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हर मौत की अलग कीमत और मीडिया का चरित्र

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: मीडिया उन्ही ख़बरों को प्रमुखता देता है जिनका उसके व्यावसायिक हितों से सरोकार हो : मुआवजे को लेकर भेदभाव में मीडिया पर भी सवाल उठाना लाजिमी है : मीडिया से शायद ज्यादा उम्मीद करना बेमानी है : एक मुल्क, एक संविधान और एक कानून वाले इस अलबेले हिंदुस्तान में हर इंसान की जिंदगी एक सी नहीं है, यह तो सब जानते हैं, लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण तथ्य यह है इस अनेकता में एकता के ढोल पीटने वाले देश में इंसानी मौत की कीमत भी अलग अलग है. लेकिन उससे भी बड़ा दर्दनाक यह है कि इंसानी मौतों में फर्क की वजह जाने अनजाने मीडिया बनता जा रहा है. हालाँकि आजादी के पहले से लेकर अब तक गरीब और अमीर का फर्क न मिटा है और न मिटेगा लेकिन अब जबकि देश का मीडिया अपने पूरे शबाब पर है ऐसे में उसकी नैतिक जिम्मेदारी तो बनती ही है. शुरुआत करते हैं कुछ आंकड़ों से जिनको पढने में बाद इस लेख को लिखे जाने की वजह आसानी से समझ आ जाएगी.

1984 में हुए भोपाल गैस कांड में शुरूआती तौर पर मारे गए 15 हजार लोगों की मौत की कीमत लगाई गई 25 हजार से 1 लाख रुपए, जबकि दिल्ली के उपहार सिनेमा में मारे गए लोगों के परिजनों को मिले 18 लाख रुपए प्रति व्यक्ति. हाल ही में कई रेल दुर्घटनाओ में मारे गए लोगों के परिजनों को 1 से 2 लाख या ज्यादा से ज्यादा 5 लाख रुपए तक मुआवाज दिया गया, लेकिन जब बंगाल में निकाय चुनाव के ठीक पहिले झाड़ग्राम में रेल दुर्घटना हुई, तो रेल मंत्री ममता बनर्जी अचानक दरियादिल हो गईं और भारी मुआवजे के साथ मारे गए लोगों के परिजनों को रेलवे में नौकरी की घोषणा कर दी. इस साल मई के महीने में हुई तमाम दुर्घटनाएं और उन पर मिला मुआवजा और प्रतिक्रियाएं इस बात को पुष्ट करती हैं कि इस देश में मौत की कीमत भी चेहरा देख कर लगाई जाती है.

इस महीने में मध्य प्रदेश के मंडला समेत कई जगह बस हादसे हुए जिनमे कुल मिलाकर सैकड़ों लोगों ने अपनी जान गंवाई. इसके साथ ही नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर भगदड़ समेत कुछ रेल दुर्घटनाएं हुई, और सबसे बड़ा हादसा मैंगलोर हवाई अड्डे पर एयर इंडिया के विमान के साथ हुआ. लेकिन हर घटना में मारे गए लोगों के परिजनों को मिलने वाली सहायता राशि अलग अलग थी. मसलन मंडला बस हादसे में मारे गए लोगों के परिवार को मिला एक लाख रुपए, रेल हादसों में मारे गए लोगों के परिजनों को 2 से 5 लाख और हवाई हादसे में 75 लाख. यह अन्तर साफ़ बताता है कि यदि आप किसी दुर्घटना का शिकार होते हैं तो आपका परिवार को सरकार तभी ज्यादा सहयोग करेगी जब आप अमीर हो. मेरा यह आशय कतई नहीं है कि हवाई जहाज हादसे में मारे गए लोगों को इतना ज्यादा मुआवजा नहीं मिलना चाहिए. लेकिन गरीबों की जान की कीमत भी इतनी कम न हो की यह केवल खानापूर्ति बनकर रह जाये.

