: गोपनीय ढ़ांचे को भंग करके उसे खुली जन पार्टी बना दी है : बदबूदार धुंआ-गैस छोड़ते हुए उड़न-छू हो गये : पूंजी की पैठ गांवों तक हो गयी है : पूंजी की मार से गांवों से बड़े पैमाने पर पलायन हो रहा है : वरिष्ठ पत्रकार आनंद स्वरूप वर्मा द्वारा नेपाल पर बनाये गये वृत्त चित्र ''फ्लेम्स ऑफ दि स्नो'' पर सेंसर बोर्ड ने रोक लगा दी है। इस रोक का स्वागत करने या उस पर ऐतराज उठाने से पहले जरूरी है कि कुछ सवालों पर विचार कर लिया जाए। समाज को इतिहास विकास की अगली मंजिल में ले जाने और विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के पैरों में पड़ी बेडि़यों को तोड़ने के लिए मार्क्सवाद का जन्म हुआ, जो कि विकास करते-करते आज माओवाद हो चुका है, जिसमें कि लेनिन और माओ के अवदान समाहित हैं। पूंजीवाद की तरह ही मार्क्सवाद-लेनिनवाद भी एक सिस्टम है और जब एक सिस्टम दूसरे सिस्टम से लड़ता है तो अखाड़े का मैदान सबसे पहले विचारधारा का क्षेत्र हुआ करता है। प्रभुत्व प्राप्त करने के लिए नग्न, निरंकुश फौजी ताकत का इस्तेमाल बाद में किया जाता है पहले अपने पक्ष में जनमत का निर्माण किया जाता है। जब तक समाज में वर्ग हैं ऐसा होता रहेगा।
अग्नि वर्षा है तो है बर्फबारी है तो है
मौसमों के दरमियां एक जंग जारी है तो है
अब चूंकि सर्वहारा क्रांति दो हजार वर्षों के संपत्ति संबंधों से जुड़ी आदतों से आमूलगामी विच्छेद होगी इसलिए उसकी तैयारियां भी चहुंमुखी होंगी और मार्क्सवाद के प्राधिकार को कायम करने के लिए हर प्रकार के रचनात्मक उपाय किये जाएंगे। आनंद स्वरूप जी पक्षधर बुद्धिजीवी के रूप में विचारधारा के इसी डोमेन में सक्रिय हैं और वह भी व्यवस्था की चौहद्दी के भीतर। वर्मा जी कुछ ज्यादा नहीं बस अभिव्यक्ति की वही आजादी मांग रहे हैं हमारे महान लोकतंत्र ने जिसे देने का वादा किया हुआ है। लेकिन, अफसोस की बात यह है कि स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के नारे की तरह ही अभिव्यक्ति की आजादी का सुथन्ना भी तार-तार हो चुका है। पत्रकार साथियों को इस बारे में कुछ अधिक बताने की जरूरत नहीं, वे अपने-अपने अनुभवों से इसकी सच्चाई से बखूबी परिचित हैं। आइये अब मूल मुद्दे पर लौटते हैं। वृत्तचित्र पर रोक लगाने के पीछे सेंसर बोर्ड ने यह तर्क पेश किया है कि यह माओवाद-नक्सलवाद का प्रचार करता है। माओवाद-नक्सलवाद की एक सुर में निंदा-भर्त्सना तो खूब की जाती है लेकिन मीडिया में कभी भी इसका जिक्र नहीं आता कि दरअसल यह है क्या। और तो और सूचनाओं को सनसनी की शक्ल में पिरोने में दक्ष पत्रकार आलोक तोमर एवं जितना पढ़ा नहीं होगा उससे ज्यादा लिखकर ढेर लगा देने वाले राजकिशोर भी इस मसले पर प्रकारांतर से अपनी अज्ञानता जाहिर कर चुके हैं।
