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बच गये बेचारे सूर, तुलसी वरना कचड़े के ढेर में होते!

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डॉ.रुक्म त्रिपाठी: इतना दंभ आपमें कहां से भर गया : साहित्कार होने के नाते ढाई लाख का पुरस्कार मिला है :  एक पत्रकार और कहानीकार, जिन्हें आप सहज ही पहचान जायेंगे वे आयु में सत्तर पार कर चुके हैं किंतु अपने को नये लेखकों का ‘गॉडफादर’ ढाई  मानते हैं और उन्हें मंच देने के लिए पुरानी पीढ़ी के रचनाकारों की अपेक्षा उन्हीं की रचनाएं छापते हैं। उनका कहना है, ‘नितांत नये लेखकों की पुस्तकें किसी भी स्थापित लेखक से कम नहीं बिकतीं। नये लेखकों की पुस्तकों के दूसरे संस्करण भी छप रहे हैं। इसका कारण है कि नये लेखकों का सृजन फलक बड़ा है। मेरी समझ से नयी पीढ़ी, हवा के ताजे झोंके की तरह आयी और पुरानी पीढ़ी द्वारा फैलाये गये प्रदूषण को बुहार कर कूड़े के ढेर में फेंक दिया। इनके कथ्य, इनकी भाषा, इनकी संवेदना और तेवर बिल्कुल नये और ताजे हैं, जो हर उम्र के पाठकों को मोह रहे हैं।’ (जैसे आप जैसे सत्तर वर्षीय युवा संपादक को मोह रहे हैं)।

बड़बोले जी! हमें आश्चर्य है कि शिक्षा विभाग आज भी छोटी कक्षाओं से लेकर स्नातकोत्तर तक पुरानी पीढ़ी के रचनाकारों के प्रदूषण फैलाने वाले साहित्य को पाठ्यक्रम के रूप में क्यों रखे है? उसे कूड़ेदान में फेंक कर नयी पीढ़ी के साहित्य को क्यों नहीं रखता? कथाकार प्रेमचंद, ‘कामायनी’ के रचनाकार जयशंकर प्रसाद, निराला, पंत, अमृतलाल नागर, भैरवप्रसाद गुप्त, आचार्य शिवपूजन सहाय, यशपाल, कृष्णचंदर आदि की पुस्तकों के अब तक दर्जनों संस्करण निकल चुके हैं और आगे भी निकलेंगे। पाठकों में प्रदूषण फैलानेवाले इनके साहित्य को कूड़े में क्यों नहीं फेंक दिया जाता?

बड़बोले जी को इस ज्ञान की प्राप्ति तब हुई , जब उनके राज्य से उन्हें वहां का निवासी साहित्कार होने के नाते ढाई लाख का पुरस्कार मिला है। (किसी अन्य राज्य ने उनके साहित्य सृजन का ऐसा मूल्यांकन क्यों नहीं किया?)।उनका कहना है कि अब मैं ढाई लाख से कम का पुरस्कार ग्रहण नहीं करूंगा। लाख रुपये के पुरस्कार छुटभैयों के लिए छोड़ रहा हूं। शायद उन्हें पता नहीं है (बड़े नगरवासी होने के कारण) कि नयी शैली की कहानियों और छंदमुक्त कविताओं के पाठक मुश्किल से बीस प्रतिशत हैं, जबकि प्राचीन साहित्य ग्रामीण पाठकों में आज भी लोकप्रिय है, जो बार-बार पढ़ा जाता है। विश्वास न हो तो गांवों के पाठकों की रुचि का सर्वे करवा कर देख लीजिए। मेरा जन्म गांव में हुआ है इसलिए मैं आज भी वहां देवकीनंदन खत्री और प्रेमचंद के उपन्यास तथा कहानियों को बड़े चाव से पढ़ते देखता हूं।

क्षमा करें बड़बोले जी! आपने सत्तर से अधिक उम्र का होते हुए भी पुरानी पीढ़ी के सम्माननीय, आपसे अधिक प्रतिष्ठित विद्वान लेखकों की रचनाओं को प्रदूषण फैलानेवाला कहा इसलिए बरदाश्त नहीं हुआ। आप भी तो मां के पेट से साहित्य सीख कर नहीं आये, इस प्रदूषण (आपकी भाषा में, हम तो इसे पावन चंदन की सुगंध मानते हैं) को पढ़ कर ही तो आपने साहित्य सृजन की शक्ति और सामर्थ्य पाया। यह तो आपका आधार है इसे ही काट देंगे तो औंधे मुंह जमीन पर आ गिरेंगे। एक बात और कहा गया है कि विद्या ददाति विनयम् विनयात यात पात्रताम् यानी विद्या विनय देती है और विनयी भाव से ही व्यक्ति में पात्रता या योग्यता आती है। इतना दंभ आपमें कहां से भर गया कि आप उस साहित्य के शलाका पुरुषों को ही कचड़ा कहने लगे जिसे सीख कर आप आज इतनी ऊंचाई पर पहुंचे हैं।

बड़बोले जी! ऊंचाई में चढ़ने के बाद उन सीढ़िय़ों को नहीं भूला करते जिनके सहारे आप वहां पहुंचे हैं खुदा न खास्ता कल ऊंचाई आपको नकार दें तो आप कहां जायेंगे। काश आपको साहित्य का नोबल पुरस्कार मिल गया होता तो पता नहीं सूर, तुलसी, रहीम, कबीर, बिहारी, केशव,पद्माकर, केशव, विद्यापति आदि की ये कैसी आरती उतारते। हम नये रचनाकारों के साहित्य सृजन विरोधी नहीं हैं। उनमें नयी दृष्टि,  नयी शैली और नया सोच है। वे बेहतर लिख रहे हैं। साहित्य में नया रंग,  नया प्रकाश ला रहे हैं। युग परिवर्तनशील है और साहित्य में भी यह परिवर्तन सुखद संकेत और इसकी श्री वृद्धि का परिचायक है लेकिन शायद वे भी अपने शलाका पुरुषों (जिनके साहित्य ने उन्हें राह दिखायी) को कचड़ा या प्रदूषण फैलानेवाला नहीं कहेंगे। बड़बोले जी! माफ कीजिएगा सूरज पर थूकने से अपने ही सिर पर आ गिरता है। संभलिए और अपने से बड़ो को सम्मान देना सीखिए। आप साधारण इंसान हैं खुद को साहित्य का भगवान मानने का भ्रम मत पालिए। लिखना कम समझना ज्यादा। आशा है अन्यथा नहीं लेंगे।

लेखक डॉ.रुक्म त्रिपाठी कई किताबें लिख चुके हैं, अनेक पत्र-पत्रिकाओं में संपादन भी कर चुके हैं. सात दशक से अधिक समय तक पत्रकारिता करने के बाद इन दिनों स्‍वतंत्र लेखन कर रहे हैं.

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