दरअसल प्रदेश और केंद्र सरकार किसी भी दुर्घटना में मारे गए लोगों के परिजनों को सहायता इसलिए देती है ताकि दुःख के समय में यह राशि उस पीड़ित परिवार के काम आ सके. लेकिन इस देश में किसी गरीब की मौत पर मिलने वाला मुआवाज इतना कम होता है की वह उसकी तेरहवीं और बाकी कर्मकांडों में खर्च हो जाता है. ऐसे में यदि मरने वाला घर का मुखिया था तो फिर पूरा परिवार सड़क पर आ जाता है. लेकिन भोपाल गैस कांड त्रासदी से लेकर बाकी हादसों तक में मुआवजे को लेकर भेदभाव में मीडिया पर भी सवाल उठाना लाजिमी है. क्‍योंकि अपने फायदे के लिए मीडिया उन्ही ख़बरों को प्रमुखता देता है जिनका उसके दर्शकों या पाठकों की संख्या या व्यावसायिक हितों से सरोकार हो. यदि ऐसा न होता तो गाँव और गलियों के हादसों को भी मीडिया में थोड़ी बहुत जगह मिलती और यही जगह उस हादसे के शिकार लोगों के परिवारों के लिए बहुत बड़ा सहयोग कर सकती थी.

आज  भोपाल गैस कांड के 25 साल बाद मिले न्याय के बाद देश भर का मीडिया अन्याय के खिलाफ मुहीम चलता दिख रहा है. खोज खोज कर इस घटनाक्रम में अन्याय करने वालों को तलाशा जा रहा है लेकिन खुद मीडिया अपने अन्याय को नहीं तलाश रहा है. देश में प्रिंट मीडिया तब भी शक्तिशाली था जब या घटना हुई थी. इसके बाद भी इस घटना के लाखों पीड़ितों की आवाज को मुहिम कभी नहीं बनाया गया. साल 2000 के बाद से पिछले 10 साल में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया भी बेहद प्रभावशाली और जन- जन की पहुंच में हो गया है, तब न तो किसी को भोपाल की याद आई और न ही गैस पीड़ितों की. यदि इन सालों में गैस पीड़ितों से होने वाले संभावित अन्याय को लेकर मुहिम चलाई जाती तो शायद 7 जून 2010 का काला दिन देखने को नहीं मिलता, यदि पिछले 10 सालों में प्रयास होते तो शायद यह फैसला कुछ और होता.

यही नहीं यदि ये प्रयास वाकई दिल से किये जाते तो हमें एंडरसन तो नहीं, डाव केमिकल से गैस पीड़ितों को कुछ उचित मुआवजा जरुर मिल जाता और भारतीय आरोपियों को ज्याद सजा. लेकिन अब लकीर पीटने से कोई फायदा नहीं. यदि मीडिया की इस मुहिम के बाद अदालत में दोबारा अपील के जरिये मामले शुरू भी हो गया तो अगले फैसले तक तो शायद ना ही 90 साल का एंडरसन जिन्दा बचेगा और ना ही कई और आरोपी. ऐसे में अपनी टीआरपी और प्रसार संख्या की उधेड़बुन में खोई मीडिया से शायद ज्यादा उम्मीद करना बेमानी है, लेकिन दुआ करते हैं कि शायद कभी अपने फायदे से इतर भी कोई सोचे और कम से कम किसी घटना या  त्रासदी पर बिना भेदभाव काम करे, तो शायद इन्साफ के लिए कानून से नाराज लोग मीडिया को ज्यादा तवज्जो दें.

लेखक सचिन चौधरी भोपाल में महुआ टीवी न्‍यूज के रिपोर्टर है.

Comments
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janta khud doshi hai.
tarun sharma 2010-07-23 13:30:29

janta khud doshi hai. haan chaudhry ji dekheye na aapne kitna achha isue uthaya hai par comment zero kyunki hamare desh me sab so rahen hain sabko lagta hai mere saath to nahi hua na dunia jaye bhhad me .ye gandi maansikta he ek din is desh ko le doobegi.
desh ki sacchai batai
pankaj nayak 2010-07-23 21:56:31

:D tumhare lekh ne to sach much desh ki kamiyon ko ujagar kiya hain bahut accha likha hai
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