वर्ष 1967 में मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पाटी के संशोधनवाद के खिलाफ उसके जिन नेताओं और कार्यकर्ताओं ने बगावत का झंडा बुलंद किया उन्हें नक्सली कहा जाता है। नक्सली नाम इसलिए पड़ा कि इस विद्रोह की शुरुआत बंगाल के दार्जिलिंग जिले की नक्सलबाड़ी नामक जगह से हुई। यहां यह जरूरी हो जाता है कि संशोधनवाद शब्द को स्पष्ट किया जाये ताकि मामले के सार तक पहुंचा जा सके। इसके लिए थोड़ा इतिहास में जाकर झांकना पड़ेगा। मार्क्सवाद की प्रयोगभूमि रूस में सबसे पहले प्लेखानोव ने मार्क्सवाद के बीज रोपे। कालांतर में लेनिन के नेतृत्व में बोल्शेविकों ने तय किया कि राज्य की सुसंगठित सत्ता से मुकाबला करने के लिए कम्युनिस्ट पार्टी का एक गोपनीय ढ़ांचा होना चाहिए और उसे चवन्नी मेंबरी वाली जन पार्टी नहीं होना चाहिए। हम देख सकते हैं कि समकालीन माकपा ने इस बुनियादी उसूल की धज्जियां उड़ाते हुए पार्टी के गोपनीय ढ़ांचे को भंग करके उसे खुली जन पार्टी बना दी है। कमयुनिस्ट पार्टी मजदूर वर्ग का अगुआ दस्ता होती है लेकिन उसके सदस्य भी इसी वर्ग समाज से आते हैं और अपने साथ वर्ग समाज की आदतों को भी ले आते हैं।
पार्टी जहां समाज पर असर डालती है वहीं वह उससे प्रभावित भी होती रहती है। पार्टी के भीतर अगर जनतंत्र और दो दिशाओं का संघर्ष होता है तो वह आगे की मंजिलों की ओर विकसित होती रहती है और ऐसा नहीं होने पर नौकरशाहाना प्रवृत्तियां और दूसरी कुरूपताएं सतह पर आने लगती हैं और इसकी तस्दीक समकालीन माकपा पर गौर करके की जा सकती है। माकपा ने इंकलाब का झंडा कब से उखाड़ फेंका है और उसके बड़े नेता संसद-राज्य विधानसभाओं की गद्देदार कुर्सियों में बैठकर एसी की हवा खाने में मस्त हैं। दो दिशाओं के संघर्ष वाली बात पर अलग से स्पष्ट हो लेना मुझे आवश्यक लगता है। समाजवाद भी अंतत: वर्ग समाज ही होता है क्योंकि मजदूरी का भुगतान हर व्यक्ति को उसके काम के हिसाब से किया जाता है न कि उसकी जरूरत के अनुसार और कहना न होगा कि हर व्यक्ति की क्षमताएं अलग-अलग होती हैं। कम्युनिस्ट पार्टी की आवश्यकता ही इसीलिए पैदा होती है कि समाज में चेतना के धरातल में अंतर पाया जाता है और जैसे-जैसे यह अंतराल कम होता जाता है, वैसे-वैसे पार्टी की भूमिका कम होती जाती है।
पार्टी के भीतर कुछ ऐसे तत्व होते हैं जो पूंजीवाद के राही होते हैं और आगे की ओर उसकी विकास यात्रा को रोकते हैं। पार्टी के भीतर अगर केंद्रीयता के साथ-साथ जनवाद होता है तो दोनों तरह के तत्व आपस में संघर्ष करते हैं और पार्टी की यात्रा आगे की ओर जारी रहती है। ऐसा नहीं होने पर पार्टी पतित होकर बुर्जुआ पार्टी बन जाती है। हमारे देश में माकपा इसकी जिंदा मिसाल है। शुरुआती दिनों के हमारे मार्क्सवादी साथी कामरेड सूर्यदेव उपाध्याय, जो कि भौतिक रूप से अब हमारे बीच नहीं हैं, एक दफा आपसी बातचीत में बताया था कि उनकी युवावस्था के दिनों में कुछ नौजवान इस तर्ज पर इंकलाब करने के लिए पार्टी में आये थे कि सजनी हमहूं राजकुमार ... लेकिन जब पार्टी ने उनसे संपत्ति संबंधों से निर्णायक विच्छेद करते हुए अपनी समस्त संपदा पार्टी को देने की बात कही तो बदबूदार धुंआ-गैस छोड़ते हुए उड़न-छू हो गये। सिर्फ यही नहीं अपने स्व को केंद्र में रखकर तरह-तरह के घटिया आरोप भी लगाना नहीं भूले। ठीक ही कहा गया है कि मामला जब संपत्ति के मालिकाने का हो तो लोग रेखागणित के प्रमेयों को भी झुठलाने लगते हैं।
