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क्या अब भी देश आजाद नहीं है ?

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गोपाल राय : मेरी किताब भाग -2: करोड़ों-करोड़ भारतीयों के गले में पहले से ज्यादा गुलामी की जंजीर कसती जा रही है :  इण्डिया गेट पर हमारे एक भी देशभक्त शहीद का नाम दर्ज नहीं है : जनता को नई साम्राज्यवादी गुलामी में जकड़ते जा रहे हैं : नहीं ! 1947 में भारत को पूर्ण आजादी नहीं मिली थी। वह अधूरी आजादी थी। क्योंकि अगर 1947 में भारत पूर्ण आजाद होता तो जिस गरीबी व भूखमरी व बदहाली व आपसी नफरत के खिलाफ आजादी की लड़ाई लड़ी गई थी, वह पूरी तरह खत्म नहीं होती तो कम से कम इतना विकराल रूप तो नहीं लेती। दरअसल भारत में ब्रिटिश गुलामी के खिलाफ इतनी बड़ी कुर्बानी देकर हमारे पूर्वजों ने इतना लम्बा स्वतंत्रता संग्राम इसलिए लड़ा, क्योंकि अंग्रेज भारत की प्राकृतिक संपदाओं को लूटकर बाहर ले जा रहे थे, जिससे यहां की खेतीबाड़ी, लघु उद्योग व सामाजिक ताना-बाना बरबाद होता जा रहा था। जिसके परिणाम स्वरूप भयंकर अकाल, भूखमरी व गरीबी चारो तरफ पैर पसारने लगी थी। जिसके खिलाफ 1757 में शुरू हुआ पहली जंगे आजादी का सिलसिला 1857 के महासंग्राम में परिवर्तित हो गया। 1858 के बाद बंग-भंग के खिलाफ स्वदेशी आंदोलन तथा असहयोग आंदोलन से होते हुए 1930 आते-आते देश की जनता में हिन्दुस्तान सोशलिस्‍ट रिपब्लिकन एसोसिएशन के भगत सिंह व उनके साथियों द्वारा पूर्ण आजादी के लिए किये जा रहे संघर्षों के साथ कांग्रेस द्वारा पूर्ण आजादी के लिए संकल्प लिए जाने से पूरे देश के अंदर एक नया उत्साह पैदा हो गया जो 1942 आते आते फूट पड़ा।

1942 के 'भारत छोड़ो आंदोलन' में जनता की व्यापक हिस्सेदारी, सुभाष चन्द्र बोस द्वारा आजाद हिन्द फौज का हमला, देश में आजाद हिन्द फौज के मुकदमें के विरोध में भारतीय सेनाओं के अन्दर पैदा होने वाला विद्रोह तथा विश्‍व युद्ध के बाद बदली हुई अन्तर्राष्‍ट्रीय परिस्थितियों ने अंग्रेजो को भारत छोड़ने पर मजबूर कर दिया। इन हालात में अंग्रेजो ने अपने सर्वनाश से बेहतर भारत के कुछ खास वर्ग को अपने पक्ष में करके 1947 में एक नया समझौता करना बेहतर समझा। जिसके परिणामस्वरूप भारत-पाक विभाजन की त्रासदी हमें तोहफा में मिली, जिसका दंश हम आज तक झेल रहे हैं। अंग्रजों के जी हजूरी करने वालों ने इसे स्वीकार कर लिया। इसके साथ ही आजादी के मुखौटे की आड़ में साम्राज्यवाद परस्त बन चुके नेतृत्व ने उन सारे कानूनों को भारतीय संविधान में शामिल कर लिया जिसे अंग्रेजों ने इस देश को गुलाम बनाए रखने के लिए बनाया था। इन्‍होंने अंग्रेजों के छद्म लोकतन्त्र की संसदीय व्यवस्था, न्याय प्रणाली, सैन्य व्यवस्था, अधिकारीतंत्र तथा पुलिस व्यवस्था को ज्यों का त्यों स्वीकार कर लिया जो पूर्ण स्वाधीनता के लक्ष्य से गद्दारी थी।

भारत में 1947 में अंग्रेजो की रीति व नीति पर चलने वाले उनके उत्तराधिकारियों के ही हिस्से में आजादी आयी। जिसके फलस्वरूप बढ़ते हुये आज दुनिया के अमीरों की लिस्ट में उनकी संख्या बढ़ती जा रही है। लेकिन करोड़ों-करोड़ भारतीयों के गले में पहले से ज्यादा गुलामी की जंजीर कसती जा रही है और उनकी हालात बद से बदतर होती जा रही है। न सिर्फ हमारे शहीदों के पूर्ण आजादी के अरमानों के साथ धोखा किया गया बल्कि जिन करोड़ो देशभक्त शहीदों की बदौलत अंग्रेजों को भारत छोड़कर जाना पड़ा था, उन्‍हें आज भी अपमानित किया जा रहा है। हमारे शासक वर्ग उन शहीदों को सम्मान तक नहीं देते।

इसके उलट उन शहीदों को अपमानित करते हुये हर 15 अगस्त व 26 जनवरी को, जिसे वे स्वतंत्रता दिवस व गणतंत्र दिवस कहते हैं, बड़े ही तामझाम के साथ दिल्ली में इण्डिया गेट पर जाकर सलामी देते हैं। जिस इण्डिया गेट पर हमारे एक भी देशभक्त शहीद का नाम दर्ज नहीं है। जिसे अंग्रजो ने अपनी रक्षा के लिए मरवाये गये सैनिकों की याद में 1931 में राष्‍ट्रीय स्मारक के रूप में घोषित किया था। 1947में हमें जो भी आधी अधूरी आजादी मिली थी विश्‍व की बदली हुई परिस्थितयों में नये अमेरिकी साम्राज्यवादी शासक वर्ग व बहुराष्‍ट्रीय कम्पनियों का पार्टनर बनकर भारतीय शासक वर्ग व कम्पनियां, भारत के अन्दर नई साम्राज्यवादी लूट व फूट पैदा करने की मुहिम मे शामिल होकर भारत की करोड़ों-करोड़ मेहनतकश जनता को नई साम्राज्यवादी गुलामी में जकड़ते जा रहे हैं।

लेखक गोपाल राय तीसरा स्वाधीनता आन्दोलन के राष्ट्रीय संगठक है.

Comments
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INQILAB ZINDABAD
saba 2010-07-26 16:23:58

I agree for your thought
main aapke saath hoon
inqilab zindabad
dr dinesh verma 2010-07-31 18:01:53

ek or kranti chahiye!
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