहीं लगाया जा सकता।
सच कहूं तो दोस्तों, इन्हीं की वजह से हमारा पालन पोषण हो रहा है। आप यकीन नहीं मानेंगे पर यह सच है कि अगर कहीं कोई ट्रेन बेपटरी होती है, कहीं बम धमाका होता है, कहीं किसी पर जूते फेंके जाते हैं, कहीं करोड़ों किसी के बिस्तर तले निकलता है तो न्यूज रूम में जान आ जाती है, हलचल मच जाती है, लोग सक्रिय हो जाते हैं, कंप्यूटर और की बोर्ड की खटखट के अलावा टीवी वाले चीखते चिल्लाते एंकरों की आवाजे ही सुनाई पडती है। यूं समझिए की अजीब तरह का उत्सवी माहौल। भयंकर।
यह था एक पत्रकार का धन्यवाद पत्र तमाम शुभचिंतको के लिए। ऐसा नहीं है कि सब बिकाऊ माल ही देते हैं कुछ ऐसा भी हैं जिनके माल नहीं बिकते, उनकी भी चर्चा कभी जरूर करूंगा। भोर हुई जाती है और नींद चढी आती है। इन दिनों जैसा माल मिल रहा है भगवान करे कि वैसा आगे न मिले इसी उम्मीद के साथ, शुभ रात्रि।
लेखक प्रदीप कुमार पांडेय पत्रकार हैं और इन दिनों इंदौर में प्रमुख हिन्दी दैनिक में सेवारत हैं.
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