हमारे देश में जिन्हें माओवादी कहा जाता है सारतत्व के रूप में वे क्रांति करने को उतावले लोग हैं जिनके पास न तो क्रांति का विज्ञान है और न ही जनता को संगठित करने का धैर्य। ये लोग दंडकारण्य के दुर्गम इलाकों में रहने वाले आदिवासियों के लिए किसी खुदाई खितमतगार से कम नहीं हैं। पिछड़ी चेतना और निहायत पिछड़े उत्पादन क्षेत्रों में सक्रिय इन माओवादियों की कार्य-पद्धति पर रहस्यवाद का मोटा पर्दा पड़ा हुआ है और इसकी आड़ में ये लोग सैन्य नेतृत्व को कमान में रखकर चल रहे हैं न कि राजनीतिक नेतृत्व को। माल उत्पादन विश्व-व्यापी परिघटना के रूप में हमारे सामने है लेकिन दंडकारण्य और कुछ दूसरे मुख्तलिफ इलाकों में सक्रिय माओवादी नामधारी इन मध्यवर्गीय लोगों की नजर में हमारे यहां अभी भी सामंतवाद कायम है।
हमारे गांव की पंडिताइन पड़ोसी को आलू बेचने से पहले निकटवर्ती बाजार में उसकी कीमत जरूर मालूम करती हैं। कहना न होगा कि पूंजी की पैठ गांवों तक हो गयी है और वे भी राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय बाजारों से जुड़ चुके हैं, लेकिन इन माओवादियों का शहरी मजदूरों के बीच कोई काम नहीं है। साल भर में कुछेक पुलिस वालों को मारकर उन्हें लगता है कि क्रांति कर रहे हैं। अभी हाल में इन माओवादियों द्वारा जनता को मारे जाने की कुछ अपुष्ट सूचनाएं सामने आई हैं जो कि समवेत स्वर में निंदा-भर्त्सना के लायक हैं। निचोड़ के तौर पर यकीन के साथ कहा जा सकता है कि नक्सलवादी-माओवादी नामधारी लोगों का माओवाद के साथ कोई संबंध नहीं रह गया है। ये बस अराजकता फैला रहे हैं और विचारधारा को निरंतर बदनाम कर रहे हैं। भारतीय राज्य को अगर अपने ऊपर भरपूर यकीन है कि वह अवाम का सच्चा हमदर्द है और यह कि भविष्य की स्वर्णिम इबारत उसके द्वारा ही लिखी जाएगी तो फिर डर किस बात का।
आनंद स्वरूप वर्मा जैसा लोगों को अपने विचारो का अनेकश: तरीकों से प्रचार-प्रचार करने दीजिए, जनता स्वयं ही अपना पक्ष तय कर लेगी। पूंजी की मार से गांवों से बड़े पैमाने पर पलायन हो रहा है। किसान आबादी अपनी जगह जमीन से उजड़कर शहर की मलिन बस्तियों में इजाफा करती जा रही है। मजदूर वर्ग रसातल की जिंदगी जी रहा है। बुनियादी सुविधाएं और शिक्षा-चिकित्सा आदि मुहैया कराना राज्य की जिम्मेदारी है यह कहने पर मजदूर अकबका जाते हैं मानो विश्वास नहीं कर पा रहे हों। सुविधाओं और शिक्षा-चिकित्सा अशिक्षा-चिकित्सा है। किसान आबादी बड़ी तेजी से शहरीकरण और सर्वहाराकरण हो रहा है और केंद्रीय हुकूमत भौचक है कि इस समस्या से कैसे निजात पाये। नरेगा जैसी योजनाएं मजदूरों के शहरों की ओर पलायन को रोकने के लिए क्रियान्वित की गयीं लेकिन वही ढाक के तीन बात। मार्क्सवाद की स्वीकार्यता का भौतिक आधार तैयार हो रहा है और घोर जनविरोधी हुकूमतें सिर्फ फासिस्ट तरीके अपनाकर ही पूंजीवाद का परचम उठाये रख सकती हैं। वर्मा जी हिम्मत पस्त करने की जरूरत नहीं अवाम आपके साथ है, इतिहास आपके साथ है।
आमीन!!!
लेखक कामता प्रसाद पत्रकार हैं तथा लखनऊ में रहते हैं.